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Details Of Tourist Places - उत्तराखंड के प्रसिद्ध पर्यटन स्थलों का विवरण

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 12, 2007, 03:33:08 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


देवप्रयाग

भारत और नेपाल के सर्वाधिक दिव्य एवं धार्मिक स्थानों में से एक माना जाने वाला देवप्रयाग पौराणिक विरासत का धनी है तथा इस पावन स्थल से कई देवी-देवता संबद्ध रखते हैं। यही वह जगह है जहां भारत की नदियों में सर्वाधिक पावन नदी, गंगा का उद्बव भागीरथी नदी एवं अलकनंदा नदी के संगम से हुआ और यह तथ्य देवप्रयाग को वह पवित्रता प्रदान करता है जो अन्य किसी स्थान को प्राप्त नहीं है। अलकनंदा पर पांच संगमों (पंच प्रयाग) में से देवप्रयाग को सर्वाधिक धार्मिक कहा गया है। स्कंद पुराण के केदारखंड में देवप्रयाग पर 11 अध्याय हैं।

ऐतिहासिक महत्व के स्थान

देवप्रयाग, भारत तथा नेपाल के 108 अत्यंत दिव्य स्थानों में से एक माना जाता है तथा पौराणिक तौर पर इस समृद्ध पवित्र स्थल से कई देवी-देवता जुड़े हैं। यही वह स्थान है जहां भारत के पवित्र नदियों में सबसे पवित्र गंगा यहां भागीरथी तथा अलकनंदा का संगम है और यही तथ्य देवप्रयाग को अधिकाधिक पवित्र बनाती है जो देश के बहुत ही कम स्थान दावा कर सकते हैं। इन्हीं कारणों से भागीरथी के पांच संगमों (पंच-प्रयाग) में देवप्रयाग को सबसे पवित्र माना जाता है। केदार खंड के स्कंद पुराण में देवप्रयाग को 11 अध्याय समर्पित हैं। भागीरथी की तेज गति से प्रवाहित हल्की मटमैली भागीरथी का जल यहीं स्वच्छ हरे रंगों में अलकनंदा की बहती जल से मिलकर पवित्र नदी गंगा बनती हैं।

संगम पर क्रम में बने कई सीढ़ियों के साथ बने घाट संगम तक जाती है। रघुनाथ मंदिर में पूजा से पहले आवश्यक है कि भक्त इस संगम पर स्नान करें।

अनंत काल से यह संगम साधुओं तथा संतों के लिये तपस्या का स्थान रहा है।


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कीर्तिनगर

कीर्तिनगर एक छोटा पर महत्त्वपूर्ण स्थान है। इसने उस आंदोलन को देखा है जिसके कारणवश टिहरी गढ़वाल का भारतीय संघ में विलय हुआ, जब नागेन्द्र सकलानी तथा मोलू राम जैसे स्वतंत्रता सेनानियों को राजा के सैनिकों ने गोली से मार डाला। प्राय: भूल से श्रीनगर का विस्तार मान लिया जाने वाला, यह शहर धार्मिक नदी अलकनंदा के विपरीत किनारे पर बसा है तथा इसके आसपास कुछ प्राचीन एवं रूचिकर स्थान हैं। यह शहर टिहरी जिला प्रशासन की चौकी भी है जहां एक छोटा पर व्यस्त बाजार है जो कार्यकलापों का केंद्र भी है।

ऐतिहासिक महत्त्व के स्थान

कीर्तिनगर में नहीं है, निकटतम स्थान है: श्रीनगर


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मुनि की रेती

मुनि की रेती - पवित्र चार धाम तीर्थयात्रा का एक समय में प्रवेश द्वार - आज गलतीवश ऋषिकेश का एक भाग समझा जाता है। लेकिन पवित्र गंगा के किनारे तथा हिमालय की तलहटी में अवस्थित इस छोटे से शहर की एक खास पहचान है। मुनि की रेती भारत के योग, आध्यात्म तथा दर्शन को जानने के उत्सुक लोगों का केन्द्र है, यहां कई आश्रम हैं जहां स्थानीय आबादी के 80 प्रतिशत लोगों को रोजगार मिलता है और यह जानकर आश्चर्य नहीं होगा कि यह विश्व का योग केन्द्र है। अनुभवों के खुशनुमा माहौल में प्राचीन मंदिरों, पवित्र पौराणिक घटना के कारण जाने वाली स्थानों, तथा एक सचमुच आध्यात्मिक स्वातंत्र्य का एक ठोस वास्तविक अहसास - और वो भी आरामदायक आधुनिक होटलों, रेस्टोरेन्ट तथा भीड़भाड़ वाले बाजारों में - उपलब्ध है। यहां इजराइली तथा इटालियन व्यंजनों के साथ शुद्ध शाकाहारी भोजन मिलता है, भजन-कीर्तन एंव आरती के साथ टेकनो संगीत, एक ओर पर्यटक गंगा में राफ्टिंग करते हैं और दुसरी और भक्त इसमें स्नान करते हैं; इनमें से जो भी आप ढुंढ रहे हैं, मुनि की रेती में ही आपको मिल जायेगा।

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नरेन्द्र नगर स्थित

यमुनोत्री एवं गंगोत्री के रास्ते पर ऋषिकेश से 16 किलोमीटर से भी कम दूरी पर निचले हिमालय क्षेत्र में नरेन्द्र नगर स्थित है, जिसने पहले के रजवाड़ों से संबद्ध पुराने समय की मनोहरता को बरकरार रखा है। यह वर्ष 1919 में टिहरी रियासत की राजधानी बना जब राजा नरेन्द्र शाह ने टिहरी से प्रशासनिक केन्द्र हटा लेने का निर्णय किया। वर्ष 1949 में उसके तत्कालीन राजा ने नरेन्द्र नगर को स्वाधीन भारत में विलय कर लिया। वर्ष 1989 तक यह शहर टिहरी गढ़वाल जिले का मुख्यालय था जब प्रशासनिक केंद्र को वापस टिहरी लाया गया। आज यह एक शांतिदायक शहर प्रतिष्ठा को प्रवाहित करता है तथा अपने अद्भुत सूर्यास्त, दूनघाटी के मनोरम दृश्य, गंगा तथा हिमालय क्षेत्र के पुराने राजमहल में स्थित आनंदा एन द हिमालया रिसार्ट एवं वार्षिक रूप से आयोजित कुंजापुरी मेला के लिये प्रसिद्ध है।

ऐतिहासिक महत्व के स्थान

नाम : नंदी बैल
दिशा : प्रमुख सड़क पर, मुख्य बाजार के विपरित
परंपरागत/
ऐतिहासिक महत्व : प्रस्तर-प्रतिमा का गठन प्रसिद्ध गढ़वाली शिल्पकार अवतार सिंह पंवार द्वारा वर्ष 1960 में किया गया तथा नगर पालिका द्वारा उदघाटित हुआ।
विशेष मंतव्य : उत्तरी भारत में नंदी बैल की यह सर्वाधिक बड़ी प्रस्तर-प्रतिमा है (भगवान शिव की सवारी)




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टिहरी

नई टिहरी की स्थापना तब हुई जब भागीरथी पर विशाल टिहरी हाईडेल प्रोजेक्ट का निर्माण शुरू हुआ। नदी पर बांध बांधने तथा विशाल जलाशय टिहरी झील के बनने से पुरानी टिहरी के वासियों का पुर्नवास इस नये शहर में हो गया। अब नई टिहरी अपनी नई संस्कृति तथा अपना एक नया इतिहास रचने की प्रक्रिया में है। नये शहर में एक नई जीवन शैली, एक नई सोच तथा एक नई दृष्टि दिखायी पड़ती है। एक ओर समुदाय का अपनी विरासत तथा परंपरा की ओर गहरा लगाव है, दूसरी ओर वह उत्तराखंड की उन्नति एवं संपन्नता की दिशा में अग्रसर है।

नाम  :
जिला कारागार, नई टिहरी
दूरभाष  :
01376-232007

व्यक्ति गण (जिनसे संपर्क किया जा सकता है) :
जेलर
स्थापना :
वर्ष 1992 में सरकार द्वारा नई टिहरी में, (पहले वर्ष 1910 से पुरानी टिहरी में)


पारम्परिक/ ऐतिहासिक महत्त्व  :
श्री देव सुमन, स्वतंत्रता सेनानी की हथकड़ी, 24 जुलाई, 1944 को 84 दिनों का ऐतिहासिक आमरण अनशन, और वे मर गये।


अन्य विशेषताएं/विशेष रूचि  :
25 जुलाई (मेला) प्रदर्शनी की शुरूआत दिवस (प्रति वर्ष)

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दुगड्डा

सिलगढ़ एवं लंगूरगढ़ नदियों के बीच स्थित होने के कारण इस शहर का नाम दुगड्डा पड़ा। यह एक ऐसा शहर है जिसने अतीत में संपन्नता एवं उन्नति के दिन देखे हैं। 19वीं सदी के अंत एवं 20वीं सदी के प्रारंभ में यह एक महत्त्वपूर्ण वाणिज्यिक केंद्र था। पौड़ी, तत्कालीन टिहरी रियासत की राजधानी श्रीनगर एवं बद्रीनाथ के रास्ते में पड़ने के कारण यहीं से इन जगहों के लिये आवश्यक सामग्रियों की आपूर्ति की जाती थी। यहां सर्वदेशीय संस्कृति का विकास हुआ, क्योंकि सुदूर मारवाड़ से आकर व्यापारी इस धनी शहर में बस गये। भारतीय स्वाधीनता संग्राम के दौरान इसने कई जाने-माने स्वतंत्रता सेनानियों की मेजबानी की। आज यह सुप्त शहर आगन्तुकों को शांतिपूर्ण छुट्टी प्रदान करता है तथा गौरवशाली भविष्य के सपने दिखाता है।

ऐतिहासिक महत्व के स्थान

नाम :
चन्द्रशेखर स्मृति वृक्ष
पता
:
दुगड्डा से 3 किलोमीटर दूर सेंधीखल-रथुआढ़ाब रोड पर, नाथुपुर गांव के नजदीक, पौड़ी गढ़वाल, उत्तरांचल
व्यक्ति गण (जिनसे संपर्क किया जा सकता है) :
रेंज आफिसर, दुगड्डा
स्थित :
दुगड्डा सेंधीखल-रथुआढ़ाब रोड
स्थापना :
वर्ष 1930 में नगर पालिका दुगड्डा द्वारा 
बन्द :
सभी दिन खुला
 
पारम्परिक/ऐतिहासिक महत्व :
जुलाई 1930 में प्रशिक्षण के दौरान अपने क्रांतिकारी साथी (जो नजदीक के गांव नाथुपुर) हजारी लाल चैल बिहारी, विश्वेशरी दयाल तथा भवानी सिंह रावत के साथ शहीद चन्द्रशेखर आजाद के महान निशानेबाजी का यह पेड़ एक मुक गवाह है।
 
अन्य विशेषताएं/विशेष रूचि :
शहीद चन्द्रशेखर आजाद तथा उनके साथियों को नाथुपुर गांव के निवासी भवानी सिंह रावत ने जुलाई 1930 के दौरान काकोरी डकैती के समय आमंत्रित किया था।

शहीद चन्द्रशेखर आजाद से जूड़े होने के सम्मान में नगर पालिका दुगड्डा द्वारा इस पेड़ के नजदीक चन्द्रशेखर आजाद मेमोरियल पार्क विकसित किया गया है। मई 1986 में भवानी सिंह रावत के समाधि का भी उदघाटन किया गया। प्रत्येक वर्ष 27 फरवरी को रामलीला मैदान, धनीराम बाजार, दुगड्डा में शहीद चन्द्रशेखर आजाद मेला आयोजित होता है तथा यहीं से शहीद यात्रा भी प्रांरभ होता है।



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कोटद्वार

कोटद्वार नाम का अर्थ होता है– कोट या पहाड़ी तथा द्वार अर्थात् पहाड़ियों का द्वार। प्रभावस्वरूप यह गढ़वाल की पहाड़ियों का प्रवेश द्वार है जो सदियों से रहा है। यह विकास का अग्रदूत भी है। आज यह हमारे उत्तराखंड का महत्वपूर्ण शहर है तथा राज्य में बड़ी मात्रा में वाणिज्य को नियंत्रित करता है। कई औद्योगिक इकाइयों के साथ इसका द्रुत औद्योगीकरण यहां हो रहा है, पर यहां एक गहरी परंपरा की जड़ों से प्रगतिशील उद्यमशीलता का भाव प्रमुख है। आगामी दिनों में उत्तराखंड में होने वाले सक्रिय परिवर्तनों में कोटद्वार की भूमिका महत्वपूर्ण साबित होगी।

ऐतिहासिक महत्व के स्थान (पूजा स्थल के अलावा)


नाम : कण्वाश्रम
स्थित : कोटद्वार से 12 किलोमीटर दूर पूरानी हरिद्वार रोड पर मलिन नदी के तट के किनारे
 
पारम्परिक/
ऐतिहासिक महत्व  : कण्व ऋषि का आश्रम वह स्थान है जहां ऋषि विश्वामित्र ने तपस्या किया था। इन्द्र ने उनकी साधना भंग करने के लिए मेनका नामक अप्सरा को भेजा। वह इसमें सफल रही तथा शकुंतला नामक पूत्री को जन्म दिया जिसका विवाह हस्तिनापुर के राजकुमार से हुआ एवं उन्होंने भरत को जन्म दिया। यह मान्यता है कि बाद में उनके ही नाम पर इस देश का नाम भारत पड़ा।

पुरातत्व के अनुसार असली आश्रम समय के साथ-साथ नष्ट हो गया लेकिन एक नया मंदिर का निर्माण लगभग 40 वर्षो पहले हुआ जहां कण्व, भरत, शकुंतला, दुष्यन्त तथा सिंह के शावकों की प्रतिमाएं हैं।
 
अन्य विशेषताएं/विशेष रूचि : ठहरने की व्यवस्था अतिथि गृह में उपलब्ध है, कण्वाश्रम गढ़वाल मंडल विकास 

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पौड़ी

कुमाऊं में अल्मोड़ा की तरह ही, गढ़वाल में पौड़ी को सबसे पुराना प्रशासनिक शहर होने की विशिष्टता प्राप्त है। वर्ष 1815 में यह ब्रिटिश गढ़वाल का प्रशासनिक केन्द्र बना और आज भी यह जिला एवं गढ़वाल मंडल का मुख्यालय है। शहर की प्रसिद्धि के अन्य दावे भी हैं। मेजर जनरल (अवकाश प्राप्त) बी. सी. खंडूरी (वर्तमान मुख्यमंत्री) तथा नरेन्द्र सिंह नेगी, गढ़वाल के प्रसिद्ध गीतकार, जैसे सर्वाधिक प्रसिद्ध लोगों का यह घर है। यह हिमालय का एक अद्भुत दृश्य प्रस्तुत करता है तथा इसकी स्वास्थ्यवर्द्धक जलवायु एवं प्राकृतिक सुंदरता इसके आकर्षण को बढ़ा देते हैं। एक पर्यटक के रूप में आप पौड़ी की यात्रा संतोषजनक पायेंगे, चाहे वह मैदानों की गर्मी एवं धूल से दूर जाकर आराम के लिये हो, या यहां के स्थानों को देखना हो या मात्र यात्रा के लिये ही हो।

ऐतिहासिक महत्व के स्थान

पौड़ी में एक महत्वपुर्ण ऐतिहासिक स्थल धारा रोड पर स्थित है-एक छोटा पत्थर का ढ़ांचा। पहले इस स्थान पर एक प्राकृतिक जल श्रोत था। यह एक समय में यहां के लोगों के लिए जल का मुख्य श्रोत था और यहां जल, नाग देवता मंदिर से गुल (एक पथरीला नाला) के द्वारा यहां पहुंचता था। बस स्टेण्ड से इस स्थान तक एक कीचड़ युक्त रास्ता हुआ करता था, जहां आजकल कुछ झोपड़ियां बसी हैं। इस जल श्रोत का शिलान्यास वर्ष 1844 में तत्कालीन पौड़ी के सहायक कमिश्नर हेनरी हेडले द्वारा रखा गया था, इस तथ्य को दो पत्थरों पर खुदाई कर, एक पर बाहरी तरफ तथा दूसरे पर अन्दर की तरफ दर्शाया गया है। अन्य एक छोटे गुफानुमा ढ़ांचे का अभिलेख अपठनीय है लेकिन एक स्थानीय इतिहासकार के अनुसार इस अभिलेख में एक स्थानीय राजा जिन्होंने इस क्षेत्र में एक शिव मंदिर की स्थापना किया है, का वर्णन है।

जब सड़क पौड़ी तक बन गया तब गुल द्वारा पानी का वितरण नष्ट कर दिया गया। पानी के वितरण के लिए एक पाइप बिछा दिया गया। जो भी हो, कई सारे छोटे पाइपों के इस एक में जुड़ जाने से यहां तक जल नहीं पहुंच पाता है।

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डीडीहाट

प्राकृतिक तौर पर सुंदर घाटी जहां डीडीहाट का छोटा पहाड़ी शहर स्थित है, उसकी विशिष्टता है– एक हरा-भरा वातावरण, छोटा पहाड़ी शिखर के मैदान में आबाद टीले, जहां अधिकांश घर बसे हैं तथा जिसके नीचे चरमगद नदी प्रवाहित है एवं कुछ दूरी पर बर्फ से ढकी पांचुली हिमालय ऋंखला का मनोहर दृश्य। हरित, उपजाऊ घाटी को ही हाट कहते हैं। डीडीहाट, कैलाश-मानसरोवर तीर्थयात्रा के मार्ग पर है एवं इसका नाम कुमाऊंनी भाषा के डंड या छोटी पहाड़ी से आया है।

नाम : श्री रघुनाथ मंदिर
सम्पर्क व्यक्ति : मंदिर कमिटी
स्थिति : एसडीएम कोर्ट के नजदीक 
आरती/ प्रार्थना का समय : प्रात: 5 बजे तथा सायं 5 बजे 
पूजित देवता (पूजित देवता अगर कोई हो) : रघुनाथ या भगवान राम
टिप्पणी/ विशेष बातें : पंचचुली पर्वत का मनोहर दृश्य

नाम : नन्दा देवी मंदिर
पता : नन्दा देवी मंदिर, डीडीहाट
सम्पर्क व्यक्ति : मंदिर कमिटी
स्थिति : तहसील कार्यालय के नजदीक 
आरती/ प्रार्थना का समय : प्रात: 7.30 बजे तथा सायं 5.30 बजे 
पूजित देवता (पूजित देवता अगर कोई हो) : नन्दा देवी या मां जगदम्बा
टिप्पणी/ विशेष बातें : नन्दा देवी, भगवान शिव का संगम तथा पार्वती का प्रत्यक्ष रूप है जो प्राचीन समय से पूजित है। प्रत्येक 12 वर्षों में भक्तगण नन्दा देवी राज जाट की पैदल यात्रा कर त्रिशूल पहूंच कर भगवती नन्दा देवी की पूजा कर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं, इस दौरान मंदिर में भंडारा भी आयोजित किया जाता है।

नाम : सीराकोट मंदिर
पता : डीडीहाट
स्थिति : शहर से दो किलोमीटर दूर तथा पहाड़ी की चोटी से एक मील दूर 
आरती/ प्रार्थना का समय : प्रात: 5 बजे तथा दोपहर 2 बजे 
पूजित देवता (पूजित देवता अगर कोई हो) : भगवान शिव
टिप्पणी/ विशेष बातें : मंदिर परिसर से हिमालय तथा डीडीहाट शहर का अतुलनीय सुन्दर दृश्य दिखाई पड़ता है। मंदिर के द्वार तक कच्चा सड़क निर्माणाधीन है जिनका 180 सीढ़ियों के हर एक सीढ़ी से एक सुन्दर मनोरम दृश्य उपस्थित होता है।

नाम : श्री मलय नाथ मंदिर
पता : डीडीहाट
स्थिति : शहर के दक्षिणी भाग में, टैक्सी स्टेण्ड के नजदीक 
आरती/ प्रार्थना का समय : प्रात: 5 बजे तथा 5 बजे सायं
पूजित देवता (पूजित देवता अगर कोई हो) : भगवान शिव
टिप्पणी/ विशेष बातें : यह मंदिर पेड़ों से घिरा है जो कई प्रकार के बागानों को पोषित करता है। यह मंदिर उच्च समतल भू-भाग का प्राकृतिक तथा नीचे के हरे-भरे खेतों का सुन्दर दृश्य भी उपस्थित करता है।

नाम : शिव मंदिर
पता : गांधी चौक, डीडीहाट
आरती/ प्रार्थना का समय : प्रात: 5 बजे तथा 5 बजे सायं
पूजित देवता (पूजित देवता अगर कोई हो) : भगवान शिव

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श्रीनगर

पौराणिक काल से ही श्रीनगर का प्राचीन शहर, जो बद्रीनाथ के मार्ग में स्थित है, निरंतर बदलाव के बाद भी अपने अस्तित्व को बचाये रखा है। श्रीपुर या श्रीक्षेत्र उसके बाद नगर के बदलाव सहित श्रीनगर, टिहरी के अस्तित्व में आने से पहले एकमात्र शहर था। वर्ष 1680 में यहां की जनसंख्या 7,000 से अधिक थी तथा यह एक वाणिज्यिक केंद्र जो बाजार के नाम से जाना जाता था, पंवार वंश का दरबार बना। कई बार विनाशकारी बाढ़ का सामना करने के बाद अंग्रेजों के शासनकाल में एक सुनियोजित शहर के रूप में उदित हुआ और अब गढ़वाल का सर्वश्रेष्ठ शिक्षण केंद्र है। विस्थापन एवं स्थापना के कई दौर से गुजरने की कठिनाई के बावजूद इस शहर ने कभी भी अपना उत्साह नहीं खोया और बद्री एवं केदार धामों के रास्ते में तीर्थयात्रियों की विश्राम स्थली एवं शैक्षणिक केंद्र बना रहा है और अब भी वह स्वरूप विद्यमान है।

नाम : दुर्गा मंदिर, शारदानाथ घाट

पता : अलकनंदा के तट पर

सम्पर्क व्यक्ति : शांता गिरि

दिशा :  नदी के तट पर, अपर बाजार

आरती/प्रार्थना का समय : 6 से 7 बजे सायं

पूजित देवता (अगर कोई हों) : दुर्गा मां

पारम्परिक/ ऐतिहासिक महत्व
:
वर्ष 1967 में नया मंदिर परिसर शारदानाथ बाबा द्वारा बनवाया गया।


  नाम  :  केशोराय मठ

पता  : अलकनंदा तट के करीब, कमलेश्वर मंदिर के नीचे

दिशा : अलकनंदा के तट पर


पारम्परिक/
ऐतिहासिक महत्व :  एटकिंस द्वार हिमालयन गजेटियर में इस मंदिर का निर्माण वर्ष 1625 में बताते हैं। इसका खंडहर यह बताता है कि उस समय यह मंदिर कितना भव्य होगा। यह महसूस कर आपको शर्मिन्दगी होगी कि इसे नष्ट होने की अनुमति दी गई। इसके जड़ में पीपल के पेड़ उग गये, प्रवेश द्वार को नष्ट कर दिया गया तथा जहां असली मूर्ति स्थापित था वह स्थान खाली पड़ा है।

नाम : शीतला देवी मंदिर

पता :  भक्तियाना, श्रीनगर

पूजित देवता
(अगर कोई हों)
:
शीतला मां

पारम्परिक/
ऐतिहासिक महत्व
:
यह देवी, भक्तियाना क्षेत्र की इष्ट देवी मानी जाती हैं।

नाम :  लक्ष्मी-नारायण मंदिर

पता :  तिवारी मोहल्ला, श्रीनगर

सम्पर्क व्यक्ति  :  राकेश तिवारी

दिशा :  अलकनंदा के तट पर, तिवारी मोहल्ला

पूजित देवता  : लक्ष्मी-नारायण


पारम्परिक/
ऐतिहासिक महत्व :  यह मंदिर नगर शैली डिजाइन में बनाया गया है। इस मंदिर के प्रमुख पवित्र हॉल में चार भुजाओं वाले भगवान विष्णु की प्रतिमा स्थापित है जो पुराने राजमहल की ओर मुखातिब है। यह संभव है कि पंवार राजा गण प्रतिदिन इस मंदिर में प्रार्थना करते थे। यह भी संभव है कि यही वह प्रतिमा है जिसे मानशाह तिब्बत से लाये थे। यह महसूस किया जाता है कि असली मंदिर अलकनंदा के तट पर उत्तर की ओर बनाया गया, बाद में इसे सुरक्षित रखने के लिए पुन: स्थापित किया गया। बिरेही बाढ़ के बाद अलकनंदा इस मंदिर के और करीब स्थानांतरित हो गई।


टिप्पणी/ विशेष बातें
:
स्थानीय लोग इस मंदिर के पुन: ठीक-ठाक करने के लिए कार्य कर रहे हैं। यहां एक अन्य मंदिर सत्यनारायण का था जो नष्ट कर दिया गया।


नाम   :  लक्ष्मी-नारायण मंदिर/शंकरामठ

पता  :  एसएसबी, श्रीनगर

दूरभाष  :  09319477624

सम्पर्क व्यक्ति  :  महु प्रसाद उन्नियाल

आरती/प्रार्थना का समय  :  6 बजे सायं

पूजित देवता   :  देवी लक्ष्मी तथा भगवान विष्णु, राज राजेश्वरी, कृष्ण


पारम्परिक/
ऐतिहासिक महत्व  :  यह स्थान ठाकुर द्वारा भी कहलाता है। वर्ष 1670 में फतेहपति शाह द्वारा जारी एक ताम्रपत्र के अनुसार तत्कालीन धर्माधिकारी शंकर धोमल ने यहां जमीन खरीदा तथा राजमाता की अनुमति से मंदिर की स्थापना की।
मंदिर में विशाल मंडप बना है, चूंकि उसमें कोई खंभा नहीं है इसलिए यह तत्कालीन पाषाण वास्तुकला की खोज का एक उदाहरण है।

मंदिर के मुख्य भवन में ढ़ाई मीटर ऊंचा एक सुंदर प्रतिमा लक्ष्मी-नारायण का स्थापित है। ऐसा मालूम पड़ता है कि यह दक्षिण से लाया गया था। दूसरी प्रतिमा भगवान विष्णु की, ठीक उसके बगल में स्थापित है।

नाम  :  लक्ष्मी-नारायण मंदिर

पता  :  नागेश्वर गली, श्रीनगर

दूरभाष  :  03146-211049

सम्पर्क व्यक्ति  :  श्री भगवती प्रसाद बदोनी, पुजारी

दिशा  :  सरस्वती विद्या मंदिर के नजदीक

आरती/प्रार्थना का समय
:
प्रात: 6 बजे से 7:30 बजे सायं

पूजित देवता
:
लक्ष्मी-नारायण तथा हनुमान


पारम्परिक/
ऐतिहासिक महत्व
:
यह कहा जाता है कि एक बार लंका पर पूल बना, उनमें कुछ पत्थर बच गए जिसमें 'राम' लिखा था। हनुमान ने भगवान राम को सलाह दिया कि उन पत्थरों पर लिखे नाम को लोगों द्वारा ठोकर मारने के लिए नहीं छोड़ देना चाहिए इसलिए उन पत्थरों को लाकर गढ़वाल में यह मंदिर बनवा दिया गया।


टिप्पणी/ विशेष बातें
:
हनुमान की प्रतिमा को वर्ष 1200 के बाद से बचाकर रखा गया और बाद में यहां लाया गया।


नाम   :  कमलेश्वर/सिद्धेश्वर मंदिर

पता  :  अलकनंदा तट के करीब, श्रीनगर

सम्पर्क व्यक्ति   :  आशुतोष पुरी, महंत

दिशा
:
अलकनंदा तट के करीब

पूजित देवता
:
भगवान शिव, गणेश, देवी अन्नपूर्णा


पारम्परिक/
ऐतिहासिक महत्व
:
यह श्रीनगर का सबसे अधिक श्रद्धेय एवं पूजित मंदिर है। यह कहा जाता है कि जब देवता गण राक्षसों के साथ युद्ध हार रहे थे तो भगवान विष्णु सुदर्शन चक्र पाने के लिए इसी स्थान पर भगवान शिव का तप किया था। उन्होंने भगवान शिव के 1,000 नामों में से एक-एक का उच्चारण कर कुल 1,000 कमल (कमल जिससे मंदिर का नाम जुड़ा है) फूल चढ़ाये। उन्हें जांचने के लिए भगवान शिव ने एक फूल छिपा लिया। जब भगवान विष्णु को ज्ञात हुआ कि उनके पास एक फूल कम है तो उन्होंने तुरंत एक फूल के बदले अपनी आंख (जो कमल भी कहलाता है) चढ़ा दिया। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें सुदर्शन चक्र दिया जिससे भगवान विष्णु ने असुरों का संहार किया।
चूंकि भगवान विष्णु ने कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष चतुर्दशी को सुदर्शन चक्र धारण किया था इसलिए यहां बड़े धूमधाम से बैकुंठ चतुर्दशी मनाया जाता है। इसी दिन दम्पत्ति जो पुत्र की प्राप्ति चाहते हैं, वे हाथों में दीप जलाकर रातभर खड़े होकर प्रार्थना करते हैं। यह कहा जाता है उनकी इच्छाएं पूर्ण होती है। यह खाद रात्रि कहलाती है तथा यह कहा जाता है कि भगवान कृष्ण ने स्वयं यही पूजा इस मंदिर में किया था।

इस मंदिर का निर्माण, कहा जाता है कि आदी शंकराचार्य के निवेदन पर भगवान ब्रह्मा ने रातों-रात कर दिया जो कि गढ़वाल के ऐसे 1,000 मंदिरों में से एक है। यह वास्तव में एक खुला मंदिर है जो 12 सुंदर नक्काशी किये पत्थरों पर टिका है। सम्पूर्ण मंदिर भवन काले पत्थरों का बना है जो कि पेंटिंग कर सुरक्षित कर दिया गया। बिरला परिवार ने वर्ष 1960 में इस मंदिर का पुनरूद्धार कर इसमें दीवार लगवा दिया।

यहां का शिवलिंग स्वयंभू तथा मंदिर से भी पूर्व (पूराना) का है। यह कहा जाता है कि गोरखों ने इस शिवलिंग को खोदने की कोशिश की लेकिन जमीन में 122 फीट गहरे खुदाई के बाद भी इसका छोर नहीं मिला। उसके बाद उन्होंने माफी मांगी, धरती की खुदाई को ढ़क दिया तथा यह कहा कि इस मंदिर की खुदाई कर छेड़-छाड़ करना अनुचित है तथा यह एक पवित्र मंदिर है। 

टिप्पणी/विशेष बातें :
एटकिंस द्वार हिमालयन गजेटियर में इस मंदिर का निर्माण वर्ष 1625 में बताते हैं। इसका खंडहर यह बताता है कि उस समय यह मंदिर कितना भव्य होगा। यह महसूस कर आपको शर्मिन्दगी होगी कि इसे नष्ट होने की अनुमति दी गई। इसके जड़ में पीपल के पेड़ उग गये, प्रवेश द्वार को नष्ट कर दिया गया तथा जहां असली मूर्ति स्थापित था वह स्थान खाली पड़ा है।


   नाम  :  श्री बद्रीनाथ मंदिर

पता  :  वीर चन्द सिंह गढ़वाली मार्ग, श्रीनगर

दूरभाष
:
01346-253556

सम्पर्क व्यक्ति
:
पी भट्ट

दिशा
:
कल्याणेश्वर मंदिर के नजदीक

आरती/प्रार्थना का समय
:
प्रात: 8 बजे तथा 6 बजे सायं

पूजित देवता
:
भगवान विष्णु


पारम्परिक/
ऐतिहासिक महत्व
:
माना जाता है कि इस छोटे मंदिर की प्रतिमा पहले तिवारी मोहल्ला में लक्ष्मी-नारायण मंदिर के नजदीक सत्यनारायण मंदिर में स्थापित था।

      नाम
:
कल्याणेश्वर मंदिर

पता
:
गोला बाजार, श्रीनगर

सम्पर्क व्यक्ति
:
राधु शाम गुप्ता, प्रबंधक

दिशा
:
गोला बाजार में

आरती/प्रार्थना का समय
:
प्रात: 8.30 बजे और 7.30 बजे सायं

पूजित देवता
:
भगवान शिव

पारम्परिक/
ऐतिहासिक महत्व
:
इस मंदिर की स्थापना तीन पुश्तों पहले एक अग्रवाल परिवार द्वरा कराया गया।

टिप्पणी/ विशेष बातें
:
मंदिर में एक सत्संग हॉल तथा एक धर्मशाला है।

       नाम
:
हनुमान मंदिर

पता
:
अपर बाजार, गंगा घाट, श्रीनगर

सम्पर्क व्यक्ति
:
श्री भगवती प्रसाद बदोनी, पुजारी

दिशा
:
अपर बाजार

आरती/प्रार्थना का समय
:
प्रात: 5 बजे तथा 6 बजे सायं

पूजित देवता
:
हनुमान और गरूड़

पारम्परिक/
ऐतिहासिक महत्व
:
130 से अधिक वर्षों पुराना, स्थानीय लोगों द्वारा बनवाया गया।

टिप्पणी/ विशेष बातें
:
हनुमान मंदिर में हनुमान तथा गरूड़ दोनों की प्रतिमा अगल-बगल में स्थापित है।



      नाम
:
हेमकुण्ड साहिब

पता
:
गोला बाजार, श्रीनगर

दूरभाष
:
01346-252203

मोबाइल
:
09927218805

सम्पर्क व्यक्ति
:
ज्ञानी सुरेन्द्र सिंह

दिशा
:
गोला बाजार

Prayer समय
:
प्रात: 4:15 बजे और 6:30 बजे सायं


पारम्परिक/
ऐतिहासिक महत्व
:
यह कहा जाता है कि अभी जहां यह गुरूद्वारा है वहां पहले एक बगीचा था जहां तीर्थ यात्रियों के ठहरने का एक छोटा सा स्थान बना था। एक तीर्थयात्री गुरू गोविंद सिंह का लिखा कुछ पवित्र पंक्तियां लाया जिसे सुरक्षित रखने के लिए यह गुरूद्वारा बना। वे अभी भी इस गुरूद्वारा में सुरक्षित हैं।


विशेष बातें
:
हेमकुण्ड साहिब की पवित्र यात्रा वर्ष 1937 में प्रारंभ हुआ एवं इस पवित्र स्थान तक पैदल आने वाले भक्तों को ठहरने तथा भोजन की व्यवस्था के लिए गुरूद्वारा कमीटी की स्थापना की गई। इस प्रकार के कई गुरूद्वारा की स्थापना हेमकुण्ड साहिब के रास्ते में की गई, तथा यह हरिद्वार और ऋषिकेश के बाद यह तीसरा है।

      नाम
:
नागेश्वर मंदिर

पता
:
नागेश्वर गली, श्रीनगर

मोबाइल
:
09410123593

सम्पर्क व्यक्ति
:
उमानन्द पुरी

दिशा
:
शिशु मंदिर विद्यालय के नजदीक

आरती/प्रार्थना का समय
:
प्रात: 5 बजे और 7 बजे सायं

पूजित देवता
:
गणेश के साथ भगवान शिव, पार्वती तथा पंच देव


पारम्परिक/
ऐतिहासिक महत्व
:
अलकनंदा के नजदीक एक नाग कुंड था। पांच पुश्तों पहले इस प्रतिमा को वर्तमान स्थान पर लाया गया। उसके बाद से इसी स्थान पर शिवलिंग की पूजा की जाती है।


नाम
:
गोरखनाथ मंदिर

पता
:
नागेश्वर गली, श्रीनगर

सम्पर्क व्यक्ति
:
श्री गोपाल नाथ जी

दिशा
:
नागेश्वर मंदिर के नजदीक

आरती/प्रार्थना का समय
:
प्रात: 5:30 बजे और 7:30 बजे सायं

पूजित देवता
(अगर कोई हों)
:
भैरव जी और गोरखनाथ जी

पारम्परिक/
ऐतिहासिक महत्व
:
यह 13वीं सदी का मंदिर है।

टिप्पणी/ विशेष बातें
:
एकल चट्टान से इस मंदिर का नक्काशी (निर्माण) किया गया है। यह मंदिर सिद्धेश्वर महादेव मंदिर के नाम से जाना जाता है।
 
       नाम
:
गोरखनाथ गुफा मंदिर

पता
:
भक्तियाना, श्रीनगर

दिशा
:
भक्तियाना में

पूजित देवता
:
गोरखनाथ जी तथा भगवान शिव


पारम्परिक/
ऐतिहासिक महत्व
:
सुंदर प्रतिमा, गुफा पर नक्काशी, तथा ताम्र पत्र यह साबित करता है कि यह पूजा का प्राचीन स्थान है। यह एक मध्य तथा दक्षिण गढ़वाल का महत्वपूर्ण गुफा मंदिर है।
यह कहा जाता है कि यह गोरख आश्रम के त्रियुगनारायण का सर्दी कालीन आवास था जैसा कि स्कन्द पुराण के केदारखंड में वर्णन किया गया है। एक ताड़पत्र जो कल्पद्रुम यंत्र यहां उपलब्ध है, का मंत्रोच्चार करने से मुक्ति प्राप्त होती है।

मुख्य गुफा में एक लिंग तथा अष्टधातु का बना गुरू गोरखनाथ का एक प्रतिमा है। इसके ठीक सामने गुरू गोरखनाथ का चरण पादुका है।


टिप्पणी/ विशेष बातें
:
मुख्य गुफा 3 मीटर लम्बा तथा 2 मीटर चौड़ा है। इसके बाहर 4 खंभों का चबूतरा है जिस पर 1812 अभिलेख अंकित है। मंदिर में एक ताम्र पत्र भी संभालकर रखा गया है जो फतेहपति शाह द्वारा बालकनाथ जोगी को दिया गया था।

नाम : माता कंसमर्दनी मंदिर

पता : कंसमर्दनी मार्ग, श्रीनगर

सम्पर्क व्यक्ति : मुरलीधर घिरदियाल, पुजारी

दिशा :  सेंट टेरेसा स्कूल के नजदीक

पूजित देवता
(अगर कोई हों)
:
माता कंसमर्दनी

पारम्परिक/ऐतिहासिक महत्व
:
यह कहा जाता है कि देवी एक खेत (भूमि) में उपस्थित हुई। उन्होंने किसान को वहां हल चलाने एवं उन्हें वहां से निकालकर वस्त्र पहनाकर उन्हें एक डोली में बिठाने को कहा। उन्होंने ऐसा ही किया तथा उनकी सुरक्षा के लिए एक छोटा ढ़ांचा भी बनाया। इस मंदिर को गोरखा राज्य के दौरान वर्ष 1803-1815 में बनाया गया, तथा मंदिर के मुख्य भवन में वर्ष 1809 का अभिलेख सुत्ज्यामन थापा के बारे में लिखा है।


टिप्पणी/ विशेष बाते :  यह देवी घिरदियाल वंश के तथा इस परिवार के लोगों का इष्ट देवी है तथा उनके द्वारा इस मंदिर में सदियों से पूजित है।

नाम :  अलकेश्वर महादेव मंदिर

पता: नर्सरी रोड, श्रीनगर

मोबाइल: 09411585376

सम्पर्क व्यक्ति : श्री दुर्गा प्रसाद बनवारा

आरती/प्रार्थना का समय : 6 बजे सायं

पूजित देवता : शिवलिंग

पारम्परिक/ ऐतिहासिक महत्व :  वर्तमान मंदिर का निर्माण वर्ष 1901 में हुआ जो बाढ़ में नष्ट हुए मंदिर का स्थान धारण किया।

टिप्पणी/ विशेष बाते :  धनुष तीर्थ: वह स्थान जहां यह मंदिर बना है, का वर्णन स्कंद पुराण में धनुष तीर्थ के रूप में है।