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How To Change Tough Agriculture Methodology - पहाडो की कठिन खेती

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 15, 2007, 03:42:19 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Let us see, how this plough works.
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पहाड़ी खेती, तैयार हुआ उत्तराखंडी हल

पिथौरागढ़। राष्ट्रीय बाल विज्ञान कांग्रेस में उल्लेखनीय कार्य करने वाले डा.अशोक कुमार पंत को देश का सर्वश्रेष्ठ राज्य समन्वयक घोषित किया गया है। उन्हें गुजरात में बाल विज्ञान के राष्ट्रीय आयोजन में यह पुरस्कार दिया गया।

डा. पंत को राष्ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संचार परिषद, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग, एनसीएसटीसी नेटवर्क की संयुक्त समिति ने देश के सर्वश्रेष्ठ राज्य समन्वयक पुरस्कार के लिए चुना। गौरतलब है कि डा.पंत वर्ष 1996 से बाल विज्ञान कांग्रेस से जुड़े हैं। उत्तराखण्ड में विज्ञान संचार के लिए उन्होंने महत्वपूर्ण योगदान दिया है। बाल विज्ञान कांग्रेस के आयोजन में भी उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही है। 31 दिसम्बर को गुजरात के अहमदाबाद शहर में आयोजित बाल विज्ञान कांग्रेस के राष्ट्रीय आयोजन में देश के प्रतिष्ठित वैज्ञानिकों ने उन्हें यह सम्मान प्रदान किया। डा.पंत ने अपनी इस उपलब्धि का श्रेय उत्तराखण्ड के समस्त जिला समन्वयकों, शिक्षकों, शिक्षा विभाग के अधिकारियों के सहयोग को दिया है।

http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttranchal/4_5_6073967.html

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

 
This is the "Madua" farming.. Unfortunately, people are not sowing the "Madua" in pahad. Govt must encourage people for this as Madua is considered to be very-2 beneficial for health.




एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720



Such kind of Kheti should be adopted.
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स्वरोजगार को अपनाएं मशरूम व फूलों की खेती

रुद्रप्रयाग। जिला ग्राम्य विकास अभिकरण की शासी निकाय की बैठक में स्वयं सहायता समूहों के क्रियाकलाप, ग्रामीण स्वरोजगार प्रशिक्षण, विभिन्न आवासीय योजनाओं सहित आईडब्ल्यूडीपी एवं पीएमजीएसवाई योजना की प्रगति पर विस्तृत समीक्षा की गई। बैठक में सदस्यों को पूर्व में एजेंडा न दिए जाने पर नाराजगी व्यक्त की गई।

एक होटल में आयोजित जिला ग्राम्य विकास अभिकरण की शासी निकाय की बैठक में एसजीएसवाई योजना पर चर्चा में कहा गया कि फूलों की तथा मशरूम की खेती को बढ़ावा दिया जाए, ताकि स्वरोजगार मिल सके। बैठक में बताया गया कि वित्तीय वर्ष 2009-10 में एसजीएसवाई योजना के अंतर्गत 435 समूह के सापेक्ष 425 समूहों का गठन किया गया। योजना के अंतर्गत 64 समूह वित्त पोषण लक्ष्य के सापेक्ष 75 समूहों को वित्त पोषित किया गया, इसके अतिरिक्त व्यक्तिगत स्वरोजगारियों के लक्ष्य 111 के सापेक्ष 182 स्वरोजगारियों को वित्त पोषित किया गया। ग्रामीण स्वरोजगार प्रशिक्षण योजना के तहत जनपद में 30 महिलाओं को अगस्तमुनि विपणन केन्द्र में फल संरक्षण का प्रशिक्षण दिया गया। बैठक की अध्यक्षता जिला पंचायत अध्यक्ष चण्डीप्रसाद भट्ट ने की। इसके अलावा बैठक में जिपं उपाध्यक्ष किशोरी नंदन डोभाल, ब्लाक प्रमुख जगदेश्वरी भरद्वाज, ऊखीमठ फतेसिंह, जिपं सदस्य वीर सिंह बुडेरा व लक्ष्मण सिंह नेगी सीडीओ मोहन सिंह रावत समेत कई जनप्रतिनिधि व अधिकारी मौजूद थे।


http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttranchal/4_5_6370070.html

पंकज सिंह महर

हिन्दुस्तान अखबार में यह खबर छपी थी, सरकार खेती बचाने का एक और अभिनव प्रयास करने जा रही है, लेकिन मेरी समझ में यह नहीं आ पा रहा कि छोटे-छोटे (एक हली-द्वि हली) के सीढ़ीदार खेतों में यह तकनीक कैसे काम कर पायेगी? मुझे तो यह योजना मैदानी क्षेत्रों या घाटी के बड़ी जोत के खेतों के लिये लाभदायक लग रही है।


'पोरस' विधि दिखाएगी कृषि को नई राह

पहाड़ों में पानी की किल्लत से लगातार बंजर हो रहे खेतों और लोगों के पलायन को रोकने के लिए कृषि की नवीनतम तकनीक 'पोरस' विधि वरदान साबित होगी। इस तकनीक के अंतर्गत भूमि के भीतर करीब 9 इंच की गहराई में पाइपों का जाल बिछा दिया जाएगा, जिसमें छोटे-छोटे छेद बिना पानी का अतिरिक्त नुकसान हुए बेहतर सिंचाई कर पैदावार को बढ़ायेंगे। यह कहना है राज्य के कृषि मंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत का, जो शुक्रवार को यहां पत्रकारों से मुखातिब थे।
रावत ने कहा कि इस तकनीक को प्रदेश भर में शुरू करने के प्रयास किये जा रहे हैं। इसके अलावा जल संवर्धन एवं संरक्षण के लिए प्रदेश की कृषि नीति के अनुसार बरसात के जल को सुरक्षित करने के लिए सरकार निजी स्तर पर गड्ढ़े खोदने के लिए 85 फीसदी और सार्वजनिक तालाब बनाने के लिए पूरी मदद करेगी।

रावत ने बताया कि 19 मई को प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह के पंतनगर आगमन पर उन्हें प्रदेश की कृषि समस्याओं के सम्बंध में तैयार किया गया ज्ञापन सौंपा जाएगा, जिसमें मुख्य रूप से उपजाऊ कृषि भूमि पर औद्योगीकरण के लिए विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज) के स्थान पर विशेष कृषि क्षेत्र बनाने, एससी-एसटी, सामान्य लघु एवं सीमांत किसानों को एक लाख रुपये तक के ऋण को ब्याज मुक्त कराने के लिए केंद्र से 200 करोड़ रुपये का विशेष कृषि पैकेज, प्रदेश के सीमावर्ती इलाकों में बसे गांवों में आतंकी घुसपैठ से बढ़ रहे पलायन एवं आर्थिक विकास के लिए 100 करोड़ रुपये, कृषि योग्य बंजर भूमि के सुधार के लिए उत्तराखंड को 50 करोड़ के विशेष कृषि पैकेज की मांग की जाएगी। भाजपा कार्यकर्ताओं ने सुशीला तिवारी अस्पताल के सरकारीकरण में अहम भूमिका निभाने वाले त्रिवेंद्र सिंह रावत के प्रयासों की सराहना की।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Farming on such fields is really a tough job. Portable tractor can be useful. Keeping in view the geographical condition, portable tractor can be developed which will make the easier farming in pahad.

Quote from: एम.एस. मेहता /M S Mehta on January 11, 2010, 10:51:17 PM

Farming on such field is tough.




dayal pandey/ दयाल पाण्डे

पहाड़ो पर पारंपरिक खेती का प्रचालन है अगर हम पारंपरिक खेती छोड़कर आधुनिक खेती की और जायं तो हमें अपनी मेहनत का मुवावजा मिल सकता है मतलव की जहाँ पर धान और गेहूं नहीं उगता है वहां पर कुछ और फसल योजित करैं पहाड़ो मैं मेडिसिनल प्लांट का भी स्कोप है, जेरेनियम की भी अच्छी खेती हो सकती है, चाय की भी उपज बहुत अच्छी होती है कुछ जगह तो चाय उग भी रही है इसके अलावा भी बहुत साड़ी जगह अभी बंकि है जहाँ चाय हो सकती है दालें जैसे भट, मास, सोयाबीन, और गौहत भी उगाई जा सकती है इसलिए मेरा तो जन जागरण से यही अनुरोध है की आधुनिक खेती के ओऊ ध्यान दें

पंकज सिंह महर

आधुनिक खेती के साथ-साथ व्यवसायिक खेती की ओर भी ध्यान दिया जाना चाहिये, फ्लोरीकल्चर इसका एक माध्यम है।टिहरी जिले में एक जगह है आगराखाल, वहां पर अदरक की ही खेती की जाती है। बड़े पैमाने पर अदरक की खेती वहां होती है, जिससे वहां का काश्तकार काफी समृद्ध है, उनके लिये एक कहावत है कि "बोते हैं अदरक और खाते हैं बासमती" क्योंकि वे लोग अदरक के अलावा कोई फसल नहीं बोते और समृद्धता के कारण वे लोग बासमती चावल खाते हैं। लेकिन पहाड़ों में अधिकांश में यह हालत है कि "बोते हैं सूड़िया धान और खाते हैं कंट्रोल का मोटा चावल"  मतलब कि हाड़-तोड़ मेहनत कर लोग पतला धान बोते तो हैं, लेकिन उसकी फसल इतनी नहीं हो पाती कि वह गुजारा कर सके। सो मजबूर होकर लोगों को कंट्रोल की दुकान से राशन लाना पड़ता है।

मेरा यह सुझाव है कि जिस स्थान की जलवायु जिस चीज के लिये अच्छी हो, वहां पर वही चीज बोई जानी चाहिये। उत्तराखण्ड सरकार को अपने इश्टाइल के अभिनव प्रयोग छोड़ धरातल पर कुछ करने की सोचनी चाहिये। किसानों को जागरुक कर उनके लिये ऐसा प्लेटफार्म बनाने का दायित्व तो सरकार का है ही कि वे लोग आत्मनिर्भर हो सकें।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


मेरे हिसाब से.. गेहू और धान की फसल सीडी नुमा दार खेतो में होना संभव नहीं! दूसरी तरफ पानी की कमी भी हो रही है!

तो खेती का पैटर्न बदलने के समय आ गया है! फल, दाल और एनी प्रकार के खेती पर ध्यान देना चाहिए !

सत्यदेव सिंह नेगी

fladaar ped log lagate bhi hai par sirf block se karja lene ke liye dekh rekh nahi karte jiske chalte jahan sarkaari paise ka durupayog hota hai wahin fal utpadan ki disha me khaas kuchha nahi ho pata