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Reason For Forest Fire - उत्तराखंड में आग ज्यादा, पानी कम: कारणों कि खोज

Started by मदन मोहन भट्ट, May 18, 2009, 12:00:25 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720




विकास सिंह39 minutes ago
उत्तराखण्ड के जंगलों में आग से हर साल बेशकीमती पेड़-पौधे, जड़ी-बूटियां, वन- सम्पदा और जीव-जंतु आग की भेट चढ़ रहें हैं और उत्तराखंड सरकार कुम्भकरण की नींद सो रही हैं। जंगलो की सुरक्षा और आग से रक्षा के लिए हर वर्ष करोड़ों रुपये सरकार खर्च करती है। वहीं वन विभाग अपनी लापर वाही से बाज नहीं आ रहा है। यहीं यदा-कदा इसका असर पानी के स्रोतों पर भी पड़ रहा है। 'जल-जंगल-जमीन' उत्तराखण्ड की धरोहर हैं। देश की इस अनुपम धरोहर को अग्नि में इस तरह स्वाह होने से जीव-जन्तु मात्र ही नहीं अपितु वन-सम्पदा भी खाक होती जा रही हैअब आपदाओं से निपटने के लिये सरकार की ओर से बाकायदा एक आपदा प्रबंधन विभाग भी खोला गया है। वन विभागों को हाईटेक करने की बात कही गई है ताकि आपदा के समय त्वरित कार्रवाई की जा सके। संरक्षण तथा संवर्धन के लिये बाकायदा ग्रामीण स्तर पर वन पंचायतें भी बनायी गयी हैं। इन्हें समय-समय पर आर्थिक सहायता भी दी जाती है, जिससे वे वन पंचायत क्षेत्र के अधीन वृक्षारोपण के साथ-साथ, संरक्षण में अहम भूमिका निभाएं। लेकिन इसके बावजूद सरकारी उपक्रम और प्रयास ठीक-ठाक नहीं दिखते। जंगलों की आग सच बयान कर देते हैं कि सरकार इन आपदाओं से निपटने के लिये कागजी घोड़े पर सवार होकर आग से जंग जीतना चाहती है पर जमीनी हकीकत ठीक इसके विपरीत है। दरअसल विभागों में आवश्यक संसाधन की कमी साफ दिखाई देती है। जिलों में आग पर काबू के लिए एकाध फायर ब्रिगेड की गाड़ियां ही मौजूद हैं जिनमें फायर सीजन शुरू होने से पूर्व ही पेयजल की किल्लत अहम है! हाल ही में केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने 'ग्रीन इंडिया' कार्यक्रम करने का ऐलान किया है। इस कार्यक्रम के तहत वन संरक्षण एवं सुदृढ़ीकरण को बढ़ावा दिये जाने की बात कही। प्रदेश सरकार ने इसे गंभीरता से लेते हुए आपनी प्रोजेक्ट रिपोर्ट केंद्र सरकार को सौंप दी है। प्रदेश सरकार ने इस प्रोजेक्ट को 'कैंपा' नाम दिया है। केन्द्र ने प्रदेश में वनाग्नि की गंभीरता को देखते हुए आठ सौ सैंतीस करोड़ रुपये जारी कर दिये हैं। 'कैंपा' प्रोजेक्ट के तहत इस राशि से प्रदेश सरकार वनाग्नि सुरक्षा उपकरणों की खरीद, कॉरीडोर का विकास, प्रदेश में बांज क्षेत्रों का विकास, वन पंचायतों के सुदृढ़ी करण एवं सीमांकन जैसे कार्य करेगी। यह राशि वन भूमि हस्तांतरण एवं एनपीवी के अलावा अन्य माध्यमों से एकत्रित धन का कुछ हिस्सा मात्र है। पहले से ही वनाग्नि में झुलस रहे प्रदेश के जंगल को इससे कितनी निजात मिलेगी, यह देखना अभी बाकी है। — with


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This is one of the reason...

Quote from: हेम पन्त on May 18, 2009, 03:44:49 PM
चीङ (सल्ला) पहाङों में बहुतायत से पाया जाने सुईदार पत्ती वाला पौधा है. चीङ के गुण व दोषों पर पर्यावरणविद व वनवैज्ञानिक कभी एक राय नही हो पाये. कुछ लोगों का मानना है कि चीङ की जङें मिट्टी को मजबूती से पकङ कर भू-क्षरण को रोकती हैं इसके तनों से निकलने वाला लीसा तारपीन का तेल, पैन्ट-वार्निश बनाने के काम आता है, इसकी पत्तियों को रोजगार परक बनाने के लिये कई शोध भी चल रहे हैं.

लेकिन एक गम्भीर और सर्वमान्य बात यह है कि पहाङों के जंगलों में आग फैलने का सबसे बङा कारण भी चीङ ही है. इसकी सूखी नुकीली पत्तियां और तने पर लगा लीसा आग को बहुत तेजी से फैलाता है. चीङ के जंगल बहुत तेजी से फैलते हैं और यह जमीन से पानी सोख कर उसे पथरीला बना देता है. कई सालों से चीङ के प्रसार को हतोत्साहित करने की बात चल रही है लेकिन पिछले दिनों आये एक शोध ने चीङ को पहाङों के लिये एक अतिआवश्यक और लाभकारी पौधा साबित करने का प्रयास किया है.

चीङ के जंगलों के भारी प्रसार से बांज के जंगल तेजी से सिमट रहे हैं. पहाङों में पानी की कमी का यह भी एक प्रमुख कारण है. इसके अलावा पारंपरिक पानी के अधिकांश श्रोत जैसे नौले, धारे आदि उपेक्षित हो चुके हैं. यह सार्वजनिक श्रोत रखरखाव और साफ-सफाई के अभाव में सूखने लगते हैं. गांव के लोग और सरकार भी इन्हें बचाने का कोई खास प्रयास नहीं करती. अभी पिछले सालों में मुख्य सङक मार्गों के किनारे पर कई हैण्डपम्प खुदवाये गये थे, जिनमें करोङों रुपये खर्च हुए, लेकिन मुझे लगता है इनमें से 90% हैण्डपम्प अब सूखे पङे हैं. सरकार को ऐसी परियोजनाओं में पैसा लगाने की बजाय पारंपरिक जलश्रोतों के जीर्णोद्धार की तरफ़ ध्यान देना चाहिये.   

पारम्परिक रूप से पहाङों में गांवों के ऊपरी इलाके में बांज व बुरांश के जंगल होते थे जो कि अपनी जङों में पानी संचय करते थे. इस तरह के गांवों में पानी की कभी कमी नहीं रहती थी.  मेरे गांव के आसपास के इलाके में 'सिमल्या' नाम का एक पौधा होता है, इसकी खासियत यह है कि इसकी छाया में एक जलश्रोत (नौला या धारा) जरुर होता है. सम्भवतं यह भी जमीन के अन्दर से पानी को सोखकर जङों में संचित करता होगा. ऐसी ही कई अन्य वनस्पतियां हैं जिन पर व्यापक शोध करने की आवश्यकता है. 


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Awareness is also important. There had many cases where some villagers also lit fire during summer for better grass. .

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Summer season is approaching near.. Govt should start awareness programme for public and should concrete step to save forest..


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


उत्तराखंड के  हाल ठीक नहीं है। 
कभी बादल फटने से टूटा उत्तराखंड,
कभी राजनीतिक अस्थिरता से उजड़ा उत्तराखंड
अब बचा खुचा आग में स्वाहा उत्त्तरखण्ड। 
रहम करो प्रभु - देव भूमि को दावानल से बचाओ। 

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

गर्मी की ऋतु में उत्तराखंड के जंगलों में हर साल आग लगती है और करोड़ो की वनसम्पदा का नुकसान होता है लेकिन इस साल यह दावानल कुछ ज्यादे ही भयंकर रूप धारण किये हुए है। कई गांव आग के खतरे में है। मेरा वचपन और नव-जवानी का कुछ समय उत्तराखंड में ही बीता है। हम भी कई बार आग बुझाने जंगलों में जाया करते थे और एक बार तो आग के चपेट में आ गए थे और बाल बाल जान बची थी। आग लगने का मुख्य कारण है चीड़ के पेड़ों से गिरने वाली नुकीली पत्तियां जिसे स्थानी भाषा में पिरुड कहते है। यह पिरुड काफी मात्रा में पेड़ों से सूख कर गिरती रहती है गर्मी के ऋतू में। हलकी सी भी चिंगारी से भयंकर आग का रूप ले लेती है और साथ में हवा तेज चलती है और आग तेजी से फैलती है। बाँझ , देवदार और अन्य पेड़ पानी के अच्छे श्रोत माने जाते है वही चीड़ के पेड़ आग का मुख्य कारण है। उत्तराखंड के जंगलों में अधिकतर पेड़ चीड़ के ही मिलते है। लेकिन कुदरत को कौन चैलेंज कर सकता है। कुदरत ने चीड़ के पेड़ ही उत्तराखंड को दिए अब सब पेड़ों को देवदार नहीं बनाया जा सकता है फिर भी जंगलों में लगने वाले आग से बचने के पूर्व में प्रयास किये जाने चाहिए।


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

पहाड़ो में पानी का कम होना गंभीर चिंता का विषय है।