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Articles By Bhisma Kukreti - श्री भीष्म कुकरेती जी के लेख

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, July 26, 2009, 12:54:53 PM

Bhishma Kukreti

शादी के सात बचनों का छंदयुक्त गढ़वाली अनुवाद
-
भवानुवादक - कृष्ण कुमार ममगाईं
-

ब्यो का 7 बचन गढ़वाली स्लोक :
=
जु शादिसुदा झन उ फेरौं का यूँ 7  बचनू थैं मनन कैरा अर जौंका ब्यो हूंणा छन उ रियलसल कैरा।  संस्कृत का मन्त्रु कु यु  गढ़वाली ड्राफ्ट रूपान्तर जन चा ।
प्रथम वचन:
तीर्थव्रतोद्यापन यज्ञकर्म मया सहैव प्रियवयं कुर्या:,
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति वाक्यं प्रथमं कुमारी !!

                     याने   (गढ़वालिम)   

तीर्थुम बरतुम यज्ञोंम पाठुम,
दगड़ी रखल्य जू अपणां हि साथम ।
वामांग मा औलु तभी तुम्हारा   
पैलू बचन यो ब्वल्दा कुमारी  ॥
द्वितीय वचन:
पुज्यौ यथा स्वौ पितरौ ममापि तथेशभक्तो निजकर्म कुर्या:,
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं द्वितीयम !!

                     याने  (गढ़वालिम)

अपड़ा ब्वै-बब्बु जन म्यारा भि मनल्या,
मर्यादा जन सब्बी कर्म कल्या ।
वामांग मा औलु तभी तुमारा   
दुसरू बचन यो ब्वल्दा कुमारी  ॥
तृतीय वचन:

जीवनम अवस्थात्रये मम पालनां कुर्यात,
वामांगंयामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं तृ्तीयं !!

                     याने   (गढ़वालिम)

जीवन कि तिन्नी अवस्थौं म मेरी,
मेरु जु पालन करल्या त ब्वाला ।
वामांग मा औलु तभी तुमारा     
तिसरू बचन यो ब्वल्दा कुमारी  ॥


चतुर्थ वचन:

कुटुम्बसंपालनसर्वकार्य कर्तु प्रतिज्ञां यदि कातं कुर्या:,
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं चतुर्थं !!

                     याने  (गढ़वालिम)

कुटुम्ब पालनकि सबि जुम्मेबारी,
लींदा प्रतिज्ञ उठांणा कि सारी ।
वामांग मा औलु तभी तुमारा     
चौथू बचन यो ब्वल्दा कुमारी  ॥
पंचम वचन:

स्वसद्यकार्ये व्यवहारकर्मण्ये व्यये मामापि मन्त्रयेथा,
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रूते वच: पंचमत्र कन्या !!

                     याने  (गढ़वालिम)

घर-भैरा कामुम कै भी व्यवहारम,
खर्चा कनम जू मीं थैं भि पुछल्या ।
वामांग मा औलु तभी तुमारा     
पांचौं बचन यो ब्वल्दा कुमारी  ॥
षष्ठम वचनः

न मेपमानमं सविधे सखीनां द्यूतं न वा दुर्व्यसनं भंजश्चेत,
वामाम्गमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं च षष्ठम !!

                     याने  (गढ़वालिम)

अपमान नी कल्या दगड़्यों क बीचम,
जुवा आदि ब्यसनौ से रैल्या दूर ।
वामांग मा औलु तभी तुमारा     
छट्टू बचन यो ब्वल्दा कुमारी  ॥
सप्तम वचनः

परस्त्रियं मातृसमां समीक्ष्य स्नेहं सदा चेन्मयि कान्त कुर्या,
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रूते वच: सप्तममत्र कन्या !!

                     याने   (गढ़वालिम)
बक्की जननौ थैं माँ जन्न मनल्या
अर हमरा प्रेमम हैंकै नि स्वचल्या ।
वामांग मा औलु तभी तुमारा     
सातौं बचन यो ब्वल्दा कुमारी  ॥

Of and By  : कृष्ण कुमार ममगांई
ग्राम मोल्ठी, पट्टी पैडुल स्यूं, पौड़ी गढ़वाल
[फिलहाल दिल्लि म] :: [जै भैरव नाथ जी की ]
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Bhishma Kukreti


.
गढ़वाली कुण्डलियाँ   {गढ़वलिम}
.
   
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उत्तर दिशम च देश का    तभि ता उत्तराखंड ।
बंणाद बंणाद ये थईं    कतगौंन फ्वड़नी मुन्न्ड ॥

कतगौंन फ्वड़नी मुन्न्ड  राज्य त बंणि ही ग्याया ।
फरक द्यखीणू कुछ नी  जन की तन च काया ॥

ब्वल्द कृष्ण ममगाईं   हूंन्दु क्वी इन्नू पुत्तर ।
कैकी काया पलट    दींदु कुछ सुन्दर उत्तर  ॥  {७}
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Of and By : कृष्ण कुमार ममगांई
ग्राम मोल्ठी, पट्टी पैडुल स्यूं, पौड़ी गढ़वाल
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गढ़वाली कुण्डलियाँ   {गढ़वलिम}
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{On : डिलीट कैर कै बार}
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झूठ ब्वन्नु आसान का  ये विज्ञानन  यार ।
सफेद झूठ बोली की   डिलीट कैर कै बार ॥ 
.
डिलीट कैर कै बार सबूत कुछ भी नी रांदा ।   
तकनीकी इन छन की सच भी झूठ दिखींदा ॥ 
.
ब्वल्द कृष्ण ममगाईं   अरे तू दाड़ि न कीट ।
करले मुन्ड कपाल  झूठन सदनि रांण झूठ ॥  {११}
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Of and By : कृष्ण कुमार ममगांई
ग्राम मोल्ठी, पट्टी पैडुल स्यूं, पौड़ी गढ़वाल
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गढ़वाली कुण्डलियाँ   {गढ़वलिम}
.
{On : पाड़न कन्नि द्वी भौ }
.

डांडा कांठा हमरा छन  वादी छन कश्मीर ।
कुलैं कु लीसु हम खुणे  ऊँ कू केसर खीर ॥   
.
ऊँ कू केसर खीर  बिगाड़ी क्या जी हमना ।   
वख ता  सेब बदाम  यख त दलम्या भी नीना  ॥ 
.
ब्वल्द कृष्ण ममगाईं   लगनि ई कन्ना कांडा ।
पाड़न कन्नि द्वी भौ  हम्म थैं पोड़ी डांड ॥   {१३}
.
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Of and By : कृष्ण कुमार ममगांई
ग्राम मोल्ठी, पट्टी पैडुल स्यूं, पौड़ी गढ़वाल
[फिलहाल दिल्लि म] :: {जै भैरव नाथ जी की}



गढ़वाली कुण्डलियाँ {गढ़वलिम}
{On : भदैली गौ माता }
.
गौ माता की सेवा त   पुण्य कु काम च भाई ।
भदैला गौड़ौ फिर किलै   त्यगदन हमरी माई ॥
.
त्यगदन हमरी माई   वे गौड़ौ चा क्या दोष ।
भदौम बियेकि चुचों   वे फर क्यांकु रोष ॥
.
ब्वल्द कृष्ण ममगाईं   छोड़ा बेकारै बार्ता ।
अब न छ्वड्यां कब्बी   कै भदैली गौ माता ॥ {*8*}
.
.
Of and By : कृष्ण कुमार ममगांई
ग्राम मोल्ठी, पट्टी पैडुल स्यूं, पौड़ी गढ़वाल
[फिलहाल दिल्लि म] :: {जै भैरव नाथ जी की}
बुजर्ग त सरप्लस

एक उ जमनु छौ
जब बड़ौं कि कदर
राय मशवरा का वास्ता
जरूरि समझे जांदि छै।
आज बड़ा बूढ़ौं कि कदर
कख रै गि ।
रांण भि कनम छै
गूगल जु ऐ गि ।
सब्बि धांणि  वे मै पुछणैनी
बुजर्ग त सरप्लस ह्वे गेनी ।


Of and By : कृष्ण कुमार ममगांई
ग्राम मोल्ठी, पट्टी पैडुल स्यूं, पौड़ी गढ़वाल
[फिलहाल दिल्लि म] :: {जै भैरव नाथ जी की}


मेरो गांव मोल्ठि च
.
म्यारा गौं कु नौ मोल्ठि च
तु अपड़ा गौं कु नौ जणिदि छै ।
नि जंणदी ।
जबाब मी पता च
तिन ब्वन कि
हमता यखि पैदा ह्वै छा ।
अरे चुचा करौं
कम से कम अपड़ा गौं कु
नौ, पट्टी अर  जिला त याद राखा
परमानेन्ट होम टाउन च उ ।
बगत प्वण पर
डौमिसाइल सर्टिफिकेट कू कन भगदां ।
अर फिर देर सबेर
दाखिल खारिज भि त हूंदा ॥

Of and By  कृष्ण कुमार ममगांई
ग्राम मोल्ठी, पट्टी पैडुल स्यूं, पौड़ी गढ़वाल
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Thanking You with regards

B.C.Kukreti


Bhishma Kukreti


गढ़वाली दोहा  ""पखणौं  का  बुखणां""
.

Garhwali Couplets by Krishan Mamgain

दोहा लम्बर 161 :
.
गुरु त गुड़ ही रै ग्यया 

च्याला शक्कर बणिं जांद ।

फिर भी चेला गुरुम ही   

गुर सिखणूं कू आंद ॥ [१६१]

.


दोहा लम्बर 162 :
.
तू ठगणी कू ठग छई   

मी जाती कू ठग ।

पार नि पै सकदू मेरू

कोशिस कैर जतग ॥ (१६२)


दोहा लम्बर 155 :
.
नाच नचणु त आंद नी 

करलु बतांदा चौक ।

अपणीं कमी छुपांण कू   

बाना  हुंदन  भौत  ॥ (१५५)

.दोहा लम्बर 143 :
.
शक कु इलाज हूंद नी 
हो लुकमान हकीम  ।

शक से पीछु छुड़ाण मां 

फेल सभी स्कीम ॥ [१४३]

.

दोहा लम्बर 127:
.
हैंककु  लाटु हंसांदु चा   

अपड़ू  लाटु रुलांद ।

दुनियां की या रीत चा 

दुख बस अपड़ु सतांद ॥ (१२७)

.

दोहा लम्बर 105:
.
कैकि मरीनी गैबणीं   

लैंदी कैकि खांद ।

ईं शरम कू बाग यू 

दिनम गौंम नी आंद ॥ (१०५)

.













दोहा लम्बर 144 :
.
अपड़ु हि सूनू खोटु रा
कै पर दींण क्य दोष ।
आस त इन्नी कै नि छै
बैठ्यां छां खामोश ॥ [१४४]



दोहा लम्बर 120:
.
क्या कन ये नौन्याल कू
अपड़ि मस्ति मां रांद ।
काम काज कुछ करदु नी
हगदिदां गीत लगांद ॥ (१२०)



दोहा लम्बर 69:


अन्ध्यरी और बिन्दरि का     

भितरकि जंणद नि छाय ।

अल्ट्रसौंड पर कांडा लग्या 

भ्रूण हत्य पनपाय ॥ (६९)



दोहा लम्बर 60:


कन भग्यानका भाग की 

मिलदि खणीं च खाड ।

निरभगि थैंत दबाणुं कू   

मिलदू नी चा माटु ॥ (६०)



बाकी फिर कभी अगले अंक में ........


Of and By  : कृष्ण कुमार ममगांई
ग्राम मोल्ठी, पट्टी पैडुल स्यूं, पौड़ी गढ़वाल
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B.C.Kukreti


Bhishma Kukreti


     
  श्रीमदभगवतगीता (गढ़वाली 
-

-Translation By Krishna Kukmar Mamgain


श्रीमद्‍ भगवद्‍ गीता

अध्याय 1 : श्लोक 1 : (श्लोक गढ़वलिम भि )



धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः ।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय ॥

.

श्लोक गढ़वलिम :
.

धर्मछेत्र्म   कुरुछेत्र्म

युद्ध  करनू    खड़ा हुयाँ ।

म्यारा अर पांडू का नौना

क्या कना छन  संजया  ।।१/१॥

**************************************************************** 
श्रीमद्‍ भगवद्‍ गीता

अध्याय 17: श्लोक  23 :   (श्लोक गढ़वलिम भि)

.
ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः।
ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा॥
.
श्लोक गढ़वाली म :
.         
ॐ, तत्, सत् तीन शब्द इ
ब्रह्म सूचक शब्द छन ।

यूँ हि शब्दु से शुरू शुरू मा

यज्ञ, ब्राह्मण, वेद बंण्णिं ॥ [17:23]

**************************************************************** 

श्रीमद्‍ भगवद्‍ गीता

अध्याय 17: श्लोक  24 :   (श्लोक गढ़वलिम भि)

.
तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपः क्रियाः।
प्रवर्तन्ते विधानोक्तः सततं ब्रह्मवादिनाम्‌॥
.
श्लोक गढ़वलिम
:.         
तब्बि त आरम्भ हुंदन
यज्ञ, तप अर दान की
सब्बि क्रिया बमुंणु द्वारा
ॐ का आह्वान से ॥ [17:24]

**************************************************************** 
श्रीमद्‍ भगवद्‍ गीता

अध्याय 2 : श्लोक 38 : (श्लोक गढ़वलिम भि)

.
सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ ।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ॥
.
श्लोक गढ़वाली म :
.
जय पराजय लाभ हानी
सुक्ख दुख समझ समान ।
सोचि की इन युद्ध कैर
पाप कू च यो नि काम ॥2/३८॥
**************************************************************** 


श्रीमद्‍ भगवद्‍ गीता

अध्याय 12 : श्लोक  15 :   (श्लोक गढ़वलिम भि)

.
यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः।
हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः॥
.
श्लोक गढ़वाली म :
.       


क्षुब्ध हूंदु नी जैसे क्वी भी
अर जु कै से नि हून्द क्षुब्ध ।
सुक्ख दुक्ख भय उद्वेग से
मुक्त चा जू प्रिय च मीं ।  [12:15]
**************************************************************** 


श्रीमद्‍ भगवद्‍ गीता
अध्याय 4 : श्लोक 3 : (श्लोक गढ़वलिम भि)
.
स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः ।
भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम्‌ ॥
.
श्लोक गढ़वलिम :
.

सखा छै अर भक्त छै तू
ये वजह बतलाय त्वे ।
उत्तम रहस्य ये पुरातन
योग ज्ञान कु अर्जुन ॥ [४:३]

**************************************************************** 


श्रीमद्‍ भगवद्‍ गीता
अध्याय - अध्याय 4: श्लोक 17: (श्लोक गढ़वलिम भि)
.

कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः ।
अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः ॥

.
श्लोक गढ़वलिम :
.
कर्म तत्व भि जणन चैंदा
अर जणन चैंद बिकर्म भी ।
अकर्म गति भी जणन चैंद
क्योंकि छ गहन गति कर्म की ॥ [४:१७]
**************************************************************** 


श्रीमद्‍ भगवद्‍ गीता
अध्याय 4: श्लोक 9:  (श्लोक गढ़वलिम भि)
.
जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्वतः ।
त्यक्तवा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ॥
.
श्लोक गढ़वलिम :

.

दिब्य जन्म अर कर्म म्यारा
जंणदु जो च अर्जुन ।
देह त्यागी मींमै आन्दा
पुनर्जन्म नि लीन्द ऊ ॥ [४:९]
.

**************************************************************** 


श्रीमद्‍ भगवद्‍ गीता

अध्याय 2: श्लोक 17:  (श्लोक गढ़वलिम भि)

.
अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम्‌ ।
विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति ॥
.
श्लोक गढ़वलिम :
.

नाश रहित त खालि वी च
जै मां दुनिया ब्याप्त चा ।
इना अविनाशी कु नाश
कन्नु क्वी नि समर्थ चा ॥२/१७॥
**************************************************************** 


श्रीमद्‍ भगवद्‍ गीता
अध्याय 1 : श्लोक 26 :
.
तत्रापश्यत्स्थितान्‌ पार्थः पितृनथ पितामहान्‌ ।
आचार्यान्मातुलान्भ्रातृन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा ॥
श्वशुरान्‌ सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि ।
.
श्लोक गढ़वाली म :
.

अर्जुन द्यखदा द्वी पाल्यूं
चच्चा, दादा, मम्मा, भै ।
गुरु, नाती नतणौ मित्रों
स्वसरों देखी दंग रै ॥१/२६॥
**************************************************************** 


श्रीमद्‍ भगवद्‍ गीता

अध्याय 3 : श्लोक 5: (श्लोक गढ़वलिम भि)
.
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्‌ ।
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ॥
.
श्लोक गढ़वाली म :
.

क्वी भि मनिख रै नि सकदू
बिना कर्म कब्बि भी ।
बशीभूत च प्रकृति का अर
कर्म करनू बाध्य चा ॥३/५॥
**************************************************************** 


श्रीमद्‍ भगवद्‍ गीता

अध्याय 2 : श्लोक 23 :

.

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः ।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥

.

श्लोक गढ़वाली म :

.



न शस्त्र काटी  सकदु ईं

न आग फूकी सकदि ईं ।

न पांणि ही भिगै सकद

न हवा सोखी सकदि ईं ॥२/२३॥

**************************************************************** 








श्रीमद्‍ भगवद्‍ गीता

अध्याय 10: श्लोक 22:   (श्लोक गढ़वलिम भि)

.

वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः ।
इंद्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना ॥ [१०/२२]

.

श्लोक गढ़वाली म :

.       

बेदु मा साम बेद छौं मी

देबू मा मी इन्द्र छौं ।

इंद्रियूं मा मन छौं मी

अर समस्त जीवुम चेतना ॥ [१०/२२]

**************************************************************** 



श्रीमद्‍ भगवद्‍ गीता

अध्याय 14: श्लोक 17:   (श्लोक गढ़वलिम भि)

.

सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च ।
प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च ॥ [१४/१७]

.

श्लोक गढ़वाली म :

.       

सतोगुण से ज्ञान उपजद

रजोगुण उपजान्द लोभ ।

अर तमोगुण से उपजद

अज्ञान, मोह अर प्रमाद ॥  [ १४/१७]

**************************************************************** 








श्रीमद्‍ भगवद्‍ गीता

अध्याय 4: श्लोक 8:   (श्लोक गढ़वलिम भि)

.

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्‌ ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥

.

श्लोक गढ़वाली म :

.       

भक्तु कू उद्धार करनू

बिनाश करनू दुस्टु कू

अर धर्म स्थापना करनू

प्रकट हूंदु जुग जुगम मी ॥ [४:८]

**************************************************************** 


अध्याय 15: श्लोक 12:   (श्लोक गढ़वलिम भि)

.

यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम्‌ ।
यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम्‌ ॥ 

.

श्लोक गढ़वाली म :

.       

सूर्यो तेज जु सैरि दुन्या

थैंकि करदा दीप्तिमान

अर जु चाँद अर अग्निम च

वे तेज भी मेर्वी समझ ॥ [१५/१२]

**************************************************************** 









श्रीमद्‍ भगवद्‍ गीता

अध्याय 18: श्लोक 66:   (श्लोक गढ़वलिम भि)

.

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥
.

श्लोक गढ़वाली म :

.       

सब्बि धर्मूं त्याग कैकी

शरण मेरी ऐ जा तू

सब्बि पापु से मुक्त त्वेथैं

कैरि द्यूलु फिकर नि कैर ॥ [१८:६६]

**************************************************************** 
श्रीमद्‍ भगवद्‍ गीता

अध्याय 10: श्लोक 37: (श्लोक गढ़वलिम भि)



वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनञ्जयः ।
मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः ॥ [अ0 १०: श्लो0 ३७]



श्लोक गढ़वलिम :

.

बृष्णिबंश्यूम मि बासुदेब छौँ

पांडऊंम छौँ मि धनन्जय ।

मुन्यूं मा मी ब्यास छऊं

अर कब्यूं मा शुक्राचार्य छौँ ॥ [10/37]

**************************************************************** 














श्रीमद्‍ भगवद्‍ गीता

अध्याय 7: श्लोक 9: (श्लोक गढ़वलिम भि)

.

पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ ।
जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु ॥ [अ0 ७: श्लो0 ९]
.

श्लोक गढ़वलिम :

.

पृथ्विम पवित्र गंध छौं मी

तेज छौं मी अग्नि मा ।

जीवन छौं सब्बी प्राण्यूंमा 

अर तपस्यूं म तप छौं मी ॥ [७:९] 

**************************************************************** 

श्रीमद्‍ भगवद्‍ गीता

अध्याय 10: श्लोक  25:   (श्लोक गढ़वलिम भि)

.

महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम्‌ ।
यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः ॥
.

श्लोक गढ़वाली म :

.

महर्षियूं  मां भृगु छौं मीं

वांण्यूंम छौं मीं ओंकार ।

यज्ञ्यूंम जप कीर्तन छौं मीं

अर स्थावरूंम  हिमालय ॥ [१०:२५]



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Bhishma Kukreti

Garhwali Poems by Sunil Bhatt

"बड़ु गुरू घंटाल"
-
By Sunil Bhatt
=

बाघै खाल,
निकलणु वालु,
ऊ दिल्ली वालु,
भौतै होश्यार
चितौंदू छौ अफुतैं।

देखो जी, यह लो जी,
बोलो जी, कैरि जी जी,
निपट्ट  ईमानदार
बतौंदू छौ अफुतैं।

ह्याँ बल......
"तू ठगणी कु ठग
अर मी जाति कुईई ठग"
हे ब्वै मिन त चितै जणी "यु"
भ्रष्टाचारियोंकु काल छ,
दा निराश ह्वैली ये कुणै..
हे यु बी भै बड़ु गुरू घंटाल छ।।

स्वरचित/**सुनील भट्ट***
10/05/2017

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Bhishma Kukreti

Garhwali Poem by Devesh

                        ज्यूंदाल   


              भाग-०३
प्र-०३।   *दिनांक १०/०५/२०१७
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कन रैंदा छा हम कभि डांडयों म बुग्याल म,,
फुंगड़यों म धाण करदा दिन भर शियाँ गुठयार म,,
संजेत खिलाण म छपटो कि थांतु लगाणा,,
जेठ कौथिग म ज्वान माया कु उल्यार म,,

घसेरि डांडयों म टोखणि दैणा रेंदा छाई,,
ग्वेर छवारा मालू छतुल लेकि गोर चरांडा छाई,,
पर आज बिजोग पोड़ि ग्या औलाद तरफ बैठ,,
ऊन हमर धरकटों फर एक छिटगु आँशु नि भुगाई,,

झेड पुड़ी रैद छाई असंक आई रैंद घास बिठुग मुङ पर बिठुग नि छोड़,,
कीशा म एक लालपाई न पर अपुड़ा ब्वै बाबु नि छोड़,,
आज कुन्ना भुरयां छन पर पित्रों कु मिसरा नि निकुल्द,,
पर दान दिया धर्म लाटो कभि कैकु मुंड म नि पोड,,

कभि ख्वाल म थड्या चोंफलो मु मेल छा,,
लोग बाल सभि गरीब गुरबा पर प्यार कु ब्यापार छा,,
सुनपट त अब ह्वै अपुडों कु पछैणी हुई च,,
छैन सारि सगोड़ों कु साग भुज्जी कु निखणि हुई च,,

कभि ह्युन्द का दिनों म छ्ज्जा म घाम तपदा छाई,,
ऐक आँखिल सर्या कुटुंमदरी का दुनिया दयखदा छाई,,
खट्टू लिम्बुव् म कंकरया लूण रालिक खांदा छाई,,
अब लिम्बुव् त मिठा छन पर अपुडों का जिकुड़ी म खटास ह्वै ग्याई,,

कभि धाण म चूना जौ कु रूटी म प्याज थिंची खांदा छाई,,
जु कभि ओ होलु मैमान त तभि चोंलों कु भात खाई,,
प्याज कु आलण झुंगरा  कु भात म दिन कटिंग,,
भुकि तिसि जनि रेंदा पर मेल मिलाप भलु छाई,,
----------------------------------------
कुटम दरी का तितर बितर...

देवेश


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Bhishma Kukreti



प्रीतम अपछ्याण के गढ़वाली दोहे
Garhwali Couplets by Preetam Apachhyan

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३३२
लुकचुप थौळ समौंण दिईं, तरपर जलेबी गास
चर्खि घुम्दि दां सौं खयां, तोड़ि ना वीं की आस
(मेले में सबकी नजरें बचाकर चुपके से निशानी दी थी, तरपर टपकती जलेबियां खाई थी. चर्खी में साथ घूमते हुए कसमें खाई थी. भुला ये सब भूल कर 'उसकी' आशाएं मत तोड़ देना
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३३३
ज्वत्यां बळ्दुं तैं पींडु ल्है, हळ्या कु रोटि गुसैंण
र् वट्टि खै जावा धै धवड़ी, खेति का द्यब्ता दैण
(जुते बैलों के लिए पींडा (चाटा ?) और हलिया के लिए गृहस्वामिनी रोटी ले आई है. कृषि के रखवाले देवता! तुम फलदायी होना. देखिए पूरी 'सार' में धाद लग रही है-रोटी खाने आ जाओ हो!!!)
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३३४
ओहो जमाना धन्य त्वे, सबी मुबाइलबाज
डाखानों मा स्वी न सै, मिसकालों कु रिवाज
(हाय रे जमाना! तुझे धन्य है. तेरे वक्त में सभी मोबाइलबाज हो गए हैं. डाकखानों में सब कुछ ठप्प है, न चिट्ठी, न पोस्टकार्ड, न तार. अब तो मिसकाल करने का नया रिवाज चल पड़ा है.)
-
=====================
३३५
लै टीपी छंछ्यादि रौं, गिंवड़ि सार मी ब्याळि
यकुलांसी मौ अफी अफी, न क्वी जिठो ना स्याळि
(कल मैं गेहूं की सार में कटाई, टिपान व गुच्छियां बनाता रहा. क्या करें, अकेले परिवार में सब खुद ही करना पड़ता है. न कोई जिठो है न साली, किसे कहें कि गेहूं काटने आ जाना!)

=============
३३६
त्वा! बर्खा कन डळै गई, कटीं दैयूं तिरपाल
द्वी बलड़ी ज्वा खेतुं मा, तौंकु त रखदी ख्याल
(अरे बारिश! कटी दैयूं (खलिहान में एकत्र फसल) में तुमने तिरपाल डलवा दिए. दो चार बालें, जो खेतों में रही थी, कम से कम उनका तो खयाल रखती. ऐसे मुख्य समय में अब किसान क्या करेगा?)
==========
३३७
फ्योंळि सि क्वांसो तन म्वलैम, चार दिनूं का बान
रितू नि राली उमर उनी, धरती मा भगवान
(फ्योंली के फूलों सा मुलायम शरीर केवल चार दिन के लिए रहता है. जिस तरह ऋतुएं सदा नहीं रहती, उसी तरह उम्र (यौवन) भी हमेशा नहीं रहता, चार दिन ही रहता है. इस धरती पर यही ईश्वर की लीला है)
==============
३३८
खेति बंजीं गौं खणखणा, सूंगर बांदर मूस
उत्तराखंड मा साब बोन्ना, चला खयोंला घूस
(खेती बंजर होती जा रही है, गांव खाली बटुवे जैसे हो गए हैं. सुअरों, बंदरों व चूहों की गश्त चल रही है. इस पर भी उत्तराखंड में बड़े बड़े साहब लोग कह रहे हैं - चलो जरा 'घूस रिश्वत' खा आते हैं.)

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३३९
खड़ी कटीं दैं जखातख, ऐंसू पड़द अकाळ
औडुळ बर्खा गैरबगत, ल्हैगी न्यूती काळ
(खड़ी फसल व कटी दैं (खलिहान की बालियां) जहां की तहां रह गई है. लगता है इस बार अकाल पड़ता है. गैरवक्त की बारिश व तूफान हैं, ये किसान के काल को बुला रहे हैं)

=========
३४०
देखे रूढ़ि का रूप कै, इतरी उमर कटेगी
ऐंसु कु करड़ो घाम पर, जीवन ब्यूंत सुखैगि
(गर्मी के कई रूप देखते हुए इतनी उम्र बिता दी है. इस वर्ष का कड़ा घाम तो जीवन के आधार को ही सुखा दे रहा है)

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Bhishma Kukreti




डा प्रीतम अपछ्याण  की गढ़वाली कविताएं

Garhwali Poems by Preetam Apachhyan
....
३४
.....
रूढ़ि भर नि खाई दिदा भूखो छौं
ये चतुर चौमास दिदा सूखो छौं.
पाळानऽ फुकेंद कती तृण पात
बर्खे सौंण भादो दिदा रूखो छौं.
लमढणु रै जड्डो सैरा ह्यूंद भर
हळंकार गात दिदा दूखो छौं.
असोज की जून झणा हीटिन
मी जुन्याळै डर उड्यारू लूको छौं.
भौंरा घरूं ऐनि रितु बसंत बौड़ी
भ्वां झड़्युं सी फूल दिदा झूको छौं.
दैं सि फेरो फिर वुइ भम्माण रूढ़ी
बारामासी उमर यनी कूको छौं.
चरबरो न चलमलो घळघळो गफ्फा
रोज हि ता कोदबाड़ी सी घूळो छौं.
प्री.अ.

.....============
३५
.....
पैंछा आँखर लौटाणू छौं
जलमभूमि त्वे थैं गाणू छौं.
तिनै सिखै छै गढ़वाळि भाषा
शब्द गंछ्यै की दे जाणू छौं.
त्यरै रूप से मी पछ्यणेंदो
तेरो हि छैल मि लौंफ्याणू छौं.
अपणि भाषा ही मान बढ़ांदी
येऽ रैबार मि पैटाणू छौं.
कबि सुख कबि दुख आंदा जांदा
भाषा न भूला धै लाणू छौं.
शब्द मोर्यां फिर ज्यूंदा नि हूंदा
थात नि छोड़ा समझाणू छौं.
मयेड़ी सेवा फर्ज जलम कू
जती ह्वे साकी कै जाणू छौं.
प्री.अ.
३६
.....
कै जनम तक अमर रालो यो हमारो प्यार हो
इस्कुल्या दिनूं कु गैल्या हुयूं चा करार हो.
पढ़ै छुट्गे ल्यखै छुट्गे याद बस आँखी त्यरी
सरद्यळाऽ मी भूलि ना जै रैइ मददगार हो.
प्रार्थना मा पीर्यडों मा रीटि जांदो मनमोण्यां
त्वे देखी की छपछपी सच बर्छि सी ऐत्वार हो.
हिंदी त्वी अंग्रेजी त्वी भूगोल त्वी इतिहास त्वी
फिल्मि गीतुन् कौपि भोरीं गणित चा टटगार हो.
त्वे देखणू जळकामुण्डी डैरन् झसक्यूं बि छौं
लुकिछिपी भी नजर त्वे फर वार रौं चा पार हो.
बिसरि की भी कै मुंग तू जिकर ना करि मेरु हां
ब्वे बुबा त जन बि छन मास्टर छ जळ्तामार हो.
छुंयाळों की परवा कैरी भौं कखी मयळू न ह्वे
खार्युं छन रे बैरि लगु ना कैकु क्वी असगार हो.
माया की धूनी जगाईं त्येरि जोगण बणि गयूं
बदनामी ना होंण दे रै लाटि मी लाचार हो.
ज्यूंदु रौं चा मरि जऊं जब ऐड़ि खेईयालि रे
बाळि माया जामिगे अब सच करी संसार हो.
प्री.अ.
.===================...
३७
.....
सुदि रयूं मि रूणु सुवा पैलि किलै नि बोलि तिन
माया कूटी कूटि भोरीं पैलि किलै नि बोलि तिन.
ब्यो का बाद उमर भर मि समझणु रौं त्वे झुट्यारो
रुआं सि आग रै जगणू पैलि किलै नि बोलि तिन.
माया की निवाति झौळ पाणि ढोळदि रौंउ मी
मेरा हि नौं तु रै फुकेणू पैलि किलै नि बोलि तिन.
नौना धरे त्वे से दूर अफु बि ट्यारि ट्यारि रौं
क्यो यखुली रै मठेणू पैलि किलै नि बोलि तिन.
रोक न अब बगण दे ईं आँखि मी ही अणबुधी
दिन बौड़ी नि आंदा चुची पैलि किलै नि बोलि तिन.
ज्वानि का दिन अड़ादड़ि मा खते गैनि प्यारा वो
गौळा तक छ दुख भोरेणू पैलि किलै नि बोलि तिन.
खटि कमाईं तेरि मेरी नौना त खै ल्याला फुक
हम खुणे हि रै खिटेणू पैलि किलै नि बोलि तिन.
गर्ब हूंदो काळ हेजी तुम बि मी बी जाणिग्यों
एक हैंकै ज्यान छां हम पैलि किलै नि बोलि तिन.
प्री.अ.
.....=====
३८
.....
मर्खु बण्यां छन बाबा जी
गुस्सा बिजां छन पापा जी.
कंधाघोड़ि छा ब्याळि तलक
आज लत्यौणा पापा जी.
हैंस्दा खेलदा कथा सुणांदा
डांग बण्यां छन पापा जी.
माँ कु अड़ांदा मीकु पढ़ांदा
थप्पड़ मरणा पापा जी.
फोन बि नी च आयां नि आज
चुप्प हुयां छन पापा जी.
चिज्जि ल्हावो ना रसगुल्ला
खेल खिलौणा पापा जी.
चट भला कर द्या भगवान जी
इन त नि छां मेरा पापा जी.
प्री.अ.
==============
३९
.....
करकरा ही बोल चा सै ल्हे कनै भी
प्यार को ही रूप चा रे दुश्मनै भी.
खाब खोली गिचु कताड़ी चौतरफि सब
घळ्ळ घुळणू वन टु हेरा ता जनै भी.
ईं दुन्यां मा सीधू बळ्द तु ह्वे किलै
इनै मड़कै पूँछ स्यटुगी चा उनै भी.
जनानी कू गबदायूं सी चुप्प छै क्यूं
खोलि दे मन की सुणै दे मी सणै भी.
ज्यू झुराणूऽ मन अघोरी पापि यो
नी कनू सच कू भरोंसू सच छनै भी.
ईं दुन्यां का द्वी झणों मा कब तैं रालो
खिर्तो, छोड़ी गौळापाणी हो कनै भी.
भैऽर भितनै हूंद भैजीऽ महाभारत
प्यारन् ही ह्वे सकलि रे या लड़ै भी.
प्री.अ.
====================
४०
.....
ये कळजुग मा चा पाणी का माना बदलिगे
नौना जनातन ज्वांद जरा सब दाना बदलिगे.
मी ही रौं अर मेरा ही ह्वों बस इथगै जनहित
भक्क अभक सब खाणा पेणा बाना बदलिगे.
मयळु नि रै मन जाळसाजि मा दया दिखलौटी
सासु ब्वारे अर सैणि मैंसों की हाँ ना बदलिगे.
ओबरों अन्न मज्यूळों धन बणीगे सुपिन्यां
थौला दुकानी कोठारों का खाना बदलिगे.
पुंड़ा छ्वट्टा पर वाड़ा सगत्त रे प्रेम पछ्याणा
जुत्तौ सैज बि अर बाटों का कांडा बदलिगे.
गुर्जि उडौणा अपणि पढ़ाईं ज्वांद कलोड़्यों
गर्भ गळौणा डॉक्टर ह्वेकी ब्वाना बदलिगे.
जोर जांठा कू न्यो निसाब की सोच म्वयीगे
दुंद मशीनूं खटपट खटपट चान्हा बदलिगे.
प्री.अ.
=========================
४१
.....
सर्ग रुसायूं गौळि उबाणी
एेंसु त आग लगैगे पाणी.
सूखि नवाळी तुरतुर मंगरी
गाड गदेरौं हरैगे पाणी.
मुंडळि खुसैगे गागर कंटर
आंतुरि, फूक सरैगे पाणी.
गाजि बाछि की खाब सुकैगे
पुंगड़्यों खारु बणैगे पाणी.
हैंडपंप क्या नळका टोंटी
भांडों खौळ करैगे पाणी.
मैलि हि रैगे झगुली ट्वपली
लटुल्यों ल्यौंज पड़ैगे पाणी.
झणि कनुकैकी काज सरेला
योज्नौं साप बुस्यैगे पाणी.
गरीबूं धौड़्या क्वोच बुना तुम
बैरि व्यवस्था हौरि छ काणी.
प्री.अ.

==============
४२
.....
नौळा मंगरा बुसे गैनी रीत कनु क्वे रौलि अब
हैंडपंप हि पूजि ऐगे क्या जि कारू ब्योलि अब?
मोळा थुपड़ौंम् खळे देणा छांछ छोळीं गौं वळा
कफुलु छंछ्या टपकरों मा भांडु लुकयूं खौळि अब.
ये का नौना मिल्गे वजिफा वो तीड़्यूं वे दिन बटे
पीठ पिछनै माँ कि धी की सम्णे जैहिंद बोलि अब.
आयु कब अर गायु कब फौजी दिदौ क्वी पत्ता नी
मारि फस्का सुबदानी बी तितरि बणगे चोळि अब.
मिठै ह्वेगे दारू यख भै ज्यूंणु मोरणू यकनसी
पैणु पातो न्यूतु पछतौ फौरमल्टी घोळि अब.
खुद पराजौ टैम कख रै घसेनि फिल्मी गीतुं मा
टीवी सीर्यल ही बतौणा बार दिन की बोलि अब.
पौल्ट अर पढ्याळ छीजे सेरा तक बंजेगी हो
बीपीएल कू कार्ड बण जौ यांकि कव्वारौळि सब.
हिटण बैठ्गे गौं बि बल विकास का बाटा जथैं
छोड़ा पंडजी महापरसाद जजमानूं कचमोळि अब.
प्री.अ.
======
४३
.....
बथौं सी सरकीगे बचपन ह्यूं सि गौळी ज्वानि रे
देळि दोब्यूं बुढ़ापो अब निमणौंदी की गाणि रे.
हैंसि ल्हे तिन बोलि छौ फेर ज्वानि की रितु औंदि नी
झरझरो मुख नरकायूं रै मिन बोल्यूं नी मानि रे.
इस्कुलै उमरिम् ड्वळेणू हौस्टिलूं की मौज मा
होण खाणौ बगत बुस्गे अब क्या पछतौ मानि रे.
पांजा पर नी लाई पैरी खै नि खै दिन ठ्यल्दु रौं
भोळा खातर आज बेची ब्याळि जन रै छानि रे.
तनौ सुख ना मनौ सुख पै फिर्ड़ा फिर्ड़ी दौड़ाभागी
बिछीं पलंगौं स्ये नि साकू बीज्युं भी कख जाणि रे.
उमर कू दै बितड़ेग्याई रात दिन की ठेक्युं उंद
नौण घ्यू कख हूणि छै जब छांछ ही नी फानि रे.
जो बि दगड़ा आई म्यारा म्येरि चार बणिगे वो
बगत सोधीऽ काम बिगड़े लाभ नी बस हानि रे.
दे नि साकू नौना नतेणौं बाब दादौं थाति ख्वे
भटकुणू रौं मायाजाळम् माया तौ बि नि जाणि रे.
प्री.अ.

============
४४
.....
ले हम बी द्यसपल्ट करीग्यां पितरकुड़ी का ताळा रे
त्वे दगड़ी छन द्वी क्वलणौं की रौ म्वार्यूं का जाळा रे.
वन पंच्यातम् कब्जा ह्वेगे गौचर बेचे सरकारन्
रीती गोठ छ बळ्द न गोर क्याजी करला ग्वाळा रे.
इंग्लिश मीड्यम का बाना पर घळबट छिरगे नाती ब्वे
रगड़घूस मा भ्यूंळु खड़ीक केळाणौं का क्याळा रे.
पढ्याळ करणा द्वी सार्यूं मा गूणी बांदर सुंगर करां
अणमोरायां फौळ निसूड़ बांझ पोड़ीं अणस्याळा रे.
नौळा धारा नळका बुसिगे स्वजल खड्यायूं ही रायो
परधानों का गिच्चा बुजिगे मनरेगा का म्वाळा रे.
वबरा मंज्यूळों चौक डंड्याळों बस दारू की बास फ्वळीं
ईं गंवड़ी मा कन कै रौण गास न गफ्फा गाळा रे.
त्यरै भरोंसा छोड़ि गयां सब मुलुक मैत खुद पराज थैं
त्वी लटक्यूं छै द्वार द्वरों पर तैल्या मैल्या ख्वाळा रे.
प्री.अ.

=================
४५
.....
छौं मि तेरी आस मा
ऐंसु का चौमास मा.
कुयेड़ि लौंकीं चौदिशा
बर्खा दे गै प्यास मा.
बादळू की गिड़कताळी
झसकौंदी यकुलांस मा.
टप्प चूंदी धुरपळी बी
म्येसायां गिलास मा.
झणि किलैकी गड़गड़ी तू
रितु गये मळमास मा.
कबि खळे छौ पाणि त्वेउंद
रैमासी कविलास मा.
तेरि खुद मा रुफड़ांदो मन
म्ये जना ये भ्यास मा.
प्री.अ.

=============
४६
.....
चिठ्यूं मा न खौत माया गिचन् बोलि दे
कंदुड़्यों सेळि पड़ी जालि उंठड़ि खोलि दे.
लाल गल्वाड़ि नाक पसिन्यां कब तक शर्माली
तैं उलर्या पराणै कि शरम छोळि दे.
झळकां देखी करळि नजर भौं उच्याणु छोड़
सळसळा ये मन का पाग मिसरि घोळि दे.
गळा भेंटीक् हात्वी माळा मुख इथैंइ मोड़
माया राळी राळी खौला लिम्बा च्वोलि दे.
तेरि सराईं बिमारीन् झरझुरूऽ बुखार
गदगदा हातूम् ल्हेकि मिट्ठि गोळि दे.
रूड़ि सेळ्वाणी को पाणि ह्यूंद आग चैंदा
रुफड़ायूं सरेल ढंड्युं मा चफोळि दे.
बर्सुं ह्वेग्या माया सैंति हाँ नि सूणि अज्यों तक
दिवड़ो बाळि जादि आज ताळो खोलि दे.
प्री.अ.

======================

४७
.....
ब्याळि जब तू ऐ हि गै छै स्वीणों मा मेरा
छ्वीं लगांदी हुंगरा देंदी रात भर सैरा.
तेरा मन की आँखि बोलिगे गिचन् वंठुड़ी खोलि नी
आस मा रौं चीणी जाली माया का पैरा.
हात पकड़ी रोकि तिन मी द्वार ढकदो निंद मा
गौळा भेंटी अब जि देली भुक्यूं का फेरा.
मेरि पसंदा रंग पैरी गैणा पाता सजि धजी
मुलमुलू मलकीनि तेरी उंठड़्यु का घेरा.
मेरो अडासो ल्हेकि चुप्प बैठिं रैई तू सुवा
समळौण्यां सौंपी सगोर्या सांसोंन् तेरा.
मिन त समझी बैठिं रैली बिनसिरी तक जैलि तू
भच्च भिचोळी निंद तोड़ी घौ दे गै ग्हैरा.
प्री.अ.
======================
४८
.....
कनुक्वे रंचू पैलि जरा मन उमाळ औ त सै
बरछि सी लगिनी दुख, सुख जरा पिड़ौ त सै.
माया की मिठै का गीत मन न मुख मि गौं कनै
मी क्य पता स्वाद पैली वीं मिठै चखौ त सै.
क्वा वा बांद भांडि सी भ्वरीं तलबल मायान्
अणदेखीं अंध्यराम् खड़ी वीं मुखड़ि दिखौ त सै.
नांगा खुटौं हिट्दि रौं मि गारों मा कबि कांडौं मा
मौळण दे घौ बिंवयूं लीसु च्यप लगौ त सै.
घामुं मा फुकेणै रीत बर्खा मा रुझांदो गात
तैलि ह्वेजा चांदणा ह्यों निवातो औ त सै.
हिमालान् पाणि दबै कुयेड़ान् क्वांसो मन
अथको विचार रे तु धर्ति सी रिंगौ त सै.
कथा घालि कतपती त गीत बथा ब्यांदि रै
टुक्कु टंगी रंचणा तैं गेळ उंद रड़ौ त सै.
नर्किं रै सदानि स्याणि भकायीं रै सरद्यळी
आंसु पोंछि भुक्कि प्येकि मन्यूळों मनौ त सै.
प्री.अ.
========================
४९
.....
कबि त मन कि हूण दे हे दाळ रोटी
ह्यूं बुग्याळूं छूण दे हे दाळ रोटी.
फजल उठी रस्वड़ा मा बिनसिरि बटे
खड़बड़ऽ मठ्यूण दे हे दाळ रोटी.
चर्चरो चल्मलो मैणु चिलकिन्यां बस
सळसळो अलूण दे हे दाळ रोटी.
छोळि द्यूं समोदर मि लांघु परबतूं
मणसूबा गंठ्यूण दे हे दाळ रोटी.
झम्का तोड़ी गीत गौं कि फिरकणी चौंफुला
साबळ न सै त स्यूण दे हे दाळ रोटी.
सौ सिंगार लत्ता कपड़ा पैरूं कबी
धुरपळि सी चूण दे हे दाळ रोटी.
सैर बजारै चाट चाखूं खटिमिठि खौं
गोळागरी ल्ह्यूंण दे हे दाळ रोटी.
चान्हा रैगे गौळा बिल्किं गुन्दु सी
द्वी घड़ी त ज्यूण दे हे दाळ रोटी.
गरीबी का टल्लों न् बचाये लाज
अब त छक्वे रूण दे हे दाळ रोटी.
प्री. अ.

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Bhishma Kukreti


Garhwali Poem by Devesh 'Admi'
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                        ज्यूंदाल-4
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देवेश 'आदमी ' (पैनों पट्टी )
भाग-०४।   दिनांक ११/०५/२०१७
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छुचावो हम फर भि त प्राण चा
अज्यूँ गौल हमरि भि त तिसाण चा
ब्वारी जन तू छै अपुड़ा नोनों थै ग़फ़्फ़ा दीणी
हाथ म उन्नि हमर भि त रश्याण चा

म्यार बिगरु त्यार लुकई भेलि जलठुम म उन्नि चा
बुबा त्यार भ्यजीं चिट्ठी जन्या तन्नी चा
ठुल्लु भैल त जोल कु कीलु सि बणी रैण छाई
पर छैन खरक कु भि हमर गुठयार आज उन्नि चा

क्या ह्वै अब हलक्वर भि बाटु विरड होल
झणि के गुस्सा म ब्वारी शिरडे गे होल
नात्यों क छुट्टी भि 12,15 साल बैठ नि पोड़ा
कुल देवी भि हम देखी कन चिरडे गे होल

सितगा कमज़ोर नि छाई गींठी तैडू क पल्या छौ तुम
इतग जिडजुड़ा न हो कपुल बाड़ी के सैंत्या छौ हम
क्वाद झुगरु गोर बाखरों का सौकार छा हम
आज जूग लग्यां अन्न दिखण तरसणा हम

साज भितर वीम,च्यूडों कु त्यौहार छाई
सन्जेद देँ म झुगरा भात कु देँ भौज छाई
अकटा रै गिन हमरि जिंदगी का क़्वी भोंटा
हमन त मालू पात म भि निवाण हि खाई

बुबा रै हम त तुमरि मुंड हि मलासि सकदों
तालु नि उबाण दियां अपुडों कु सला दे सकदों
तुम थै ठीस भि न लग्या कभि आस चा
उच्छणि भि न बिलक्या कैकु सारू दे सकदों
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"ज्यू टि
तिसाण या प्राण कुजाण.!
देवेश

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Bhishma Kukreti


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Garhwali Satire, Articles, Essays by Sunil Thapliyal Ghanjir
Garhwali Satire, essays, articles from Garhwal, Uttarakhand , Himalya, North India , South Asia;
Garhwali Satire, essays, articles
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सुनील थपलियाल घंजीर के लेख , व्यंग्य , निबंध
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मन कु भात....1

एक दिन अर एक रात बेबपरवा कुट्ज कु साथ ....
हरीश जुयाल कुट्ज जी दगड़ि न मालूम किलै घंजीर का तीन बीसी झकझका खुटौं फर गति ऐ जांद ? सुप्त हृदय हिर हिर कन बै जांद ।
ब्यालि एक जोरदार दावत मा कोरदार इनभिटेशन छौ । घंजीर फर खज्जी छै ।
घंजीर फर एक चटोरी जीभ च् , एक नि भ्वरेंण्या लद्वड़ि च् । द्विया साजिश करदन । घंजीरी इंजन इसटाट करदन । जिकुड़ि वश मा नि रांदि ।
घंजीर फंचि बंणाद । अफु तै लोचदार बंणाद अर कोरदार पौंछ जांद ।
पाड़ बटि हरीश जुयाल कुट्ज जी ताल उतरदन... धन आवेशित कुटज अर ऋण आवेशित घंजीर कु मेल कोरदार कु भ्रमित आकाश सैन नि करदु ... सुख्यां निरसा बादल मुंड फ्वड़ै करदन ... आंखा घुर्यंदन ... दावत मा दुयूं की टिच फुल भ्वरीं पलेट मा अपंणु रासायानिक विघ्नी पांणि छिड़कदन ।
पर कुट्ज जी का ककड़ाट का अगनै बेकूप बादल दल की नि बसांदि । मुक लुकै क् मथि पाड़ भाज जंदन ... अर कुट्ज जी अपंणि चिर परिचित विजयी मुस्कान घंजीर जनै सरकंदीं ।
घंजीर कुटज जी का काला जादु थै नमन करद ... अर दावत पलेट मा विराजमान आखिरी बासमति थै पुटगि का अंध्यरा कूंणा पिचगै की लंबू पावरफुल डकार ल्हींद ।डकार दावत की सफलता का सैन बोर्ड कु काम करद ।
कुट्ज जी की कड़ कड़ कड़ ... तड़ तड़ तड़ फैरिंग पतपता घंजीर फर अनवरत जारी रंदन ...
अर घंजीर की गिच्ची खुली रैंद ।
!!!
सुनील थपल्याल घंजीर


-2
मन कु भात .....२
-
★सुनील घंजीर
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वी जीबन दिंदी
वी ल्ही जंदी ।।
य तुकबंदी मिन गंगा जमुना का संबध मा तुकै । हम NCR तरफा पाड़ीयूं तैं पाड़ जनै मुक कना मा गंगा जमुना पार कन प्वड़दीं । छंछर ऐतवार खुंणि मेरू मुक कुरदर हरद्वार जनै छयो ।
कुरदरा सौं !
जादातर पाड़ि लोखु की जिकुड़ीयूं मा कुरदरै छवि काली च् । इलै हम कुरदरा सौं नि खांदा । खासकर मी जना जात्री मनिख्यूं खुंणि जौं खुंणि कुरदर कु अर्थ च् जेमु बस अड्डा कु भीषण कष्टकारी ,हड़बड़ी,व रकाबकी माहौल ।
कुरदर का अन्य रमणीक स्थलों से हमरू क्वी परिचय नी छ् ... बस बटि उतरदै मि अफु तैं माछु सि मैसूस करदु जैखुंणि रेड़ी पटरी से ल्हेकर लैंटर छत वला दुकनदार तक कांडु लगै क् ताक मा बैठ्यां छन ।
मि जब बि कुरदर जांदु त् वखम बटि चड़म चंपत हूंणै कोशिश करदु । कुरदर से मेरू क्वी लगाव नी छ् । कुरदर कबि बि म्यारा हृदय मा एक गज प्लाट नि काट साकू । यु सदनि परायु लगि मी तैं । इलै मि कुरदर से बात नि करदु । कुरदर बि मी तैं अपुंणु नि मनदु ।
अबै दौ पैली बार मेरी जिंदगी मा मौका ऐ कि मी थै वखि तक जांणु छौ । पैली बार एक शुभकाम मा न्यौता छौ । वख एक चिरपरिचित मिलनसार कुट्ज ममा छौ । कुटज ममा मा मोटरसैकल छै । उं मा कलाकार दगड़्यौं की लिस्ट छै । उंल मी तै गौर सिंह जी से मिलै । गौर सिंह जी का हत रंगु से लप्वड़्यां छया । उंमा पचासौं कूची छै ... अनेकों कैनवास छया । उंकी बंणई जतगा पेंटिगु फर नजर गै उं सबुम गौर सिंह जी को सिद्व कलाकारी व्यक्तित्व झलकुंणु छौ ।
तीन रौंड चाय अर पांच रौंड पांणि का बाद हमरू दिल भाई गौर सिंह जी की कला से संबधित बारीकियों व उंकी संघर्ष गाथा मा खूब रमे गे छयो कि ध्यान ऐ कि गडवलि गजल विद्यासल्ली भैजी जगमोहन सिंह बिष्ट जी बि अपंणी मिठ्ठी आशीर्वादी चाय बंणै क् हमरू जग्वाल कना छन।
भाई गौर सिंह जी से मुलाकात का बाद धुधरटी कुरदर खुंणि मेरा दिल मा एक खिड़की खुल गे छै ....
भैजी जगमोहन जी का घौर भोल ।
!!!
सुनील थपल्याल घंजीर

मन कु भात .....३

सधारण भात बंणाणु असान च् पर मन माफिक भात बंणाणु मुश्किल च् ।
खुशी की बात च् हमरा कतगै गडवलि लिख्वार सर्यूल आज बि मन लगै की अपंणि भाषा मा अपंणा लुक्यां ढक्यां शब्दु की झौल मा खुशमन किसरांणि भात पकांण मा जुट्यां छन ।
दिखे जा त् कोरदार एक जोरदार जगा बि च् । भाषा/ संस्कृति का यख अनेक पैरादार मील जाला । कोरदार बटि पाड़ै गदीन्यूं मा नयेंणा कु जांणु बि सौंगु च् । भस्स्स इस्कूटी कु स्यल्फ इसटाट बटन हि त् दबांण ।
गडवलि गज़ल तैं नयी धुरपलि दींण वला जगमोहन बिष्ट जी बि कोरदार मै रैंणा छन । उंकू एक खुटु गौं मा त् हैंकु कोरदार मा रैंद । उंसे यखि मुलाकात ह्वे ।
बल ...
कोरदार की फिजा च् बौलिं बौलिं
न कुछ ब्वनी च् न ब्वन दींणि च् ।
उं से मीलि क् जिकुड़ि मा इन शांति कु ऐसास हूंद जन कि कैं उच्ची धार मा स्थापित मंदिर मा बैठिक मिलद ! भौत शांत स्वभाव का मालिक धीर गंभीर अर कट टु लेंथ बात कन वला जगमोहन जी अफु तैं भौत शालीन तरीका से सैत्याकार बथांणा मा झिझकदा छन । उंकी गजल जिंदगी की हर ऐंगल फर फोकस मरदीं ...अर सीधा जिकुड़ि मा रस्ता बंणदीं ।
उंकी द्वी कितबी "कर्च-कबर्च" व "अपंणा अपंणा रूपकुंड" प्रकाशित ह्वे गेन .. अर तिसरी फर वो जी जान से जुट्यां छन । भगवती नंदा राजजात् फर स्वयं का अनुभौ तै यात्रा वृतांत का रूप मा प्रस्तुत ह्वेली य किताब बल ।
महाकवि कंन्हैयालाल डंडरियाल जी की सुप्रसिद्व यात्रा बिरतांत "चांठों का घ्वीड़" की उ़ंमा द्वी प्रति छै ... वैदानुसार उंल एक किताब मीथै भेंट दे । मि चरण्यां गदल्यलु सि उंकी पिरेम ढंढी मा डुबकी लगै क् गदगुदु मैसूस कन बै ग्यों ।
चा पांणि कोलडिरिंक की औपचारिकता का बाद कुट्ज -घंजीर की अंणमेल जोड़ि तरोताजा ह्वे ग्या ... पर हमुन अपंणा ककड़ाट से उंकू पीसफुल घरेलु वातावरण हीटफुल कैर द्या । वख मा वूं वाक्यों फर बि चरचा ह्वे जौं फर कनै जरोरत नि छै पर जख कुटज को साया हो बल वख आराम से वक्त जाया हो ।
अभि मुलाकात अधा रस्ता मा छै कि तबरि वखम एक उर्जावान शख्शियत की एंट्री ह्वे ..उंल मि दगड़ि उत्साह पूर्वक गलभेंट कैरी ... पता लगि आप गडवलि साहित्य का एक मजबूत स्तंभ श्री जगदंबा प्रसाद कोटनाला जी छन । उंकू कुट्ज-घंजीर सभा मा आंण से वार्तालाप सै दिशा मा अटगंण बै ग्या । उंल् मी थै जतगा भेटेज दे मि उतगा लैक त् नि छयो पर मेरा प्रति उंकी पिरेम उष्मा साफ साफ मैसूस हूंणि छै।
!!!
सुनील थपल्याल घंजीर

मन कु भात ....६



मि घंजीर छौं ! छ्वटु आदिम छौं । कुछ मीतै आदिम बि नि चितांदा ।
जूंगा म्यारा बड़ा छीं पर बात मि छ्वटि करदु ।

मि भात खांदु । हतुल गमजा गमजा कै खांदु ।

मि डिल्ली रांदु ।
मीतै चार पैंसा चैंणा छन कि मि एक टैमौ भात द्वी टैमै रव्टी ,चार झुलड़ि - द्वी रूड़ियूं की अर द्वी जड्डौं की मुल्या सकूं ।
मीतै चार पैंसा चैंणा छन कि मि एक सौ यक्यावन रूप्या न्यूतु लिखै सैकू ।
डिल्ली मा दिल नि लगदु मेरू किलै कि मि छ्वटु आदिम छौं ।
चार छै मैनौं मा हि घौर अटगि जांदू । कंई कुमंई रोडभेजु अर उंका अनुबंधित ढाबों का नौ मा कैरि आंदू ।
बड़ा आदिम बव्दीं गौं मा "कुछ" नी छ् धर्यूं ।
मेरी छ्वटि बुद्वि उंका "कुछ" थै नि जांण पै कबि ।
जो कबि गौमा छ्वटा आदिम छया छक्वे घात  खींदा छया वो बूंण जैकी बड़ा आदिम हुयां छन । अब वो गालि मंगलि नि दींदा । उंसे बड़ु संस्कारी अब क्वी नी छ् । ब्याला पैदा हुयां नौनौ कु बि आप ब्वलदीं वो ।

  उं बड़ा आदिमु थै मुजबानि मैट्रो इसटेशनु का नाम याद छन  ।
बस बदलंणा मा सल्लि छन वो ।
बूंण जैकी गंवा छ्वटा लोग देशी फुकी क् बड़ा लोग ह्वे गेन अर अफु फर चिपग्यां गडवलि निशान खुर्ची खुर्ची क् हटांणा छन ।
पर मि ठैरू जड़ मूरख छ्वटू आदिम जै फर गडवलिपनै घात लगीं च् ... जो पाड़ु मा ग्वर्ख्या , मुसलबान, बिहरी , बंगली , सारनपुरी सबु दगड़ गडवलि मा बच्यांण बै जांद इन मानि की कि जु प्राणि गडवाल मा दिखे जा वी गडवलि ।
यु म्यारू छ्वटा आदिम हूंणौ पकू परमांण च्।

अर मिन घात घलंणी बि नि छोड़ि । मेरी अपंणी स्वयं की सबि इच्छौं खुंणि घात घलीं छन ।
मि ये एडभांस जमना दगड़ नि अटग सकदु इलै छ्वटु आदिम हि रैंण चांदू ।
पर मि चांदु आप खूब अटगा अटगा मा मिस्यां रयां अर वूं उच्चा बेकूप पाड़ु से भि भौत बड़ा ह्वे जयां ... भौत बड़ा ।
अर वख पौंछ्यां जख सब कुछ हो ।

!!!

सुनील थपल्याल घंजीर
.... घिलमंडि .....

इशारा ::
(यू लेख जरा गंभीर किस्मो च कृपया हास्य की उम्मीद ना करें )
)..विक्की ! (हैप्पी बर्थडे मनाने वाला एक गढवाली कान्वेंट स्कूल स्टूडेंट ) ...दलेदर सर ! गढवाली मे "घिलमिंडी" खाना किसे कहते हैं ?
)...हां भै आज लगंणु च कि तू गढवली सिखंणा मा इनटिरेस्टिड छै । इना इना शब्द सिखंण चांणू छै जो गर्वीला पहाड़ीयूंल अर ठेठ गढवली हूंणौ दावा करंण वलोंन भि गुठ्यार धोल यलीं ।
पर तू 'घिलमंडी' किलै सिखंण चांणू छै ? कैल ब्वाल त्वैमा ?
).. दलेदर सर ...! मेरे पापा बार बार कहते रहते हैं कि मैने अपने टाइम मे बहुत "घिलमंडी " खा रखीं हैं ।
)..द रै य बात चा ! अब आई म्यारा गौं । भै ब्यटाराम त्यारू बब्बा बिल्कुल ठिक ब्वलंणू चा । वै भग्यान त इन इन घिलमंडी खंई छन कि तेरी ब्वे भी ऊं हि घिलमंडीयूं कु परिणाम चा ।
)...वाट डू यू मीन दलेदर सर ?
)...हबै घिलमंडी त बड़ा बड़ा लोगु की भी खंई छन। हल्या टैपा लोखु जनोंल ले 'हाथ' अर 'फूल' दगड़ि मीलि कै खुर्सी हथ्यांई छन ।
)... मींस ? इसमे पापा की घिलमंडी का क्या ?
).. हां हां ! आ जरा अपंणा पापा की घिलमंडी गाथा भी सूंण ले
ब्यो से पैली वो गीत लगांदा छया
"ऐजा हे भनुमती पाबौ बजारा "... अर ब्यो का बाद लगांण बैठ गीं .... " कैमा न ब्वल्यां भैजी सैंणी कु मरयूं छौं" ....
ई ह्वाई घिलमंडी ... मेरा छंछ्या थकुला । कुछ समझी कि ना ?
)... नो सर ! आई अम नॉट कैचिंग यू !
)...देख लौला ... कि त्यारा पापा ल ब्यौ से पैली तेरी माँ भरमै कि त्यारा गौला कु लॉकेट बंणौलो अर गुलबंद पैना कै तेरी ब्वे थै ल्है आया , मतलब ?
) ...मतलब पापा ने घिलमंडी खाई ।
)... हां बिलकुल रैट । अब पता चली त्वे घिलमंडी कु मतलब !
)...नो नो सर ,मेरे पल्ले कुछ नहीं आया । क्या आपने भी घिलमंडी खाई हैं ?
)... ब्यटाराम पूछ ना ...! तिरीस बरसू बटै सिंचैं विभाग म चपरसी छौं । मेरा लैमचूस अगर मी घिलमंडी खांणि आंदि त मि अपंणी जैड़ींयूं मा पांणी नि लगांदू । स्यू त्यारू बब्बा ल्ये हल्या छयो अर घिलमंडी खै खै की मंत्री जी का स्यालौ राइट हैंड हुयूं चा । प्रापर्टी डीलर बंणि क् सर्रा देहरादून बेचणू चा ।
)... सौरी सर मै तो चला । मेरा फेवरिट टी.वी प्रोग्राम हन्नी सिंह द रॉक शो आने वाला है गुडबाय
)... हां ब्यटाराम अभी तेरी उमर नी छ घिलमंडी खांणै । बगत अपंणा आप त्वे घिलमंडी खांणु भी सिखै द्यालू अर यांकु अर्थ भी समझै द्यालू ।तबरी तक तू तै हनी सिंग का गांणौ मा घिलमंडी खा ।
( गर्वीले पहाड़ियों के लिऐ ' घिलमंडी ' का मतलब बताना जरूरी है ... घिलमंडी मतलब गुलाटी मारना )
सार : घिलमंडी खाते रहें प्रगति पथ चढते रहें
" सर्वाधिकार असुरक्षित "
!!!
सुनील थपल्याल घंजीर
व्यंग...

आदिम तबि तलक मनिख च् जबतलक वेमा तंग कनै सोशल इंजीनियरिंग च् । तंग कनौ व्यंग भौत सुलभ साधन च् । पर व्यंग कनौ कुछ विषै त् चयेंद । जंग.. बिना हत्यारै कख छै ?
ब्यालि एक सुंदर कवि सम्मेलन मा पक्वड़ा अर चा पींणौ मौका मील ... आयोजन की सफलता फर हमथैन क्वी डौट नि छयो किलै की काव्य रस छलकेंणा बाद भोजन की ब्यबस्था विद हलवा बि छै ... अब साब लिफफू कीसाउंद ठिक से स्यट कैरिक आश्वस्त हूंणा बाद घार जनै मुंडलि कार त् नप एक फेसबुक मित्र समंणि रस्ता रोकी खड़ा ह्वे गीं कि बल घंजीर साब आशा च् भोल ये आयोजन फर एक टौपदार व्यंग्य पढंणौ मीललो ?
/भैसाब आप थैन पक्वड़ा नि मीला ?
/ बल सबसे भंड्या त् मिलै साफ करीं !
/आप थैन कवींयूं की प्रतिभा समज नि ऐ ?
/बल सबसे जादा तालि त् मिलै पिटीं !
/फिर व्यंग कखम पैदा कन साब ... ?? नंग कन्यांणा काम तबि अंदन जब खज्जी हो ... बिना खज्जी का धज्जी कनै उडये जा ?
/बल अज्जी क्य बात कना छौ ...तुम वी घंजीर छौ न्हा जो तोता मैना की पिरेम कानि फर बि व्यंग कना रंदौ ...यु त इतगा बड़ु आयोजन निमंड़ि ग्या ... ये फर आप थै कखि बि क्वी प्वेंट नि मीलो ...??? आपकी प्रतिष्ठा कु क्य होलु ??
वे निरदयी फेसबुकी फरैंड की कटाक मीथै सैन नि ह्वे ... अर मि अपंणि प्रतिष्ठा बचांणा वास्ता वे साफ सुथरा आयोजन फर व्यंग की संभावनाओं की तलाश कन बैठ ग्यूं... ।
देखा जि आयोजन की सफलतो श्रेय त् आयोजक ल्ही जाला पर एक व्यंगकार हूंणा नाता मि अपंणि प्रतीष्ठा दांव फर कनकै लगा द्यूं ... आयोजन कतगै सफल ह्वे जाउ तब बि एक सिद्व व्यंगकार थैं व्यंग तलाशी क् ल्हांण चैंद ... आज रात भले मी थै निंद मरण प्वाड़ा पर मिन आयोजकु का नीला सुलार कुर्ता किलै पैन्यां छाया यां फर जरूर चुटकी कसंण ... उनि बि खयां पिंया लोखु थै क्य मालूम कि यु व्यंग छयो कि जोक ।
!!!
सुनील थपल्याल घंजीर
.. *ममा वंदना* ....

एक हमरा नामचीनी व्यंग्यकार ममा छन नाम च् उंकू 'विशेष छुंयाल कुटुरू' ।व्यंग्य विद्यम कुटरू ममौ क्वी सानी नी छ् । गढवलि का सिद्व साहित्यकारू दगड़ उंको उठंणु बैठणु च् । फिर भि उंकू छिबड़ाट अर तिबड़ाट धूल-माटू उडांण वलों जन च् ।
मिल कतगै दफा टोक लगाई उंफर कि ममाजि तुम इतगा भारी भारी का डिमांडिंग लिख्वार ह्वे ग्यो पर तुमरी गंभीरता अबि तलक ढंडीउंदै प्वड़ीं च् ? जै कै दगड़ि रले- मिले जंदौ ....गोबरमैन से ल्हेकर गीज़रमैन तक सबुकी खुचलिम बैठ जंदो ...., जरा अपंणी रिपुटीशन त् चिताया करो !
भस जी इतगम त् कुटरू ममा अपंणु फेमस कुटुरू ख्वलंण बैठ गीं ... बल लाटा ! तु ठैरू स्यकुंदौ पल्यूं बढ्यूं कबूतर , तु क्य जांणि घुघती हूंणौ मलब, त्वे क्य मालूम कि "मनिख कमांणा" क्यां खुंणि बुलदीं .... ???
तुम ठैरा अपंणी सपंणी वला ... तुमथै क्य पता कि जब गौंमा कैकु बोड़ भ्याल फंस जांद त् हमरू गफ्फा नि घुटेंदू .... तु स्यकुंदै सिकासैरी न कैर यख ... कि पड़ोसीयूं मा भगनलाल थै मगनलाल नि जंणदु अर मगनलाल थै छगनलालो पता नि हूंदू ....अर यख गौंमा जरसि कैका बल्द फर अट्टा पोड़ जावा त् हमरा फट्टा सुक जंदीं ।
बाकी रै म्यारा साहित्यकारू की श्रेणिम आंणै बात त् ... यांमा क्वी खाश उतणेंणै बात नी छ् ... किलैकि जौं साहित्यकारू की गिंवड़्या कुदड़ि सारि बांजि प्वड़ीं छन वी साहित्यकार हुयां छन .. बिना बाछि मलासि भि वो गौड़ि बाछि फर कव्यता कना छन ...दिखे जा त् उंसे बड़ू साहित्यकार त् वो च् जो अपंणी गौड़ि का नाक पुटगा जूंका भैर गडणैं जुगत कनु च् ... बाछी थै मलसणुं च् ... भस फरक इतगै च् कि एक त् कव्यता ल्यखणुं च ता हैंकु कव्यता जींणू च ..।
मि अपंणु सबु दगड़ मेस मांग वलु सुभौ नि छोड़ सकदु .... तु म्यारू भणजु छै पर त्वे चुलै मीथै अपंणु कुंणजु प्रिय च् जो सबुक पूजा पाठ ब्यो काज निमटांणु च् पर वैल अपंणी धरतिम उगंणु नि छोड़ि... न अफ्फू थै वेल बड़ु चितायो ...
ममा म्यारा ऐथर अपंणी कुटरी ख्वलंणु राई अर मीमा उंका समंणि मूंण हिलांणा सिवा हैंकु क्वी लालु चारू नि छायो
!!!
सुनील थपल्याल घंजीर
एक ★ परिचय ....