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Kuli Begar Movement 1921 - कुली बेगार आन्दोलन १९२१

Started by पंकज सिंह महर, May 07, 2009, 11:46:06 AM

Devbhoomi,Uttarakhand

कुली बर्दायस  
इसका अभिप्राय अंग्रेज अधिकारीयों के भ्रमण के समय विभिन्न पडावों पर अधिकारियों,सैकिकों,पर्यटकों तथा,कारिंदों को दी जाने वाली खान पान सुभ्धाओं से था!
इसके अर्न्तगत अनाज,तरकारी, घी,दूध, मुर्गी,बकरी,पानी,लकडी,घास,बर्तन,व सतु आदि दिया जाता था!इसके अतिरिक्त चीनी,तेल,चटाई,चारपाई या पराल (घास)की भी ब्यवस्था करनी पड़ती थी!बर्दयास के रूप मैं प्राप्त शाम्ग्रि का मूल्य चुकाने का प्रावधान आंग्ल शासन ने प्रारंभ से ही किया था!किन्तु अधिकांस बर्दायासनिशुल्क और आवश्यकता से अधिक वसूल की जाती थी,जो शामान्यत उस छेत्र मैं विशेस रूप कास्तकारों के पास उपलब्ध नहीं होती थी ! न दिए जाने पर जुरमाना भी  किया जाता था,मंडवा और जौ की रोटी खान वाले किर्षकों से गेंहूँ का आटा,वासमती चावल, डालें तथा मुर्गी आदि मंगाई जाती थी!
कभी-कभी अधिकारीयों के अधिनस्त,अधिकारी सामग्री को छीनकर भी ले जाते थे!
इस प्रकार उत्तराखंड मैं बर्दायस  के साथ एक उल्लेखनीय जातीय चरित्र भी प्रकट होता था,शरवन किर्षकों के खाद्य सामग्री दूध
लिया जाता था! शिल्पकारों से छप्पर बनाने और घास लकडी आदि एकत्रित करने का ही कार्य करवाया जाता था!यह तथ्य इस बात की ओर संकेत करता है,कि इस निति के विकास मैं स्थानीय सर्बन राज कर्मचारियों तथा अधिकारीयों कि जातिवादी नैतिकता ओर भागीदारी भी उत्तरदायी थी!
सन १९१७ मैं बर्दायस  कष्टों को कम करने के लिए सरकारी प्रयत्न किये गए ,बर्दायस चुकाने के लिए नियम बनाये गए ओर उच्च अधिकारीयों को निर्देश दिए गए कि वे अपने अधिनस्त कर्मचारियों से नियमों का पालन करवाएं किन्तु शामान्यताएजेंसी
लाइनों को (जहाँ कुली एजेंसियों कि शाखायेंस्थापित हो गयी थीं) बर्दायस  का मूल्य नहीं चुकाया गया!दूरस्त ग्रामीण छेत्रों मैं १९१७ के पश्चात् भी बर्दायस मूल्य दिए बिना यह कुरुप्र्था चलती रही !

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पटवारी द्वारा की गयी मांग,लकडी,घास,दूध ही सामान्यतया मिलता था!दूध के लिए पहले से आवेदन किया जाना अनिवार्य था,लेंसीडाउन  के केंट छेत्र सैनिक भी निकट के गांवों मैं बर्दायस लेते थे!निजी उद्देश्यों की पूर्ती के लिए,सभी किर्षकों को बर्दायस देने के लिए,बाध्य किया जाता था!आवश्यकता से अधिक बकरे,गोस्ट मांसाहार के रूप मैं मँगाए जाते थे,जिनका मूल्य कास्तकारों को नहीं दिया जाता था! कुली के रूप मैं विरध स्त्री व बच्चों,सभी बेगार ली जाती थी!इसका सजीव चित्रण करते हुए,पंडित गिर्जदत नैथानी ने लिखा था कि-"आज वर्षा हुयी है किशानों ने हल तैयार किया हल-बैल लेकर ज्यों ही वे खेत पर पहुंचे
त्यों ही चपराशी बेगार का उत्तारलेकर पहुंचा! उस वक्त उसको कितना दुःख होता है,यह शिर्फ़ समझने योग्य बातें हैं! थाली पर परोषा भोजन जैशा धुख्दाई हिरदय मैं खटकता है,उससे कही अधिक बड़कर खटकता है!किशन बड़े पशोपैस मैं पद जाते थे,यदु बेगार मैं नहीं जाता है तो चालन होता है!और जाता है तो उसके खेतों को नुकशान पहुँचता है"
बेगार उत्पीडन का दूसरा पछ प्रकट करते हुए,गढ़वाली मासिक ने लिखा था कि -"मर्द परदेश मैं है स्त्री घर पर है,बेगार कि उस पर बारी आ गयी है,आह यह कैसी आफत है!अपनी बारी करने किसको भेजें? इधर प्रधान धमकता है,उधर चपराशी आंकें दिखता है!अफसोश के साथ कहना पड़ता है कि हमारे कुमाऊं प्रदेश मैं ऐसी दुखनी विधवा अथवा सधवा ओरतें भी बेगार मैं पकड़ी जाती हैं!अंग्रीजी राज्य के लिए इससे लज्जानक और क्या बात हो सकती है,जहाँ ओरतों के ऊपर अत्याचार होते हैं"जनता को उत्पीडन से बचने के उदेश्य से सन १९१० मैं सालिग्राम वैस्नव ने अंडे,मुर्गी, घास लकडी हितु ठेके खुलवाए तथा गोस्ट के लिए लैंसी डाउन मैं एक बूचड़ कि दिकान भी खुलवाई थी!


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बेगार ब्यवस्था मैं सुधार के प्रयत्न

गढ़वाल मैं कुली एजेंसी -

१९ वीं सताब्दी के अंतिम दसक तथा २० वीं सदी के आरंभिक दशकों मैं बेगार विरोधी घटनाओं तथा प्रांतीय विधायिका एवं कांग्रेस के मंच से इस कुप्रथा की निंदा करते हरी बंद किये जाने की मांग के कारण इसमें संशोधन की प्रकिर्या प्रारंभ हुई!यह कर्म आन्दोलन (बेगार) के अंतिम वर्षों तक चलता रहा!
१८९३ मैं डिप्टी कमिश्नर की सरकारी भ्रमण की अवधी घटाकर वर्ष मैं दो महा,अन्य अधि नस्त अधिकारियों की आठ से बारह  सप्ताह टक्कर दी गई,सहायक और संयुक मजिस्ट्रेटों के लिए आवास्यक्तानुसार भ्रमण की अवधी का प्रावधान किया गया था!सन १८९३ मैं ही प्रतेक अधिकारी को छेत्र का भ्रमण करने से पूर्व अपना कार्यक्रम प्रकाशित करने और सम्बंधित लोगों सूचना देने का आदेश दिया गया था!ये नियम १९१० तक प्रचलित रहे,सन १९१० मैं विकेंद्रिय कारन सम्बन्धी सकारी आयोग ने भ्रमण करने की अवधी कम करने की सलाह दी!किन्तु इस ब्यवस्था मैं सुधर और भ्रमण को सावधानी से नियोजित और विग्यान्पित करने की आवश्यकता पर बल दिया गया था! २० वीं सदी के आरम्भ इलाहबाद उच्च न्यायालय ने बेगार के विरोध मैं निर्णय दिए जाने से प्रांतीय विधायिका और स्थानीय समाचार पत्रों मैं उठ रहे बेगार विरोधी आन्दोलन को बल मिला था,फलस्वरूप समस्याक इ निराकरण के लिए सुशार्वादी कार्यकर्ताओं के डिप्टी कमिश्नर से मिलने तथा ज्ञान्प्नों को शासन तक भेजने का कर्म भी आरम्भ हुआ!
प्रशासनिक स्टार पर बेगार को संशोदित करते हुए इसे जीवित रखने के भी प्रयत्न किये गए,तत्कालीन सुधारवादियों ने इस प्रश्न पर सरकार से सीधे टकराव की निति को न अपनाकर प्रवातीय आँचल के किर्सक वर्ग की समस्या के हल के लिए कुली एजेंसियों की अस्थापना का विचार दिया था! किन्तु डाक्टर शेखर पाठक ने इस सरकार परस्त सुधारवादियों द्वारा बेगार के विरोध मैं उठ रहे आन्दोलन की गति को कम करना और इसे मिल रहे ब्यापक जन समर्थन  को विभाजित करने का प्रयास कहा है!

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सन १९०७ मैं पोडी गढ़वाल के तहसीलदार जोधसिंह नेगी ने बेगार के लिए बिना सफलतापूर्वक भार्मन का ब्यवहारिक उदहारण प्रस्तुत किया था!उससे उत्साहित होकर द्वारीखाल के कानूनगो शालिग्राम वैशन्व ने एक अभिनव प्रयोग किया,उसने डिप्टी कमिश्नर के दोरे के समय निकट के गाँवों से खाद्य सामग्री अंडा,मुर्गी,दूद ,दही न मंगवाकर प्रति परिवार से दो दो आना चंदा एकत्रित कर कमिश्नर स्टोवल व उसके दल के ठहरने व खाने का प्रबंध किया था!यह कदाचित पहला प्रयोग था,जब वर्दायस के रूप मैं वस्तुओं के स्थान पर धन राशिः लेकर कार्य संपन्न किया गया!इसी तरह का विचार गढ़वाली माशिक ने अगस्त १९०६ के अंक मैं दिया था!इसके अनुसार बेगार  से लोगों को बचने के लिए कोटद्वार या श्रीनगर गढ़वाल मैं एक ट्रांसपोर्ट डिपो कि स्थापना कि जानी चाहिए! इसी तरह १३ मई १९०७ के अल्मोडा अख़बार ने गढ़वाल मैं कुली उत्तार फंड की स्थापना का प्रस्ताव किया था!
इस तरह आरम्भिक सफलताओं के उदहरणों से उत्साहित  होकर सन १९०८ मैं जोधसिंह नेगी ने कुली एजेंसी की स्थापना की!
तत्कालीन प्र्स्तिथियों मैं इसे पहले स्थाई व ब्यवहारिक प्रयास के रूप मैं मान्यता मिली यही!
कुली एजेंसियों ने अपनी स्थापना के प्रथम वर्स मैं उल्लेखनीय भूमिका निभाते हुए,एक हजार रूपये की बचत की थी.१९१२ मैं डिप्टी कमिश्नर कोलेट ने भी कुली एजेंसियों के कार्यों की प्रशंसा की,फलस्वरूप श्रीनगर,पोडी,कालेश्वर,ब्यास्घाट,द्वारीखाल,डंडामंडी  तहत दुगड्डा मैं एजेंसियां स्थापित हुयी!सन १९१२ के अंत तक लैंसडौन मैं तथा मार्च १९१३ मैं छातिखाल (रुद्रप्रयाग)मैं एजंसी स्थापित की गयी!

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गढ़वाल मैं कुली एजेंसियों की स्थापना से उत्पन्न नै ब्यवस्था मैं भी कुछ अधिकारी व कर्मचारी मजदूरी और मूल्य देने से बचने का प्रयास करते रहे,इन बुक्तियों ने कुली एजेंसियों से संपर्क न कर सीधे गाँव वालों से कुली मांगने के प्रयत्न किये!गढ़वाल समाचार ने लिखा था कि-कुछ ऐसे उदाहरण भी सामने आये हैं,जब ये अधिकारी और कर्मचारी उस स्थान पर पडाव नहीं डालते थे,जहाँ कुली एजेंसियों कि ब्यवस्था है,ये ग्रामीण किर्सकों को अपने जाल मैं फांसने मैं सफल रहते थे!
विशेकर दूरस्थ छेत्रों मैं जनता एजेंसी को शुल्क देने के उपरांत भी कभी-कभी स्वयं कुली बनकर कर बद्र्दायस देने के लिए बाद्य थी!स्वयं तारादत गैरोला ने विधायिक मैं बेगार उन्मूलन सम्बन्धी प्रस्ताव रखते हुए १६ दिसम्बर १९१८ मैं कहा था कि-एजेंसी बेगार का कभी समाधान नहीं हो सकता है!
उनका कहना था कि ग्रामीणों को अपने स्वराज के बराबर ही राशि एजेंसी फंड मैं देनी पड़ती है,इस दूरस्थ गांवों मैं बेगार और उत्तार लगातार चल रही है!गढ़वाल के साप्ताहिक पत्र प्रुर्सार्थ का कहना था कि -ठाकुर जोत्सिंघ नेगी ने भ्रमण करने वाले अधिकारीयों के साथ स्थायी कुली ब्यवस्था करने के स्थान पर एजेंसी चलाई और हमारा देश कुली कहलाने के अपमान से मुक्त नहीं हुआ,उलटा इसे १० साल पीछे धकेल दिया गया!
बिटिश साशन की ओर से कहा गया कि-कुली एजेंसियां समाधान तो नहीं हैं लेकिन तात्कालिक रूप से बहुत सहायक हैं!निष्कर्स रूप मैं कहा जा सकता है कि-उत्तराखंड मैं बेगार कि प्रकिर्या का प्रारंभ परम्परागत था और आंग्ल साशन मैं इसका बोझा बढ़ता गया!
सन १९२२ मैं अंग्रेज अधिकारी ग्लेन द्वारा यातायात हेतु खच्चरों की ब्यवस्था करना और कुलियों की मजदूरी बढाये जाने की सस्तुती करना तत्कालीन आंग्ल साशन की उद्धार दिर्स्ती का प्रतीक था!किन्तु सन १८१५ के उपरांत आंग्ल साशन की निरंतर विस्तार से प्रसाशनिक इकाइयों की संख्या मैं बिर्धि हुई!भू सुधर और प्रवातीय छेत्रों के वनों के उपभोग से यहाँ वानिजिया पूंजीवाद प्रारंभ हुआ,स्थानीय स्थर भी प्र्साशकों की उद्धार दिष्टि मैं परिवर्तन हुआ,तथा बेगार बोझ बढ़ता गया!
बेगार प्रथा का चरमोत्कर्ष १९ वीं शताब्दी के अंतिम दसकों मैं हुआ इसी समय रास्ट्रीय स्थर पर कांग्रेश के साथ प्रांतीय विधयिका भी जन्म हुआ! स्थानीय स्थर पर समाचार पत्रों मैं बेगार पर टिपण्णीयां प्रकाशित होने लगी थीं!शिष्ट मंडलों द्वारा भी इसका विरोध किया जाने लगा!
२० वीं सताब्दी के आरम्भिक दसक मैं बेगार विरोधी असंतोष ने जन-आन्दोलन की संभावनाओं को बढाया ,परिनाम्ताया शासन द्वारा बेगार को संशोदित किये जाने की प्रकिर्या प्रारम्भ हुई,१९१६ मैं स्थापित कुमाऊं परिषद् ने आर्थिक और सामाजिक जीवन मैं ब्याप्त विसंगतियां,वन और बेगार प्रश्नों पर जनमत जागृत करने का प्रयत्न किया!

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बेगार प्रशन और जन-चेतना का बढ़ता राजनैतिक्करण कुमाऊं परिषद् और कांग्रेश

प्रवारिया आँचल के आर्थिक सामाजिक व राजनैतिक पिछडे पण को दूर करने के उद्देश्य से शिछित वर्ग द्वारा ३० सितम्बर १९१६ को नैनीताल मैं कुमाऊं परिषद् की स्थापना की गई थी!कुमाऊं गढ़वाल के विभिन् विचारधरा वाले ब्यक्ति इसमें समिलित किये गए,यह संगठन सामान्य सुधर के उद्देश्यों पर ही केन्द्रित न होकर राजनैतिक सोच और दिर्ष्टि का भी सगठन था!इसके संस्थापकों मैं लाछ्मिदत शास्त्री,हरगोविंद पन्त,बद्रिदाद पाण्डेय,गोविन्द्बलभ पन्त,मोहनजोशी,मोहनसिंह मेहता आदि,कुमाऊं के संभ्रांत परिवारों के शिछित ब्यक्ति थे!
इस वार्स लखनऊ मैं आयोजित कांग्रेश के प्रांतीय अधिवेसन मैं उत्तराखंड से लगभग ५०० ब्यक्ति गए,इनमेंसे २० प्रतिनिधि ही कांग्रेसी थे,लखनऊ अधिवेसन मैं कुली प्रथा मैं परिवर्तन हेतु प्रस्ताव पारित हुआ था! कुमांऊ पार्षद की प्रथम बैठक रायबहादुर छ्पाल के सभ्पतित्व मैं मझेड़ा (अल्मोडा) मैं हुई,सितम्बर १९१७ मैं सभा का पहला वार्षिक अधिवेसन अल्मोडा मैं हुआ!
सभा की अध्य्छाता अवकाश प्राप्त दीप्ती कलेक्टर जयदत जोशी ने की,इस अवसर पर बद्रिदत जोशी की कविता "राजा वाही रहेंगे श्रीमान जॉर्ज पंचम प्रतेक स्वेत चर्मा राजा न हो सकेगा"के माध्यम से बिर्टिस नौकरशाही पर चोट पहुंचाई गई!किन्तु सभा मैं उपस्तित राय बहादुर जोशी ने कविता पड़े जाने पर आपति प्रकट क्धिकांस युवक अधिवेसन से चले गए!इस तरह अपनी स्थापना के पहले वर्स मैं ही कुमाऊं परिषद् के दो धडे हो गए,एक ओर अवकाश प्राप्त सर्कार्प्र्स्त स्थानीय अवकास प्राप्त अधिकारी राय बहादुर ओर संपन्न ब्यक्ति थे!
दूसरी ओर तिलक ओर होमरूल की रास्तियता से प्रभावित युवक थे,परिषद् की आधार पीठिका मैं गोविन्द्बलभ पन्त,लाछ्मिदत शास्त्री,हरगोविंद पन्त और बद्रिदत पाण्डेय प्रमुख थे!कुमाऊं परिषद् का दूसरा अधिवेसन २५-२५ दिसम्बर १९१८ को हल्द्वानी मैं राय बहादुर ,तारादत गैरोला की अध्याछ्ता मैं हुआ, तारादत गैरोला के अतिरक्त राय बहादुर,बद्रिदत पाण्डेय तथा भोलादत पाण्डेय के महत्वपूरण ब्याख्यान हुए!
बेगार और उसमें उत्पन्न सम्स्यवों पर विश्त्रित चर्चा हुई!अध्य्छिं भासन मैं तारादत गैरोला ने कहा कि राजनैतिक सुधारों के साथ-साथ सामाजिक सुधर भी किये जाने चाहिए,राजनैतिक सुधारों के अर्न्तगत उन्होंने कुली उतार जंगलात और शिछ के पिछडे पन को दूर करना बताया कुली एजेंसियों कि कार्यों कि सराहना करते हुए उन्होंने कहा इसने उत्तर के कठिन प्रशन को सुविधाजनक ढंग से हल कर दिया है!
25 दिसम्बर को हरगोविंद पन्त ने प्रस्ताव पारित करते हुए बेगार को दो वर्स के अन्दर समाप्त करने का संकल्प लिया,किन्तु परिषद् के कुछ बुजुत्ग नेता इसे समाप्त न करके धीरे-धीरे समाप्त किये जाने के पछ मैं थे!गढ़वाल आँचल मैं २१ मार्च १९१९ को श्रीनगर गढ़वाल मैं कुमाऊं परिषद् कि बिर्हद सभा हुई,इसमें पारित १३३ प्रस्तावों मैं ,प्रथम प्रस्ताव राजभक्ति और चोथा कुमाऊं से शिग्ढ़ बेगार समाप्त करने से सम्बंधित था!
३० मार्च १९१९ को श्रीनगर मैं हुए विजयोत्सव समारोह कि अध्य्छ्ता करते हुए तारादत गैरोला ने अंग्रेजी सरकार की प्रशंसा की किन्तु बेगार प्रथा समाप्त किये जाने की मांग करते हुए,इसे शानदार राज्य के लिए कलक के सामान बताया गया!जून १९१८ मैं मल्ला कत्यूर की कुछ पत्तियों के मालगुजारों आदि आसामियों ने पटवारियों द्वारा लिए जाने वाले अन्न का विरोध किया,साथ ही साथ इसे देना बांध किया,और उत्पीडन किये जाने पर आन्दोलन की चेतावनी दी!

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कुमाऊं परिषद् का तीसरा वार्षिक अधिवेसन २२,२३ तथा २४ दिसम्बर १९१९ को कोटद्वार मैं सम्म्पन हुआ,राय बहादुर,बद्रिदत जोशी और अध्यछ और तारादत गैरोला इसके स्वाग्ताध्यछ थे!इसमें नैनीताल गढ़वाल और अल्मोडा जनपद ५०० से अधिक ब्यक्ति समिलित हुए,इनमें बद्रिदत जोशी,भोलादत पाण्डेय,गोविन्द्बलभ पन्त,बद्रिदत पाण्डेय,मोहन जोशी,दुर्गादत पन्त,मोहन सिंह मेहता हरगोविंद,पन्त,तारादत गैरोला,मथुरा प्रशाद नैथानी,अनुशुया प्रशाद बहुगुणा,चंनिशाह,प्रतापसिंह,गिरिजादत नैथानी,मुकंदिलालावैरिस्तर,विसम्बर्दत चंदोलाधनीराम मिश्र प्रमुख ब्यक्ति थे!
अधिवेसन के प्रथम दिन गिर्जादत नैथानी,रामदत,दुर्गापंत,नारायांस्वामी,तारादत गैरोला,बिरज्मोहन चंदोला,गोविन्द बलभ पन्त और बद्रिदत जोशी के ब्याख्यान हुए,वक्ताओं ने कुली बेगार और जंगलात कष्टों को असे और निकिर्ष्ट ठहराते हुए इन्हें निबल किर्षकों का उत्पीडन बताया! इसके साथ ही इन्हों बेगार की वास्तविकता आंग्ल कानून और इसके दुर्प्र्योग के तथ्य रखते हुए प्र्साशकों के द्वारा बेगार को जीवित रखने के अर्न्तगत तर्क भी प्रस्तुत किये,अधिवेसन के दुसरे दिन श्रीकिशन जोशी,पीताम्बर जोशी (अल्मोडा) धर्मानंद जोशी,मठुरादत त्रिवेदी (द्वारहात),जयलाल (बागेश्वर),गोपालशाह (गंगोलीहाट),केशाव्दत पन्त,आदि के पत्र पढ़े गए!जिनका समर्थन गिर्जादत नैथानी और अनुसूया प्रशाद नैथानी ने प्रस्तुत किया!इस प्रस्ताव का सदस्यों मैं बिवाद हुआ,किन्तु अन्तत बी डी चंदोला हरदार उप्प्ध्याय व तारादत गैरोला ने मत भेद सुलझाने और आम सहमती कराने मैं सफलता प्राप्त की!
कोटद्वार अधिवेसन की समाप्ति पर पर्वतीय छेत्र के लगभग १०० कार्यकर्त्ता यहाँ इ अमृतसर कांग्रेश अधिवेसन मैं समिलित हिने के किये गए!इनमें मुकुंदीलाल, अनुसूया प्रसाद बहुगुणा,बद्रिदत पाण्डेय,हर्गोविन्द्पंत,मोहन मेहता आदि प्रमुख थे,अमृतसर कांग्रेश से लोटने के उपरांत कुमाऊं परिषद् के नेताओं और कार्यकार्ताओं ने गाँव तक संघठन के प्रसार के उद्देश्य से लोक शिछन और सभाएं आयोजित की, इस प्रकार परिषद् ने ग्रामीण किर्शक जनता को सरकार द्वारा किये जा रहे शोसन के विरूद्व संघठित करने का प्रयत्न किया!
कुमाऊं परिषद् का सातवाँ और अंतिम अधिवेसन १९२६ मैं गानियाँ धोली मैं मुकुंदीलाल वैरिस्टर की अध्याछ्ता मैं संपन्न हुआ,इसके उपरांत इसी वर्स कुमाऊं परिषद् का कांग्रेश मैं विलय कर दिया गया! आगे चलकर स्वाधीनता प्राप्ति तक के जन संघर्सों के इतिहास मैं सभी सामाजिक,आर्थिक राजनैतिक प्रश्नों और सम्स्यवों के समाधान के लिए कांग्रेश ने अपना मंच प्रदान किया,इसमें जनता मैं विशेषकर निर्बल वर्ग (शिल्पकार) मैं इस संघठन के प्रति रूचि और उत्साह देखा गया!

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गढ़वाल मैं कांग्रेश संघठन की प्रारम्भिक गति विधियां

२० वीं सताब्दी के तीसरे दसक मैं गढ़वाल मैं दो विचार धाराएँ सामाजिक जीवन मैं उपलब्ध थीं,पहली विचारधारा मैं सरकारपरस्त किन्तु सुधर वादी नेता जिनमें रायबहदुर,तारदत गैरोला,पातीराम,गंगादत जोशी घनानंद खंडूडी,राम बहादुर जोधसिंह नेगी,आदि प्रमुख थे! सरकार को सीधी टक्कर न देते हुए, जनता को उनकी अदिकारियों की प्राप्ति के लिए सचेत करने की दिशा मैं ये सुधर वादी प्रयत्न शील थे,जो स्थानीय चेतना को रास्ट्रीय राजनैतिक के साथ जोड़ने की इच्छुक थे!उनमें मुकंदिलाल वैरिस्टर,अनुसूया प्रशाद बहुगुणा,ने कांग्रेश के अमृतसर अधिवेशन मैं थे,मुकंदिलाल और अनुसूया प्रशाद बहुगुणा ने अधिवेशन मैं भाग लिया था!वापस लोटकर उन्होंने गढ़वाल मैं रोलेट एक्ट का विरोध किया था! यह घटना गढ़वाली समाज का रास्टीय राजनीति की मूलधारा के निकट आने की परिचायक थी!रास्ट्रीय राजनीति के विचारों से प्रभावित इन ब्यक्तियों ने गढ़वाल का भार्मन किया दिसम्बर १९१९ के अंतिम दिनों मैं अपने को कंग्रेशी घोषित करते हुए कांग्रेश कमिटी की घोषणा की!गढ़वाल मैं बने पहले इस राजनैतिक संघठन के सयोंजक मुकंदिलाल बनाये गए!मुकंदिलाल ने गढ़वाल कांग्रेश को संघठन का आना  सदस्य बनाया! तत्पश्चात मुकंदिलाल वैरिस्टर को कुमाऊं कमिस्नरीने पहले अखिल भारतीय कांग्रेश कमिटी के सदस्य के रूप मैं मनोनीत किया गया!
गढ़वाल कांग्रेश कमिटी सम्मुख प्रमुख समस्या थी,की जनता को किन किन साधनों से कंग्रेह्स और उसकी नीतियों के प्रति आकर्षित किया जाय! अश्य्हयोग आन्दूलन और गांधी के सन्देश को लेकर गोवर्धन बडोला गढ़वाल पहुंचे इन कार्यकर्ताओं ने मुकंदिलाल,इस्वरिदत ध्यानी,मंगत राम खंतवाल,तथा अनुसूया प्रशाद बहुगुणा आदि के साथ मिलकर कुली बेगार की विरूद्व जनमत जागृत करने के लिए गढ़वाल के विभिन्न छेत्रों मैं पद यात्रएं की!