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गिरीश चन्द्र तिवारी "गिर्दा" और उनकी कविताये: GIRDA & HIS POEMS

Started by पंकज सिंह महर, May 18, 2009, 03:51:58 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कां जूंला यैकन छाड़ी (Girda)

हमरो कुमाऊं, हम छौं कुमइयां, हमरीछ सब खेती बाड़ी
तराई भाबर वण बोट घट गाड़, हमरा पहाड़ पहाड़ी

यांई भयां हम यांई रूंला यांई छुटलिन नाड़ी
पितर कुड़ीछ यांई हमारी, कां जूंला यैकन छाड़ी

यांई जनम फिरि फिरि ल्यूंला यो थाती हमन लाड़ी
बद्री केदारै धामलै येछन, कसि कसि छन फुलवाड़ी

पांच प्रयाग उत्तर काशी, सब छन हमरा अध्याड़ी
सब है ठूलो हिमाचल यां छ, कैलास जैका पिछाड़ी

रूंछिया दै दूद घ्यू भरी ठेका, नाज कुथल भरी ठाड़ी
ऊंचा में रई ऊंचा छियां हम, नी छियां क्वे लै अनाड़ी

पनघट गोचर सब छिया आपुण, तार लागी नै पिछाड़ी
दार पिरूल पतेल लाकड़ो, ल्यूछियां छिलुकन फाड़ी

अखोड़ दाड़िम निमुवां नारिंग, फल रूंछिबाड़ा अघ्याड़ी
गोर भैंस बाकरा घर घर सितुकै, पाल छियां ग्वाला घसारी.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

By Girda

चुनावी रंगे की रंगतै न्यारी,
मेरि बारी! मेरि बारी!! मेरि बारी!!!
दिल्ली बै छुटि गे पिचकारी,
अब पधान गिरी की छू हमरी बारी,
चुनावी रंगे की रंगतै न्यारी।
मथुरा की लठमार होलि के देखन्छा,
घर-घर मची रै लठमारी,
मेरि बारी! मेरि बारी!! मेरि बारी!!!

आफी बण नैग, आफी बड़ा पैग,
आफी बड़ा ख्वार में छापरि धरी,
आब पधानगिरी छू हमरि बारि।
बिन बाज बाजियै नाचि गै नौताड़,
खई पड़ी छोड़नी किलक्यारी,
आब पधानगिरी की छू हमरि बारी।
रैली थैली, नोट-भोटनैकि,
मची रै छो मारामारी,
मेरि बारी! मेरि बारी!! मेरि बारी!!!

पांच साल तक कान-आंगुल खित,
करनै रै हूं हु,हुमणै चारी,
मेरि बारी! मेरि बारी!! मेरि बारी!!!
काटि में उताणा का लै काम नि ऎ जो,
भोट मांगण हुणी भै ठाड़ी,
मेरि बारी! मेरि बारी!! मेरि बारी!!!

पाणि है पताल, ऎल नौणि है चुपाड़,
मसिणी कताई बोल-बोल प्यारी,
चुनाव रंगे की रंगतै न्यारी।
जो पुजौं दिल्ली, जो फुकौं चुल्ली,
जैंकि चलैंछ किटकन दारी,
चुनाव रंगे की रंगते न्यारी,
मेरि बारी! मेरि बारी!! मेरि बारी!!!
चुनाव रंगे की रंगते न्यारी।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

है किसका अधिकार नदी पर

चलो नदी तट वार चलो रे
चलो नदी तट पार चलो रे,करें यात्रा नदियों की
नदी वार तट पार चलो रे,करें यात्रा नदियों की

इन नदियों के अगल-बगल ही
जीवन का विस्तार,चलो रे करें यात्रा नदियों की

आज इन्हीं नदियों के ऊपर
पड़ी है मारामार, चलो रे करें यात्रा नदियों की

टुकड़ा-टुकड़ा नदी बिक रही
बूँद-बूँद जल भर, चलो रे करें यात्रा नदियों की

गाँव हमारे, नदी किनारे
सूखा कंठ हमारा, चलो रे करें यात्रा नदियों की

जल में बोतल,बोतल में जल
प्यासा पर संसार, चलो रे करें यात्रा नदियों की

सूखा गीला बादर-बिजुली
सबकी हम पर मार, चलो रे करें यात्रा नदियों की

प्रश्न यही कि नदी पर पहला
किसका है अधिकार, चलो रे करें यात्रा नदियों की

नहीं किसी की नदी मौरूसी
हम पहले हकदार, चलो रे करें यात्रा नदियों की

बहता पानी,चलता जीवन
थमा कि हाहाकार, चलो रे करें यात्रा नदियों की

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


जहाँ न बस्ता कंधा तोड़े, ऐसा हो स्कूल हमारा - 'गिर्दा'

जहाँ न बस्ता कंधा तोड़े, ऐसा हो स्कूल हमारा
जहाँ न पटरी माथा फोड़े, ऐसा हो स्कूल हमारा

जहाँ न अक्षर कान उखाड़ें, ऐसा हो स्कूल हमारा
जहाँ न भाषा जख़्म उभारे, ऐसा हो स्कूल हमारा

जहाँ अंक सच-सच बतलाएँ, ऐसा हो स्कूल हमारा
जहाँ प्रश्न हल तक पहुँचाएँ, ऐसा हो स्कूल हमारा

जहाँ न हो झूठ का दिखव्वा, ऐसा हो स्कूल हमारा
जहाँ न सूट-बूट का हव्वा, ऐसा हो स्कूल हमारा

जहाँ किताबें निर्भय बोलें, ऐसा हो स्कूल हमारा
मन के पन्ने-पन्ने खोलें, ऐसा हो स्कूल हमारा

जहाँ न कोई बात छुपाए, ऐसा हो स्कूल हमारा
जहाँ न कोई दर्द दुखाए, ऐसा हो स्कूल हमारा

जहाँ फूल स्वाभाविक महकें, ऐसा हो स्कूल हमारा
जहाँ बालपन जी भर चहकें, ऐसा हो स्कूल हमारा

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720



जहाँ न बस्ता कंधा तोड़े, ऐसा हो स्कूल हमारा - 'गिर्दा'

पार पछय़ूं बटी, माठू-माठु, ठुमुकि-ठुमुकि
रतङ्यालि जै छबिलि-सुघड़ि, हुलरि ऐ गै ब्याल!
गौनन गोर-बाछन दगै मोहन की मुरुलि रणकि
बिनु-बिजौराक गाल में लटकि घंटुलि खणकि
अदम बाटै खालि घड़ ल्ही, बावरि राधिका जसि
चाय्यैं रैगै ब्याल, चाय्यैं रैगे ब्याल!

हेम पन्त


विनोद सिंह गढ़िया

स्व० श्री गिर्दा (गिरीश चन्द्र तिवारी) जी के वचन,जो आज हमें उत्तराखण्ड में आयी इस तबाही के बाद याद आ रहे हैं।


विनोद सिंह गढ़िया

भविष्य में भयमुक्त, उदार समाज की कल्पना करते हुए लिखा गया "गिर्दा" का यह गीत उत्तराखण्ड के प्रसिद्ध गायक नरेन्द्र सिंह नेगी जी ने अपनी कैसेट "उत्तराखण्ड रैली मां" में सन 1994 में गाया था। उस समय उत्तराखण्ड राज्य की मांग को लेकर चल रहा आन्दोलन अपने चरम पर था। यह गीत अब एक जनगीत बन चुका है, विभिन्न आन्दोलनों और रैलियों में लोग इसे आशावादिता और एकजुटता प्रदर्शित करने के लिये गाते हैं।



विनोद सिंह गढ़िया

उत्तराखण्ड के प्रसिद्ध जनकवि और रंगकर्मी श्री गिरीश चन्द्र तिवारी (गिर्दा) का एक कविता पोस्टर।