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Songs For Saving Forests - वन सम्पदा को वचाने के लिए ये गाने

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, May 31, 2009, 01:04:34 PM

हेम पन्त

चिपको और नशा विरोध आन्दोलन के दौर में गीत और कविताओं के माध्यम से जनजागरण की लहर उठाने में घनश्याम भट्ट "शैलानी" जी का अमूल्य योगदान है, उनके द्वारा लिखे गये गीत "खड़ा उठा भाई-बंदो, सब कठा होला, सरकारि नीति से जंगल बचौंला" ने दूरस्थ क्षेत्र के लोगों में भी जंगलों को बचाने की जरूरत के विचार पैदा किये. इससे पहले 1971 में नशा विरोधी आन्दोलन के दौर में शैलानी जी ने "हिटा दिदी, हिटा भुली, चला गौं बचौला, दारु कु दैंत लाग्यौं तै दैंत भगौंला" जैसे गीत गाकर लोगों को नशा उन्मूलन आन्दोलन के लिये एकजुट किया.

निम्न गीत भी चिपको आन्दोलन के समय लिखा गया था. इसमें घनश्याम भट्ट "शैलानी" जी ने सरकार की जनविरोधी नीतियों से जंगलों के ठेकों को रोकने के लिये महिलाओं से आगे आने का आह्वान किया है और जंगल कटने पर होने वाले दुष्प्रभावों को भी बताया है.


धरती को हरण ह्वैगे, मिट्टी को क्षरण ह्वैगे
मनख्यूं को मरण ह्वैगे, जंगलु दु:शासन लै गे
कृष्ण बणी कु आलु धरती की लाज थामण लि.
तैयार ह्वै जावा बैणियो, गौं-गौं कि स्याणि सय्याणियों
पहाड़ कि तुम आंछरियों, शक्ति की मातरियों
घी-दूध को बण तुमरु मैत लुटै गैन लो
ह्यूंचुलि ड़ाण्यूं मां आब ह्यूं कखन जामलो.

धरती का हरण और मिट्टी क्षरण हो चुका है. मनुष्य की मृत्यु होने लगी है और जंगलों पर दु:शासन (ठेकेदारों) का राज हो गया है. कोई तो आयेगा कृष्ण बनकर जो धरती की लाज बचायेगा. गांव की बहनों-महिलाओ तुम तैयार हो जाओ, तुम शक्ति का अवतार हो. यह वन जो तुम्हारे मायके के समान है वो लुट रहा है. यदि यह जंगल नहीं रहे तो ऊंची पहाड़ियों पर बर्फ कैसे जमेगी.


सत्यदेव सिंह नेगी

Naa Jaa Na Ja Thau Bhelu Pakhan Jideri ghaseri bwalyun man

aani ni dyandu tu sarakari boon gaur bhasyun kya ji khan

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


उत्तराखंड के लोक संगीत में वन संरक्षण के लिए बहुत गाने बने है! कई गानों में वन संपदा को आन औलाद के रूप में भी देखा गया है, वनों की तुलना संतान से की गयी है!


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

 
हो नी काटो , नी काटो झुमरयाली बाँज , बंजानी धुरा ठंडो पानी |
ठंडो पानी , ठंडो पानी , बाँज बंजानी धुरा ठंडा पानी |
नैपाल की धनपुतली , कमर खुकुरी |
बरमा जानी धनपतली ,कमर खुकुरी |
ठंडो पानी , ठंडो पानी , बाँज बंजानी धुरा ठंडो पानी |
हो नी काटो , नी काटो झुमरयाली बाँज , बंजानी धुरा ठंडो पानी |
म्हैना आयो चैत को हो कोई न कोई आलो |
जैको भाई , चाई रौली , गत भिटौली ल्यालो |
ठंडो पानी , ठंडो पानी , बाँज , बंजानी धुरा ठंडो पानी|
हो नी काटो , नी काटो झुमरयाली बाँज , बंजानी धुरा ठंडो पानी |
यो दिन यो बार मेरी ऊमर की बात |
भुलुलो , भुलुलो कुंछी , बांकी उन्छी याद |
ठंडो पानी , ठंडो पानी , बाँज बंजानी , धुरा ठंडो पानी |
हो नी काटो , नी काटो झुमरयाली बाँज , बंजानी धुरा ठंडो पानी |
(कुमाऊ का लोक साहित्य से साभार )

भावार्थ :
मत काटो काटो मत , इस नुकीली घनी पत्तियों वाले बाँज को , बाँज के वन का जल बहुत शीतल होता है |
शीतल , बहुत शीतल जल , बाँज के वन में बहुत शीतल जल होता है |
नेपाल का धनपुतली नामक व्यक्ति कमर में खुकुरी बांधे है |
धनपुतली वर्मा जा रहा है , कमर में खुकरी बंधी है |
शीतल बहुत शीतल जल , बाँज के वन में बहुत शीतल जल है |
मत काटो काटो मत , इस नुकीली घनी पत्तियों वाले बाँज को , बाँज के वन का जल बहुत शीतल होता है |
चैत का महीना आ रहा है , कोई न कोई अवश्य आवेगा |
जिन बहिनों के भाई हैं वे भाई की राह देखती होंगी कि कब भिटौली लेकर भाई आ जावे |
शीतल , बहुत शीतल जल , बाँज के वन में बहुत शीतल जल है |
मत काटो काटो मत , इस नुकीली घनी पत्तियों वाले बाँज को , बाँज के वन का जल बहुत शीतल होता है |
वह दिन , वह वार जीवन भर मेरी स्मृति में रहा |
जितना इसे भुलाने की चेष्टा की , उतना ही अधिक याद आया यह |
शीतल , बहुत शीतल जल , बाँज के वन में बहुत शीतल जल है |
मत काटो काटो मत , इस नुकीली घनी पत्तियों वाले बाँज को , बाँज के वन का जल बहुत शीतल होता है |

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


पेड़ पर जाओ, उसको शाखा उप शाखाओ पर जाओ, उसके फल खाओ पर पेड़ को मत तोडना
यह गीत के बोल देखिये !

इस गीत के पीछे भी यह सन्देश है की वन संपदा को वचाया जाय !

लंका गढ़ भीतर बल, छोलिंग की डाई!
छोलिंग तुम खाला बल, डाई झन तोडिया!
तुम डाई तोड़ला, हम घर बोलला!
बूबा जी को पास , बल बूबा जी को पास !
हांगी जाया फांगी, बाल डाली झन तोडिया!

लंका गढ़ भीतर बल, नारंगी की डाई!
नारंगी तुम खाला बल, डाई जहाँ तोडिया !
तुम डाई तोड़ला, हम घर बोलला!
बूबा जी को पास , बल बूबा जी को पास !
हांगी जाया फांगी, बाल डाली झन तोडिया!

लंका गढ़ भीतर बल, आंखोड़ की डाई!
आंखोड़ की तुम खाला बल, डाई झन तोडिया!
तुम डाई तोड़ला, हम घर बोलला!
बूबा जी को पास , बल बूबा जी को पास !
हांगी जाया फांगी, बाल डाली झन तोडिया!



एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


गर्मी ऋतु और बाज की जड़ो से निकालने वाला पानी १

ल्यो ठंडो पाणी, ते बांजा जौड़ी को !

ल्यो ठंडो पाणी, तै ज्योठ वैसाख!
ल्यो ठंडो पाणी, तनी ज्योठ को घाम !
ल्यो ठंडो पाणी, हरणा वबैगी !
ल्यो ठंडो पाणी, येगी ऋतु बौडी!
ल्यो ठंडो पाणी, झुम्या-२ म्योऊ
ल्यो ठंडो पाणी, लुप्या लुप्या कुवेडी!
ल्यो ठंडो पाणी, कन पयारु, मान्यन!
ल्यो ठंडो पाणी, शरील भरयन!
ल्यो ठंडो पाणी, डिबली सो गाज!
ल्यो ठंडो पाणी. सियोली  बैठी जोला !
ल्यो ठंडो पाणी, बुरोशो की डाली!
ल्यो ठंडो पाणी, डाल्यो बैठी  जोला!
ल्यो ठंडो पाणी, बंगी बंगी लगनी !
ल्यो ठंडो पाणी, म्वारयो रुणानी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

प्रयाग पाण्डे

पर्यावरण संरक्षण को लेकर बहुत पुराना कुमाऊँनी लोक गीत :-

पारा रे भीडा को छै घस्यारी
मालू वे तू मालू नी काट ।
पारा रे भीडा मैं छूं घस्यारी
मालू वे तू मालू काटण दे ।
तौ मालू काट्यो पाप लांगछ
मालू वे तू मालू नी काट ।
भैंसी रे छ , थोरी है रै छ
मालू वे तू मालू काटण दे ।
तौ भैंसी कणी भ्योव घुरै दे
मालू वे तू मालू नी काट ।
भैंसी छ भागी मैं कणी प्यारी
थोरी छ भागी दीदी कें प्यारी
के छ वे तेरे दीदी को नाम
वीक मरद की करों काम ।
दीदी क नाम प्यारी दुलारी
धनसिंहाँ भीना तेरी अन्वारी ।
पारा रे भीडा को छै घस्यारी
मालू वे तू मालू नी काट ।
तौ मालू काट्यो पाप लांगछ
मालू वे तू मालू नी काट ।