• Welcome to MeraPahad Community Of Uttarakhand Lovers.
 

Articles By Bhisma Kukreti - श्री भीष्म कुकरेती जी के लेख

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, July 26, 2009, 12:54:53 PM

Bhishma Kukreti


विकाश
-
Modern Garhwali Short Story by Jasvir
-

ये साल गर्मीयूं कि छुट्टीम गौं जयूंछायी,  मेरी मां ल बथै कि हमरा सैणाक पुगुंड फर सडक कटेणी च बल।   मि हैरान ह्वे ग्यों, यो पुगुंडु त हमरु सबसे बडु पुगडु छौ, येकै नाज से त हम पलेन्दा छा।

ब्यखुनि दौं  मि धुमुणकु चलि ग्यों सारी जने,  द्य्याखा त सैर्या पुंगुडु कटै ग्या, द्वी JCB अर पाचं मजदूर लग्यां छा खैंण्डण फर। मि निराश ह्वे कि पुंगडक एक किनरा फर बैठि ग्यों,   तबरि म्यारू ध्यान पुगंडक ढीसक पोड फर गा, म्यारा आखोंन्द आंसु  ब्वगण लगगी, आखों अगने धुन्धकार ह्वे ग्या, मीथै अपणु बचपन दिखेण बैठ ग्या।

चैत का मैनेौं कि सट्टी (धान) बुतैम येयी पोडाक मुडि बैठिक कल्योरोटी खान्द छाया, मेरी मा मीखुणी बोदि छै, लखडु अर ग्वपला टीपीकि ल्यायु आग जगोंला अर च्या (चाय) बणौला।

म्यारू दादा (बडु भै) मीसे काफी बडु छाै यांलै वो हैल लगांदु छौ, अर मी खुणि ब्वदा छा तु डाला फोड, सबसे बेकार काम छौ मीथै भारी गुस्सा औन्दु छो पर म्यारा पिताजी कि डैरकु  मि चुप रैजान्दु छौ ।   मी थै सिनक्वलि भूख लग जान्दी छै, मि बार-बार मेरी मां थैं सनकाणु रैन्द छौ, मेरि मां हैंसिकि बोदि छै,  मूडि गदन  छोयाम जा अर पाणि लियो फिर रोटि खौंला।

मि खुश ह्वेकि हथ फरकु कूटू एक तरफ चुटैकि पाणी कु कैन हाथ म पकडि कि दौडुदु छौ छोंया कि तरफ, तवरि पिछनै भटी म्यारा पितजिकी खतरनाक अवाज सुणेन्दी छै, कन भूख ह्वे रे त्वे खुण,    अभित अद्दा पुगुंडु भि नि बुते, के कु कबलाट हुयूं त्वेफर ?  फिर मि रुवण्यां सि मुख बणा खै अपणी मां जनै देखुदु छौ अर तब मेरी मां बोदि छै, नन्नु लौडु च भूख लग गे होली वेथैं, आल्यावदि खै ल्यूंला बगत ह्वेतग्या। फिर हम सब्या येई पोडक मुडि बैठिक कल्योरोटी खाणकि तैयरी करदा छाया।  पिताजि तैल -मैल पुंगडक हल्यों थैं धै लगांन्दा छाया, आवा भारे रोटी खै जावा।

असूजक मैना मेरी मां ब्वलदि छै बुबा आज इसगोलकि   छुट्टी कारो आज सैणाक  पुगंडक सट्टी मन्डणी, सर्या सार मुके ग्या हमरु ही हमरु रै ग्या, लोखुल गोर छोडयलीं सारि । मि मेरी मां दगड एक शर्त धरुदु छों कि मिल तभ आण  जो तिल  कखडिकु रैलु अर भात बणाण अर एक कखडी कच्ची खाणा कु लिजाण नथर मिल नि आणु I  मेरी मां  तैय्यार ह्वे जान्द छै। सुबेर मेरी मां भात और रैला थे भान्डाउन्द धैरि क अपणी पुरणी धोती का कत्तर चीरि कि एक फन्ची बणा कि मेरि भुल्ली का मुण्डम धरदि छै और हथ फर पाणी कु कैन लेकि  भुल्ली अगने भटै अर मां अर मी पिछनै भटे मोलकु ब्वर्या मुन्डम धैरीक रस्तालग जान्दा छाया।

पुंगडम पौंछिकि जब मि सट्यूंकु कुन्डकु देखुदु छौ, जो कि मी से भी उच्चु रैन्दु छौ त म्यारू सबि साहस खत्म ह्ने जान्दु छौ । सट्टी   मंडै, पराल फ्वलै, फिर बोरि भ्वारा अर धार सरै, थकि -थुकि खै फिर ये ही पोड मुडि बैठिक रैलु भात खयेन्दु छौ, मेरी मा आन्दी-जान्दी बेटी-ब्वारीयूं थै धै लगै- लगै कि बुलान्दि छै, आजावा हे कखडी खा जावा, .. अर तब  मिल-जुलिखै  हारा मठ्ठा दगडि हैरि कखडी कि फडकी खयेन्दि छै।

फागुणक  मैना स्कूल १० बजी लगदी छै, हमरा गौंक  लौडौंकि एक टीम छै, सुवेर-सुवेर पैलि हम एक धात मोल घोल्यान्दा छाया सैणाक पुंगडों, दगुडु बणेकि जान्दा अर आन्दा छा, रस्ता म एक गौं प्वडुदु छों, वख भटै अमरूद च्बरणा, खूब गालि खयेन्दी छै पर मजा भी खूब आन्दु छो।

मि इन्नि बचपन का सपना देखुणु रौं तबरि गाड का पलिछाल मडगट भटि म्यारू सि दद्दा आंद दिख्या, ... मि हैरान ह्वे ग्यों दद्दा थैं म्वर्यांत कै साल ह्वेगीं पर इबरी यख ..कनखै ?      दद्दा नजदीक ऐैग्या, दद्दा कु मुख गुस्साल लाल हुययूं छौ, अर अन्दिचोट दद्दा JCB वला मजदूर फर पिलची ग्या।     कनु रै हराम का बच्चा . . .किलै उजाड रे तुमुल यो पैरु ? ....तुम थैं पता मिल अर मेरी सैणिल मूडि गाड भटै सर्यां छी ये पैरा खुणि ये ढुन्गा, सर्या भीड्ड उजाडयाल? . . मजदूर ब्वनु, हे ब्वाडा सडक बनणीच यख, ... उनभित बन्जर ही छो स्यू प्वडीयूं, किलै छौ गुस्सा हूणा ?  यां का पैसा मिलणी तुम थैं।

अरे बुबा कतग पैसा जि देला तुम ? कतग खैरि खंयीच मेरी यीं पुगंडी बार, अपडि शैणिकु बुलाक, गुलाबन्द अर कन्दुडुकि मुर्खी बिकै कि मिल या पुगुंडि मोल ल्या, तीन दिन का बासा फर पैदल भूखू- निर्भुखु  पौडि गौंमि येकि रजेस्ट्री कराणा खुणि, मेरी खैरिक क्या कीमत दे सकदौ तुम ? ....पर निर्भे छव्वारा केखुण खैन्डणा छो तुम यीं सडक थै ?

अरै ब्वाडा विकास आणुच बुना ..गढवालम यीं सडकाक रस्ता, मजदूर बोनु ।

पर बुबा कतग बडु च वो विकास जै खुण इतग बड़ी सडक चैन्द ?

अरे ब्वाडा बहुत बडुच यत कुछ भि नीच वे खुण त सैर्या गढ्वाल खैन्डेणू च ।,

सचें ब्वनु छै तू?

हां ब्वाड़ा।

तबरी दद्दा  कि नजर मीं फर पोडिग्या, ... कनु रै निर्भग्याओ किलै छोडियीं तुमल पुगंडि बन्जी ? ...... मि डैर ग्यों, क्या बोलु, फिरभी हिम्मत कैरिक मिल ब्वाल ... कैल कन खेति - पाति ब्वे - बाप अब दाना ह्वेगीं।

दद्दा कु गुस्सा अब सातों असमान फर चैडिगे, .... कनु तुम थैं जैर अयूंच करदा ?

डरदा- डरदा मिल ब्वाल ....दद्दा हम द्विया भाई शहर रन्दौ नौकरी फर।,

पर ब्वारि त ह्वेली तुम्हरी धारम ?, दद्दाल  पूछ

मि-   न - न वो भि हम दगड ही रन्दन ।

पर किलै ? दद्दा हैरान ह्वेकि

मि-  नौनौ थैं पडाना खुणि ..

दद्दा  गुस्साम -  पर यख किलै नि पढाया ? .... तुमल भित यखि पाढा।

मि- दद्दा यखकि पडै मा और वख कि पडै मा भौत फर्क च ।

दद्दा हैरानी से -  क्या फर्क च रै ?

मि-  दद्दा यख पैडिकत हम जन ही बणला, पर वख पाडला त भौत बड़ा आदिम बणला।

दद्दा - बड़ा आदिम ? कतग बड़ा रै?

मि-   भौत बड़ा दद्दा,  इतग बडा कि फिर वो मूडि ब्वे-बाप, नाता-रिस्ता, बोलि-भाषा, तीज-त्योहार कैथै नि देखि सकदा, बस विकास थै की देखिदीं।

दद्दा -  बिकास ? ......को .... जो यीं सडका रस्ता आणुचं ....वी ? 

मि- हां दद्दा ।     
 
दद्दा क मुख फर निराश छा ग्या, ठिक च बाबू.... बोलिकि,  फर फरकि, एक नजर उजड्रयां पैराक तरफ ढ्याख  फिर पुगंड जनै ढ्याख.... अर  फिर स्यां-स्यां मडगट जनै जाण लग गीं। मि रुण बैठग्यों, जोर से धै लगैं, ....दद्दा .... मी थै भि लीजा अफु दगडि, पर दद्दाल  फरकि खै भि  नि ढ्याखु, अचानक मेरी तन्द्रा टु्टी, मिल द्याख कि मित पुगंडक किनरा फर बैठ्यूं छौं अर मजदूर काम कना छा। दद्दा थैं म्वरयां त तीस साल ह्वे गीं पर शोर अभि भी पुगंडियूं फरै च । दद्दा थै सायद बिकास समझ नि आयी, पर मेरित गेड बन्दी च, कि विकास आलु त यूं सडक्यूं कै रस्ता आण ।


                                 जसवीर
--




With Kind Regards


Dhangu, Gangasalan Ka Kukreti

Bhishma Kukreti


सफेद छाती वाले मुर्ग
--
White-Breasted Waterhen (Amauronuis phoenicurus) Safed Chhati wali Jal Murg
-

गढ़वाल की चिड़ियायें - भाग -26

( Birds of  Garhwal; Birding and Birds of Garhwal, Uttarakhand, Himalaya ----- 26)
-
आलेख : भीष्म कुकरेती , M.Sc. 
-

32 सेंटीमीटर लम्बे जलमुर्ग मुख्यतया मैदानी हिस्सों व नैनीताल जैसे पहाड़ी जगहों में तालाब व तलायों के बिलकुल पास पाए जाते हैं। अग्र भाग सफेद व पश्च भाग सिलेटी रंग का होता है।  उड़ सकते हैं और नर -मादा साथ में रहते हैं।
-
सर्वाधिकार @सुरक्षित , लेखक व भौगोलिक अन्वेषक 



Birds of Pauri Garhwal, Birds of  block, Pauri Garhwal , Uttarakhand Himalaya; Birds of  Kot block, Pauri Garhwal Uttarakhand Himalaya; Birds of  Kaljikhal block, Pauri Garhwal ; Birds of Dhangu (Dwarikhal)  block, Pauri Garhwal Uttarakhand Himalaya; Birds of  Jahrikhal block, Pauri Garhwal Uttarakhand Himalaya  ;Birds of  Ekeshwar block, Pauri Garhwal ;  Birds of  Pauri block, Pauri Garhwal Uttarakhand Himalaya; Birds of Pabau , Pabo  block, Pauri Garhwal Uttarakhand Himalaya; Birds of Rikhanikhal  block, Pauri Garhwal Uttarakhand Himalaya; Birds of  Bironkhal block, Pauri Garhwal Uttarakhand Himalaya  ; Birds of Yamkeshwar  block, Pauri Garhwal Uttarakhand Himalaya; Birds of Naninidanda  block, Pauri Garhwal Uttarakhand Himalaya; Birds of  Dugadda block, Pauri Garhwal Uttarakhand Himalaya; Birds of  Pokhara block, Pauri Garhwal Uttarakhand Himalaya; Birds of Khirsu  block, Pauri Garhwal Uttarakhand Himalaya; Bird watchers Guide Uttarakhand , Himalaya; Bird watchers Guide Garhwal, Uttarakhand , Himalaya ; Bird watching Places in Pauri Garhwal, Himalaya, Uttarakhand  , Birding  Garhwal, Uttarakhand Himalaya , Birding  Garhwal, Uttarakhand Himalaya ,Birding Dehradun garhwal, Birding Dehradun Shivalik, Himaalya
गढ़वाल ,  चिड़ियाएं , उत्तराखंड , चिड़ियाएं , हिमालय  चिड़ियाएं , पौड़ी गढ़वाल चिड़ियाएं  , उत्तराखंड चिड़ियाएं  , हिमालय चिड़ियाएं , उत्तर भारतीय चिड़ियाएं , दक्षिण एशिया चिड़ियाएं

--




With Kind Regards


Dhangu, Gangasalan Ka Kukreti

Bhishma Kukreti






प्रतीक्षालयुं मा प्रतीक्षा प्रसव पीड़ा 

(Best  of  Garhwali  Humor , Wits Jokes )
s =आधी अ
-
  चबोड़ , चखन्यौ , ककड़ाट  :::   भीष्म कुकरेती   
-
प्रतीक्षा हमर जमनाक एक संस्कृति च , इन्तजार करण  सभ्यताs  अंग च  , प्रतीक्षा मा जीण एक कला बि च।
               म्यार  प्रतीक्षालय से पैल पैल मुखसौड़ तब ह्वे छे  मि दर्जा छैइम दाखिला लीणो सिलोगी स्कूलम ग्यों।  प्रिंसिपल साब क भैर बड़ो बरामदा छौ अर हरेक क्लास का कमरा बरामदा मा खुल्दा छा। म्यार दगड़ म्यार बडा जी छा जु खुद प्राइवेट टीचर छा तो फॉर्म भरणो समस्या नि छै।  बकैयूं संरक्षक बडा से फॉर्म भरवाणा छा।  बडा जी तै प्रतीक्षा अनुभव नि हूणु छौ किलैकि हौरू फॉर्म भरण म ब्यस्त छा।  हम प्रवेशार्थी भैर खुलाम  एक हैंक से कविता पूछिक परिचय करणा छा तो प्रतीक्षा वेदना को अनुभव नि ह्वे।  प्रतियोगिता /दूसर तै कविता पुछण प्रतीक्षा पीड़ा  नि हूण दीणि छै। 
               फिर जब मि ड्यारा डूण भर्ती हों तो हमर गांव से बस स्टॉप ज्यादा ना सात मील दूर गंगापार सिंगटळि छौ।  उख पूरी रोड प्रतीक्षालय ही छौ।  द्वी तीन  घंटा बाद ऋषिकेशौ कुण बस आंद तो रोड ही प्रतीक्षालय ह्वे सकद छौ।  चाय आदि की द्वी दूकान बि इन्तजारौ दर्द कम करणो आशियाना छा।  1965 से 1974 तक साल भर मा द्वी -तीन दैं सिंगवळिम वेटिंग पेन अनुभव करण इ पड़द छौ।  गेट सिस्टम छौ तो गाडी अपण समौ पर आंद छा अर अमूनन बसूं म जगा नि   मिलदी छै तो प्रतीक्षा अधिक ही हूंद छे।  बस वेटिंग पेन वाकई  मा चाइल्ड डेलिवरी पेन से बड़ो पेनफुल हूंद छौ।  जग्वाळ की पीड़ा स्वील हूणो दर्द से बिंडी दर्दीला !
                       ड्यारा डूनण मा प्रतीक्षालयों मा प्रतीक्षा पीड़ा भौत अनुभव ह्वे पर यादगार अनुभव तो फिल्म हॉल से भैर  जग्वाळ करणो को ही च।  बारा बजिक शो कुण दस या ग्यारा बजि टिकट मिल जावो तो सिनेमा हॉल का बरामदा या भैर चौक मा शो शुरू हूण तक प्रतीक्षा पेन क्या कम पेनफुल हूंद छौ क्या ?
सेल्स लाइन मा छौं तो पिछला चालीस सालों से टूर जीवन को अभिन्न अंग च।  अर बस स्टॉप , रेलवे स्टेशन व एयर पोर्ट पर इंतजारी  दर्द जीवन से से इथगा घुलमिल गे कि जैदिन इन्तजार नि करण पोडद तो इन लगद मि इंडिया मा ना फॉरिन कंट्री मा हूँ।  बस या रेलवे स्टेशनोंमा  जग्वाळ थुड़ा भौत सह्य हूंद।  इखपण तुम कैक बि दगड़ कनि बि , हिंदीम बचळे सकदा पण एयरपोर्टम वेटिंग बड़ी बोरिंग हूंद।  एयरपोर्ट मा सब अपण इगो मुंडम लेक खड़ा या बैठ्यां रौंदन अर तुम युंका दगड़ सुदि मुदि टैम व्यतीत करणो बान छ्वीं नि लगै सकदा।  अर क्वी मिल बि जावो त अंग्रेजी मा ही बात करण पोड़द।   
             अस्प्तालूँ मा प्रतीक्षालय हो बि तबि वु  अस्पताल ही हूंद।  मोळs लड़्डू  पर चांदी लोप लगैक वो चाँदीक लड़्डू नि ह्वे जांद।  उनी अस्प्ताळुं प्रतीक्षालय वाटानुकूलित बि ह्वावन तो बि बीमारी , रोग अर दुःख की हव्वा कम त नि ह्वे सकदी ना।
    क्वी मोरी गे तो यदि मृतक तै मड़घट लिजाणम बिंडी देरी हो तो या प्रतीक्षा परजामा मा ली जांदी।
    सरकारी काम कराणो बान साब की प्रतीक्षा बि त पेनिंग ही होंद।
    अब द्याखौ न फेसबुक मा पोस्ट डाळो अर जब तक क्वी Like अर कमेंट्स नि आवन तो वा प्रतीक्षा कम पेनफुल हूंदक्या ?
   लैंडलाइन टेलीफोन कम्प्लेन करणो बान टेलीफोन पर - आप कतार में हैं , कृपया प्रतीक्षा कीजिये की ध्वनि करैं से बि बिंडी कर्करि लगदी।
कम्प्यूटर रिस्टोर हूणै प्रतीक्षा त जानलेवा हूंदी।
जथगा दिन तथगा किस्मो प्रतीक्षा।  शास्त्र बुल्दन बल जु प्रतीक्षा करण सीख जावो ओ ही इंद्रजीत , महावीर  , लालकृष्ण अडवाणी हूंद।  पर जरा लालकृष्ण अडवाणी तै कबि पूछ च बल प्रधान मंत्री बणनो प्रतीक्षा कथगा अधिक दर्दीली हूंद।

-
Copyright@ Bhishma Kukreti , Mumbai India ,  17 /6/ 2017
*लेख की   घटनाएँ ,  स्थान व नाम काल्पनिक हैं । लेख में  कथाएँ , चरित्र , स्थान केवल हौंस , हौंसारथ , खिकताट , व्यंग्य रचने  हेतु उपयोग किये गए हैं।
-
Best of Garhwali Humor Literature in Garhwali Language , Jokes  ; Best of Himalayan Satire in Garhwali Language Literature , Jokes  ; Best of  Uttarakhand Wit in Garhwali Language Literature , Jokes  ; Best of  North Indian Spoof in Garhwali Language Literature ; Best of  Regional Language Lampoon in Garhwali Language  Literature , Jokes  ; Best of  Ridicule in Garhwali Language Literature , Jokes  ; Best of  Mockery in Garhwali Language Literature  , Jokes    ; Best of  Send-up in Garhwali Language Literature  ; Best of  Disdain in Garhwali Language Literature  , Jokes  ; Best of  Hilarity in Garhwali Language Literature , Jokes  ; Best of  Cheerfulness in Garhwali Language  Literature   ;  Best of Garhwali Humor in Garhwali Language Literature  from Pauri Garhwal , Jokes  ; Best of Himalayan Satire Literature in Garhwali Language from Rudraprayag Garhwal  ; Best of Uttarakhand Wit in Garhwali Language from Chamoli Garhwal  ; Best of North Indian Spoof in Garhwali Language from Tehri Garhwal  ; Best of Regional Language Lampoon in Garhwali Language from Uttarkashi Garhwal  ; Best of Ridicule in Garhwali Language from Bhabhar Garhwal   ;  Best of Mockery  in Garhwali Language from Lansdowne Garhwal  ; Best of Hilarity in Garhwali Language from Kotdwara Garhwal   ; Best of Cheerfulness in Garhwali Language from Haridwar    ;
Garhwali Vyangya, Jokes  ; Garhwali Hasya , Jokes ;  Garhwali skits , Jokes  ; Garhwali short Skits, Jokes , Garhwali Comedy Skits , Jokes , Humorous Skits in Garhwali , Jokes, Wit Garhwali Skits , Jokes 

Thanking You .
Jaspur Ka Kukreti

Bhishma Kukreti



अरे नि चुलावो , नि चुलावो , स्या मेरि बूड सासुन बणवै छौ   
-
(Best  of  Garhwali  Humor , Wits Jokes )
s =आधी अ
-
  चबोड़ , चखन्यौ , ककड़ाट  :::   भीष्म कुकरेती   

नै  मकान बणानो बान पुरण कूड़ उजण जरूरी छौ।  बिहारी ठिकदारक गढ़वळि मजदूर ऐ गे छा।  समान सुमान भैर करणो पैल काम छौ।
सुंदरा बौ - अरे जल्दी जल्दी  उठाओ ढैपर बिटेन सामान।
एक 18 सालौ गढ़वळि मजदूर - ये सुंदरा बोडी , ए बोडी ! यु पथरौ कुछ चीज क्या च ?अर यु इनि काठक क्वी तीन चीज छन  जन थाळी।
सुंदरा बौक सासु जमोतरी - अरे अरे स्यु पयळ च पयळ च।  इ राम दा कथगा काम आंद छौ स्यु पयळ।  पळयो खाणो , रैलु धरणो क्या काम नि आंद छौ। अर वु दुसर बि काठक पयळ च।
मजदूर - हैं माटक भांड त सूणी छौ पर पथरौ भांड ?काठक थाळी ?
जमोत्री  - अरे  त्यार ददा अर बूड ददा की ही त सि काठक थाळी बणइ छन।  मेर बूड सासु बतांदी छे बल बूड ससुर जिक दादा जी मोरद दैं  चुपड़ा सारिक गींठी बचैक रखणो बोली गे छा। त्यार बूड दादान अर त्यार ददा न उ गींठी डाळ काटि छौ।  त्यार बूड ददा त म्यार नि छा दिख्यां पर त्यार ददान त हमर कथगा काम करदा छा हाँ। फिर बल दुयुंन 6 काठक थाळी , एक पर्या , द्वी बड़ पर्वठ अर तीन चार बरोळी बणै छौ।  तुमर साण छै साण काठौ भांड बणाणो।  पता च कथगा दे छे मजदूरी तब ?
मजदूर -कथगा ?
जमोत्री  -टुप द्वी दूण झंग्वर , एक दूण क्वादो , द्वी पाथ सट्टी , एक पाथ  दाळ  , एक गिंदौड़ा , मर्च मसलु  अर तमाखु अलग से। अर चार फांग बगैर त्याड़ दियां भद्वाड़ करणो कुण.
  मजदूर - बस ?
जमोत्री - अरे वै टैमाक सबसे बड़ी मजदूरी छै। सरा गाउँ वळुंन हम तै सुणै बल इतगा मजदूरी किलै दे ?
मजदूर -सरा गौं नि बुल्दी।  सबि बिठुंन बुल्दी।
जमोत्री - हां हाँ सबि बिठुंन तून देन।  बकि सिक्की  ...
मजदूर - यीं ददिक त काम इत्यास बथाणो रैग्या  पर ये सुंदरा काकी इन बथा कि यूँ पथरुुँ अर काठौ भांडुं क्या कन्न ?
सुंदरा - भेळुँद चुटै दीण अर क्या करण ?
जमोत्री - नै नै।  जरा यूं पर क्वी हथ लगालो तो वैकि कुल्लि फोड़ देलु मि।  हमर पुरखोंन कथगा मेनत से यी जरुरातै चीज बणैन अर तुम भेळुंद चुलाणो बुलणा छंवां। 
सुंदरा -हाँ पर तब जरुरात छे अब नी च ना ?
जमोत्री -अरे आग लगल ये नै जमन पर।  यूँ पर हथ नि लगाण।
सुंदरा -तुम बि  ना नरेंद्र कठैत ह्वे गेवां।
जमोत्री - क्वा च उ कठैत ? राजा का ...
सुंदरा - राजाक न।  अच्कालौ गढ़वळिs  स्टार सटाइरिस्ट च।
जमोत्री - औ गढ़वळि व्यंग्यक सितारा ? क्या ब्वाल वैन ?
सुंदरा - बल साहित्यकारों तै इंटरनेट से अधिक पत्र पत्रिकाओं मा ध्यान दीण चयेंद।
जमोत्री - ठीक त ब्वाल अरे इंटरनेट बि क्वी माध्यम च जु किताबों मुकाबला कर साको। बुक्स आर फॉरएवर , किताब अमर छन। 
सुंदरा - तो तुम फिर मोबाइल मा गढ़वळि लोकगीत या नरेंद्र सिंग  नेगी का गीत किलै सुणदा ?
जमोत्री  - वु त , वु त अब क्वी ना तो गांवक गीत बणांदु ना क्वी गीत गांदो तो मीन मोबाईल मा गीत नि सुणनन त कख सुणनन ?
मजदूर - अरे गीत रचण वळुं तुमन कीमत नि जाणी त वूंन किलै गीत रचणन ?
सुंदरा - ये तू यीं बात तैं हैंक दिनौ कुण धौर दे हाँ। 
जमोत्री - कुछ बि ह्वे जैन मीन यी पुराणी चीज भेळुन्द नि फिंकण दीण।
सुंदरा -त तुमि ब्वालो क्या करण यूं वैजमानो चीजुंक ?
जमोत्री - इन कारो नै मकान का एक भितर  चौड़ी सीमेंटकी पटिया -पसूण बणावो अर उखमा यूँ सब चीजों तै धरि द्यावो।  कै चीजै जरूरत खतम ह्वे जावो तो वीं चीज तै कला या आर्ट  बणैक समाळी धौरण चयेंद।
मजदूर - हाँ ये दादी अब लगणु च तू अपण जमानैs  मिंडल पास छे हाँ।  मीन बि दसक किताब मा पौढ़ि छे बल - इफ देयर इज नो रिपीटेड यूज ऑफ एन आर्टिकल मेक इट आर्ट एंड इट्स  वैल्यू विल इनहैंस।
-
-
Copyright@ Bhishma Kukreti , Mumbai India , 21 /6/ 2017
*लेख की   घटनाएँ ,  स्थान व नाम काल्पनिक हैं । लेख में  कथाएँ , चरित्र , स्थान केवल हौंस , हौंसारथ , खिकताट , व्यंग्य रचने  हेतु उपयोग किये गए हैं।
-
Best of Garhwali Humor Literature in Garhwali Language , Jokes  ; Best of Himalayan Satire in Garhwali Language Literature , Jokes  ; Best of  Uttarakhand Wit in Garhwali Language Literature , Jokes  ; Best of  North Indian Spoof in Garhwali Language Literature ; Best of  Regional Language Lampoon in Garhwali Language  Literature , Jokes  ; Best of  Ridicule in Garhwali Language Literature , Jokes  ; Best of  Mockery in Garhwali Language Literature  , Jokes    ; Best of  Send-up in Garhwali Language Literature  ; Best of  Disdain in Garhwali Language Literature  , Jokes  ; Best of  Hilarity in Garhwali Language Literature , Jokes  ; Best of  Cheerfulness in Garhwali Language  Literature   ;  Best of Garhwali Humor in Garhwali Language Literature  from Pauri Garhwal , Jokes  ; Best of Himalayan Satire Literature in Garhwali Language from Rudraprayag Garhwal  ; Best of Uttarakhand Wit in Garhwali Language from Chamoli Garhwal  ; Best of North Indian Spoof in Garhwali Language from Tehri Garhwal  ; Best of Regional Language Lampoon in Garhwali Language from Uttarkashi Garhwal  ; Best of Ridicule in Garhwali Language from Bhabhar Garhwal   ;  Best of Mockery  in Garhwali Language from Lansdowne Garhwal  ; Best of Hilarity in Garhwali Language from Kotdwara Garhwal   ; Best of Cheerfulness in Garhwali Language from Haridwar    ;
Garhwali Vyangya, Jokes  ; Garhwali Hasya , Jokes ;  Garhwali skits , Jokes  ; Garhwali short Skits, Jokes , Garhwali Comedy Skits , Jokes , Humorous Skits in Garhwali , Jokes, Wit Garhwali Skits , Jokes 


Thanking You .
Jaspur Ka Kukreti

Bhishma Kukreti

Third Phase of Forest settlement in Garhwal and Kumaon
-   
                             British Administration in Garhwal   -117
       -
History of British Rule/Administration over Kumaun and Garhwal (1815-1947) -134
-

            History of Uttarakhand (Garhwal, Kumaon and Haridwar) -971
-
                              By: Bhishma Kukreti (History Student)

Due to taking village forests and surrounding village forests under government rights, Citizens were dissatisfied by the new rules.  There was a new movement in Kumaun and Garhwal 'Kuli Begar' against British officials using free labor. There were fires in many places.
   Commissioner Bentham realized that people are suffering much due to new policies. Taking permission from higher authorities, he set up a committee. He visited villages, listened their pleas. Bentham recommended that government should open many forests for public and public should be free for using forests of half miles away from village. Bentham suggested Poles nearby village forests. Government accepted some suggestions and freed a few forests and reduces some uncomfortable policies. 
Government set up a Kumaun Forest circle for Kumaon. The government set up a 'Janglat Kasthnivaran Samiti'.  There were some elected members, some nominated by gverment and government employees the committee.
  There was plan for protecting village Panhcayat forests. 


Copyright@ Bhishma Kukreti Mumbai, India, bckukreti@gmail.com 17/6/2017
History of Garhwal – Kumaon-Haridwar (Uttarakhand, India) to be continued... Part -972
-
*** History of British Rule/Administration over British Garhwal (Pauri, Rudraprayag, and Chamoli1815-1947) to be continued in next chapter
-
(The History of Garhwal, Kumaon, Haridwar write up is aimed for general readers)
XX   
References 
1-Shiv Prasad Dabral 'Charan', Uttarakhand ka Itihas, Part -7 Garhwal par British -Shasan, part -1, page- 287-312
2- Badridatt Pandey, Kumaun ka Itihas , page 468-69

Xx

History of British Rule, Administration , Policies, Revenue system,  over Garhwal, Kumaon, Uttarakhand ; History of British Rule , Administration , Policies Revenue system  over Pauri Garhwal, Udham Singh Nagar Kumaon, Uttarakhand; History of British Rule, Administration, Policies ,Revenue system  over Chamoli Garhwal, Nainital Kumaon, Uttarakhand; History of British Rule, Administration, Policies ,Revenue system  over Rudraprayag Garhwal, Almora Kumaon, Uttarakhand; History of British Rule, Administration, Policies ,Revenue system  over Dehradun , Champawat Kumaon, Uttarakhand ; History of British Rule, Administration, Policies, ,Revenue system  over Bageshwar  Kumaon, Uttarakhand ;
History of British Rule, Administration, Policies, Revenue system over Haridwar, Pithoragarh Kumaon, Uttarakhand;   


Bhishma Kukreti


Third Phase of Forest settlement in Garhwal and Kumaon
-   
                             British Administration in Garhwal   -119
       -
History of British Rule/Administration over Kumaun and Garhwal (1815-1947) -136
-

            History of Uttarakhand (Garhwal, Kumaon and Haridwar) -973
-
                              By: Bhishma Kukreti (History Student)

     Before 1915, the Garhwal hills forests were under ' reserved forests'  under district magistrate. In 1916, government employed forest officials for conservation of 2125 square miles Garhwal  hills forests. There was Hakaku (right) for villagers on their forests and the policy was beneficial to the villagers. However, due to government officers and workers there was dissatisfaction among villagers. There were difficulties for uneducated villagers for getting authorization in cutting trees etc. There was disturbance in India due to non-cooperative movement too.
   There were relaxations for villagers for fodders, cutting branches for fuel or sometimes whole tree too.  There forest destruction started after new policies.
In 1921, government accepted the suggestion of 'Kashtnivaran samiti' and kept the B grade forests under forest department but handed over A grade forest to revenue department. Therefore, there was control on villagers using forests as per their wishes. Villagers started cutting trees without any fear.
Copyright@ Bhishma Kukreti Mumbai, India, bckukreti@gmail.com 23/6/2017
History of Garhwal – Kumaon-Haridwar (Uttarakhand, India) to be continued... Part -974
-
*** History of British Rule/Administration over British Garhwal (Pauri, Rudraprayag, and Chamoli1815-1947) to be continued in next chapter
-
(The History of Garhwal, Kumaon, Haridwar write up is aimed for general readers)
XX   
References 
1-Shiv Prasad Dabral 'Charan', Uttarakhand ka Itihas, Part -7 Garhwal par British -Shasan, part -1, page- 287-312
2- Ibbetson, Revenue settlement of Garhwal district page 4

Xx

Forest settlement , History of British Rule, Administration , Policies, Revenue system,  over Garhwal, Kumaon, Uttarakhand ; Forest settlement , History of British Rule , Administration , Policies Revenue system  over Pauri Garhwal, Udham Singh Nagar Kumaon, Uttarakhand; History of British Rule, Administration, Policies ,Revenue system  over Chamoli Garhwal, Nainital Kumaon, Uttarakhand; Forest settlement ,  History of British Rule, Administration, Policies ,Revenue system  over Rudraprayag Garhwal, Almora Kumaon, Uttarakhand; History of British Rule, Administration, Policies ,Revenue system  over Dehradun , Champawat Kumaon, Uttarakhand ; History of British Rule, Administration, Policies, ,Revenue system  over Bageshwar  Kumaon, Uttarakhand ; Forest settlement ,
History of British Rule, Forest settlement ,  Administration, Policies, Revenue system over Haridwar, Pithoragarh Kumaon, Uttarakhand;   Forest settlement ,


Bhishma Kukreti


इन हाथों से क्या कर्रूँ ?
-   
यूँ हथुं से क्या करण ?

(Best  of  Garhwali  Humor , Wits Jokes , गढ़वाली हास्य , व्यंग्य )
  चबोड़ , चखन्यौ , ककड़ाट  :::   भीष्म कुकरेती   

--
                   मि राजस्थान्यूं , गुजरात्यूं अर गढ़वळ्यूं पार्टी मा नि जांदु अर कुछ ना कुछ बाना , बहाना एक्सक्यूज बणै दींदु जां से न्यूत दिंदेर रुसे नि जावन।  ना ना मि  इलै नि जांदू बल राजस्थान्यूं , गुजरात्यूं अर गढ़वळ्यूं पार्टी मा वेजिटेरियन फ़ूड मिल्दो।  ना भै ना आई चैरिस वेजिटेरियन फ़ूड।  मि तै वेजिटेरियन फ़ूड से क्वी परेज नी च।
   मि जब बि कै बड़ आदिमक पार्टी हो तो जांद छौ।  मि कै पंजाबी , कै सिंधी , कै पारसी या क्रिश्चियनाक ब्यौवक पार्टी म जाणम क्वी परहेज नि हूंद। पर बस राजस्थान्युं , गुजरात्युं अर गढ़वळ्यूं ब्यौ , बर्थडे , जणणि पार्टीम जाणम बड़ी औसंद आंद।  सबसे बड़ी परेशानी राजस्थान्युं , गुजरात्युं अर गढ़वळ्यूं  पार्ट्यूं मा मेकुण या हूंदी कि मि अपण हथुं से क्या कौरूं। हथुं से क्या कौरूं विषय ही मेरी बड़ी परेशानी च।
   मि मुंबई मा सतीश मोलासी (वीडिओकोन का भूतपूर्व डाइरेक्टर  ) , कन्हैयालाल बलोदी (भूतपूर्व मुंबई गार्डन कमिशनर  ) अर नानू गुप्ता (विजय सेल्स का मालिक ) आदि बढ़ आदिम्युं की बच्चों की शादी बड़ा होटलोम ह्वे।  पर सच्ची भुंदरा बौ क सौं मजा नि आयी।  जब कि हमर इक क्रिश्चियन चपड़ासी क बैणि ब्यो पार्टी जु छुट सि हॉल मा  छै उखमा भौत ही मजा ऐ।  नै नै इलै ना कि मोलासी , बलोदी अर गुप्ता जिक पार्टी वेजिटेरियन छे अर चपड़ासी क पार्टी नॉन वेजिटेरियन छे।  मेकुण वेजिटेरियन -नॉन वेजिटेरियन क्वी माने नि रखदन। मोलासी , बलोदी अर गुप्ता जिक पार्टीम मेरी समस्या छे कि मि अपण हथुं से क्या कौरूं, भगवान से पुछणु छौ कि यी हाथ के कामक छन ?  तो क्रिश्चियन की पार्टी मा मि भगवान से प्रार्थना करणु रौं कि मि द्वी हाथ किलै देन , चार हाथ किलै नि देन।
    असल म अजकाल होटल या पार्टी हौलुं मा सिगरेट बिलकुल बंद करे गे।  जु मि सिगरेट नि प्यों तो मेरी समज मा नि आंद कि मि यूं हथुं से क्या कौरूं।  जेबुंद कथगा दै हाथ रख सकद क्वी ? स्लिप पर खड़ हुयां क्रिकेटरों तरां हथ बोटिक कथगा समय तक रै सकदा तुम ?
   फिर राजस्थान्यूं , गुजरात्यूं अर गढ़वळ्यूं पार्टी मा शराब बि नि सर्व हूंदी।  जब ना तो शराब अर ना ही सिगरेट  पीऊं तो मेरी समझ म नि आंद कि भोजन से पैलि द्वी तीन घंटा मीन अपण हथुं से क्या करण ? सॉफ्ट ड्रिंक बि त एक या आधा गिलास पे सक्यांद अर फिर सॉफ्ट ड्रिंक कि गिलासड़ि कथगा देर तक हाथ मा पकड़े सक्यांद।  छी भै। 
  अहा जै ब्यौ मा (न्यूतेरो रात ना भै ) ड्रिंक हो सिगरेट हो अर मंचिंग , क्रंचिंग , चखना हो तो हर समय म्यार हथ व्यस्त रौंदन।  एक हाथ मा जब दारु गिलास , हैंक हाथ मा चखना , मुख मा जळी सिगरेट अर जीबि म चखना हो तो मगज बि व्यस्त ह्वे जांद।  हर समय हाथ अर मुख व्यस्त हूण से समय का पता ही नहीं चलता कि चार घंटे हो गए अभी तक होस्ट ने डिनर काल नहीं की। 
  तो या च राज कि मि ऊं पार्ट्यूं मा नि जांदू जौं पार्ट्यूं मा दारु नि हो अर सिगरेट अलाउड नि ह्वावो।  किलैकि मेरी समज मा नि आंद बल मि अपण हथुं से क्या कौरूं।


-
Copyright@ Bhishma Kukreti , Mumbai India ,  /6/ 2017
*लेख की   घटनाएँ ,  स्थान व नाम काल्पनिक हैं । लेख में  कथाएँ , चरित्र , स्थान केवल हौंस , हौंसारथ , खिकताट , व्यंग्य रचने  हेतु उपयोग किये गए हैं।
-
Best of Garhwali Humor Literature in Garhwali Language , Jokes  ; Best of Himalayan Satire in Garhwali Language Literature , Jokes  ; Best of  Uttarakhand Wit in Garhwali Language Literature , Jokes  ; Best of  North Indian Spoof in Garhwali Language Literature ; Best of  Regional Language Lampoon in Garhwali Language  Literature , Jokes  ; Best of  Ridicule in Garhwali Language Literature , Jokes  ; Best of  Mockery in Garhwali Language Literature  , Jokes    ; Best of  Send-up in Garhwali Language Literature  ; Best of  Disdain in Garhwali Language Literature  , Jokes  ; Best of  Hilarity in Garhwali Language Literature , Jokes  ; Best of  Cheerfulness in Garhwali Language  Literature   ;  Best of Garhwali Humor in Garhwali Language Literature  from Pauri Garhwal , Jokes  ; Best of Himalayan Satire Literature in Garhwali Language from Rudraprayag Garhwal  ; Best of Uttarakhand Wit in Garhwali Language from Chamoli Garhwal  ; Best of North Indian Spoof in Garhwali Language from Tehri Garhwal  ; Best of Regional Language Lampoon in Garhwali Language from Uttarkashi Garhwal  ; Best of Ridicule in Garhwali Language from Bhabhar Garhwal   ;  Best of Mockery  in Garhwali Language from Lansdowne Garhwal  ; Best of Hilarity in Garhwali Language from Kotdwara Garhwal   ; Best of Cheerfulness in Garhwali Language from Haridwar    ;गढ़वाली हास्य -व्यंग्य ,  जसपुर से गढ़वाली हास्य व्यंग्य ; जसपुर से गढ़वाली हास्य व्यंग्य ; ढांगू से गढ़वाली हास्य व्यंग्य ; पौड़ी गढ़वाल से गढ़वाली हास्य व्यंग्य ; Garhwali Vyangya, Jokes  ; Garhwali Hasya , Jokes ;  Garhwali skits , Jokes  ; Garhwali short Skits, Jokes , Garhwali Comedy Skits , Jokes , Humorous Skits in Garhwali , Jokes, Wit Garhwali Skits , Jokes 


Thanking You .
Jaspur Ka Kukreti

Bhishma Kukreti


                                Resettlement of Garhwal Forests

                             British Administration in Garhwal   -120
       -
History of British Rule/Administration over Kumaun and Garhwal (1815-1947) -137
-

            History of Uttarakhand (Garhwal, Kumaon and Haridwar) -974
-
                              By: Bhishma Kukreti (History Student)
                 
                                    Ganga Ji Forest Division
   Government declared Garhwal forests as reserved forest under article 24 of Indian Forest Code of 1878. Government prepared a list of villages come under forests.
In 1879, officials prepared maps showing forest land under Ganv Hakuk or village right but perhaps did not declared the boundaries.
  Including Karhitiya forest, there were six blocks under Ganga division –between Ramganga and Ganga Rivers. In 1879, officials included Saneh, Laldhang and Khara forests in Ganga Ji division. In 1880, government shifted Chandi block from Bijnor to Ganga Ji block. North border of Ganga Ji block was Talla Salan and Gangasalan and south border was Kandi Road.
   The area for Ganga Ji Division was 350 square miles or 224104 square acres. There were dense or scanty forests of Sal trees. The hills approaching towards north were containing Sal but south side forests were having Sal, Haldu, Dhaur, Shisham Jamun, Khair  and other trees. Bamboo trees were also there. However, people cut suitable trees. Deputy Conservator Harley in 1887, reported that people destroyed forests which were nearby markets. Harley stated that the forest as Kansur and Mandali block forest were safe because being far from markets.

         

XX   
References 
1-Shiv Prasad Dabral 'Charan', Uttarakhand ka Itihas, Part -7 Garhwal par British -Shasan, part -1, page- 287-312
2- Walton Garhwal Gazetteer page 11-12

Xx

Copyright@ Bhishma Kukreti Mumbai, India, bckukreti@gmail.com 24/6/2017
History of Garhwal – Kumaon-Haridwar (Uttarakhand, India) to be continued... Part -975
-
*** History of British Rule/Administration over British Garhwal (Pauri, Rudraprayag, and Chamoli1815-1947) to be continued in next chapter
-
(The History of Garhwal, Kumaon, Haridwar write up is aimed for general readers)

Forest settlement , History of British Rule, Administration , Policies, Revenue system,  over Garhwal, Kumaon, Uttarakhand ; Forest settlement , History of British Rule , Administration , Policies Revenue system  over Pauri Garhwal, Udham Singh Nagar Kumaon, Uttarakhand; History of British Rule, Administration, Policies ,Revenue system  over Chamoli Garhwal, Nainital Kumaon, Uttarakhand; Forest settlement ,  History of British Rule, Administration, Policies ,Revenue system  over Rudraprayag Garhwal, Almora Kumaon, Uttarakhand; History of British Rule, Administration, Policies ,Revenue system  over Dehradun , Champawat Kumaon, Uttarakhand ; History of British Rule, Administration, Policies, ,Revenue system  over Bageshwar  Kumaon, Uttarakhand ; Forest settlement ,
History of British Rule, Forest settlement ,  Administration, Policies, Revenue system over Haridwar, Pithoragarh Kumaon, Uttarakhand;   Forest settlement ,



Bhishma Kukreti


  Dr Umesh Chamola : A Multidimensional Garhwali Creative
-
by Sanjay chauhan
-

आज हम आपका परिचय करा रहे हैं डॉ. उमेश चमोला से । उमेश चमोला जिन्होंने  बरसों से मौजूद लोककथाओं को (जिन्हें हम लोग अपने बुजुर्गों से सुना करते थे) को संगृहित करके आखरों में आने वाली पीढ़ी के लिए संजो कर रखा, लोक की संस्कृति और परम्पराओं को सरल और सहज बनाकर लोक में लाये, लोक की बोली, भाषा और लोकजीवन से जुड़े छोटे छोटे, लेकिन अनछुये और महत्वपूर्ण प्रसंगो से लोक का परिचय कराया, लोक के प्रति लगाव आपको विरासत में मिला है। आपकी प्रतिभा के हर कोई मुरीद है, खुद की मेहनत से लोक में मुकाम प्राप्त किया, लोक में आखर का ज्ञान देने के साथ साथ ये लोक को परिभाषित करने वाली एक दर्जन से भी ज्यादा पुस्तकों का साक्षात्कार लोगों से करवा चुके हैं ।

डॉ. उमेश चमोला  रुद्रप्रयाग जनपद में मन्दाकिनी घाटी के मैखंडा परगने के कौशलपुर गांव (बसुकेदार) के रहने वाले हैं । मां राजेश्वरी देवी और पिता श्रीधर प्रसाद चमोला के घर १४ जून १९७३ को आपका जन्म हुआ ।  स्नातक, परास्नातक. एम एड, की पढाई आपने गढ़वाल विश्व विद्यालय श्रीनगर से प्राप्त की। यहीं आपने पत्रकारिता में स्नातक भी किया । पत्रकारिता में आपको विश्वविधालय द्वारा  रजत पदक भी दिया गया। १९९८  में आप बतौर शिक्षक राजकीय सेवा में आ गए। साइंस का छात्र और शिक्षक होते हुए भी लोक के प्रति जिज्ञाषा आपको विरासत में पिता श्रीधर प्रसाद चमोला से मिली। आप दर्जनों पुस्तकों का सम्पदान कर चुके हैं। आपके द्वारा लिखित किताब उत्तराखंड की लोक कथाओं में आपने जिस तरह से लोक में मौजूद कहानियों का समावेश किया है ।वह बेजोड़ है। ये कहानियां आज समाज से विदा हो चली हैं । डिजिटल युग में अब बच्चे इनसे दूर हो चले हैं। लेकिन, हमारी कई पीढ़ी इन्हीं कहानियों को सुनकर बड़ी हुई हैं। उस दौर में मोबाइल, टीबी, की जगह दादा-दादियों की यही कहानियां थी, जो न केवल मनोरंजन के साधन थे, अपितु इन कहानियों में समाज का ताना-बाना बुना हुआ होता था।  सामाजिक मूल्यों को प्रगाढ़ करती ये कहानियां बरसों से यहाँ के समाज का हिस्सा रही हैं। ये कहानियाँ अच्छे बुरे को चरितार्थ करती है, साथ ही सोचने के विस्तृत दायरे से रूबरू करवाती हैं।

उत्तराखंड की लोक कथाओं  में बंटवारा, ह्युंद के लिए, जय घोघा माता, तिस्मिली तिस तिस, काफल पाको मी नि चाखो, हल के स्यूं पर मछली सहित कुल ४२ कहानियां हैं। जो बरसों से उत्तराखंड के लोक में लोक कथाओं के रूप में मौजूद हैं। इन्हें दादा-दादी कथा काणी रात ब्याणी कहकर सुनाती थी, लेकिन आज फेसबुक, ट्वीटर, इंस्ट्राग्राम, विचेट, कार्टून के इस दौर में नौनिहालों के लिए ये पुस्तक किसी वरदान से कम नहीं है ।  इसके अलावा आपके द्वारा रास्ट्रदीप्ती, उमाल, आस पास विज्ञान, उत्तराखंड की लोक कथाएं भाग -१ और भाग-२, कचाकि- उपन्यास, फूल, धुरलोक से वापसी, पडवा बल्द नाम की किताब में ३२ गढ़वाली ब्यंग कवितायें, नानतिनो की सजोली –गढ़वाली-कुमाउनी बाल काब्य संग्रह जिसमें आपके और विनीता जोशी जी द्वारा होली, घिनुड़ी, किरमोड, बुरासं, हिंसोल, से लेकर घुघूती, फूल सगरान्द, सहित पहाड़ के हर उस बिंदु को उकेरा है, जो यहाँ के लोकजीवन के अभिन्न अंग हैं।  रचनाओ का १५ से भी अधिक रास्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में संकलन प्रकाशित हो चुका है।

इसके अलावा निरबिजू एक गढ़वाली उपन्यास है तो पथ्यला में २९ गीत और १३ कविताएँ है, जिसमे पथ्यला ( सूखे हुये पेड़ो के पतियाँ) को जिस अधभुत ढंग से उकेरा है ,वह वाकई काबिले तारीफ़ है, इसके अलावा आपकी गढ़वाली गीतों की एक एलबम "गों माँ" भी आ चुकी है। आपकी अंग्रेजी भाषा की पत्रिका लविंग सिस्टर में  बाल कहानियां प्रकाशित हो चुकी हैं। आप वर्तमान में राज्य शैक्षिक अनुसन्धान एवं प्रशिक्षण परिषद उत्तराखंड देहरादून में बतौर शिक्षक-प्रशिक्षक के पद पर कार्यरत हैं । उत्तराखंड विद्यालय शिक्षा द्वारा प्रकाशित पुस्तकों के संपादन और लेखन में भी आपकी सहभागिता होती है। वहीँ चन्द्र कुंवर बर्त्वाल, रविन्द्र नाथ टैगोर, महाकवि कालिदास, उत्तराखंड के लोकगीत, सहित अन्य विविध शोधपत्रों का प्रकाशन, लोकसंस्कृति, लोकसाहित्य के लिए दिये गए योगदान हेतु आपको विभिन्न मंचो से भी सम्मानित किया गया है । जिसमे ऋचा रचनाकार परिषद मध्य प्रदेश से भारत गौरव की मानद उपाधि.उत्तराखंड मिलन साहित्य सम्मान, छ्तीशगढ़ में साहित्य महिमा सम्मान, रास्ट्रीय बाल प्रहरी, रास्ट्रीय काब्य श्री एवं बाल प्रहरी सृजन श्री सम्मान, सहित पंजाब, उत्तरप्रदेश एवं दिल्ली की कई साहित्यक संस्थाओं से सम्मान भी मिल चुका है।

उमेश चमोला कहते हैं  कि जीवन में रचनात्मकता बहुत जरुरी है, इसके बिना जीवित मनुष्य भी मृत्यु तुल्य है, आगे कहते हैं की जीवन का महत्वपूर्ण मोड़ स्वजनों के प्रयासों से आई मृत्यु से साक्षत्कार है, जिसने मेरी जीवन का उद्देश्य ही बदल कर रख दिया, मेरे जीवन में मेरी माता और पिताजी का सबसे ज्यादा प्रभाव पड़ा है, उनके द्वारा दिखाए गए रास्ते का ही अनुकरण कर रहा हूँ, वर्तमान युवा पीढ़ी का अपनी मात्रभाषा, लोकसंस्कृति, परम्पराओं, से विमुख होना काफी तकलीफ देय है। यदि हमें अपनी लोकभाषा, लोकसंस्कृति को बचाए रखना है तो युवा पीढ़ी के युवाओं को अधिक से अधिक संख्या में आगे आना होगा।  जैसी आत्मीयता, और बैभवशाली हमारी संस्कृति और बोलियाँ है वैसी अन्यत्र नही, लोक से लगाव ने ही जीवन की दिशा और दशा बदल कर रख दी। कोशिस कर रहा हूँ की लोक का कुछ ऋण लौटा सकूँ और आने वाली पीढ़ी को कुछ दे सकूं।  वास्तव में यदि देखा जाय तो डॉ. उमेश चमोला जैसे लोग समाज के लिए किसी प्रेरणा से कम नहीं है। उन्होंने लोक, लोकभाषा, लोकसंस्कृति को अपनी लेखनी के द्वारा नया आयाम दिया है और लोक को नई पहचान दिलाई है। लोक के लिए समर्पित २५ बरसो से उनकी ये जात्रा आज भी बदस्तूर जारी है...।

संजय चौहान, बंड पट्टी,पीपलकोटी, चमोली

Thanking You .
Presented by Bhishma  Kukreti

Bhishma Kukreti


Interview with Garhwali creative Dr Umesh Chamola by Bhishma Kukreti 
बहुआयामी रचयिता डा उमेश चमोला से  भीष्म कुकरेती की बातचीत
(Critical and Chronological History of Garhwali Poetry, part – 167 )
भीष्म कुकरेती;-  आपना अब तक गढवाळी मा क्या क्या लेख अर कथगा कविता लेखी होला, आपक संक्षिप्त
जीवन
परिचय , सन गाँव , पट्टी , जिला , पढाई वर्तमान पता , फोन साहित्यक ब्यौरा आपक
                             साहित्य पर समीक्षकों कि राय.
उमेश चमोला –उमाळ(खंडकाव्य ) 2007,निरबिजू(उपन्यास ) 2012,कचाकी(उपन्यास ) 2014,पथ्यला(गीत–   कविता संगरौ) 2011,नान्तिनो सजोलि(गढ़वाली आर कुमाउनी संयुक्त बाल कविता संग्रह )2014, एक नाटक संग्रह अर उपन्यास प्रेस मा.पड़वा बल्द(व्यंग्य कविता संग्रह ) 2015.

                  गढ़वाली मा अब तक १०० से जादा कविता लेखि होलि.
        संक्षिप्त परिचय –
         जन्मदिवस –१४ जून एतवार,१९७३,
         गाँव –कौशलपुर,जिला रुद्रप्रयाग,उत्तराखण्ड.पट्टी-कालीपार मन्दाकिनी.
       शिक्षा –एम०एस-सी(वनस्पति विज्ञानं ),एम ०एड,पत्रकारिता स्नातक(रजत पदक ),डीफिल.
      u.chamola23@gmail.com
       वर्तमान पता –एस० सी० ई ० आर० टी उत्तराखंड,राजीव गाँधी नवोदय विद्यालय नालापानी देहरादून.
        साहित्यिक ब्यौरा –
       स्थानीय अर राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकों मा हिन्दी,अंगरेजी अर गढ़वाली मा रचनो कु प्रकाशन.
      हिन्दी बाल साहित्य –
    प्रकाशित किताबी-गढ़वाली से इतर -
   1- राष्ट्र्दीप्ति(राष्ट्रभक्ति पूर्ण हिन्दी गीत अर कवितो संग्रह )2-,फूल ( हिन्दी बाल कविता संग्रह ),3-पर्यावरण   
     शिक्षा पाठ्य सहगामी क्रियाकलाप4-आस-पास विज्ञानं (विज्ञानं आधारित कविता,कहानी अर पहेली संग्रह 
     ,धुरलोक से वापसी (विज्ञानं गल्प )प्रेस मा
      • उत्तराखण्ड विद्यालयी शिक्षा बटी प्रकाशित कक्षा 3 से 5 तके पर्यावरण पुस्तक 'हमारे आस =पास का     
        लेखन मा समन्वयन अर लेखन मंडल मा सामिल.

        • उत्तराखण्ड विद्यालयी शिक्षा बटी प्रकाशित कक्षा 6 से 8 तके हिन्दी पुस्तक मा वित्तीय साक्षरता पर     
          आधारित लिखी कहानी सामिल.

     लोकसाहित्य (हिन्दी ) –उत्तराखण्ड की लोककथाएँ द्वी खण्डों मा.
      शोधपत्र –(हिन्दी मा)
     1-चन्द्रकुंवर बर्त्वाल के साहित्य में प्रकृति चित्रण.
    2- चन्द्रकुंवर बर्त्वाल के साहित्य में विभिन्न युगीन प्रवृत्तियाँ.
   3-उत्तराखण्ड के लोकगीतों में सम सामयिक परिवेश.
   4-रवीन्द्र नाथ टैगोर के साहित्य के विविध पक्ष.
   5-कालिदास के साहित्य में गढ़वाल हिमालय का वर्णन.
    6-कालिदास के साहित्य में वनस्पति विज्ञान.
   7-उत्तराखण्ड की क्षेत्रीय भाषाओँ में बाल साहित्य.
   8-उत्तराखण्ड के संस्कार गीतों का साहित्यिक सौन्दर्य और इनके विकास में महिलाओं का योगदान.
    अन्य-
   • 'गौ मा' ऑडियो कैसेट से गढ़वाली गीतों प्रसारण.
    •  २० से जादा राष्ट्रीय संयुक्त संकलनो मा कवितो कु प्रकाशन.
  साहित्य पर समीक्षकों की राय –
   1-उत्तराखण्ड की लोककथाएँ ---
   डॉ चमोला की यह पुस्तक हालाँकि हिन्दी में ही लिखी गयी है किन्तु बहुत सारी कथाओं में उन्होंने   
   उत्तराखण्ड की स्थानीय बोलियों के शब्दों को भी पिरोया है जिस कारण यह पुस्तक हिन्दी भाषा के 
   शब्दकोष में अवश्य वृद्धि करेगी.
                                                                                 ------नवीन डिमरी 'बादल' नवल जनवरी –मार्च २०१४
    2 कचकी-
    • कचकी की भाषा बोलचाल की भाषा की गढ़वाली है.गढ़वाली न जानने वालों के लिए उपन्यास के परिशिष्ट   
     में कठिन शब्दों के हिन्दी अर्थ दिए गए हैं.संवाद पात्रानुकूल और उनकी मनोदशा प्रकट करने में सक्षम
      हैं.लोक में प्रचलित लोकोक्तियों और मुहावरों का भी यथा स्थान प्रयोग किया गया है.
                                                                ------हरि मोहन'मोहन' सम्पादक नवल ,अक्टूबर –दिसम्बर  २०१४
       • डॉ चमोला ने कचकी के संक्षिप्त कलेवर में आंचलिक संस्कृति के विभिन्न चरित्रों को प्रदर्शित करने में   
           गागर में सागर भरने जैसा कार्य किया है.       
                                                             -----डॉ सुरेन्द्र दत्त   सेमाल्टी,रीजनल रिपोर्टर जनवरी २०१५
               • यह गढ़वाली उपन्यास एक अत्यंत पठनीय,साहित्यिक कलाकारी से भरपूर एक उत्कृष्ट रचना है.यह   
                  गढ़वाली साहित्य का एक अमूल्य मोती है.इस रचना के बाद हम कह सकते हैं साहित्यिक प्रतिभा
                   के धनी डॉ उमेश चमोला जैसे साधक तपस्वी रचनाकारों की पीढी ही गढ़वाली भाषा को मानक
                 स्वरूप प्रदान करेगी.
                                                    -----------डॉ नागेन्द्र जगूड़ी 'नीलामबरम' उत्तराखण्ड स्वर अगस्त २०१५
         • The novel is interesting and moral oriented. There has been vacuum of novel writing in modern   
         Garhwali literature. Dr Umesh Chamola should be credited to fulfill the vacuum by publishing his second   
          novel in Garhwali.

                   -----Bhishm Kukreti, Bedupako.com
         3 –निरबिजू
        • इस उपन्यास में लेखक द्वारा प्रयुक्त मुहावरे जैसे बिस्या सर्प कि जिकुड़ी मा दया जरमी जौ त क्या   
           बात छ ?,माया कु सूरज उदै होण का दगडी अछ्लैगी छौ.,माया कु बाटू भौत संगुडू होंदु आदि से लेखक   
           पाठकों का ह्रदय जीतने में शत प्रतिशत सफल है.

                                           ------ डॉ नागेन्द्र जगूड़ी 'नीलामबरम' उत्तराखण्ड स्वर मई २०१३
     • लेखक द्वारा इस उपन्यास में प्राचीन कथा के बहाने आदर्श राज धर्म की व्याख्या करते हुए बताया गया 
     है की राजा के माया मोह में पड़कर राजधर्म से विमुख होने पर प्रजा तो दुखी होती ही है,धरती भी निरबिजू
      (बंजर ) हो जाती है.
                                             हरि मोहन'मोहन' सम्पादक नवल ,जनवरी –मार्च २०१३
         • The story construction is so tight and cryps that readers would like to read novel many times.The
          dialogues are small and very appropriate as per characters.
                     ------------Bhishm Kukreti March 2013,E magazine.
         • निरबिजू नौ कु यो उपन्यास उपन्यास तत्वों का आधार पर एक सफल उपन्यास छ.यो डॉ उमेश चमोला 
            कु पैलू उपन्यास छ पर कथा गठन अर उपन्यास शैली से इन नि लागुदु की उपन्यासकार एक नवाड़
              उपन्यासकार छ.उपन्यास विधा ते अगर क्वी अगने बढे सकदा त डॉ उमेश चमोला जन   
            युगसाहित्य्कार.
                                        ---डॉ नन्द किशोर ढोंडीयाल ,खबर सार फरवरी २०१३
      3 –नान्तिनों की सजोलि
       • 'नान्तिनों की सजोलि 'नामक इस गढ़वाली और कुमाउनी कविताओं के संग्रह को हम इन दोनों भाषाओँ 
           का प्रथम संयुक्त बाल कविता संग्रह कह सकते हैं .इस कविता संग्रह के सहृदय बाल कवि डॉ उमेश
         चमोला और कु विनीता जोशी की यह संयुक्त कृति अपने में अनोखी उत्तरांचल के ग्रामीण अंचलों की 
         भाषाओँ में रची गयी बाल कविताओं का सरस संग्रह है.इस मौलिक कृति में बाल मनोविज्ञान को दृष्टि
            में     रखकर रची गयी कवितायेँ हैं.
                                             -------------- डॉ नन्द किशोर ढोंडीयाल ,पुस्तक की भूमिका में.
     • डॉ उमेश चमोला ने गढ़वाली और विनीता जोशी ने कुमाउनी में अपनी २५ -२५ कविता रुपी पुष्प पुस्तक 
        में पिरोकर एक नया प्रयोग किया है.दोनों रचनाकारों ने स्वयं बालमन में उतरकर उनकी मानसिकता के
        अनुरूप रचनाएँ रची हैं.

                              ------ डॉ सुरेन्द्र दत्त सेमाल्टी,नवल जनवरी –मार्च जनवरी २०१५
             • Credit goes to 'Nantino ki sajoli' as first combined children poetry collection in history of Garhwali 
               and Kumauni literature. Garhwali poem in this volume are real sense the poem for children.
----------                                           --Bhishm Kukreti,Bedupako.com E magazine.
      4 – पड़वा बल्द
    • उमेश कि कवितों मा भौं भौं किस्मौ चबोड़ छन अर यी चस्केदार,चखन्यौरि कविता समाज   
      ,प्रशासन,राजनीति,भ्रस्टाचार,कुविचार,व्यभिचार,भल्तो बिगडैल्या, शिष्टाचार जन दोषों पर व्यंग्य रूपि चक्कु
      से चीरा लगान्दन.व्यंग्य कि असली रंगत तबि आंद जब बुले जाव कैकुण अर तीर चलन के हौर पर.जरा
        पडवा बल्द बांचो त आप भी मानी जौल्याबल उमेश कि तकनीक अन्तराष्ट्रीय स्तर की विश्व कवितों
           दगड प्रतियोगिता करणा छन.
                                             -------------भीष्म कुकरेती,पड़वा बल्द की भूमिका मा .
       • पड़वा बल्द में समाज और जीवन में व्याप्त असंगतियों और विसंगतियों को हास्य के साथ अभिव्यक्त   
         कर सुधार की दिशा में प्रेरित करने के लिए व्यंग्य का आश्रय लिया गया है.कवि के प्रत्येक व्यंग्य के
       पीछे व्यथा और आक्रोश और आदमी का आक्रोश छिपा है जो अपने चारों ओर व्यवस्था के नाम पर चल
         रही अव्यवस्था से पीढित व शोषित है और उसे बदलना चाहता है परन्तु उसके हाथ बंधे हुऐ हैं,ऐसे में
       उसका आक्रोश और असहायता व्यंग्य में बदल जाती है.प्रस्तुत संकलन के शीर्षक का चयन कवि की
        मौलिक प्रतिभा का प्रमाण है.आज घर ,परिवार,दफ्तर,समाज सब जगह पडवा बल्दों का ही वर्चस्व है.

                                  -------------------कृष्ण चन्द्र मिश्रा,'कपिल'नवल अप्रेल –जून २०१६
    भीष्म कुकरेती : आप कविता क्षेत्र मा किलै ऐन ?
     उमेश चमोला : कविता मीतै अपणा पिताजी से संस्कार मा मिलि. भौत छोटी क्लास बटिन मेरु कविता से
                            लग्यार व्हेगी छौ.शनिवारा दिन बालसभा होन्दी छै त बालसभा मा सुणोंण का वास्ता मी 
                          अप्नी कोर्से किताब से भैरे कविता अर गीत याद करदू छौ.मीते आज भी याद छ जबार मी

                         चारे क्लास मा पढ्धू छौ एक दौ मीन दीदी हिन्दी किताबे कविता याद करि अर बाल सभा मा
                       सुनै दीनि.हमारा गुरुजि भौत खुश व्हेन अर दगडया चक्कर मा पड़ी गेन.एक दिन एक अखबारा
                       पत्तर पर महात्मा गाँधी पर एक कविता छै छ्पी.मीन स्या कविता याद करीक द्वी अक्टूबरा
                         दिन सुने दीनि.या पांचवी क्लास्से छ्वीं छ.नौ की क्लास बटी मीते वाद-विवाद अर भाषनौ
                     चस्का लगी. ग्यारवीं क्लास्से बात होलि या.वादविवाद मा जू कविता मेरि छै छाणी स्या मी से
                      पैली वाला वक्तान बोल दीनि.तै दिन बाटी मीन सोचि कै भी भाषण मा मी अप्नी कविता ही 
                    सुणोलू . भाषण अर वाद विवाद का बीच –बीच मा अप्नी कविता लिखण अर ब्वन कु यो क्रम 
                    डिग्री कोलेजा तका कार्यक्रम मा भी जारी रे.भाषण का बीच –बीच मा ब्वन का वास्ता लिखी
                   कविता सरल अर विचार प्रधान होन्दी छै.कविता का बारा मा सुमित्रानंदन पन्त ज्यू कु विचार
                 'वियोगी होगा पहला कवि –तै मी एक अनुभूत सच मानदु.जीवन मा घोर असंदो यन बगत आई
                     जेन मीमु कविता सृजन करवाई. .
भीष्म कुकरेती : आपकी कविता पर कौं कौं कवियुं प्रभाव च ?
उमेश चमोला :  मी मालम नी च कि मेरि कवितों पर कौं कौं कवियुं कु प्रभाव च?ये बारा मा विद्वान समीक्षक
                      ही बते सकला.मी हाई स्कूल का बगत मा जयशंकर प्रसाद की कविता भौत स्वान्दी छै.बाद मा
                    प्रयोगवादी अर नई कवितों से परीचे व्हे.विद्वान समीक्षक मेरि गढ़वाली कवितों अर गीतों पर
                          हिन्दी काव्य अर गीत शैली कु प्रभाव बतोंदन.
भी.कु. : आपका लेखन मा भौतिक वातावरण याने लिखनो टेबल, खुर्सी, पेन, इकुलास, आदि को कथगा महत्व च ?
उमेश चमोला :यो मदि पेन अर यकुलांस कु महत्व मी जादा चितांदु.कविता कखी भी मन मा ऐ सकिदी.
भी.कु.: आप पेन से लिख्दान या पेन्सिल से या कम्पुटर मा ? कन टाइप का कागज़ आप तैं सूट करदन
             मतबल कनु कागज आप तैं कविता लिखण मा माफिक आन्दन?
उमेश चमोला :पैली दौ त कविता पेन से ही लिखुदु अर के भी कागज पर कविता लेख सकुदु.
भी.कु.: जब आप अपण डेस्क या टेबले से दूर रौंदा अर क्वी विषय दिमाग मा ऐ जाओ त क्या आप क्वी नॉट
             बुक दगड मा रखदां ?
उमेश चमोला : मी छोटू मोटू पैड या कागज सदनी दगड़ा मा लेक चल्दु.
भी.कु.: माना की कैबरी आप का दिमाग मा क्वी खास विचार ऐ जवान अर वै बगत आप उन विचारूं तैं लेखी
          नि सकद्वां त आप पर क्या बितदी ? अर फिर क्या करदा ?
उमेश चमोला :या स्थिति के कवि दगिडी घटि सकिदी.जब अफु मू कबि क्वी कागज नि रैंदु अर मन मा क्वी
          विचार या कविता की पंगति ऐ जांदी त मी तै बिचार या कविता पर इतगा मंथन करि देन्दु कि स्या
          बिसिर्या न जौ.के दौ मी कविता की पंगति या भाव हाथ मा लेख देन्दु.
भी.कु.: आप अपण कविता तैं कथगा दें रिवाइज करदां ?
उमेश चमोला :पैली दौ त कविता जे रूप मा औन्दी लेख देन्दु.बाद मा कविता तै साज संवार देन्दु.कबि कबि
             कविता की द्वी चार पंगति ऐ जांदी.के दिनों तलक स्या कविता अगने नि बडदि.के दौ अप्नी कविता
            तै दुबारा पढ़ण से हौर पंगति भी ऐ जांदी.यन करी द्वी –तीन दौ कविता रीवाइज व्हे जांदी.
भी.कु. क्या कबि आपन कविता वर्कशॉप क बारा मा बि स्वाच? नई छिंवाळ तैं गढवाळी कविता गढ़णो को
             प्रासिक्ष्ण बारा मा क्या हूण चएंद /आपन कविता गढ़णो बान क्वी औपचारिक (formal ) प्रशिक्षण ल़े च ?
उमेश चमोला :हर क्वी कविता नि लेख सकुदु पर कविता का कलापक्ष तै प्रशिक्षण से सजे संवार सकदान.जौ
              नान्तिनो रूचि कविता सृजन मा हो तौन्कु प्रशिक्षण हुन चैंद.जन कवि सम्मेलन,लोकभाषा उत्सव अर
             नाटक जन गतिविध्यों तै हम महत्व देंदा तनि लोकभाषा संस्थो तै कविता गढ़नो प्रशिक्षण करोण
            चैंद.हिन्दी   मा बाल साहित्य पर यन काम भौत च होणु,लोकभाषा मा कवि सम्मेलनों पर ही आयोजकों
             कु ध्यान छ.
मीन कविता गढ़नो बान कवी औपचारिक प्रशिक्ष्ण नि लीनि.
भी.कु.: हिंदी साहित्यिक आलोचना से आप की कवितौं या कवित्व पर क्या प्रभौ च . क्वी उदहारण ?

उमेश चमोला :हिन्दी साहित्य आलोचना कविता अर कवित्व तै नै दिशा देण कु काम करिदी.साहित्य आलोचना
                 से अलग –अलग बगत मा लिखी कवितो की युगीन प्रवृत्यों कु पता चलुदु.कवि तै अप्नी अर होरों
                   कवितो का तुलनात्मक अध्ययन मा सैता मिल्दी.जख तक मेरि कविता अर कवित्व पर हिन्दी
                    साहित्य आलोचनो प्रभाव कि बात छ त भौत पैली मी रस,छंद अर अलंकारों से सजी सवरी
                     कविता तै ही कविता चितोंदु छौ .साहित्य आलोचना अध्ययnaaना बाद मीते नई कविता कु अलग
                      शिल्प विधान अर बिम्ब कु पता चलि.तब अतुकांत शैली मा मी भी कविता रचण बैठ्यूँ.
भी.कु : आप का कवित्व जीवन मा रचनात्मक सूखो बि आई होलो त वै रचनात्मक सूखो तैं ख़तम करणों
               आपन क्या कौर ? (Here the poet took Sukho as happiness and not DRY days in the life of poet when he can't create poetry)
उमेश चमोला :जीवन की भौतिक समृधि अर आपाधापी का बगत रचनात्मक सुखो ऐ जांद.तै बगत मा लगुदु
              कि मीन पैली जू लेखि स्वो कनकै लेखि होलू ?पर हमतें स्वाध्याय तै बगत की चोरि करन सीखण
            चैंद.यन भी के दौ व्हे जान्द की कविता का सुखा का बगत मा हौर बौद्धिक काम हम करि सकदा.ये
               बगत मा गद्य मा हम काम करि सकदा.
भी.कु : कविता घड़याण मा, गंठयाण मा , रिवाइज करण मा इकुलास की जरुरत आप तैं कथगा हूंद ? एकांत
             जरुर चैंदु किलै की मन का जू तार छन वूँ थैं बाटोलाना जरुरी च तभी कुछ शब्दों कु भंडार खुल्दु .
उमेश चमोला : कविता घड़याण मा, गंठयाण मा , रिवाइज करण मा इकुलास की जरुरत

                पड़दि.जीवन का हौर काजो का बीच येका वास्ता हमते समय प्रबंधन औंण चयेंद.
भी.कु: इकुलास मा जाण या इकुलासी मनोगति से आपक पारिवारिक जीवन या सामाजिक जीवन पर क्या 
             फ़रक पोडद ? इकुलासी मनोगति से आपक काम (कार्यालय ) पर कथगा फ़रक पोडद ?
उमेश चमोला : घर गृहस्थी का बगत का बीच हमते बगत की चोरि करन औंण चयेंदु.या बात कार्यालय का
             काम काज पर भी लागु होन्दी.कार्यालयी काम का वास्ता जब यत –तत टूर पर जाण पड्दु त यात्रा कु
             इकुलांस काव्य सृजन कु बाटू खोल्दु.
भी.कु: कबि इन हूंद आप एक कविता क बान क्वी पंगती लिख्दां पं फिर वो पंगती वीं कविता मा प्रयोग नि
           करदा त फिर वूं पंगत्यूं क्या कर्द्वां ?
उमेश चमोला :इन के दौ होंदु.के दौ द्वी चार पंगति कविते लिखये जांदी.के दिनों तक कविता अगने नि
             बड़दि.मी यों कवितो तै लिखी धरदु अर बीच –बीच मा पढ्दी जांदू.के दौ यी कविता भौत बगत बाद
             अपणा पूरा रूप मा ऐ जांदी .
भी.कु :  जब कबि आप सीण इ वाळ हवेल्या या सियाँ रैल्या अर चट चटाक से क्वी कविता लैन/विषय आदि
                मन मा ऐ जाओ त क्या करदवां ?
उमेश चमोला : यन स्थिति मा उठी तै मी तीं कविता तै लेखि देन्दु फ्येर स्वनिंदु व्हे जांदू.
भी.कु: आप को को शब्दकोश अपण दगड रख्दां ?
उमेश चमोला :मीमू श्री कन्हैया लाल डडरियाल अर बीना बेंजवाल अर अरबिंद पुरोहित कु शब्दकोश
                  छ.शब्दकोष का बारा मा मेरु यो विचार छ कि हमतें कखी बटिन भी क्वी शब्द मिलि जांदू त हमते
              अप्नी डैरि मा नोट कर देण च्येन्द.सुबिरंण को खोजत फिरत कवि ,व्यभिचारी,चोर वालि बात मीते
                 सहि लगिदी.अपण शब्दकोश तै बडोनो तै हमते बगत बगत पर गौ का दाना स्यांनो से बातचित
                 करन च्येंदी.गढ़वाल का अलग –क्षेत्रों मा चलन मा अयाँ शब्दों कु प्रयोग हमते अपणा साहित्य मा
                   करन चयेंद.
भी.कु: हिंदी आलोचना तैं क्या बराबर बांचणा रौंदवां ?
उमेश चमोला :हाँ,हिन्दी की पत्र-पत्रिकों मा छ्प्यां आलोचनात्मक लेख पढ्नो मिलि जांदा.
भी.कु: गढवाळी समालोचना से बि आपको कवित्व पर फ़रक पोडद ?
उमेश चमोला :हाँ, समालोचना कविता का रूप तै निखार देन्दी.समालोचना से रचनाकार तै यु पता लगुदु की
            तैकि रचना कै स्तरे छन अर अगने क्या कन चयेंद? गढ़वाली मा अभि समालोचना पर काम कने जर्वत 
              छ.
भी.कु: भारत मा गैर हिंदी भाषाओं वर्तमान काव्य की जानकारी बान आप क्या करदवां ?
उमेश चमोला : कबि कबार जबरि गैर हिन्दी भाषों कि क्वी कितबी मिलि जांदी या तौंकी हिन्दी या अंग्रेजी मा
               टीका मिलि जांदी त गैर हिन्दी भाषों का साहित्य का मिजाजो पता चलि जांदू.
भी.कु : अंग्रेजी मा वर्तमान काव्य की जानकारी बान क्या करदवां आप?
उमेश चमोला : ये बारा मा मी क्वी खास जतन नि करदू.कबि अंग्रेजी मा लिख्युं क्वी आलेख पढ्नो मिलि
              जांदू त जानकारी भी मिलि जान्दी.
भी.कु: भैर देसूं गैर अंगरेजी क वर्तमान साहित्य की जानकारी क बान क्या करदवां ? या, आप यां से बेफिक्र
             रौंदवां
उमेश चमोला :भैर देसों ,गैर अंग्रेजी क वर्तमान साहित्य का बारा मा कबि इन्टरनेट से जानकारी ली देन्दु.कबि
             योकि हिदी मा टीका मिली त ये से भी पता चलि जांदू.
भी.कु:      भी.कु -आपन बचपन मा को को वाद्य यंत्र बजैन ?
उमेश :   उमेश चमोला -जिज्ञासावश ढोल,दमों अर बीनू बाजु थ्वडा-थ्वडा.



Thanking You .
Jaspur Ka Kukreti