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Honour Of State Movement Heroes - उत्तराखण्ड आन्दोलन के आन्दोलनकारियों का सम्मान

Started by पंकज सिंह महर, March 06, 2009, 12:15:38 PM

पंकज सिंह महर

असल आंदोलनकारियों का सम्मान

देहरादून, जागरण ब्यूरो: सन् 1979 को राज्य आंदोलनकारियों के चिन्हीकरण का वर्ष घोषित करना उक्रांद के लिए बड़ी उपलब्धि है, क्योंकि यह उक्रांद की ही मांग रही है। भाजपा द्वारा अपने सहयोगी दल को दी गई इस सौगात के कई राजनीतिक निहितार्थ निकाले जा रहे हैं। उक्रांद इसे असल आंदोलनकारियों का सम्मान मानता है। उत्तराखंड आंदोलनकारी कल्याण परिषद की अध्यक्ष सुशीला बलूनी कहती हैं कि इस निर्णय का बहुत अधिक फायदा नहीं होगा, क्योंकि जंगल काटने पर मुकदमा झेलने वालों को राज्य आंदोलनकारियों की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता है। जन आंदोलन तो 1994 में ही हुआ। यह बात ठीक है कि कुछ लोगों में राज्य के प्रति जुनून था, उन्होंने उसे प्रदर्शित भी किया, लेकिन चिन्हीकरण के लिए प्रमाण भी तो देने होंगे।

* सत्ता में आते ही सुर बदल गये, इनसे ये उम्मीद नहीं थी, क्योंकि इन्हीं जनान्दोलनों से उत्तराखण्ड आन्दोलन की शुरुआत हुई।

इसलिए लगता है कि इसका बहुत अधिक लाभ नहीं मिल पाएगा। सरकार की घोषणा के साथ ही कैबिनेट मंत्री दिवाकर भट्ट ने कहा था कि 1979 से आंदोलनकारियों का चिन्हीकरण उक्रांद का मुद्दा है। यह उक्रांद के लिए बड़ी जीत है। श्री भट्ट के अनुसार 1994 में अचानक जन आंदोलन खड़ा नहीं हो गया। किसी भी जन आंदोलन के लिए एक बड़ी पृष्ठभूमि की जरूरत होती है, जो उक्रांद ने 1979 से बनानी शुरू की थी। उनके अनुसार कांग्रेस द्वारा किया गया आंदोलनकारियों का चिन्हीकरण राजनीति से प्रेरित था। श्री भटट कहते हैं कि पेड़ों का कटान व पानी का आंदोलन इसी के हिस्से थे। उक्रांद नेता काशी सिंह ऐरी कहते हैं कि यह उक्रांद के नौ बिंदुओं में से एक है। भाजपा ने उक्रांद की एक मांग मानी है। श्री ऐरी कहते हैं कि पेड़ काटना राज्य आंदोलन का हिस्सा था। सरकार को आंदोलनकारियों के चिन्हीकरण के लिए मानकों को शिथिल करना चाहिए। इससे असल आंदोलनकारियों का सम्मान हो सकेगा। उत्तराखंड राज्य के गठन की मांग को लेकर 1979 में उत्तराखंड क्रांति दल का गठन किया गया था। उसके बाद राज्य की मांग को लेकर आंदोलन शुरू हुए। राज्य गठन के लिए शुरू हुए इस आंदोलन के कई रूप थे। जैसे विकास कार्यो में अवरोध बने जंगलों का कटान हुआ। पानी के लिए भी आंदोलन हुआ। उक्रांद इस मांग को ठीक चुनाव से पहले मानने के सरकार के निर्णय के पीछे राजनीतिक निहितार्थ भी छिपे हो सकते हैं।
 

shailesh

आन्दोलनकारियों का सम्मान , यह बात मेरी समझ से परे है , क्यूंकि जिस तरह से सरकारें अपना शासन चला रही है उससे तो एक बात साफ़ होती है की जनता को फिर एक आन्दोलन के लिए तैयार होना पड़ेगा !  हालात आज भी वैसे ही है जैसे उत्तराखंड राज्य बनाने से पहले थे, बल्कि और ज्यादा खतरनाक हो गए हैं , एक अलग राज्य बनाने से पहाड़ के दलाल , माफिया ,..इत्यादि   अब  या तो सरकार मे हैं या उन सबको सरकारी संरक्षण प्राप्त है! हालात इसलिए भी वैसे है जैसे राज्य बनाने के पहले थे , क्यूंकि सरकारों की सोच मे कोई बदलाव नहीं आया है , पहले यही सरकार आन्दोलनकारियों को अलगाववादी मानती थी ,आज ये सरकार , अपनी जल ,जंगल ,जमीन के हकों की बात करने वाले आन्दोलनकारियों को माओवादी कहती है ! इसलिए मेरी समझ मे ये नहीं आ रहा है की सरकार किन लोगों का सम्मान कर रही है , और कैसा सम्मान कर रही है !

vivekpatwal

शुक्र है हमारी सरकार को कुछ तो याद आया,
मुझे लगता है की हमारे देश मै हर ६ महीने या साल भर मै चुनाव होने चाहिए, क्योंकि उस वक़्त सरकारें बहुत काम करती है,
  :)

हेम पन्त

राज्य बने 8 साल गुजर गये लेकिन अभी भी न बेरोजगारी और पलायन कम हुआ है, न ही भ्रष्टाचार... न ही खेतों में पानी पहुंचा और न ही शिक्षा के क्षेत्र में कोई उल्लेखनीय प्रगति हुई..

उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलन के दौरान लिखे गये, समाज के हर तबके की अपेक्षाओं को दर्शाने वाले नरेन्द्र सिंह नेगी जी के इस गाने पर हमारे नीति-नियंताओं की नजर शायद अब तक नहीं गयी है...


बोला भै-बन्धू तुमथैं कनू उत्तराखण्ड चयेणू छ्
हे उत्तराखण्ड्यूँ तुमथैं कनू उत्तराखण्ड चयेणू छ्
जात न पाँत हो, राग न रीस हो
छोटू न बडू हो, भूख न तीस हो
मनख्यूंमा हो मनख्यात, यनूं उत्तराखण्ड चयेणू छ्

बोला बेटि-ब्वारयूँ तुमथैं  कनू उत्तराखण्ड चयेणू छ्
बोला माँ-बैण्यूं तुमथैं  कनू उत्तराखण्ड चयेणू छ्
घास-लखडा हों बोण अपड़ा हों
परदेस क्वी ना जौउ सब्बि दगड़ा हों
जिकुड़ी ना हो उदास, यनूं उत्तराखण्ड चयेणू छ्

बोला बोड़ाजी तुमथैं  कनू उत्तराखण्ड चयेणू छ्
बोला ककाजी तुमथैं  कनू उत्तराखण्ड चयेणू छ्
कूलूमा पाणि हो खेतू हैरयाली हो
बाग-बग्वान-फल फूलूकी डाली हो
मेहनति हों सब्बि लोग, यनूं उत्तराखण्ड चयेणू छ्

बोला भुलुऔं तुमथैं  कनू उत्तराखण्ड चयेणू छ्
बोला नौल्याळू तुमथैं  कनू उत्तराखण्ड चयेणू छ्
शिक्षा हो दिक्षा हो जख रोजगार हो
क्वै भैजी भुला न बैठ्यूं बेकार हो
खाना कमाणा हो लोग यनू उत्तराखण्ड चयेणू छ्

बोला परमुख जी तुमथैं  कनू उत्तराखण्ड चयेणू छ्
बोला परधान जी तुमथैं  कनू उत्तराखण्ड चयेणू छ्
छोटा छोटा उद्योग जख घर-घरूँमा हों
घूस न रिश्वत जख दफ्तरूंमा हो
गौ-गौंकू होऊ विकास यनू उत्तराखण्ड चयेणू छ्!!

हेम पन्त

पंकज दा आपने उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलनकारियों से सम्बन्धित बहुत ही गम्भीर सवाल उठाया है, सरकार आन्दोलनकारियों का सम्मान तो कर रही है, लेकिन आन्दोलनकारियों का चिन्हीकरण करने की जो प्रक्रिया अपनाई जा रही है उस पर कई उंगलियां उठ रही हैं.

अभी भी ऐसे कई सच्चे आन्दोलनकारी हैं जिन्होने अपना कैरियर और भविष्य राज्य प्राप्ति के लिये न्यौछावर कर दिया लेकिन उनका बलिदान "धरमखाते" में ही चला गया. वो लोग आन्दोलनकारियों की सूची में भी नही हैं. जबकि बङे राजनीतिक दलों के मक्खनबाज फर्जी तौर पर आन्दोलनकारी घोषित हो चुके है. राज्य के उक्रांद कोटे के कैबिनेट मन्त्री दिवाकर भट्ट जी को एक अग्रणी और जुझारू आन्दोलनकारी के रूप में सभी जानते और मानते हैं. लेकिन इससे ज्यादा हास्यास्पद बात क्या हो सकती है कि मीडिया में वो कहते हैं "इस मसले में मैं क्या बोलूं, खुद मेरा ही नाम राज्य आन्दोलन्कारियों की लिस्ट में नही है?"

हुक्का बू

८ साल, तीन सरकारें, चार मुख्यमंत्री!
उत्तराखण्ड क्यों मांगा, क्यों लम्बी लड़ाई लड़ी गई, किसी ने जानने की कोशिश नहीं की।
आन्दोलनकारियों के सम्मान के नाम पर सिर्फ राजनीति की जा रही है, इसके लिये बनाई गई सम्मान परिषद पार्टी के असंतुष्टों को लालबत्ती देने मात्र का राजनैतिक स्टंट है। लोगों की स्वतः स्फूर्त भावना थी कि उत्तराखण्ड राज्य बने और इसकी राजधानी गैरसैंण बने। लेकिन अभी भी भाजपानीत सरकार के एक वरिष्ठ कैबिनेट मंत्री कहते है कि मेरा बस चले तो इसका नाम उत्तरांचल कर दूं।  इससे इन जनप्रतिनिधियों की जनता के प्रति समझ परिलक्षित होती है।
    इस सरकार ने गैरसैंण में ढोल दमाऊ प्रशिक्षण केन्द्र खोलकर उसके प्रति अपना रवैया भी उजागर कर दिया है।
      उत्तराखण्ड के हित की बात करना गंजों के शहर में कंघी बेचने जैसा हो गया है, जिन सरकारों के पास आन्दोलन को समझने की, उसके पीछे की भावना को जानने की इच्छा शक्ति ही न हो, वह किसी आन्दोलनकारी का क्या सम्मान करेगी, समझा जा सकता है।

पंकज सिंह महर

आंदोलनकारियों को सम्मान

आठ वर्ष बाद भी राज्य निर्माण आंदोलन में भागीदारी करने वाले आंदोलनकारियों को चिन्हित करने का कोई प्रभावी फार्मूला नहीं बन पाया है। पहले भाजपा की अंतरिम सरकार ने आंदोलनकारियों की पहचान के लिए योजना लागू की। उसके बाद पहली निर्वाचित कांग्रेस सरकार में आंदोलन में शामिल लोगों को सम्मान देने की पहल हुई। इसके बावजूद आंदोलन में सक्रिय भागीदारी करने वालों तक सरकार पहुंचने में असफल रही। अब राज्य आंदोलनकारी सम्मान परिषद ने सरकार को एक नया प्रस्ताव भेजा है। यदि इस प्रस्ताव पर मुहर लग जाती है तो आंदोलनकारियों को चिन्हित करने का काम अधिक आसान हो जाएगा। दूसरी ओर, सरकार के स्तर पर आंदोलनकारियों को चिन्हित करने का कार्य पूरा हो चुका है। इंतजार केवल जिलाधिकारियों से सूची उपलब्ध होने का है। दरअसल, आंदोलनकारियों के मामले में सरकारी तंत्र का रवैया लापरवाह रहा है। राजनीतिक दल अपनी साख बढ़ाने के लिए आंदोलनकारियों को सम्मान देने का रास्ता अपनाते रहे हैं, लेकिन यह पहल अभी तक भावनात्मक ही रही है। यदि सरकार की मंशा साफ होती तो आठ वर्ष बाद भी आंदोलनकारी चिन्हित करने की जरूरत महसूस नहीं होती। उत्तराखंड जिस रास्ते पर चल रहा है, उससे यह संकेत तो मिल ही रहे हैं कि राज्य निर्माण के लिए सड़कों पर उतरने वाले आंदोलनकारियों के सपने पूरे होने आसान नहीं हैं। सत्ता व कुर्सी के झगड़े में उलझे राजनीतिक दलों के दिग्गजों के पास इतना भी समय नहीं है कि राज्य गठन की अवधारणा के अनुरूप अपना आचरण बना सकें। कमोवेश सभी राजनीतिक दलों का रवैया एक जैसा बना है। जिन सवालों को लेकर राज्य को अस्तित्व में लाने का आंदोलन चला, वे सवाल अब और हाशिये पर खिसक गए हैं। ऐसे में आंदोलनकारियों के लिए सबसे बड़ा सम्मान यही होगा कि राज्य गठन की मूल अवधारणा के विपरीत कोई भी कार्य सरकारें न करें। यदि सत्ता में बैठे दल ऐसा नहीं करते हैं तो आंदोलनकारियों को सम्मान देने की बात केवल तुष्टिकरण की नीति ही मानी जाएगी। अभी संभलने का समय है और यदि नहीं संभले तो राज्य गठन के औचित्य पर ही प्रश्नचिन्ह लग जाएगा।

स्रोत- दैनिक जागरण, देहरादून 01/06/2009

पंकज सिंह महर

दीपक चन्द्र बड़थ्वाल, राष्ट्रीय सहारा २२ जून, २००९
रूड़की। पृथक राज्य के सुनहरे सपनों को लेकर आंदोलन में कूदे प्रकाश कांति ने नहीं सोचा था कि अपना राज्य बनेगा तो वह बेगाना होकर रह जाएगा। राज्य आंदोलन में विकलांग हुए प्रकाश को पिछले 15 साल से आश्वासन तो बेशुमार मिले लेकिन जबसे राज्य बना, उसके बाद से उसकी सुध लेने की फुरसत किसी को नहीं । आन्दोलन के दौरान पुलिस की गोली से पूरी तरह विकलांग हो चुके प्रकाश को नेताओं से भरोसा उठ चुका था लेकिन फिर भी न जाने क्यों उम्मीद की किरण बार-बार उसे दिलासा देती है कि आज नहीं तो कल कोई तो उसका हाल जानने जरूर आएगा।
राज्य प्राप्ति के संघर्ष में रूड़की आन्दोलन का प्रमुख केंद्र था। तीन अक्टूबर 1994 को क्षेत्र के आन्दोलनकारी एक दिन पहले गांधी जयंती के दिन हुए रामपुर तिराहा काण्ड के विरोध में बीएसएम तिराहे पर प्रदर्शन कर रहे थे। इसी दौरान पुलिस व पीएसी ने प्रदर्शनकारियों पर ताबड़तोड़ गोलियां चला दी। इसमें 28 वर्षीय युवक प्रकाश कांति को भी तीन गोलियां लगी। दो गोली तो उसके शरीर को छूती हुई निकल गयी लेकिन एक गोली उसके सीने के दायीं तरफ घुसती हुई पीठ की तरफ से निकल गयी। गंभीर हालत में प्रकाश को पहले मेरठ व फिर दिल्ली के सफदरगंज अस्पताल ले जाया गया। यहां उसका दो माह तक इलाज हुआ। इलाज से उसकी जान तो बच गई लेकिन वह पूरी तरह विकलांग होकर रह गया। प्रकाश अभी भी अपने पैरों पर खड़ा होने की स्थिति में नहीं है। उसकी पूरी दिनचर्या ह्वील चेयर पर बीतती है। दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि राज्य बनने के बाद राज्य व्याधि निधि, मुख्यमंत्री विवेकाधीन कोष तथा तमाम अन्य मदों में पिछले नौ साल में अरबों रूपये पानी की तरह बह गये लेकिन प्रकाश कांति की सुध किसी को नहीं आई, उन्हें भी नहीं जिन्होंने अस्पताल में तब उसका हाल-चाल जानने का ढोंग किया था। प्रकाश को उम्मीद तो थी कि अपना राज्य बनने के बाद उसके जैसे तमाम लोगों की सरकार सुध लेगी लेकिन अब नौ वर्ष बाद लगता है कि उसके जैसे आंदोलनकारियों के संघर्ष को सलाम करने वाली सरकार अभी तक उत्तराखण्ड में नहीं बनी है। हैरतअंगेज बात यह है कि कांग्रेस के शासनकाल में इस पूर्ण विकलांग को जिला प्रशासन ने सरकारी नौकरी का प्रस्ताव देकर उसके दर्द को और बढ़ाने का काम किया। तब प्रकाश ने अपनी शारीरिक स्थिति को बयां करने के साथ ही नौकरी के बदले पेंशन अथवा मेडिकल सहायता मांगी तो प्रशासन ने पत्र व्यवहार करना ही बंद कर दिया। 15 वर्षीय पुत्री के पिता प्रकाश का जीवन अब पूरी तरह उनकी पत्नी द्वारा चलाये जा रहे स्कूल से होने वाली आय पर निर्भर है। इलाज के लिए भी प्रकाश पर उनके परिजन लाखों रूपया खर्च कर चुके हैं। प्रकाश के पिता पूर्व फौजी जयकिशन कांति व माता सतेश्वरी कांति अपने बेटे के राज्य के प्रति जज्बे को तो सम्मान करते हैं, लेकिन राजनीतिज्ञों के प्रति उनके मन में घृणा के अलावा कुछ नहीं है।

आन्दोलनकारी करते हैं सलाम

रूड़की। राज्य आन्दोलन के दौर में प्रकाश के साथी रहे हर्ष प्रकाश काला, कमला बमोला व नरेन्द्र गुंसाई सरीखे अग्रणी आन्दोलनकारी उसके संघर्ष को सलाम करते हैं, साथ ही सरकार से सवाल करते हैं कि शहीदों के नाम पर सड़कों व स्कूलों का नामकरण तो हो रहा है लेकिन जो आन्दोलनकारी जिन्दगी से ही संघर्ष कर रहे हैं उनकी सुध क्यों नहीं ली जा रही है?

क्या कहना है परिषद का

रूड़की। राज्य आन्दोलनकारी सम्मान व कल्याण परिषद की उपाध्यक्ष श्रीमती सुशीला बलूनी इस मामले में कुछ और ही दावा करती हैं। उनका कहना है कि परिषद को आज तक प्रकाश की तरफ से मदद के लिए विधिवत कोई पत्र ही नहीं मिला है। पत्र मिलेगा तो उस पर कार्रवाई जरूर होगी। हालांकि उनके पास इस बात का जवाब नहीं था कि प्रशासन की आ॓र से सूचीबद्ध होने के बाद भी अलग से आवेदन की क्यों जरूरत है।

घर तो सभी नेता आते हैं

रूड़की। मुख्यमंत्री बीसी खण्डूडी, केंद्रीय मंत्री हरीश रावत, सांसद सतपाल महाराज, योजना आयोग के उपाध्यक्ष मनोहरकांत ध्यानी, आन्दोलनकारी कल्याण परिषद के पूर्व कार्यकारी अध्यक्ष धीरेन्द्र प्रताप से लेकर वर्तमान उपाध्यक्ष सुशीला बलूनी आदि तमाम राजनीतिज्ञों ने प्रकाश कांति के घर पहुंचकर मदद का आश्वासन तो दिया। सीएम बनने से पहले खण्डूडी दिल्ली अस्पताल व रूड़की दोनों ही जगह प्रकाश कांति की कुशलक्षेम पूछने आये लेकिन इतने भर से पीड़ा कम नहीं हो जाती।

pandey


सत्यदेव सिंह नेगी

पंकज भाई
हम लोग कितने अहसान फरामोश होते जा हरे हैं न
कभी कभार तो बड़ी शर्म आती है पर क्या करें यही तो जीवन है