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Articles By Bhisma Kukreti - श्री भीष्म कुकरेती जी के लेख

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, July 26, 2009, 12:54:53 PM

Bhishma Kukreti



कुरी /कुरु/ कड़वा इन्द्रजव   वनीकरण से स्वास्थ्य पर्यटन विकास

Indrajao shrub Plantation for Medical Tourism Development

औषधि पादप वनीकरण - 45
Medicinal Plant Community Forestation -45

उत्तराखंड में चिकत्सा पर्यटन  रणनीति - 149
Medical Tourism Development Strategies -149
उत्तराखंड पर्यटन प्रबंधन परिकल्पना - 252
Uttarakhand Tourism and Hospitality Management -252

आलेख : विपणन आचार्य
         भीष्म कुकरेती

लैटिन नाम -holarrhena pubescens
संस्कृत /आयुर्वेद नाम -इन्द्रयव , कुटज
सामान्य   नाम -कुरु , कुरी , इन्द्रजव
आर्थिक उपयोग ---
रंग
वनीकरण हेतु सुविधाजनक

-----औषधि उपयोग ---

रोग व पादप अंग जो औषधि में उपयोग होते हैं

जड़ छाल

पत्तियां

छाल



बीज
रोग जिनके निदान में पादप उपयोगी है
अमीबा जनित दस्त
मल में रक्तस्राव रोकथाम
बबासीर
त्वचा रोग - त्वचा फटने पर
मूत्र रोग , पथरीली जमीन किन्तु
गठिया आदि
ककफ , जुकाम

बाजार में उपलब्ध औषधि

पादप वर्णन
समुद्र तल से भूमि ऊंचाई मीटर  - ५०० से १५००
तापमान अंश सेल्सियस - २५ ३०।  युवा में ओस से बचाना आवश्यक किन्तु शहर रिकवरी
वांछित जलवायु वर्णन - शुष्क स्थान , पथरीली जमीन पानी या गदन किनारे
वांछित वर्षा mm - सामन्य भिलंगना घाटी आदि में
वृक्ष ऊंचाई मीटर - ३  तक किन्तु १० तक भी
तना गोलाई मीटर - २५ cm
छाल - मटमैली , हल्की पीली
टहनी - बहुतायत झाडी बनाने में कामगार
पत्तियां - मोमदार, हरी , लम्बी १० - २० cm लम्बी

फूल आकार व विशेषता -
फूल रंग - सफेद ५ दल वाले , आयु संग पीले होने लगते हैं
फल रंग -
फल आकार व विशेषता
बीज /गुठली विशेषता, आकार , रंग - बीज अंडाकार ९ -१६ mm लम्बे
फूल आने का समय  - पतझड़ के तुरंत बाद मानसून से पहले
बीज पकने का समय - दो तीन महीने में
बीज निकालने का समय - मानसून तक
बीज/गुठली  कितने समय तक अंकुरण हेतु क्रियाशील हो सकते हैं - तुरंत , एक साल के बाद से अंकुरण में कमी


संक्षिप्त कृषिकरण विधि -

नरसरी में बोते समय बीज अंतर -  cm
मिटटी में  बीज कितने गहरे डालने चाहिए - cm गहराई
नरसरी में अंकुर रोपण अंतर-
बीज बोन के बाद सिचाई क्रम -
अंकुरण समय -    २ -३ सप्ताह
नए नए बीजों का अंकुरण प्रतिशत बहुत अधिक होता है , सीधे मिटटी में बोया जाना सही विधि है , बीजों में १ मीटर दूरी वांछित दूरी है
टिस्यू कल्चर व कलम से भी संभव है किन्तु वनों में मानसून आते बीज छिड़कना अधिक सही

यह लेख औषधि पादप कृषिकरण /वनीकरण हेतु जागरण हेतु लिखा गया है अतः  विशषज्ञों , कृषि विद्यालय व कृषि विभाग की राय अवश्य लें

कृपया इस लेख का प्रिंट आउट ग्राम प्रधान व पंचायत को अवश्य दें


Copyright@ Bhishma Kukreti , 2018 , kukretibhishma@gmail.com

Medical Tourism Development in Uttarakhand , Medical Tourism Development in Garhwal, Uttarakhand , Medical Tourism Development in Kumaon Uttarakhand ,
Medical Tourism Development in Haridwar , Uttarakhand , Medicinal Tree Plantation for Medical Tourism Development in Garhwal, Medicinal Tree Plantation for Medical Tourism Development in Kumaon;  Medicinal Tree Plantation for Medical Tourism Development in Haridwar , Herbal Plant Plantation in Uttarakhand for Medical Tourism; Medicinal Plant cultivation in Uttarakhand for Medical Tourism, Developing Ayurveda Tourism Uttarakhand, गढ़वाल उत्तराखंड में स्वास्थ्य पर्यटन विकास ;हरिद्वार गढ़वाल उत्तराखंड में स्वास्थ्य पर्यटन विकास ;
पौड़ी गढ़वाल उत्तराखंड में स्वास्थ्य पर्यटन विकास ;चमोली गढ़वाल उत्तराखंड में स्वास्थ्य पर्यटन विकास ;रुद्रप्रयाग गढ़वाल उत्तराखंड में स्वास्थ्य पर्यटन विकास ; टिहरी गढ़वाल उत्तराखंड में स्वास्थ्य पर्यटन विकास ; उत्तरकाशी गढ़वाल उत्तराखंड में स्वास्थ्य पर्यटन विकास ;देहरादून गढ़वाल उत्तराखंड में स्वास्थ्य पर्यटन विकास ;  उधम सिंह नगर कुमाऊं , उत्तराखंड में स्वास्थ्य पर्यटन विकास ; नैनीताल कुमाऊं , उत्तराखंड में स्वास्थ्य पर्यटन विकास ; अल्मोड़ा कुमाऊं , उत्तराखंड में स्वास्थ्य पर्यटन विकास ; चम्पावत कुमाऊं , उत्तराखंड में स्वास्थ्य पर्यटन विकास ; पिथोरागढ़  कुमाऊं , उत्तराखंड में स्वास्थ्य पर्यटन विकास ;
Indrajao

Bhishma Kukreti



तूण वृक्ष  वनीकरण से स्वास्थ्य पर्यटन विकास

Red Cedar , Toon Tree Plantation for Medical Tourism Development

औषधि पादप वनीकरण -46
Medicinal Plant Community Forestation -46

उत्तराखंड में चिकत्सा पर्यटन  रणनीति -150
Medical Tourism Development Strategies -150
उत्तराखंड पर्यटन प्रबंधन परिकल्पना - 253
Uttarakhand Tourism and Hospitality Management -253

आलेख : विपणन आचार्य
          भीष्म कुकरेती

लैटिन नाम - Toona ciliata

सामान्य   नाम - तून , तूण
आर्थिक उपयोग ---
इमारती लकड़ी
रंग
गोंद

-----औषधि उपयोग ---
दस्त
त्वचा रोग
फोड़े साफ़ करने में
रोग व पादप अंग जो औषधि में उपयोग होते हैं



छाल

फूल
पत्तियां


पादप वर्णन
समुद्र तल से भूमि ऊंचाई मीटर  - ४०० -२८००
तापमान अंश सेल्सियस -१८ - ३४ किन्तु -3 c व 48 डिग्री सेल्सियस भी सह सकता है
वांछित जलवायु वर्णन - धूप पसंद , आद्रता पसंद
वांछित वर्षा mm- ११०० -3000 किन्तु ७०० -४५०० सहनशीलता
वृक्ष ऊंचाई मीटर - १० ३८ या कुछ अधिक ऊँचा
तना गोलाई मीटर -  २ तक जा सकता है
छाल -खुरदरी , पपड़ी युक्त
टहनी - गहन , शाखा युक्त
पत्तियां -टहनियों में
पत्तियां आकार , लम्बाई X चौड़ाई cm और विशेषता -
फूल आकार व विशेषता - हरे , आयु के साथ भूरे फल रंग -
फल आकार व विशेषता - गोल , पीलायी लिए सफेद छाल युक्त अंडाकार

बीज निकालने का समय - मानसून समय
बीज/गुठली  कितने समय तक अंकुरण हेतु क्रियाशील हो सकते हैं - एक साल किन्तु नए बीजों का अंकुरण प्रतिशत 85 प्रतिशत तक


संक्षिप्त कृषिकरण विधि -
अंकुरण समय ७- ८ दिन
नरसरी स्थान छायादार या धुपेली - बीज छाया में बोये जायँ तो बेहतर फल
नए नए बीजों को मानसून में   नरसरी या वनों में लाभदायी फल।  तने की कटाई करते रहना सही जिससे शाखा न पनपे और पेड़ लम्बा हो जाय
क्या वनों में सीधे बीज या पके फल छिड़के जा सकते हैं ?   हाँ सही।  गोबर गोले बनाकर अधिक  उत्पादक हो सकते हैं /अथवा  कटे-पके फलों व बीजों को नदी या गदनों, पर्वत श्रेणी से पानी बहाव में बहा देना श्रेयकर
तून  बीजों को जंगल में फेंकने से भी तून जम जाएंगे
वयस्कता समय वर्ष - ७ - ८

यह लेख औषधि पादप कृषिकरण /वनीकरण हेतु जागरण हेतु लिखा गया है अतः  विशषज्ञों , कृषि विद्यालय व कृषि विभाग की राय अवश्य लें

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Copyright@ Bhishma Kukreti , 2018 , kukretibhishma@gmail.com

Medical Tourism Development in Uttarakhand , Medical Tourism Development in Garhwal, Uttarakhand , Medical Tourism Development in Kumaon Uttarakhand ,
Medical Tourism Development in Haridwar , Uttarakhand , Medicinal Tree Plantation for Medical Tourism Development in Garhwal, Medicinal Tree Plantation for Medical Tourism Development in Kumaon;  Medicinal Tree Plantation for Medical Tourism Development in Haridwar , Herbal Plant Plantation in Uttarakhand for Medical Tourism; Medicinal Plant cultivation in Uttarakhand for Medical Tourism, Developing Ayurveda Tourism Uttarakhand, गढ़वाल उत्तराखंड में स्वास्थ्य पर्यटन विकास ;हरिद्वार गढ़वाल उत्तराखंड में स्वास्थ्य पर्यटन विकास ;
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Bhishma Kukreti



बांज वृक्ष  वनीकरण से स्वास्थ्य पर्यटन विकास

Blackjack Oak Tree Plantation for Medical Tourism Development

औषधि पादप वनीकरण -47
Medicinal Plant Community Forestation - 47

उत्तराखंड में चिकत्सा पर्यटन  रणनीति -151
Medical Tourism Development Strategies -151
उत्तराखंड पर्यटन प्रबंधन परिकल्पना - 254
Uttarakhand Tourism and Hospitality Management -254

आलेख : विपणन आचार्य
            भीष्म कुकरेती

लैटिन नाम - Quercus leucotrichophora , Quercus oblongata
संस्कृत /आयुर्वेद नाम - बांज
सामान्य   नाम - बांज , फनल
आर्थिक उपयोग ---
केवल पत्तियां चारा
कई काष्ठ वास्तु निर्माण ,
कृषि यंत्र के हत्थे आदि
जल रुकाव
चीड़ से हानि से रोकथाम , भूसंरक्षण
गोंद

-----औषधि उपयोग ---

रोग व पादप अंग जो औषधि में उपयोग होते हैं

गोंद

पत्तियां

छाल


फल

बीज
रोग जिनके निदान में पादप उपयोगी है
मूत्र रोग निदान
दांत दर्द
बबासीर
दस्त
पेट शूल निदान
गोनोरिया
स्वास
अपाचन निदान
टॉन्सिल में गार्गल प्रयोग
सर्प दंस
शारीरिक कमजोरी


बाजार में उपलब्ध औषधि

पादप वर्णन

समुद्र तल से भूमि ऊंचाई मीटर  - १००० से  २४००
तापमान अंश सेल्सियस - १५ से २४ कभी कभी ३०
वांछित जलवायु वर्णन - छायादार किन्तु  सामन्य शुष्क , ओस , बर्फ सहनशील
वांछित वर्षा mm- सामन्य
वृक्ष ऊंचाई मीटर -२५ -३०
तना गोलाई मीटर - . आधा तक जा सकता है
छाल -मटमैली खुरदरी
टहनी - पत्तियां व फूल टहनी पर लगती हैं , शाखाएं वाला वृक्ष
पत्तियां -सदाबहार , चमकीली , मोमदार जैसे , गहरी हरी , बाहर तीखे कोने
पत्तियां आकार , लम्बाई X चौड़ाई cm और विशेषता - ५ से १० cm लम्बी
फूल  विशेषता -सफेद, पिलाई लिए  -
फल  - गुठली जो एक कप से ढके होते हैं

बीज /गुठली विशेषता, आकार , रंग - मटमैले सफेद भूरे
फूल आने का समय - वसंत
फल पकने का समय - नवंबर मार्च किन्तु गुठली वृक्ष पर कई महीने तक रहती हैं
बीज निकालने का समय - तुरंत निकलकर बुवाई सही
बीज/गुठली  कितने समय तक अंकुरण हेतु क्रियाशील हो सकते हैं - एक साल


संक्षिप्त कृषिकरण विधि -
बांछित मिट्टी प्रकार pH आदि -अम्लीय , क्षार , बलुई
बीज बोन का समय - २४ घंटे पानी में भिगोकर मानसून , बीजों को सुखाना नहीं चाहिए व छाया में रखे जायँ ,    तोड़ने के तुरंत बाद बोये जाने चाहिए
नरसरी में बोते समय बीज अंतर -  cm  कम से कम ६ -१०
मिटटी में  बीज कितने गहरे डालने चाहिए - cm गहराई = १० cm
नरसरी में अंकुर रोपण अंतर-  ४  मीटर
बीज बोन के बाद सिचाई क्रम - सामन्य

रोपण हेतु गड्ढे मीटर    x  x कठिन होता है और एक या दो साल बाद बहुत ही कठिन
रोपण बाद सिचाई - सामन्य
नरसरी स्थान छायादार या धुपेली - शुरू में छाया
क्या कलम से वृक्ष लग सकते हैं ? हाँ
क्या वनों में सीधे बीज या पके फल छिड़के जा सकते हैं ? गोबर गोले बनाकर अधिक  उत्पादक हो सकते हैं /अथवा  कटे-पके फलों व बीजों को नदी या गदनों में बहा देना श्रेयकर , बांज को चरान , बीमारियों से बचाना आवश्यक
गिलहरी से बीज बचाने आवश्यक
वयस्कता समय वर्ष -१५ के बाद

यह लेख औषधि पादप कृषिकरण /वनीकरण हेतु जागरण हेतु लिखा गया है अतः  विशषज्ञों , कृषि विद्यालय व कृषि विभाग की राय अवश्य लें

कृपया इस लेख का प्रिंट आउट ग्राम प्रधान व पंचायत को अवश्य दें


Copyright@ Bhishma Kukreti , 2018 , kukretibhishma@gmail.com

Medical Tourism Development in Uttarakhand , Medical Tourism Development in Garhwal, Uttarakhand , Medical Tourism Development in Kumaon Uttarakhand ,
Medical Tourism Development in Haridwar , Uttarakhand , Medicinal Tree Plantation for Medical Tourism Development in Garhwal, Medicinal Tree Plantation for Medical Tourism Development in Kumaon;  Medicinal Tree Plantation for Medical Tourism Development in Haridwar , Herbal Plant Plantation in Uttarakhand for Medical Tourism; Medicinal Plant cultivation in Uttarakhand for Medical Tourism, Developing Ayurveda Tourism Uttarakhand, गढ़वाल उत्तराखंड में स्वास्थ्य पर्यटन विकास ;हरिद्वार गढ़वाल उत्तराखंड में स्वास्थ्य पर्यटन विकास ;
पौड़ी गढ़वाल उत्तराखंड में स्वास्थ्य पर्यटन विकास ;चमोली गढ़वाल उत्तराखंड में स्वास्थ्य पर्यटन विकास ;रुद्रप्रयाग गढ़वाल उत्तराखंड में स्वास्थ्य पर्यटन विकास ; टिहरी गढ़वाल उत्तराखंड में स्वास्थ्य पर्यटन विकास ; उत्तरकाशी गढ़वाल उत्तराखंड में स्वास्थ्य पर्यटन विकास ;देहरादून गढ़वाल उत्तराखंड में स्वास्थ्य पर्यटन विकास ;  उधम सिंह नगर कुमाऊं , उत्तराखंड में स्वास्थ्य पर्यटन विकास ; नैनीताल कुमाऊं , उत्तराखंड में स्वास्थ्य पर्यटन विकास ; अल्मोड़ा कुमाऊं , उत्तराखंड में स्वास्थ्य पर्यटन विकास ; चम्पावत कुमाऊं , उत्तराखंड में स्वास्थ्य पर्यटन विकास ; पिथोरागढ़  कुमाऊं , उत्तराखंड में स्वास्थ्य पर्यटन विकास ;

Bhishma Kukreti

         Bharat Chhodo Movement  in Garhwal
             British Administration in Garhwal   -345
       -
History of British Rule/Administration over Kumaun and Garhwal (1815-1947) -365

            History of Uttarakhand (Garhwal, Kumaon and Haridwar) -1201
          By:  Bhishma Kukreti (History Student)
Revolutionists took the leadership in 1942 movement at All India  level
The Bharat Chhodo Movement was strong in more in South Garhwal than other parts of Garhwal. In each area, a person or group was leading the movement by his/her own way . Dr Dabral published a pamphlet published on 8th August from mumbari reached to Garhwal within four five days. The request on pamphlet was as under –
" We were told that every community takes action in any day that action transforms the whole world. All India Congress committee took such decision. First Time, India decided that till it gets freedom , it will fight the battle . Every Indian child, old man , woman is freedom soldier. Might be that your leader would be put in jail before he communicates with you . Might be that British keeps Mahatma Gandhi far away from us.   You take your own decision and fight the war by your own conscious. Your step should be for getting freedom and not less than that . Win or death should be your aim . "
(Shiv Prasad Dabral, Uttarakhand ka Itihas , part 8 , page 284 )



Copyright@ Bhishma Kukreti, 2018
*** History of British Rule/Administration over British Garhwal (Pauri, Rudraprayag, and Chamoli1815-1947) to be continued in next chapter 1202
-
(The History of Garhwal, Kumaon, Haridwar write up is aimed for general readers)

History of British Garhwal, Education , Caste, History of Devalgarh Garhwal , ; History of Badhan Garhwal; Education , Caste History of Barasyun Garhwal; Education , Caste, History of Chandpur Garhwal; Education , Caste History of Chaundkot Garhwal; Education , Caste History of  Gangasalan Garhwal;  History of Mallasalan Garhwal;  Education , Caste, History of Tallasalan Garhwal; Education , Caste History of Dashauli Garhwal; Education , Caste, History of Nagpur Garhwal; Society  in British Garhwal. History of British Garhwal, History of Social Structure and Religious Faith in Chamoli Garhwal, History of Social Structure and Religious Faith of Pauri Garhwal ,  Education , Health, Social and Culture History of Rudraprayag Garhwal.








Bhishma Kukreti

         Pamphlets Distribution for Bharat Chhodo /Quit India Movement  in Garhwal
             British Administration in Garhwal   -346
       -
History of British Rule/Administration over Kumaun and Garhwal (1815-1947) -366

            History of Uttarakhand (Garhwal, Kumaon and Haridwar) -1202
          By:  Bhishma Kukreti (History Student)
      National Press Mumbai published  pamphlets instructing freedom fighters on 9th -10 August 1942. The said pamphlets were dispatched various parts of India. The senders dispatched pamphlets to Garhwal too  It was instructed for close down Hadtal on 14th August. There were 17 instructions for movement activists . Dr Dabral informed main instructions relevant for Garhwal .
1-Activist should declare Britain ! Quit India at all corners
2- Destroy all information medium as cut telephone , telegraph wires and railway communication medium.
3- Destroy transportation medium (government)
4-Boycott government works /administrative works too
5-Capture police stations , courts , kachhri  etc
6- burn government liquor shops
7- Students shuld stop going to schools , colleges nd work for freedom movement
   
There were other pamphlets reached Garhwal after a couple of days –
1-Don't do any government work in offices and break type writers etc
2- do breakdown in government vehicles or machines
3-police men should revolt
4-army men should do inside activities for freedom
5- destroy all communication and transport medium




Copyright@ Bhishma Kukreti, 2018
*** History of British Rule/Administration over British Garhwal (Pauri, Rudraprayag, and Chamoli1815-1947) to be continued in next chapter 1202
-
(The History of Garhwal, Kumaon, Haridwar write up is aimed for general readers)

History of British Garhwal, Education , Caste, History of Devalgarh Garhwal , ; History of Badhan Garhwal; Education , Caste History of Barasyun Garhwal; Education , Caste, History of Chandpur Garhwal; Education , Caste History of Chaundkot Garhwal; Education , Caste History of  Gangasalan Garhwal;  History of Mallasalan Garhwal;  Education , Caste, History of Tallasalan Garhwal; Education , Caste History of Dashauli Garhwal; Education , Caste, History of Nagpur Garhwal; Society  in British Garhwal. History of British Garhwal, History of Social Structure and Religious Faith in Chamoli Garhwal, History of Social Structure and Religious Faith of Pauri Garhwal ,  Education , Health, Social and Culture History of Rudraprayag Garhwal.









Bhishma Kukreti



काफल    वनीकरण से स्वास्थ्य पर्यटन विकास

Box Berry , Kafal Tree Plantation for Medical Tourism Development

औषधि पादप वनीकरण - 48
Medicinal Plant Community Forestation - 48

उत्तराखंड में चिकत्सा पर्यटन  रणनीति - 152
Medical Tourism Development Strategies -152
उत्तराखंड पर्यटन प्रबंधन परिकल्पना - 255
Uttarakhand Tourism and Hospitality Management - 255

आलेख : विपणन आचार्य
          भीष्म कुकरेती

लैटिन नाम - Myric Nagi
संस्कृत /आयुर्वेद नाम -कठफल
सामान्य   नाम - काफल
आर्थिक उपयोग ---
फल
लकड़ी
भूसंरक्षण

-----औषधि उपयोग ---

रोग व पादप अंग जो औषधि में उपयोग होते हैं

जड़ें

पत्तियां

छाल

फूल

फल

बीज
रोग जिनके निदान में पादप उपयोगी है
दस्त
रक्त कमी
स्वास
कफ
बुखार
बबासीर
यकृत समस्याएं
नजले में नासिका बंद खोलना
गले की खरास
घाव भरान , ट्यूमर
कई औसधि में माध्यम आदि
जलन कम करने हेतु
योनि रोग जैसे ल्यूकोरिया
कमजोर दांत रक्षा
ऊर्जा दायक
बाजार में उपलब्ध औषधि

पादप वर्णन

समुद्र तल से भूमि ऊंचाई मीटर  - ३०० से २५००
वांछित जलवायु वर्णन -नम भूमि , शीषक जलवायु , अर्ध छायादार स्थल , चुना रहित भूमि
वांछित वर्षा mm - उत्तराखंड की सामन्य वारिश , तेज हवा सहनशील
वृक्ष ऊंचाई मीटर - १२
तना गोलाई मीटर - आधा मीटर तक जा सकता है
छाल -चिकनी किन्तु करकरी
टहनी - फूल पत्तों हेतु
पत्तियां - मोमयुक्त , हरा रंग

फूल रंग - सफेद व लाल
फल रंग -हरा फिर पक ककर गुलाबी , भूरे लाल कभी पील
बीज /गुठली विशेषता, आकार , रंग - गुठली , गुदा बहुत ही कोमल
फूल आने का समय = फरवरी अप्रैल
फल पकने का समय - अप्रैल कभी कभी मई
बीज निकालने का समय - तुरंत
बीज/गुठली  कितने समय तक अंकुरण हेतु क्रियाशील हो सकते हैं


संक्षिप्त कृषिकरण विधि -
बांछित मिट्टी प्रकार pH आदि -अम्लीय व क्षारीय
वांछित तापमान विवरण -पहाड़ी क्षेत्र १००० मीटर  के ऊपर
बीज बोन का समय - मानसून
सभी प्रकार की मिटटी किन्तु चुना रहित।  कलम से भी रोपण की रिपोर्ट मिलती हैं

क्या वनों में सीधे बीज या पके फल छिड़के जा सकते हैं ? गोबर गोले बनाकर अधिक  उत्पादक हो सकते हैं /
वयस्कता समय वर्ष - देरी से
व्यापारिक रूप से कृषिकरण की कोई रिपोर्ट उपलब्ध नहीं है

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पौड़ी गढ़वाल उत्तराखंड में स्वास्थ्य पर्यटन विकास ;चमोली गढ़वाल उत्तराखंड में स्वास्थ्य पर्यटन विकास ;रुद्रप्रयाग गढ़वाल उत्तराखंड में स्वास्थ्य पर्यटन विकास ; टिहरी गढ़वाल उत्तराखंड में स्वास्थ्य पर्यटन विकास ; उत्तरकाशी गढ़वाल उत्तराखंड में स्वास्थ्य पर्यटन विकास ;देहरादून गढ़वाल उत्तराखंड में स्वास्थ्य पर्यटन विकास ;  उधम सिंह नगर कुमाऊं , उत्तराखंड में स्वास्थ्य पर्यटन विकास ; नैनीताल कुमाऊं , उत्तराखंड में स्वास्थ्य पर्यटन विकास ; अल्मोड़ा कुमाऊं , उत्तराखंड में स्वास्थ्य पर्यटन विकास ; चम्पावत कुमाऊं , उत्तराखंड में स्वास्थ्य पर्यटन विकास ; पिथोरागढ़  कुमाऊं , उत्तराखंड में स्वास्थ्य पर्यटन विकास ;

Bhishma Kukreti


  अन्यार वनीकरण से स्वास्थ्य पर्यटन विकास

Oval Leaved Lyonia/ड Drude Tree Plantation for Medical Tourism Development

औषधि पादप वनीकरण -  49
Medicinal Plant Community Forestation -49

उत्तराखंड में चिकत्सा पर्यटन  रणनीति -253
Medical Tourism Development Strategies -153
उत्तराखंड पर्यटन प्रबंधन परिकल्पना - 256
Uttarakhand Tourism and Hospitality Management -256

आलेख : विपणन आचार्य
          भीष्म कुकरेती

लैटिन नाम -Lyonia ovalifolia
संस्कृत /आयुर्वेद नाम -
सामान्य   नाम - अन्यार , अंगेरी ,
आर्थिक उपयोग ---
वस्तुतः अनुउपयोगी
लकड़ी का धुंवा आँखों हेतु घातक
लकड़ी बड़ी कमजोर

-----औषधि उपयोग ---

रोग व पादप अंग जो औषधि में उपयोग होते हैं



पत्तियां




रोग जिनके निदान में पादप उपयोगी है
त्वचा रोग
वाह्य कृमि या परजीवियों को समाप्ति हेतु आदि
बाजार में उपलब्ध औषधि

पादप वर्णन

समुद्र तल से ऊंचाई - 1200 -2500  मीटर तक हिमालयी जलवायु
वांछित जलवायु वर्णन - नम व अर्ध छायादार
वांछित वर्षा mm- बांज , चीड़ के साथ जंगलों में
वृक्ष ऊंचाई मीटर - २-३
छाल -भूरी , पतली स्ट्रिप में निकलती रहती है
टहनी -छोटी
पत्तियां -
पत्तियां आकार , लम्बाई X चौड़ाई cm और विशेषता -अंडाकार , अंत कोनेदार  5 -15 cm लम्बी
फूल आकार व विशेषता - सफेद बहुत अधिक , रोंयेदार

फूल आने का समय - ग्रीष्म

बीज निकालने का समय - अगस्त से दिसम्बर
बीज/गुठली  कितने समय तक अंकुरण हेतु क्रियाशील हो सकते हैं


संक्षिप्त कृषिकरण विधि -
बांछित मिट्टी प्रकार pH आदि - अम्लीय चुना रहित
वांछित तापमान विवरण - पहाड़ी क्षेत्र की सामन्य जलवायु
बीज बोन का समय - ग्रीष्म या मानसून
नरसरी में चाडार या अर्ध छायादार स्थिति में , अंकुरों को  ओस /बर्फ से बचाना आवश्यक।  जब अंकुर बड़े हो जाय तो स्थायी स्थान पर रोपण लगाई जानी चाहिए , कलम मानसून में लगाई या पैदा की जाती है
क्या वनों में सीधे बीज या पके फल छिड़के जा सकते हैं ? हाँ गोबर गोले बनाकर अधिक  उत्पादक हो सकते हैं /अथवा  कटे-पके फलों व बीजों को नदी या गदनों में बहा देना श्रेयकर


यह लेख औषधि पादप कृषिकरण /वनीकरण हेतु जागरण हेतु लिखा गया है अतः  विशषज्ञों , कृषि विद्यालय व कृषि विभाग की राय अवश्य लें

कृपया इस लेख का प्रिंट आउट ग्राम प्रधान व पंचायत को अवश्य दें


Copyright@ Bhishma Kukreti , 2018 , kukretibhishma@gmail.com

Bhishma Kukreti


मेळू   वनीकरण से स्वास्थ्य पर्यटन विकास

Himalayan Pear  , Indian Wild Pear Tree Plantation for Medical Tourism Development

औषधि पादप वनीकरण -
Medicinal Plant Community Forestation -

उत्तराखंड में चिकत्सा पर्यटन  रणनीति -
Medical Tourism Development Strategies -
उत्तराखंड पर्यटन प्रबंधन परिकल्पना -
Uttarakhand Tourism and Hospitality Management -

आलेख : विपणन आचार्य भीष्म कुकरेती

लैटिन नाम -Prunus pushia
संस्कृत /आयुर्वेद नाम - अमृतफल
सामान्य   नाम -मेळू , मयल
आर्थिक उपयोग ---
लकड़ी
कृषि यंत्र हेतु लकड़ी
भूसंरक्षण
कहीं कहीं फल की सब्जी भी

-----औषधि उपयोग ---

रोग व पादप अंग जो औषधि में उपयोग होते हैं
फल


रोग जिनके निदान में पादप उपयोगी है
दस्त
जानवरों के आँख पुतली हेतु
बाजार में उपलब्ध औषधि

पादप वर्णन

समुद्र तल से भूमि ऊंचाई मीटर  - 750 -2700
तापमान अंश सेल्सियस -
वांछित जलवायु वर्णन -  धूप पसंद किन्तु अर्ध छाया सहन  है
वांछित वर्षा mm
वृक्ष ऊंचाई मीटर -9
तना गोलाई मीटर -  आयु अनुसार
छाल -मटमैली
टहनी - पत्ती , फूल व फल हेतु
पत्तियां -
पत्तियां आकार , लम्बाई X चौड़ाई cm और विशेषता - 5 -10  cm लम्बी अंडाकार चमकीली
फूल आकार व विशेषता -
फूल रंग -गुच्छों में
फल रंग - भूरा ,
फल आकार व विशेषता - गोल
बीज /गुठली विशेषता, आकार , रंग -फल ही ,  गुठली में 5  भूरे बीज
फूल आने का समय - अप्रैल
फल पकने का समय - नवंबर दिसंबर
बीज निकालने का समय - तुरंत
बीज/गुठली  कितने समय तक अंकुरण हेतु क्रियाशील हो सकते हैं - एक साल तक किन्तु भण्डारकृत बीज अंकुरण में समय लेते हैं एक बार शीत तापमान आवश्यक


संक्षिप्त कृषिकरण विधि -
बांछित मिट्टी प्रकार pH आदि -अम्लीय से क्षारीय
वांछित तापमान विवरण - 15 से २० डिग्री सेल्सियस
बीज बोन का समय - बीज निकालने के तुरंत बाद

नरसरी स्थान छायादार या धुपेली - पहले पफल अर्ध छाया , गर्मियों में रोपण किया जाता ह
क्या कलम से वृक्ष लग सकते हैं ? हाँ जड़ों से भी
क्या वनों में सीधे बीज या पके फल छिड़के जा सकते हैं ? गोबर गोले बनाकर अधिक  उत्पादक हो सकते हैं /अथवा  कटे-पके फलों व बीजों को नदी या गदनों में बहा देना श्रेयकर
वयस्कता समय वर्ष -

यह लेख औषधि पादप कृषिकरण /वनीकरण हेतु जागरण हेतु लिखा गया है अतः  विशषज्ञों , कृषि विद्यालय व कृषि विभाग की राय अवश्य लें

कृपया इस लेख का प्रिंट आउट ग्राम प्रधान व पंचायत को अवश्य दें


Copyright@ Bhishma Kukreti , 2018 , kukretibhishma@gmail.com

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Bhishma Kukreti


       गुप्त काल में जैन धर्म

       Jainism in Gupta Era in context History of Haridwar,  Bijnor,   Saharanpur
                   
                         
    हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग - 249                 


                                               इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती

जैन धर्म इतिहास में गुप्त काल का विशेष महत्व है।  गुप्त काल में जैन धर्मावलम्बियों के मथुरा व बल्लभी में दो महत्वपूर्ण सम्मेलन हुए।  इन सम्मेलनों ने धर्म हेतु लिखित साहित्य को सही किया या मतभेद दूर किये।  गुप्त काल में ही जैन धर्म पंडितों ने कई ग्रंथों की रचना संस्कृत में की। जैन दर्शन , जैन न्याय आदि की व्याख्या आदि   की दें है।  इन पंडितों में निर्युक्ति , उमास्वाति , सिद्धसेन , प्रमुख हैं।
    इस काल में जैन धर्म का प्रसार बंगाल , मैसूर , मथुरा , बल्लभी, तामिलनाडु  आदि क्षेत्रों में खूब हुआ।  वैसे जैन धर्म का प्रभाव हर तबके पर भी पड़ा। 
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   History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur  to be continued Part  --

हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास  to be continued -भाग -


      Ancient  History of Kankhal, Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient History of Har ki Paidi Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient History of Jwalapur Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient  History of Telpura Haridwar, Uttarakhand  ;   Ancient  History of Sakrauda Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient  History of Bhagwanpur Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient   History of Roorkee, Haridwar, Uttarakhand  ;  Ancient  History of Jhabarera Haridwar, Uttarakhand  ;   Ancient History of Manglaur Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient  History of Laksar; Haridwar, Uttarakhand ;     Ancient History of Sultanpur,  Haridwar, Uttarakhand ;     Ancient  History of Pathri Haridwar, Uttarakhand ;    Ancient History of Landhaur Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient History of Bahdarabad, Uttarakhand ; Haridwar;      History of Narsan Haridwar, Uttarakhand ;    Ancient History of Bijnor;   seohara , Bijnor History Ancient  History of Nazibabad Bijnor ;    Ancient History of Saharanpur;   Ancient  History of Nakur , Saharanpur;    Ancient   History of Deoband, Saharanpur;     Ancient  History of Badhsharbaugh , Saharanpur;   Ancient Saharanpur History,     Ancient Bijnor History;
कनखल , हरिद्वार  इतिहास गुप्त काल ; तेलपुरा , हरिद्वार  गुप्त काल इतिहास ; सकरौदा ,  हरिद्वार  गुप्त काल इतिहास ; भगवानपुर , हरिद्वार  गुप्त काल इतिहास ;रुड़की ,हरिद्वार गुप्त काल इतिहास ; झाब्रेरा हरिद्वार  इतिहास ; मंगलौर हरिद्वार  गुप्त काल इतिहास ;लक्सर हरिद्वार  इतिहास ;सुल्तानपुर ,हरिद्वार  इतिहास ;पाथरी , हरिद्वार  गुप्त काल इतिहास ; बहदराबाद , हरिद्वार  गुप्त काल इतिहास ; लंढौर , हरिद्वार  इतिहास ;ससेवहारा  बिजनौर , बिजनौर इतिहास; नगीना ,  बिजनौर गुप्त काल   इतिहास; नजीबाबाद , नूरपुर , बिजनौर गुप्त काल इतिहास;सहारनपुर इतिहास; देवबंद सहारनपुर गुप्त काल इतिहास , बेहत सहारनपुर गुप्त काल इतिहास , नकुर सहरानपुर गुप्त काल इतिहास Haridwar Itihas, Bijnor Itihas, Saharanpur Itihas

Bhishma Kukreti


मेडिकल टूरिज्म /टूरिज्म विकास हेतु निवेशक सम्मेलन का महत्व व लाभ

Importance of Investors Summit in Medical Tourism Development

औषधि पादप वनीकरण -51
Medicinal Plant Community Forestation -51

उत्तराखंड में चिकत्सा पर्यटन  रणनीति - 155
Medical Tourism Development Strategies -155
उत्तराखंड पर्यटन प्रबंधन परिकल्पना - 258
Uttarakhand Tourism and Hospitality Management -258

आलेख : विपणन आचार्य भीष्म कुकरेती

  आगामी अक्टूबर में उत्तराखंड राज्य सरकार इन्वेस्टर्स सम्मिट आयोजित करने जा रही हैं।  उत्तराखंड सरकारों को जो आयोजन  सन 2001 में कर लेना चाहिए था वह अब होने जा रहा है।  निवेशक सम्मेलन उत्तराखंड सरीखे राज्य हेतु परमावश्यक है।
निवेशक सम्मेलन अर्थात संभावित निवेशकों को एक साथ औपचारिक रीति से बुलाकर स्थल /राज्य /देस की वस्तुस्थिति व देस /स्थल में सुविधाओं व निवेशकों को निवेश लाभ बताकर निवेशकों को स्थल /देस में निवेश हेतु प्रेरित करना।  निवेशक सम्मेलन निम्न प्रकार के होते हैं -
आम निवेशक सम्मेलन - जिसमे सभी प्रकार के निवेशकों को आमंत्रित जाता है और कई तरह के उद्योगों में निवेश हेतु संभावित निवेशकों को निवेशार्थ प्रेरित  किया जाता है। अधिकतर ऐसे सम्मेलन बड़े स्तर पर होते हैं

विशेष निवेशक सम्मेलन - ऐसे सम्मेलनों में विशेष उद्यम विकास हेतु विशेष निवेशकों को आमंत्रित किया जाता है जैसे मेडिकल टूरिज्म विकास हेतु हॉस्पिटल निवेशक या होटल निवेशक या औसधि पादप उत्पादक निवेशक का विशेष सम्मेलन।  ऐसे सम्मेलन अधिक प्रभावशाली होते हैं विशेष निवेशकों के साथ अनुपूचारिक स्तर पर भी खुल कर बातचीत होती है

अति विशेष  निवेशक सम्मेलन - ऐसे सम्मेलन किसी विशेष स्थल/प्रोडक्ट  विकास हेतु  विशेष निवेशकों की मीटिंग तय की जाती है जैसे परिहवहन निवेशक मीट्स  , बैंकर्स मीटिंग , टिहरी झील हेतु विशेष जल मनोरंजन निवेशकों की मीटिंग आदि।
   प्रत्येक राज्य या टूरिज्म विभाग उपरोक्त तीनो प्रकार के सम्मेलन करता रहता है।
  निवेशक सम्मेलनों से मेडिकल टूरिज्म या टूरिज्म विकास को निम्न लाभ मिलते हैं -

         विज्ञापन करने का सकारात्मक अवसर

आम तौर पर विज्ञापनों पर लोग कम भरोसा करते हैं किन्तु जब निवेशक सम्मेलन हेतु विज्ञापन किये जाते हैं तो लोगों को विज्ञापन पर भरोसा होने लगता है।

        प्रचार से जनसंपर्कीय  लाभ

    निवेशक सम्मेलन हेतु चौतरफा प्रचार हेतु प्रेस कॉन्फरेंसेज करने पड़ते हैं और पत्र -पत्रिकाओं में समाचार जनसम्पर्कीय प्रचार प्रसार का माध्यम बनते हैं।  समाचार  विज्ञापन से अधिक कामगार साबित होते हैं। जैसे उत्तराखंड मुख्यमंत्री श्री त्रिवेंद्र रावत द्वारानिवेश सम्मेलन हेतु विदेशी राजदूतों से मिलने से कई देशों में निवेशकों को उत्तराखंड के बारे में नई सूचना मिली होगी

       सोये हुए निवेशकों का जागरण
  कई निवेशकों के पास निवेश हेतु धन होता है किन्तु ऐसे निवेशक किसी विशेष अवसर की तलाश में रहते हैं ऐसे निवेशक सूचना पाकर निवेश करते हैं।  वेंचर इन्वेस्टर्स ऐसे ही निवेश करते रहते हैं।

     सप्लायर्स प्रेरित हो जाते हैं
मेडिकल टूरिज्म या पर्यटन हेतु कई प्रकार के सप्लायर्स की आवश्यकता होती है निवेशक सम्मेलनों के प्रचार प्रसार से ऐसे कई सप्लायर्स सामने आते हैं जो किसी कारण वस छुपे रह जाते थे।

  आंतरिक भागीदारों में स्फूर्ति
वाह्य निवेशकों के सम्मेलन से आंतरिक भागीदार (stakeholders ) भी स्फूर्तिवान हो जाते हैं।

   आंतरिक भागीदार  द्वारा  ज्वाइंट वेंचर की खोज
यदि राज्य कोई विशेष कार्य न करे तो आंतरिक भागिदार भी सोये से रहते हैं किन्तु जब राज्य सरकार ऐसे निवेशक सम्मेलन करती है तो आंतरिक भागीदार भी वाह्य भागीदारों के साथ ज्वाइंट ववेंचर हेतु नए जोड़ीदार (वेंचर कैपिटलिस्ट्स ) की खोज में निकल पड़ते हैं जैसे कोई डाक्टर मैक्स हॉस्पिटल के साथ ज्वाइंट वेंचर करने को लालायित हो जाते हैं , मध्यम होटल पांच तारा होटल हेतु नए वेंचर कैपिटलिस्ट को ढूंढता है आदि


      आम जनता में उत्साह
निवेशक सम्मेलन से आम जनता में उत्साह वृद्धि होने से जनता टूरिज्म की और जागृत हो पाती है और स्वयं भी निवेश करने लगती है।

प्रशासनिक तंत्र में जागरण
निवेश सम्मेलन से प्रशासन तंत्र भी क क्रियाशील हो जाता है। राजनैतिक , सामजिक स्तर पर भी क्रियाशीलता आ जाती है.

  निवेशकों के मध्य जागृति
निवेशक सम्मेलन से विज्ञापन व अन्य जनसम्पर्किय माध्यमों से संभावित निवेशकों को कई प्रकार की जानकारी मिलती है और निवेहक निवेश हेतु प्रेरित होते हैं

     निवेशकों को त्वरित जानकारी मिलना
सम्मेलन में संभावित निवेशकों की कई प्रकार की भ्रान्ति टूट जाती है और निवेश द्वार खुल जाते हैं

     राज्य को निवेशिकों की मानसिकता से रूबरू होना
  राज्य अधिकारी , राजनीतिज्ञ निवेशकों की मानसिकता से वन टु वन बातचीत से निवेशक की वास्तविक मानसिकता से रूबरू हो जाते हैं और भविष्य में निवेश में रोधक कारकों को हटाते हैं . निवेशक कई तरह की जानकारी अधिकारियों व राजनीतिज्ञों को देते हैं जो प्रशासन के लिए लाभदायी सिद्ध होता है याने मार्किट रिसर्च भी साथ साथ हो जाती है।  कई तरह के पेंच भी इस दरमियान हटाए जाते हैं

    निवेशकों का आपस में बातचीत
यदि राज्य की नीति उद्यम जगत हेतु सही नीति हों तो निवेशक आपस में सकारात्मक छवि बना लेते हैं और नए निवेश के द्वार खुल जाते हैं

      त्वरित या दूरगामी परिणाम
निवेश सम्मेलन में त्वरित व दूरगामी परिणाम सामने आते हैं।  राज्य द्वारा फॉलो अप  भी उतना ही आवश्यक है जितना सम्मेलन।

   अतः प्रत्येक राज्य को समयांतर के बाद निवेश सम्मेलन करते रहना चाहिए . शीघ्र परिणाम व दूरगामी परिणाम आने को विश्लेषित कर भविष्य हेतु उचित कदम उठाने चाहिए

 

Copyright@ Bhishma Kukreti , 2018 , kukretibhishma@gmail.com

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