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SUMITRA NANDAN PANT POET - सुमित्रानंदन पंत - प्रसिद्ध कवि - कौसानी उत्तराखंड

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 13, 2007, 01:34:02 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

तप रे! / सुमित्रानंदन पंत

रचनाकार: सुमित्रानंदन पंत                 



तप रे, मधुर मन!



विश्व-वेदना में तप प्रतिपल,
जग-जीवन की ज्वाला में गल,
बन अकलुष, उज्जवल औ\' कोमल
तप रे, विधुर-विधुर मन!



अपने सजल-स्वर्ण से पावन
रच जीवन की पूर्ति पूर्णतम
स्थापित कर जग अपनापन,
ढल रे, ढल आतुर मन!



तेरी मधुर मुक्ति ही बन्धन,
गंध-हीन तू गंध-युक्त बन,
निज अरूप में भर स्वरूप, मन
मूर्तिमान बन निर्धन!
गल रे, गल निष्ठुर मन!

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

ताज / सुमित्रानंदन पंत

रचनाकार: सुमित्रानंदन पंत                 



हाय! मृत्यु का ऐसा अमर, अपार्थिव पूजन?
जब विषण्ण, निर्जीव पड़ा हो जग का जीवन!
संग-सौध में हो श्रृंगार मरण का शोभन,
नग्न, क्षुधातुर वास विहीन रहें जीवित जन?



मानव! ऐसी भी विरक्ति क्या जीवन के प्रति?
आत्मा का अपमान, प्रेत औ\' छाया से रति!!
प्रेम अर्चना यही, करें हम मरण को वरण?
स्थापति कर कंकाल, भरे जीवन का प्रांगण?



शव को दें हम रंग, आदर मानन का
मानव को हम कुत्सित चित्र बना दे शव का?
गत युग के मृत आदर्शों के ताज मनोहर
मानव के मोहांध हृदय मे किए हुए घर,



भूल गये हम जीवन का संदेश अनश्वर,
मृतकों के है मृतक जीवतों का है ईश्वर!

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

द्रुत झरो / सुमित्रानंदन पंत

रचनाकार: सुमित्रानंदन पंत                 



द्रुत झरो जगत के जीर्ण पत्र!
हे स्त्रस्त ध्वस्त! हे शुष्क शीर्ण!
हिम ताप पीत, मधुमात भीत,
तुम वीतराग, जड़, पुराचीन!!



निष्प्राण विगत युग! मृत विहंग!
जग-नीड़, शब्द औ\' श्वास-हीन,
च्युत, अस्त-व्यस्त पंखों से तुम
झर-झर अनन्त में हो विलीन!



कंकाल जाल जग में फैले
फिर नवल रुधिर,-पल्लव लाली!
प्राणों की मर्मर से मुखरित
जीव की मांसल हरियाली!



मंजरित विश्व में यौवन के
जगकर जग का पिक, मतवाली
निज अमर प्रणय स्वर मदिरा से
भर दे फिर नव-युग की प्याली!

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

दो लड़के / सुमित्रानंदन पंत

रचनाकार: सुमित्रानंदन पंत                 
 

मेरे आँगन में, (टीले पर है मेरा घर)
दो छोटे-से लड़के आ जाते है अकसर!
नंगे तन, गदबदे, साँबले, सहज छबीले,
मिट्टी के मटमैले पुतले, - पर फुर्तीले।



जल्दी से टीले के नीचे उधर, उतरकर
वे चुन ले जाते कूड़े से निधियाँ सुन्दर-
सिगरेट के खाली डिब्बे, पन्नी चमकीली,
फीतों के टुकड़े, तस्वीरे नीली पीली
मासिक पत्रों के कवरों की, औ\' बन्दर से
किलकारी भरते हैं, खुश हो-हो अन्दर से।
दौड़ पार आँगन के फिर हो जाते ओझल
वे नाटे छः सात साल के लड़के मांसल



सुन्दर लगती नग्न देह, मोहती नयन-मन,
मानव के नाते उर में भरता अपनापन!
मानव के बालक है ये पासी के बच्चे
रोम-रोम मावन के साँचे में ढाले सच्चे!
अस्थि-मांस के इन जीवों की ही यह जग घर,
आत्मा का अधिवास न यह- वह सूक्ष्म, अनश्वर!
न्यौछावर है आत्मा नश्वर रक्त-मांस पर,
जग का अधिकारी है वह, जो है दुर्बलतर!



वह्नि, बाढ, उल्का, झंझा की भीषण भू पर
कैसे रह सकता है कोमल मनुज कलेवर?
निष्ठुर है जड़ प्रकृति, सहज भुंगर जीवित जन,
मानव को चाहिए जहाँ, मनुजोचित साधन!
क्यों न एक हों मानव-मानव सभी परस्पर
मानवता निर्माण करें जग में लोकोत्तर।
जीवन का प्रासाद उठे भू पर गौरवमय,
मानव का साम्राज्य बने, मानव-हित निश्चय।



जीवन की क्षण-धूलि रह सके जहाँ सुरक्षित,
रक्त-मांस की इच्छाएँ जन की हों पूरित!
-मनुज प्रेम से जहाँ रह सके,-मावन ईश्वर!
और कौन-सा स्वर्ग चाहिए तुझे धरा पर?

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

धेनुएँ / सुमित्रानंदन पंत


रचनाकार: सुमित्रानंदन पंत                 
 

ओ रभाती नदियों,
बेसुध
कहाँ भागी जाती हो?
वंशी-रव
तुम्हारे ही भीतर है!



ओ, फेन-गुच्छ
लहरों की पूँछ उठाए
दौड़ती नदियो,



इस पार उस पार भी देखो,-
जहाँ फूलों के कूल
सुनहरे धान से खेत हैं।



कल-कल छल-छल
अपनी ही विरह व्यथा
प्रीति कथा कहती
मत चली जाओ!



सागर ही तुम्हारा सत्य नहीं
वह तो गतिमय स्त्रोत की तरह


"http://hi.literature.wikia.com/wiki/%E0%A4%A7%E0%A5%87%E0%A4%A8%E0%A5%81%E0%A4%8F%E0%A4%81_/_%E0%A4%B8%E0%A5%81%E0%A4%AE%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%A8_%E0%A4%AA%E0%A4%82%E0%A4%A4" से लिया गया

sanjupahari

Mehta ji Salute aapko...aapke paas ye itna masala aata kahaan se hain,,,,m really impressed >> u r genius...3 cheers for you
HIP HIP HURREY
HIP HIP HURREY
HIP HIP HURREY
sanjupahari

JAI PAHAD>>>JAI GOLU<<<JAI BADRIVISHAL

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720



Sanju Da,

Thanx for kind words of appreciation. Yah i  got good stuff of Pant Ji poem and have posted there.

Pant JI was gem of UK. His poems will always be appreicated by coming generation.


Quote from: sanjupahari on November 12, 2007, 09:34:59 PM
Mehta ji Salute aapko...aapke paas ye itna masala aata kahaan se hain,,,,m really impressed >> u r genius...3 cheers for you
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sanjupahari

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