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Articles By Bhisma Kukreti - श्री भीष्म कुकरेती जी के लेख

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, July 26, 2009, 12:54:53 PM

Bhishma Kukreti


एक गज़ल खळ्याण जनै
********
Gazhals by Payash Pokara
=

उगाड़ी रखदा छाया जब कूड़ों का द्वार खळ्याण जनै ।
हैंसि-खुसि कि भि लगीं रैंदि छाई लंग्यार खळ्याण जनै ॥
तिबरि-डंड्यळि खालि ह्वैगीं अब यख  क्वी नि रैन्दु ।
बिना मनख्यूं का घर-कूड़ा हुयां खन्द्वार खळ्याण जनै ॥
अब त जिकुड़ों फर भि बड़-बड़ा डाम दिखेणा छन ।
झणि कब बटैकि नि आई यूंफरै मौळ्यार खळ्याण जनै ॥
ब्वै थैं चलि गैन चारा अर बुब्बा थैं सन्निपात हुयूंच ।
भयूं ल झगड़ों मा जब चीण द्याई दिवार खळ्याण जनै ॥
कख हर्चिगीं वो छज्जा चौक अर गुठ्यार म्यारा गांव का ।
ख्वजणा छवां थड्या चौंफ्ळा लाड-प्यार खळ्याण जनै ॥
अब ठुंगणा कु भि किलै नि आंदि घुघूति- घिंडुड़ि आज ।
सेरेक कौणि झुंगरु छिटक तू वार-प्वार खळ्याण जनै ॥
बूण-परदेस घूळि गैन म्यारा गौं-गळ्या अर ख्वाळौं थैं ।
"पयाश" नीना प्याट ल्हिण लग्यूं डंकार खळ्याण जनै ॥

@पयाश पोखड़ा
=

एक गज़ल "बगत" फर
******************
यो बगत भि कन चट-चटाक ह्वै जांद |
पैदा हूंण से पैलि पोट-पटाग ह्वै जांद ||
अज़ाण अपछ्याण उपुरि सि मेमान बणिकै |
पछ्यणकुल से पैलि यो झट-झटाक ह्वै जांद ||
मुण्ड फर बड़-बड़ा गुरमुळा दे ग्याइ यो बगत |
झणि कबरि यो खैड़ा कि कट-कटाग ह्वै जांद ||
भुक्करा पिळचीं त रुवै-बुथै भि ग्याइ यो बगत |
उछिण्डू बिळ्कैकि दूधकि घट-घटाग ह्वै जांद ||
मि जणदु छौं बगत आज त्यारु मुण्ड मलसणु चा |
भोळ-परबात बगत की कनि चोट-भटाग ह्वै जांद ||
अपणि खैरि कु पस्यौ कभि सुखणि नि देई तू |
छैल बैठदै हि यो बगत भि लट-लटाक ह्वै जांद ||
सर्या दुन्यां की आळि-झाळि नि कैर तू "पयाश" |
बगत का दगड़ा ज़िन्दगि झट-झटाग ह्वै जांद ||
@ पयाश पोखड़ा |
--
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Bhishma Kukreti


  "त्वी बिंगौ अब"
-
Garhwali Poems by Dharmendra Negi

दिन द्वफरि
दिखयाँ
तेरा स्वीणा
अर
माया मा
तेरी करीं
सौं - करारौं
तैं भलि कै
खरोळि- खराळी
छीटि-फटकी
अर
रकरै- बतै की
देखियाल मिन
सब उनि
बुसिला छन
जन कोन्ना पेट
मूसा ठुन्ग्याँ सट्टि
छूड़ु भुखु
अब
त्वी बिंगौ मैतैं
यूं
बुसिला स्वीणों
अर
सौं- करारौं
का सारा
कनक्वे ठ्यलण
मिन अपणी
या सैरी जिन्दगी

सर्वाधिकार सुरक्षित -:

            धर्मेन्द्र नेगी
       चुराणी, रिखणीखाळ
            पौड़ी गढ़वाळ



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Bhishma Kukreti


कलीज /तीतर
--
Kalij/Khaleej Pheasant (Lophura leucomelanos), Chhoti khaleej/kalij
-
गढ़वाल की चिड़ियायें - भाग -15

( Birds of  Garhwal; Birding and Birds of Garhwal, Uttarakhand, Himalaya ----- 15)
-
आलेख : भीष्म कुकरेती , M.Sc. 
-
64 cm करीब लम्बी तीतर पक्षी सब जगह मिलता है और सर्दियों में नीचे आ जाते हैं।  नर कलीज काला व दम पर सफेद चक्क्ते होते हैं। नर कलीज की कलंगी होती है और  काली पूंछ।  मादा भूरी होती है।  दोनों लिंगों के टांगें सिलेटी व  लाल मुख होता है। गाँवों के पास पाए जाते हैं।

-
सर्वाधिकार @सुरक्षित , लेखक व भौगोलिक अन्वेषक



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Bhishma Kukreti


         बालकृष्ण भट्ट -   मेरे प्रेरणासोत्र , प्रिय व्यंग्यकार , आदरणीय चबोड्या  -3
-
                     आत्मकथ्य : भीष्म कुकरेती
-

सैत च भारतेन्दु जुगौ हिंदी  लिख्वार  बालकृष्ण भट्ट का लेख मीन या त दर्जा नौ या ग्याराम बाँची होलु।  तै समौ लेख त याद नी पण कखि ऊंको लेख 'दिल बहलाव के जुदे जुदे तरीके ' बाँची थौ।  इन लगद जन भट्ट जीन म्यार आस पड़ोस का लोगुं देखिक लेख लिखी होलु।  कुतघळी लगंदेर , झीस लगांद हंसोड्या -चखन्योर्या लेख।  उन बि बालकृष्ण भट्ट की नूतन ब्रह्मचारी , गुप्त वैरी, पछावती आदि रचना प्रसिद्ध रचना छन।


-
  बकै फिर ..  मेरे प्रेरणासोत्र , प्रिय व्यंग्यकार , आदरणीय चबोड्या -4 मा
Great Satirists, Great Satirists in my opinion, Satirists those influenced me; I admire those Great Satirists, my choice for Great Satirists,  My liking for Satirists

Thanking You .
Jaspur Ka Kukreti

Bhishma Kukreti


वीरेंद्र जुयाल 'अजनवी ' की गढ़वाली  कविताएं
-
Garhwali Poems by Virendra Juyal
-



••••=55.
जो खांदु छूँ
वो पचदु नि।
जो कमांदु छूँ
वो बचदु नि।।
जो पैरुंद छूँ
वो मि
जचदु नि।
जै थैई
हेरदु छूँ
वो मि जनै
द्यखदु नि ।।
जो ब्वलदु छूँ
वो क्वी सुणदु नि।
जो बच्यांदु छूँ
वो क्वी बिंगदु नि।।
जो च्वोरि
करद
वो बचदु नि।
जो सच ब्वल्द
वो डरुदू नि।।
फिर बि वुं लोखुं
क गिच्चा कैल
पकडणै ?
जो ब्वल्दी यो
"अजनबी"
जुयाल कुछ कर्दु नि ।।
••••=56.
सुख क
बाटु बथाण वोला
यख बटि चलिगिंई
मि बि बाटु खुज्याणुं छूँ।
चौछोडि मनख्यूँ क
थुपडा लग्यां पर मि
अफ्थैं यकुलि चिताणुं छूँ।।
मनख्यूँ क चबलट्या
रंग ढंग द्येखिक छाल
फरि बैठि खिसाणुं छूँ।
भाग मा म्यार विधाता क
यकुलि ल्यख्यूं इलै त
मि नि रुसाणुं छूँ।।
जो बथौं बणिक
उकलि लैगि मि
वुंकी गाथा गाणूं छूँ।
जो उंदरि क बाटा
सौंगू बथाणा मि वुंका
वचन छटयांणुं छूँ।।
स्याणी गाणी क पैथर
यकतरा हुंयां छी लोग
पर मि शुरुक शुरुक कै
सबथैं धै लगाणुं छूँ।
सदनि अपडि भाषा मा
ल्यख्णूं बच्याणूं अपडा
मन थैई मि बि बुथ्याणुं छूँ।।
=
इन ह्वैग्याई त ह्वैग्याई..............
---
ताजमहल कु नै नियम बथाणु कौफ्णी
धर्मनिरपेक्ष देश मा यो रंग की धौंकणि।
नै सरकार बि देखि क अजक्यै खै चौंकणी
विदेशी ब्वोलिक मीडिया बि मनी च टौंखिणी।।
इन ह्वैग्याई त ह्वैग्याई........................
कश्मीरी मा ढुँगा ध्वल्दरा खूब हुंयां छी
यो त कतगै आर्मी क बाढ मा बचैयां छी
यो चलन सर्या देश से गद्दारी कु चा ।
ये घौ थैई मोदी जी बगतल खत्म कारा
अब बगत इतिहास मा नै पारी कु चा।।
इन ह्वैग्याई त...............................
घाटी मा राजनीति कु गठजोड हटावा।
माटी का गद्दारूँ क नामो निशान मिटावा।।
लगणु संसद मा लूला लंगडा बच्याणा छी
वो ढुंगौं ल फौजी ना देश थैं कच्याणा छी।
अब आसार राष्ट्रपति शासन का लगणा छी।।
इन ह्वैग्याई त.................................
सोनू निगम लाउडस्पीकर हटवाणा
निन्द अर जंता बि अजान से परेशान चा।
मौलवी मुंड सफाचट कु फतवा सुणाणा
फतवा सूणिक लोकतंत्र हुयुँ हैरान चा।।
इन ह्वैग्याई त ह्वैग्याई...........................
दिल्ली मा एमसीडी खुणि वोटिंग ह्वै
मीडिया सर्वै मोदीजी थै जिताणा छी।
लगणु चा गोवा पंजाब जन यख बि
सरजी कटगडा चाणा बुखाणा छी।।
इन ह्वैग्याई त.....................................
दिल्ली मा एयरफोर्स क अफसर पिटैई
यैमा कैथै बुरै नजर नि आणी चा।
लोकतंत्र कि आड मा जंता यो कनु चरखा चलाणी चा।।
ब्यालि सुकमा क नक्सली घटना ह्वै कर्युं बडु यो आघात चा।
मोदीजी अब दिखावा दम नथर यो त बडी शर्म की बात चा।।
इन ह्वैग्याई त ह्वैग्याई.............................
हज्जि ऐथर****

••••=59.
°°°°°°°°◆◆◆◆◆°°°°°°°°
मि बि गढवली छूँ भैजी।
वीर चंद्र सिंह नि छूँ भैजी।।
मि बि गढवली छूँ भैजी।
नरेंद्र सिंह नेगी नि छूँ भैजी।।
मि बि गढवली छूँ भैजी।
अजित डोभाल नि छूँ भैजी।।
मि बि गढवली छूँ भैजी।
विपिन रावत नि छूँ भैजी।।
मि बि गढवली छूँ भैजी।
अजय भट्ट नि छूँ भैजी।।
मि बि गढवली छूँ भैजी।
योगी आदित्यनाथ नि छूँ भैजी।।
मि बि गढवली छूँ भैजी।
क्वी पत्रकार नि छूँ भैजी।।
मि बि गढवली छूँ भैजी।
क्वी गितार नि छूँ भैजी।।
मि बि गढवली छूँ भैजी।
क्वी चित्रकार नि छूँ भैजी।।
मि बि गढवली छूँ भैजी।
क्वी गद्दार नि छूँ भैजी।।
मि बि गढवली छूँ भैजी।
क्वी फनकार नि छूँ भैजी।।
मि बि गढवली छूँ भैजी।
मि क्वी बेकार नि छूँ भैजी।।
मि बि गढवली छूँ भैजी।
भले मि 'अजनबी' छूँ भैजी।।
•••••=60.
°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°
तु सदनि अफ्थैं बडु से बडुु चिताणु रै भुला।
तिल भित्रक बिरणा बणैई भैर अपणौं खुणि खुदेणु रै भुला।।
अब्बि तक तिल अपडै नि पछयाणा नातों थै छटयाणुं रै भुला।
मुख समिणी लाटू बणिक पिछनै बटि लथ्याणु रै भुला।।
तिडयणि की ठांठी अल्झै कै हथुंल टैट मस्काणुं रै भुला।
अपडि खुशि मा अपड़ों क बुरु सोचि पापी मनथै बुथ्याणुं रै भुला।।
जो त्वथै आंदा जांदा ख्यालों मा बिसरि नि सकणा तु वुं जनै मुच्छयलु नपाणु रै भुला।
तु अपडै हथुंल छैंदा रिश्तों क कन गालु किटर्णु रै भुला।।
एक घडि मा छ्वीं नि पुरेंदि लाटा तु त अपडि धुन लगाणु रै भुला।
रिश्तों की ग्येड चौबट्ट मा खोलिक तु अपडों की हैंस अफि उडाणु रै भुला।।
==
•••••=61.
°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°
हे हम्हर उत्तराखण्ड क्या छो अर क्या ह्वैग्या देखिल्या।
कन स्वाणी रौनक रैंदि छै कै जमन अब त वो बगत नि रैग्या देखिल्या।।
शहीदुं ल कुर्बानी दे राज्य क बान अर राज त नेतों क हथ लगि देखिल्या।
आज त हर चुलखंदि मा राजनीति थडकिणी तब्बि त राज्य क गैराल ह्वैगि देखिल्या।।
वुंल स्वाचु छो कि अलग राज्य बणिक हम्हरू त भलु ह्वालु ।
पर राज्य कु त चौछोडि भलिकै खगिन बिगन ह्वैग्या देखिल्या।।
बर्सु बटि नै राज्य क बान कूणा कुमच्यरों बटि धै धवडि लगणि छै ।
अब धौ सनिकै मिल त कना कुहाल हुंयां छी देखिल्या।।
छै ज्वा देवभूमि कब्बि द्यब्तौं क सिर्वणु आज बणिच वा दारु क ठेकादरुं क मैत देखिल्या।
जि धर्ति मा जाडा ब्वाटों कि बयार रैंदि छै वख ब्वगणि च आज दारु की नयार देखिल्या।।
भै भै कु जख एक हि रस्वडु हूंद छो आज वै रस्वोडा मा चकडैतूं कि हुईंच मौज बहार देखिल्या।
जै मुल्क क हवा पाणि क कर्जदार छो हम वैकु चुकोला कनक्वै उधार देखिल्या।।

==
*****छ्वीं•••••=62.
★★★★★
ये रुप्या ! बिचरा सब त्यारै बान
अटगणा भटगणा छी दाना ज्वान
त्येरि अदंलि लगंद सर्या दुन्या
त्वै पैथर माखा सि रिटणा छी इंसान
ये पापी कलजुग मा सचै सब
भगवान पुज्येण्या त्यारै बान
ये रुप्या बिचरा सब त्यारै बान.........
त्यारा चेला भगत यख इंसान
उठदा बैठदा चलदा फिरदा लोग
खैरि खाणा छी त्यारै बान
हूणूँ त्वै पाणा क प्रपंच तमान
ये रुप्या बिचरा सब त्यारै बान .........
सींदा खांदा आंदा जांदा
फजल ब्यखुनि त्यार हि गुणगान
त्वै पैथर लदवडि् तडम लगद
भूक बि लगि जांद मुकदान
ये रुप्या बिचरा सब त्यारै बान ..........
त्वै पिछनै ना क्वी ग्वारु कालु
कुबरणी लौबाणि सब एक समान
त्वै पिछनै अब हूण लग्यूँ चा
रिश्ता नातों मा भलिकै फुकान
त्वी छै श्रद्धा, त्वी छै मान
ये रुप्या बिचरा सब त्यारै बान .......
त्वी छै अब फौंदारी शान
खुमसेणा रैंदि सब त्यारै बान
त्यारु गुलाम ह्वैग्या इंसान
वुन सर्या मुंडरु हुंयुं रैंद
रोज रोज सिर्फ त्यारै बान।।
=
काम काज करण वोला सब्या डुट्याल नि हूंदा रै।
तड तड बच्याण वोला सब्या छुंयाल नि हूंदा रै।।
कब्बि कब्बि लोग टौंखिणी मारिक सुद्दि नि रुंदा रै।
ई दुन्या मा कतगै मनिखि सिर्फ नौ कै ज्यूँदा रै।।
अब नि दिख्येंदा कखि ना धम्येला ना लटकण्या फूंदा रै।
छुछौ हर्चिग्या अब बीच कपलि कि स्यूंदा रै।।
म्वडब्वका काम लाटा कब्बि भला नि हूंदा रै।
कुलौं की डाल्यूँ फर त निक्वाल नि हूंदा रै।।
छ्वीं बथौं मा सदनि सवाल जबाब नि हूंदा रै।
बिना फट्ला रड्या का कब्बि धुरपला नि च्वुंदा रै।।
बिना पाणी क सूखा शंख पाणी च त सब ज्यूँदा रै।
सुद्दि बिरणों थैई बि दोष क्य दीण 'जुयाल'
जब भितरा कै अपडा नि हूंदा रै।।

=
हलकर्या बौ......
-
भैजि की जिकुडि घडि घडि झूरा।
हलकर्या बौ का त दियूरै दियूरा।।
जण्चारेक ना जिठणा भतिजा बि पूरा।
हलकर्या बौ का त दियूरै दियूरा।।
बौ की छुंयुंमा लपोडे जंदि उत्येड्या दियूरा।
बौ सानि सान्यूं मा ख्यल्द कुश्ती नूरा।।
बौजि थै देखणा कु द्यूरुं क जिकुडा कबलंदि।
कूणा कुमच्यरों बटि 'बौ प्यारी बौ' धैई लगंदि।।
रपचट्या स्वभौ से बौजि नौ प्वड्यूँ च हलकर्या।
छवटा बडा सब रंगतें जंदि बौ बणि च सरकर्या।।
जब जब बौ जनै भैजि ल करलि आंख्यूं ल घूरा।
खति गीं तब घलत्वण्या छुंयुंमा भ्यलि का चूरा।।
=



@

Bhishma Kukreti



(हमरी आस )
-
Garhwali Poetry by Sunil Maindola

त्वेकुु माया जोडियाल
अर पंखुडी-पुच्छडि बि
लगी गेनी त्वेफर
अब त फुरर उडी जैलु तू
म्यारू लाटा दूर परदेस तू
बणैलि एक नै घोल
बसैलि अपणी छ्वटी सि दुन्या
तु बिअास लेकि
फेर कु पुछद ब्वे- बुबा थै
कु द्यखद पुरण कूडि थै
जैका डिंडयल ,चौक फुण्ड
खितगुणू  हैंसणो रैन्द छै बचपन
यांकु दोष त्यारू बि नीच
इन त  जुग-जुग बिटै
चलणी रीति च
पर,
इतगा त याद रखी
हमरी साँखी छै तू
हमरी अाँखी छै तू
हौर
हमरी जिकुडी काख माया छै तू !
तन कि दूरी भले  जै
पर मन कि दूरी न हूण  दे  तू
याद रखी आज जन तू
अपुण भविष्य बणाणि छै
हमरू बि उनि भविष्य छै तू
बुरा दिनों  कि लाचारी म
हमरी एक आस छै तू
एक सांस छै तू
हमरू मन म हुंयूं च घंघतोल
त्वे कनक्वे बिंगौंला
अपणि मन कि बात
यो माया को पहिय्यां
कतगा तेज घुमणो यल्यूं च
ब्यटा रे ,
भोल जब तू चलि जैलु
अपणि नौकरी फर परदेस
तब हमन
घुघती सी खुदेणू रैण दिन-रात
टपराणी रैलि मयलि आँखी
तेरी सकल-सूरत द्यखण को !
ब्यटा,
जौंकि सच्ची सरधा रैद
अपणा ब्वे-बाबु खुणै
वूंकि अौलाद झुल्दा-फुल्दा हून्द
जा म्यारू लाटा
अपणि नौकरी फर
पर,
ज्वानि कि उमंग मा
भूली न जै हमुथै
अरे एक दिन त्वेन बि
हमुमैं त अाण !!

(सुनील दत्त मैंन्दोला )

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Bhishma Kukreti


   "जणी मी म्वरयूँ छौं"

-

गढ़वाली पोएम बी सुनील भट्ट

-
जैबर्यौं मुख अग्नै,
अंध्यारू छ्यै जांदू ।
सारू भरोसू दिखेंदू नी क्वी,
कुछ बी समझ मा नी आंदू।
दुख विपदा, पीड़ा सैंदू सरैल,
तिसालु पराण टपरांदू ।।
सची दगड़्यौं तब यनु सी लगदु,
कि जणी मी म्वरी ग्यौं।
कर्मौं का फल छन, भ्वगणु छौं।
नरक मा छौं यख भटकणु छौं,
जणी मी म्वरयूँ छौं ।।

जैबर्यौं म्यरा मन की होंदी,
गाती मा छपछपी सी लगदी।
माया की ठंडी नयार ब्वगदी,
जु भी चैंदू  चीज मिलदी।
बगछट्ट ह्वै दिल नाची जांदु,
रंगौं मा लरतर गीत गांदु।
सची दगड़्यौ तब यनु सी लगदु,
जणी मी म्वरी ग्यौं ।
कर्मौं का फल छन, भ्वगणु छौं।
स्वर्ग मा छौं अब यखी रै जौं,
जणी मी म्वरयूँ  छौं ।।

कबर्यौं पितृ द्यव्ता,
स्वीणौ मा म्यरा औंदन,
मुंडु मलासी बात या मीतैं समझौंदन ।
माया का धागौं मा ना अऽलिझी रै तू,
ज्यूंदु छै बुबा रै ज्यूंदु सदानी  रै तू।
स्वर्ग मा बिछांयु रै माया कु जाल,
नरक मा बी माया की चाल।
मनखी छै तू जाणी ले,
सरैल कु मोल पछ्याणी ले।
संत जु तुलसीदास ह्वैनी,
बात या सच्ची बोली गेनी ...कि....

"बड़े भाग मानुष तन पावा।  सुर दुर्लभ सद् ग्रन्थन्हि गावा।।
साधन धाम मोक्ष कर द्वारा। पाहे न जेहीं परलोक संवारा"।।

स्वरचित/**सुनील भट्ट**
20/05/17



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Bhishma Kukreti







गज़ल
*****
Garhwali Ghazals by Payash Pokhra
हम त सदनि आंख्यूं मा आंसु सि सरकणा रवां |
न बल तुम त आंख्यूं मा खैड़ सि करकणा रवां ||
वींकी देळिम बटैकि तिसळा हि बौड़िक ऐ ग्यवां |
जैं चोळि का बाना खरयां सरग सि बरखणा रवां ||
रुप्या कळदारु की माळा पैरिक आंखि अागास च |
हम त माटा मा खुट्यूं ताळ पैसा सि गिरकणा रवां ||
बनि-बनि उज्यळों का बीच अंध्यरु भि चमकद |
पोतळ्यूं का कौथिग मा जोगण सि छिरकणा रवां ||
कबि न कबि तुमरि खुट्टि भि कुरचळि त सै हमथैं |
इन जाणिक गंगल्वड़ा सि हरकणा फरकणा रवां ||
द्यख्दै-द्यख्दा बड़-बड़ा पोड़ भि जगा छोड़ि गैन |
तबि त हम भि जर-जरा कैकि उंदू रड़कणा रवां ||
"पयाश" दगड़ा का सबि बाँज-बुराँश भि फूलि गैन |
हम त खरड़ी मुण्डळि जना पाड़ सि दरकणा रवां ||
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@पयाश पोखड़ा |

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Bhishma Kukreti

प्रसिद्ध चित्रकार श्री बी मोहन नेगी के फेसबुक आदि सोसल मीडिया में गढ़वाली -कुमाउंनी भाषा विकास पर विचार
-
(बी  . मोहन नेगी दगड़ भीष्म कुकरेती टेली -छ्वीं 24 -5 -2017  )


भीष्म कुकरेती -नेगी जी अचकाल फेसबुक्या चौंतराम नि दिखयाणा छंवां जी ?
बी. मोहन नेगी -ओहो ! माराज ! भै डेढ़ मैना बटिं कूड़ छंवै याने  रिपेयरम  व्यस्त छौं , कैकि खाणी , कैकि पीणी अर क्यांक फेसबुक !
भीष्म कुकरेती -नेगी जी ! फेसबुक याने सोसल मीडिया मा गढ़वळि साहित्य काम का बाराम क्या ख़याल च जी ?
बी. मोहन नेगी -भै काम त दिख्याणु च हाँ।  लोग बाग़ ताणि त मारणा इ छन। फेसबुक चाहे मौसमी चौंतरा च पण खेती बाड़ी तो नजर आणि च।
भीष्म कुकरेती - पाठकों बाराम क्या ख़याल च ?
बी. मोहन नेगी -कांड त इख्मी लगीं छन जी।  पाठक गढ़वळि बंचण चाणा छन पर ढब ही नी त पौढ़न कनै ?
भीष्म कुकरेती -मतलब ज्वा  समस्या पारम्परिक माध्यम मा च वनि समस्या सोशल मीडिया मा   ...
बी. मोहन नेगी - बिलकुल जी बिलकुल  ..
भीष्म कुकरेती -तो बि सोसल मीडिया मा पाठक वृद्धि का वास्ता कुछ तो करे जै सक्यांद।
बी. मोहन नेगी -हाँ सवादी कविता हो तो  ... बात बण सकदी
भीष्म कुकरेती -कविता तो अधिक पोस्ट हूँणे  ही छन।
बी. मोहन नेगी -जख तख हो कविता पोस्टर या कविता दगड़ चित्र अवश्य हूण चएंदन जाँसे पाठक आकर्षित हो अर कुछ तो पौढ़ ल्यावो।
भीष्म कुकरेती - गैर पद्य साहित्य म सुखो च।
बी. मोहन नेगी -पारम्परिक माध्यम मा बि इनि च पर सोशल मीडिया माँ कुछ तो ह्वे इ सकेंद।
भीष्म कुकरेती -जन कि ?
बी. मोहन नेगी - लालचंद राजपूत सरीखा साहसी लोकुं तै रोज गढ़वळिम जोक्स पोस्ट हूण चएंदन।
भीष्म कुकरेती -हाँ बात म दम च।  हौर ?
बी. मोहन नेगी -व्यंग्य चित्र ह्वावन तो पाठकों तैं पढ़णो ढब बि पोड़ल।
भीष्म कुकरेती -जी हाँ
बी. मोहन नेगी -लघु कथा , लघु कथ्य , लघु नाटक बि रोज पोस्ट ह्वावन तो पाठक वृद्धि का पूरा अवसर छन।
भीष्म कुकरेती -जी हाँ
बी. मोहन नेगी -  इनि लघु रूप माँ कै विषय पर घपरोळ -चर्चा बि पाठक बढ़े सकदन।  पर विषय चर्चा लैक हूण चयेंद हाँ।
भीष्म कुकरेती -जी
बी. मोहन नेगी - फिर रोज आण , पहेली , कहावत पोस्ट होवन तो पाठक जमा होला अर पढ़णो ढब्याला।
भीष्म कुकरेती -100 % सही और   ...
बी. मोहन नेगी -कुछ प्रतियोगिता हूणा रावन तो पाठकों की रूचि बि बढ़ली अर ल्वायलिटी बि बढ़ली।जन कि खानापूरी , ज्ञान आदि विषयी प्रतियोगिता 
भीष्म कुकरेती -जी हाँ यो तो भौति बढ़िया सुझाव च नेगी जी
बी. मोहन नेगी - ये मेरी ब्वे सी मिस्त्री धाइ लगाणु च।  फिर हैक दिन हां।
भीष्म कुकरेती -जुगराज रयाँ आधुनिक मौलाराम जी  ...

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Copyright@ Bhishma Kukreti , 25/5/2017
Interview with famous drawing , Artist B.Mohan Negi , Interview with B.Mohan Negi about Social media


Bhishma Kukreti




शिल्पी , समाज और सरकार साथ मिलकर  ही गढ़वाली नाटकों को पुनर्जीवित कर सकते हैं - डा .डी.आर. पुरोहित
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(गढ़वळि नाटक पुनर्जीवितिकरण पप्रसिद्द लोक नाट्य सक्रिय शिल्पी डा .डी.आर. पुरोहित दगड़ भीष्म कुकरेतीअ   टेली -छ्वीं )
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भीष्म कुकरेती  - जी डा साब ! अजकाल दस बारा सालुं बटिं गढ़वळी नाटकुं मा सुन्नपट्ट हुयुं च। 
डा .डी.आर. पुरोहित- हाँ दिखे जावो तो राष्ट्रीय स्तर पर बि इनि कुछ  ..
भीष्म कुकरेती  -ना पर मुंबई , पुणे मा मराठी नाटकों मा दुबर रंगत ऐ गे , मुंबई मा अब गुजराती नाटक खूब चलणा छन अर मुंबई म हिंदी नाटक बि अब ठीक ठीक चलणा छन।
डा .डी.आर. पुरोहित- हाँ वो तो च किन्तु गढ़वळि नाटकों की सबसे बड़ी परेशानी च बल इखमा नाटक का समझदार नाट्य लिख्वार नि छन , एकाद अपवाद हो  तो हो।
भीष्म कुकरेती  -मतलब जड़ नाट्य लिख्वार की सबसे बड़ी समस्या च।
डा .डी.आर. पुरोहित- बिलकुल सबसे पैल नाटक की समझ वाळ नाटक ल्याखन तो नाटक विधा अगवाड़ी बढ़णो बाटो साफ़ होलु। दिखणेर  तो तबि आकर्षित होला कि ना ?
भीष्म कुकरेती  - माना कि नाट्य लेखक मिल बि जावन तो मंचन की समस्या तो उख्मी च कि ना ?
डा .डी.आर. पुरोहित- जी आज मंचन खासो मैंगो ह्वे गे तो इखमा सामाजिक संस्था , समाज अर धनी वर्ग तै समिण आण पोड़ल।
भीष्म कुकरेती  -जी कन ?
डा .डी.आर. पुरोहित- सामाजिक संस्थाओं व धनी वर्ग तै मंचन व्यवस्था करण पोड़ल अर समाज तै अपण खीसा से कंळदार खर्च करिक नाटक दिखण पोड़ल।
भीष्म कुकरेती  -जी हाँ जनता तै पैसा लगाणो ढब डळण पोड़ल। 
डा .डी.आर. पुरोहित- अर उत्तराखंड सरकार तै याने संस्कृति विभाग तै विजनरी ह्वेका नयो  शिरा से आधुनिक नाटकों का संवर्धन , संरक्षण का वास्ता योजना बणाण आवश्यक च।  आज  की स्थिति तो भयानक च।  संस्कृति विभाग बस एक तुर्री बजाण वळ विभाग बणी रै गे। 
भीष्म कुकरेती  -याने कि नाट्य शिल्प , समाज व संस्कृति विभाग तै एक दगड़ी ह्वेका काम करण से ही नाटक विधा माँ सुधार आलो।
डा .डी.आर. पुरोहित- बिलकुल तिन्नी स्तम्भ जब तक मीलिक काम नि कारल  नाटकों विकास असंभव च।
भीष्म कुकरेती - जुगराज रयाँ।