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How To Change Tough Agriculture Methodology - पहाडो की कठिन खेती

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 15, 2007, 03:42:19 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720



Life can become somewhat easier if pattern of agriculture is changed in pahad.

हेम पन्त

देहरादून। उत्तराखंड के पर्वतीय अंचलों में पाई जाने वाली जंगली सब्जिया मैदानी क्षेत्रों में खासी लोकप्रिय हो रही हैं। पहाड़ के नमी वाले इलाकों में बरसात में उगने वाले लिंगुड़ा व खुंतड़ा को ही लें तो देहरादून समेत अन्य महानगरों में यह खूब पसंद किया जा रहा है। प्रकृति की गोद में स्वयं उगने वाली पौष्टिक तत्वों से भरपूर इस जैविक सब्जी का टेस्ट सभी को भा रहा है।

बरसात के दौरान पर्वतीय क्षेत्रों में नमी वाले इलाकों और जलस्रोतों के किनारे प्राकृतिक रूप से समूह के रूप में उगती हैं। यह एक प्रकार की फर्न (डिप्लेजियम एसप्लेंटम) है। इन जंगली सब्जियों को स्थानीय बोली में लिंगुड़ा, खुंतड़ा के नाम से जाना जाता है। पर्वतीय इलाकों में इन्हें अर्से से सब्जी के तौर पर उपयोग में लाया जाता रहा है, लेकिन अब ये पहाड़ों से निकलकर मैदानों में आकर लोगों को भी खूब भा रही हैं। विशुद्ध रूप से प्रकृति की गोद में उगने वाली यह सब्जी पूरी तरह जैविक है। राज्य औषधीय पादप बोर्ड के उपाध्यक्ष डा.आदित्य कुमार के अनुसार औषधीय गुणों के अलावा आयरन, विटामिन्स आदि की अधिकता के चलते यह अधिक पौष्टिक है। इसका स्वाद भी बेहद लाजवाब है। अच्छी बात यह है कि पहाड़ के लोग इसका व्यावसायिक महत्व समझने लगे हैं और लिंगुड़ा व खुंतड़ा पहाड़ की वादियों से निकलकर मैदानी क्षेत्रों की ओर रूख करने लगा है। वहां इसे पसंद भी खूब किया जा रहा है। देहरादून की ही बात करें तो यहां भी न केवल पहाड़ बल्कि बाहरी मूल के लोग भी इसे हाथों-हाथ ले रहे हैं। लालपुल के पास लिंगुड़ा-खुंतड़ा बेचने वाले अशफाक ने बताया कि उसे इस पहाड़ी जंगली सब्जी का नाम तो नहीं मालूम, लेकिन लोग इसे हाथों-हाथ ले लेते हैं। मसूरी से आने वाले एक व्यक्ति से वह इस सब्जी को खरीदता है। रोजाना ही इसकी 70-80 गट्ठियां निकल जाती हैं। अन्य कई लोग भी इस कार्य में जुटे हैं।



Risky Pathak

पहाडो में धान व गेहू की खेती ही मुख्यता की जाती है|

आइये जाने कितनी मेहनत व कठिनाइयों को पार करके हम अपने लिए अन्न उगाते है|
   
धान की खेती(रोपाई):

बैशाख के महीने में "बिन" रखा जाता है| "बिन" रखने के लिए धान के अंकुरित "बी" को "बिन" वाले खेत में छिड़का जाता है|

आषाढ तक "बिन" में "पुत" १.5-२ फुट के हो जाते है| और यही "पुत" रोपाई में खेतो में रोपे जाते है|

गेहू काटने के बाद खेत को १ बार दोबारा हल से जोता जाता है, जिसे नयो खर्याना कहा जाता है| नयो खर्याने के १०-१५ दिन बाद, जब पानी भरपूर मात्रा में हो तब रोपाई की जाती है|

रोपाई में पहले खेत में पानी डाला जाते है| और उसके बाद खेत को हल से हलाया जाता है| "बॉस" से मिटटी संतुलित की जाती है| "कैशी" से इचाव कन्होव बनाया जाता है| हलाने के बाद, खेत में "मोय" लगाया जाता है, जिससे मिटटी समतल हो जाए और "पुत" आसानी से रोपे जा सके| "फाडू" से भी मिटटी समतल की जाती है|

बिन से "पुत" काटकर उनका "आन्थ" बनाया जाता है और रोपाई वाले खेत में लेजाकर पुत रोपे जाते है|     
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Risky Pathak


पुत रोपने के बाद खेतो में पुत बढने लगते है| करीबन १ महीने बाद, "रोप न्योवरण"किया जाता है, जिसका मतलब है खेत में से अनचाही घास व अन्य पौदे निकाले जाते है, जिससे धान के पौधे को बढने में कोई कठिनाई न हो|

भाद्रपद-आश्विन के महीने में धान काटने का समय आ जाता है| धान के पौधों को जड़ से काटा जाता है और उनकी "कुनी" बनाई जाती है| "कुनी" बनाये जाने का अर्थ है धान के पौधों को काटकर इक्कठा किया जाता है| "ताड़" जोता जाता है| "ताड़" १ प्रकार का टेंट सा होता है, जिसे खेत में लगाया जाता है और उसके अन्दर धान के पौधे रखे जाते है| धान के पौधों को पत्थर पर "चुटा " जाता है, जिससे धान अलग हो जाता है| बचे हुए पौधों को "पराव" कहते है| पराव को ३-४ दिन धूप में सुखाकर "लुट" बना दिया जाता है|  इसी तरह धान को "मोस्ट" में सुखाकर अन्दर "भकार" में रख दिया जाता है|


Risky Pathak

अब गेहूं की खेती की बात करते है|


धान काटने के बाद खेत में जो बची कुची जड़ धान की बच जाती है, उसे हटाने के लिए हल चलाया जाता है, जिसे "च्युत बाना" कहा जाता है| खेतो में मिटटी के बड़े बड़े गोले जैसे बन जाते है, जिन्हें "डेल" कहा जाता है| इन्ही डेल को फोड़ने के लिए "डोट" का इस्तेमाल होता है|  डेल फोड़ने के बाद "मोय" से मिटटी समतल की जाती है| उसके बाद "पौरे" की जाती है| "पौरे" का अर्थ है कि खाद के रूप में गोबर खेतो में डाला जाता है| उसके उपरांत गेहू छिडके जाते है| फ़िर १ बार हल बाया जाता है| उसके बाद मोय लगाया जाता है|

Risky Pathak


१.५-२ महीने बाद गेहू के खेतो में से अनचाही घास व अन्य पौधे हटाए जाते है जिसे "जांत चाण" भी कहते है| बैशाख के अंत में गेहू की कटाई शुरू हो जाती है| "रूयाथ" के द्वारा गेहू की बालियों को काटा जाता है| उन्हें घर लाकर सुखाया जाता है| फ़िर "दाबोव" के द्वारा उन्हें चुटकर गेहू निकाले जाते है| गेहू से" धुस" को हटाने के लिए, "फत्याव" लगाया जाता है| फ़िर गेहू को "मोस्ट" में सुखाकर भकार में रख दिया जाता है| १८-२० दिन बाद खेतो से बचा गेहू के पौधे जिन्हें "नयो" कहा जाता है, उन्हें भी काटकर घर ले आते है|   

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Quote from: Himanshu Pathak on August 04, 2008, 02:51:48 PM

१.५-२ महीने बाद गेहू के खेतो में से अनचाही घास व अन्य पौधे हटाए जाते है जिसे "जांत चाण" भी कहते है| बैशाख के अंत में गेहू की कटाई शुरू हो जाती है| "रूयाथ" के द्वारा गेहू की बालियों को काटा जाता है| उन्हें घर लाकर सुखाया जाता है| फ़िर "दाबोव" के द्वारा उन्हें चुटकर गेहू निकाले जाते है| गेहू से" धुस" को हटाने के लिए, "फत्याव" लगाया जाता है| फ़िर गेहू को "मोस्ट" में सुखाकर भकार में रख दिया जाता है| १८-२० दिन बाद खेतो से बचा गेहू के पौधे जिन्हें "नयो" कहा जाता है, उन्हें भी काटकर घर ले आते है|   



Himanshu Bhai,

Thanx for the details but my pain is that the way of doing agriculture has not changed in pahad at all. This is somewhat resulting in migration too.

Risky Pathak

Mehta Jee, Aapse sehmat hu, inhi kathinaiyo ke kaaran ab pahaad viraan ho gye hai. Khet Baanj reh gye hai.


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

नौ जिलों में सिर्फ चार माह खाने भर खेती!Aug 06, 12:21 am

देहरादून। उत्ताराखंड के 13 में से नौ पर्वतीय जिलों में 'जय किसान' का नारा संकट में है। हरित क्रांति का दशकों पुराना सपना यहां अंकुरित ही नहीं हुआ। इन जिलों में खाद्य सुरक्षा अब तक हासिल नहीं की जा सकी है और हकीकत यही है कि चावल-गेहूं की पैदावार चार महीने के खाने पर ही हो पाती है।

कृषि विभाग के अनुसार, राज्य के चार मैदानी जिलों को छोड़कर नौ जिलों में चावल पैदा होने वाले 1,42,588 हेक्टेयर खेतों में 97,227 हेक्टेयर तथा गेहूं पैदा होने वाले 1,45,773 हेक्टेयर खेतों में 1,02,953 हेक्टेयर असिंचित हैं। मैदान के मुकाबले पहाड़ में गेहूं की उपज एक-तिहाई कम और चावल की उपज करीब आधी ही होती है। अब इन नौ जिलों के सिंचित व असिंचित खेतों में सौ फीसदी खेती हो, तब 1.9 लाख टन चावल और सवा दो लाख टन गेहूं पैदा हो सकता है। इन जिलों की आबादी वर्ष 2001 की जनगणना में 37,61,496 थी। आबादी वृद्धि दर दो फीसदी ही मानी जाए तो इन जिलों की जनसंख्या में 15 फीसदी वृद्धि हो चुकी है। 'फूड हैबिट' का राष्ट्रीय मानक 85 फीसदी आबादी को व्यस्क मानने व प्रति दिन हर व्यस्क के 0.455 ग्राम अनाज खाने का है। इस मानक से नौ जिलों की 37,61,496 जनसंख्या को साल भर खाने के लिए 6,24,690 लाख टन गेहूं-चावल चाहिए। जबकि नौ जिलों में गेहूं-चावल दोनों के उत्पादन आकलन करीब चार लाख टन का है। इस हिसाब से भी इन जिलों की आबादी के लिए करीब आठ माह भोजन के लिए ही चावल-गेहूं हो सकता है। यह आदर्श स्थिति तब होगी, जब सौ फीसदी खेत में चावल-गेहूं की खेती हो और एक खेत में एक वर्ष में दोनों फसल हों। मगर वास्तव में पहाड़ में ऐसा है नहीं। अमूमन एक ही फसल होती है और बड़े पैमाने पर खेत परती रह जाते हैं। कृषि विभाग भी मानता है कि हर साल करीब एक लाख हेक्टेयर खेत परती रह जाते हैं। इस तरह देखें तो पर्वतीय जिलों में चावल-गेहूं चार-पांच महीने से अधिक खाने भर पैदा नहीं होता। सिर्फ 14 फीसदी खेत सिंचित हैं। राष्ट्रीय जोत के औसत डेढ़ हेक्टेयर क्षेत्र के मुकाबले इन जिलों में अधिसंख्य जोत आधा हेक्टेयर के हैं। आज भी सिंचाई के परंपरागत साधनों हौज, गुल, हाइड्रम का ही इस्तेमाल होता है। खेत बिखरे हुए व ऊंचे-नीचे हैं। चकबंदी नहीं है। खेतों पर जंगली जानवरों का आक्रमण बना रहता है। खेती से आय लागत के मुकाबले काफी कम है। गांवों से आबादी का शहरों की ओर पलायन हो रहा है। यह सब पर्वतीय जिलों में खेती के लगातार घटने की वजहें हैं।