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Districts Of Uttarakhand - उत्तराखंड के जिलों का विवरण एवं इतिहास

Started by Devbhoomi,Uttarakhand, April 22, 2009, 10:46:12 PM

Devbhoomi,Uttarakhand



खिरसू-

बर्फ से ढ़के पर्वतों पर स्थित खिरसू बहुत ही खूबसूरत स्‍थान है। यह जगह हिमालय के मध्‍य स्थित है। इसी कारण यह जगह पर्यटकों को अपनी ओर अधिक आकर्षित करती है। इसके अलावा यहां से कई अन्‍य जाने-अनजाने शिखर दिखाई पड़ते हैं। खिरसू पौढ़ी से 19 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह समुद्र से 1700 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। खिरसू बहुत ही शान्तिपूर्ण स्‍थल है। यहां बहुत अधिक संख्‍या में ओक, देवदार के वृक्ष और फलोघान है।


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गौरीकुंड-

सोन प्रयाग से गौरीकुंड की दूरी 5 किलोमीटर है। यह समुद्र तल से 1982 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। केदारनाथ मार्ग पर गौरीकुंड अंतिम बस स्‍टेशन है। केदारनाथ में प्रवेश करने के बाद लोग यहां पूल पर स्थित गर्म पानी से स्‍नान करते हैं। इसके बाद गौरी देवी मंदिर दर्शन के लिए जाते हैं। यह वहीं स्‍थान है जहां माता पार्वती ने भगवान शिव को पाने के लिए तपस्‍या की थी।



दिओरिया ताल-

यह स्‍थान चोपटा-ऊकीमठ मार्ग पर स्थित है। जो कि सारी गांव के आरम्‍भ मार्ग से 2 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह झील चारों तरफ से वनों से घिरी हुई है। चौकम्‍बा शिखर का पड़ने वाला प्रतिबिम्‍ब इस झील को ओर अधिक खूबसूरत बनाता है।

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तेईस हज़ार फुट की ऊँचाई पर एक तरफ़ बर्फ़ से ढकी चोटियाँ दिखाई देती हैं तो दूसरी ओर खुली पठारी शिखर श्रेणियाँ छाती ताने खड़ी रहती हैं। हिमशिखरों से समय-समय पर हिमनद का हिस्सा टूटता है। काले-कबरे पहाड़ों से पत्थर गिरते हैं। इनके बीच नागिन की तरह बल खाती पतली-सी पगडंडी पर होता है, आम आदमी। घबराया, आशंकित-सा।

गौरीकुंड से १४ किलोमीटर दूर मंदाकिनी के तट पर स्थित पवित्र केदारनाथ धाम तक के दुर्गम मार्ग का कोई भी यात्री यही वर्णन कर सकता है। चरम सुख को मृत्यु के भय के साथ देखना हो, बर्फ़ीली हवाओं का आनंद लेना हो, तो इस जोखिमभरी यात्रा का अनुभव आवश्यक है। केदारनाथ की ओर चलें तो प्रकृति और वातावरण, दोनों में भारी अंतर है। नीचे मंदाकिनी नदी बेताबी से बहती चली जाती है अलकनंदा से रुद्रप्रयाग में मिलने। तीर्थयात्रियों के लिए यह यात्रा कौतूकतापूर्ण होती है, परंतु यहाँ के निवासियों के लिए जीवन एक कठोर संघर्ष है। एक ऐसा संघर्ष जो दिन-रात चलता रहता है, लेकिन फिर भी माथे पर कोई शिकन नहीं।

पुण्यभूमिः उत्तराखंड
उत्तराखंड धर्म के हिसाब से चार धाम, पंचप्रयाग, पंचकेदार, पंचबदरी की पुण्यभूमि के रूप में जाना जाता है। यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ व बदरीनाथ चार धाम हैं। देवप्रयाग, रुद्रप्रयाग, कर्णप्रयाग, सोनप्रयाग एवं विष्णुप्रयाग नामक पाँच प्रयाग हैं। इनके अतिरिक्त भी गंगा और व्यास गंगा का संगम व्यास प्रयाग, भागीरथी का संगम गणेश प्रयाग नाम से प्रसिद्ध है। देवप्रयाग में अलकनंदा और भागीरथी नदियाँ मिलती हैं। देवप्रयाग में इन दो नदियों के संगम के बाद जो जलधारा हरिद्वार की ओर बहती है, वही गंगा है। देवप्रयाग से पहले गंगा नाम का कहीं अस्तित्व नहीं है। यात्रा दुर्गम भी है और रोचक भी। देवप्रयाग से ६८ किलोमीटर दूर दो पहाड़ियों के मध्य में स्थित है रुद्रप्रयाग। रुद्रप्रयाग दो तीर्थयात्राओं का संगम भी है। यहाँ से मंदाकिनी नदी के साथ चलकर केदारनाथ पहुँचते हैं और अलकनंदा के किनारे चलकर बद्रीनाथ। पौराणिक मान्यता के अनुसार पहले केदारनाथ की यात्रा करना चाहिए, उसके बाद बदरीनाथ की। अगर दुर्गम पहाड़ियों को काटकर बनाए सर्पिल रास्तों से न जाकर सीधे नाक की सीध में जाया जाए, तो वह दूरी बीस कि.मी. से ज़्यादा नहीं।

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पूजा-पाठ व श्राद्ध
शाम होते-होते हम गौरीकुंड पहुँचते हैं जो गुप्तकाशी से ३३ किलोमीटर की दूरी पर और समुद्र से ६८०० फीट की ऊँचाई पर स्थित है। यहाँ का पर्वतीय दृश्य बहुत लुभावना है। देश के कोने-कोने से तीर्थयात्री यहाँ पहुँचते हैं। कुछ विदेशी पर्यटक भी देखे जा सकते हैं। यहाँ पर गढ़वाल मंडल विकास निगम का विश्रामगृह है। इसके अतिरिक्त कई छोटे-मोटे होटल और धर्मशालाएँ भी हैं। गौरीकुंड को पार्वती के स्नान करने की जगह बताया जाता है। यह भी कहते हैं कि यहाँ गौरी ने वर्षों तप कर भगवान शिव के दर्शन किए थे। यहाँ दो कुंड हैं। एक गरम पानी का कुंड है। इसे 'तप्त कुंड' कहते हैं। इसमें नहाकर ही यात्री आगे बढ़ते हैं। महिलाओं के नहाने के लिए अलग से व्यवस्था है। गंधक मिले इस पानी को चर्म रोगों के लिए प्रकृति सुलभ उपचार माना जाता है। गंधक के कारण ही यह पानी गरम रहता है। इस तरह के 'तप्त कुंड' बदरीनाथ सहित अनेक स्थानों पर पाए गए हैं। पास ही ठंडे जल का कुंड है। इसमें पीले रंग का जल है, पर यहाँ नहाना मना है। यहाँ पर पंडों द्वारा पूजा-पाठ व श्राद्ध की क्रिया पूर्ण की जाती है। इससे लगा हुआ गौरी का एक मंदिर भी है।



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हरिद्वार ज़िला
हरिद्वार ज़िला, उत्तराखंड, भारत में एक पवित्र नगर और नगर निगम बोर्ड है। हिन्दी में, हरिद्वार का अर्थ हरि ("ईश्वर)" का द्वार होता है। हरिद्वार हिन्दुओं के सात पवित्र स्थलों में से एक है।

३१३९ मीटर की ऊंचाई पर स्थित अपने स्रोत गौमुख (गंगोत्री हिमनद) से २५३ किमी की यात्रा करके गंगा नदी हरिद्वार में गंगा के मैदानी क्षेत्रो में प्रथम प्रवेश करती है, इसलिए हरिद्वार को गंगाद्वार के नाम सा भी जाना जाता है, जिसका अर्थ है वह स्थान जहाँ पर गंगाजी मैदानों में प्रवेश करती हैं।



हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, हरिद्वार वह स्थान है जहाँ अमृत की कुछ बूँदें भूल से घडे से गिर गयीं जब खगोलीय पक्षी गरुड़ उस घडे को समुद्र मंथन के बाद ले जा रहे थे। चार स्थानों पर अमृत की बूंदें गिरीं, और ये स्थान हैं:- उज्जैन, हरिद्वार, नासिक, और इलाहाबाद|
आज ये वें स्थान हैं जहां कुम्भ मेला चारों स्थानों में से किसी भी एक स्थान पर प्रति ३ वर्षों में और १२वें वर्ष इलाहाबाद में महाकुम्भ आयोजित किया जाता है। पूरी दुनियाभर से करोडों तीर्थयात्री, भक्तजन, और पर्यटक यहां इस समारोह को मनाने के लिए एकत्रित होते हैं और गंगा नदी के तट पर शास्त्र विधि से स्नान इत्यादि करते हैं।

वह स्थान जहाँ पर अमृत की बूंदें गिरी थी उसे हर-की-पौडी पर ब्रह्म कुंड माना जाता है जिसका शाब्दिक अर्थ है 'ईश्वर के पवित्र पग'। हर-की-पौडी, हरिद्वार के सबसे पवित्र घाट माना जाता है और पूरे भारत से भक्तों और तीर्थयात्रियों के जत्थे त्योहारों या पवित्र दिवसों के अवसर पर स्नान करने के लिए यहाँ आते हैं। यहाँ स्नान करना मोक्ष प्राप्त करने के लिए आवश्यक माना जाता है।



हरिद्वार जिला, सहारनपुर डिवीजनल कमिशनरी के भाग के रूप में २८ दिसंबर १९८८ को अस्तित्व में आया। २४ सितंबर १९९८ के दिन उत्तर प्रदेश विधानसभा ने 'उत्तर प्रदेश पुनर्गठन विधेयक, १९९८' पारित किया, अंततः भारतीय संसद ने भी 'भारतीय संघीय विधान - उत्तर प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम २०००' पारित किया, और इस प्रकार ९ नवंबर, २०००, के दिन हरिद्वार भारतीय गणराज्य के २७वें नवगठित राज्य उत्तराखंड (तब उत्तरांचल), का भाग बन गया।

आज, यह अपने धार्मिक महत्व से परे, राज्य के एक प्रमुख औद्योगिक गंतव्य के रूप में, तेज़ी से विकसित हो रहा है, जैसे तेज़ी से विक्सित होता औद्योगिक एस्टेट, राज्य ढांचागत और औद्योगिक विकास निगम, SIDCUL (सिडकुल), भेल (भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड) और इसके सम्बंधित सहायक।

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हरिद्वार: इतिहास और वर्तमान

प्रकृति प्रेमियों के लिए हरिद्वार स्वर्ग जैसा है। हरिद्वार भारतीय संस्कृति और सभ्यता का एक बहुरूपदर्शक प्रस्तुत करता है। इसका उल्लेख पौराणिक कथाओं में कपिलस्थान, गंगाद्वार और मायापुरी के नाम से भी किया गया है। यह चार धाम यात्रा के लिए प्रवेश द्वार भी है (उत्तराखंड के चार धाम है:- बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री), इसलिए, भगवान शिव के अनुयायी और भगवान विष्णु के अनुयायी इसे क्रमशः हरद्वार और हरिद्वार के नाम से पुकारते है। हर यानी शिव और हरि यानी विष्णु।



महाभारत के वाणपर्व में धौम्य ऋषि, युधिष्टिर को भारत के तीर्थ स्थलों के बारे में बताते है जहाँ पर गंगाद्वार, अर्थात्, हरिद्वार और कनखल के तीर्थों का भी उल्लेख किया गया है।

कपिल ऋषि का आश्रम भी यहाँ स्थित था, जिससे इसे इसका प्राचीन नाम, कपिल या कपिल्स्थान मिला। महान राजा, भगीरथ, जो सूर्यवंशी राजा सगर के प्रपौत्र (श्रीराम के एक पूर्वज) थे, गंगाजी को सतयुग में वर्षों की तपस्या के पश्चात् अपने ६०,००० पूर्वजों के उद्धार और कपिल ऋषि के श्राप से मुक्त करने के लिए के लिए पृथ्वी पर लाये। ये एक ऐसी परंपरा है जिसे करोडों हिन्दू आज भी निभाते है, जो अपने पूर्वजों के उद्धार की आशा में उनकी चिता की राख लाते हैं और गंगाजी में विसर्जित कर देते हैं। कहा जाता है की भगवान विष्णु ने एक पत्थर पर अपने पग-चिन्ह छोड़े है जो हर की पौडी में एक उपरी दीवार पर स्थापित है, जहां हर समय पवित्र गंगाजी इन्हें छूती रहतीं हैं।

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