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52 Garh Of Garhwal - गडवाल के 52 गढ के बारे में जानकारी (Exclusive)

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, July 26, 2009, 01:42:29 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720



गडवाल के ५२ गढ  के बारे में जानकारी
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       नाम                  जगह का नाम
   
  ४६  चंपा  गढ             देवलगढ
४७  डोगरा गढ            देवलगढ
४८  क्वारा गढ            देवलगढ
४९  मोना गढ            देवलगढ
५० लोदगढ               देवलगढ
५१  लोदान गढ           देवलगढ
५२  जौलपुर गढ           देवलगढ

पंकज सिंह महर

डा० रणवीर सिंह चौहान द्वारा लिखित "गढ़वाल के गढ़ों का इतिहास" में १२४ छोटे-बड़े गढों का उल्लेख किया गया है। उनका जनपदवार विवरण निम्नवत है।

जनपद चमोली के गढ़

चांदपुर गढ़ी
राजगढ़ी
आदिबद्री गढ़
लोहबागढ़
गोपेश्वर गढ़
नागपुर गढ़ी
कानपुर गढ़ी
कंडारा गढ़
गढ़ कडारा घानी
गढ़तांग
भिंलंग गढ़
माणा गढ़
लामव गढ़
पैनखण्डा गढ़
चौड़ गढ़
तोपगढ़
रानी गढ़
कोलापुर गढ़
जूनिया गढ़
बांगर गढ़
बधाण गढ़
मानीला गढ़
हरियाली डांडा गढ़ी
पोखरी गढ़
बिन्सर गढ़
जोशीमठ गढ़
दशोलीगढ़
लंगड़ासू गढ़
नंदाकोट गढ़
रणचूली दुर्ग
डडोली गढ़
अस्कोट
लखनपुर गढ़
लखनपुर कोट गढ़
तालेश्वर गढ़


पंकज सिंह महर

पौड़ी जनपद के गढ़

देवलगढ़
तारागढ़
बूंगीगढ़
उफरैगढ़
धूमाकोट
हंसुलागढ़
चाण्डीगढ़
कोटलागढ़
तैड़ीगढ़
नयालगढ़
जूनगढ़
मोरध्वज गढ़
सागर ताल गढ़
पैनोगढ़
खैरागढ़
बुटोलागढ़
उल्खागढ़
शंदरगढ़
खाटलीगढ़
खाटलीसावलीगढ़
जगदेव गढ़ी
गूजडू गढ़
गुराड़ गढ़
कोलियगढ़
ल्वेईगढ
कांडागढ़
वनगढ़
दीपागढ़
सिलगढ़
घुंघटीगढ़
चौंदकोटगढ़
बूंखालगढ़
कालिंकागढ़ी
उमटागढ़ी
रज्जागढ़ी
ईड़ागढ़
बागड़ीगढ़
ढांगूगढ़
महाबगढ़
अजमेरी गढ़
घुघुतीगढ़
मुण्डेश्वर गढ़
राज्यगढ़ी
कण्वाआश्रम गढ़
भैरिगढ़ी

पंकज सिंह महर

टिहरी जनपद के गढ़

नागटिब्बा गढ़
जौनपुर-थत्यूड़ गढ़
विराटगढ़
उप्पूगढ़
रतनगढ़
रणकोटगढ़
धमोडूगढ़
मौल्यागढ़
रैंका(मोली) गढ़
क्वीलीगढ़
डडूरगढ़
शाकम्बरीगढ़
कुंजापुरीगढ़
चन्द्रबदनी देवी गढ़
सुरकुण्डा देवी गढ़
वडियारगढ़
कोटागढ़
धन्यागढ़
उदयकोट
चौमतीगढ़

पंकज सिंह महर

उत्तरकाशी जनपद के गढ़

नाकुरीगढ़
माणिकनाथ डांडा गढ़
बाड़ाहाट गढ़
बांडागढ़ी
ऐरासू गढ़
चौरंगी गढ़
कन्दरोड़ा गढ़
रज्जागढ़ी
धन्यारी गढ़
मुल्लागढ़
नैलचामी गढ़
हनोल गढ़

पंकज सिंह महर

देहरादून जनपद के गढ़

मोड़ा (लाखामण्डल) गढ़
शेरगढ़
कानीगढ़
नरोरागढ़
लोहागढ़
मांडूरगढ़
पत्थर गढ़
कैलागढ़
सुन्तोरगढ़
खैलपुरगढ़
नालापानी गढ़

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Thanks Pankaj Da,

The detailed information. Hope this will serve the purpose of Parashar Gaur Ji who is need of distt of these Gar.


उतराखंड 52 गढ

नागपुर गढ      भटनाग      तपोगढ
            
लोदनगढ      बनगढ      रानी गढ
            
कोली गढ      भरदार गढ      श्रीगुरु गढ
            
रावड गढ      चौन्दकोट गढ   बधाण गढ
            
फ़ल्याण गढ   नयाल गढ      लोहाव गढ
            
बान्गर गढ      अजमीर गढ      दशोली गढ
            
कुइलीगढ/जोराशी गढ   कोडागढ      कन्डारी गढ
            
भरपूर गढ      साबली गढ      धोना गढ
            
कुन्जडी गढ      बदलपुरगढ      रतन गढ
            
सिलगढ      सन्गेलागढ      एराशू गढ
            
मून्गर गढ      जोट गढ      इडिया गढ
            
रैन्का गढ      गुजुडू गढ      लगूर गढ
            
मौल्या गढ      देवल गढ      बागगढ
            
उप्पू गढ      लोहा गढ      बडकोट गढ
            
नालागढ      जौलपुरागढ      विराल्य गढ
            
सान्करी गढ      चम्पागढ      चान्दपुर गढ
            

Parashar Gaur


Devbhoomi,Uttarakhand

उत्तराखंड के टिहरी जिले के चंबा ब्लाक के गावों की भूमि इसकी तस्दीक करती है कि दुनिया के इतिहास को बदलने में इनकी कितनी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। यही वह भूमि है जहा प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान न्यू चैपल के नायक रहे विक्टोरिया क्रास विजेता शहीद गबर सिंह ने जन्म लिया था।

चंबा कस्बे से लगभग दो किलोमीटर की दूरी पर बसे स्यूटा गाव को ही लें। यहा के रणबाकुरे लगभग एक सदी से लगातार विजय की नई इबारत लिख रहे हैं।

प्रथम विश्व युद्ध में गाव से 36 जाबाज शामिल हुए, जिसमें से चार शहीद हो गए थे। तब से लेकर आज तक इस गाव के अधिकाश युवक सेना में रहकर देश की सेवा में लगे हैं।

वैसे तो गढ़वाल के कई क्षेत्रों से लोग प्रथम विश्व युद्ध से लेकर आजाद हिंद फौज और देश स्वतंत्र होने के बाद सेना में शामिल होकर देश की सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, लेकिन स्यूटा गाव इसलिए महत्वपूर्ण है कि एक ही गाव से एक बार में इतनी बड़ी संख्या में लोग युद्ध में शामिल नहीं हुए।

प्रथम विश्व युद्ध में ब्रिटिश सेना की ओर से लड़ते हुए न्यू चैपल लैंड में गाव के जगतार सिंह, छोटा सिंह, बगतवार सिंह और काना सिंह शहीद हो गए।

इस गाव के जाबाज सिपाहियों ने प्रथम ही नहीं द्वितीय विश्व युद्ध में भी जर्मन सेना को धूल चटाने में कोई कमी नहीं रखी। इस युद्ध में भी स्यूटा के 10 जवान शामिल हुए, जिसमें से बैशाख सिंह और लाभ सिंह रणभूमि में काम आए।

यह सिलसिला यहीं नहीं रुका, 1962 के भारत-चीन युद्ध में शामिल होने वाले यहा के जाबाजों की संख्या 40 तक पहुंच गई थी। इस लड़ाई में सते सिंह पुंडीर शहीद हुए। अस्सी के दशक में तो 132 परिवार वाले गाव में हर परिवार से औसतन एक सदस्य सेना में था।

आज भी गाव में 45 लोग सेना के पेंशनर हैं और 25 लोग सेना और दूसरे सुरक्षा बलों में सिपाही से लेकर डीआईजी तक हैं। गाव के प्रधान रहे सेवानिवृत्त 80 वर्षीय कैप्टन पीरत सिंह पुंडीर बताते हैं कि 1946 में जब वे सेना में शामिल हुए तो तब तक द्वितीय विश्व युद्घ समाप्त हो चुका था।

उन्होंने 1962, 1965 और 1971 की लड़ाई लड़ी और इसमें भी गाव के कई लोग शामिल हुए। स्यूटा गाव से लगे मंजूड़ गाव के भी 11 जाबाज प्रथम विश्व युद्ध में शामिल हुए।

विक्टोरिया क्रास विजेता गबर सिंह नेगी इसी गाव के थे। इसी तरह से स्यूटा से कुछ ही दूर पर स्थित बमुंड पट्टी के जड़दार गाव के 16 रणबाकुरे प्रथम विश्व युद्ध में शामिल हुए थे। इसलिए स्यूटा गाव को लोग आज भी फौजी गाव भी कहते हैं।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

A Love Story related to Kiwidigarh

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सरू की प्रेम कहानी का गवाह है क्वीलीगढ़
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नई टिहरी गढ़वाल। गढ़वाल के इतिहास में बावन गढ़ों का विशेष महत्व है। सदियों पुराने इन सभी गढ़ों से कोई न कोई ऐतिहासिक आख्यान भी जुड़ा हुआ है, जो इन गढ़ों की विशेषता को भी दर्शाते हैं। ऐसा ही एक गढ़ है, टिहरी जिले में स्थित क्वीलीगढ़। जिला मुख्यालय के करीब 65 किलोमीटर दूर स्थित इस गढ़ की कहानी सरू का जिक्र किए बिना अधूरी है, बल्कि अगर यह कहा जाए कि सरू के कारण ही क्वीलीगढ़ जाना जाता है, तो अतिश्योक्ति नहीं होगी।

विभिन्न लोकगीतों में सरू की प्रेम कहानी का वर्णन मिलता है। बताया जाता है कि सोलहवीं सदी में दिल्ली में मुगलों का प्रभाव बढ़ गया था। तब जौरासीगढ़ के अधिपति भगत सिंह सजवाण थे। एक दिन उनके स्वप्न में भगवान घंटाकरण आए व उन्हें दिल्ली में स्थित अपनी शिला गढ़वाल में लाकर स्थापित करने का निर्देश दिया। भगत सिंह दिल्ली से शिला लेकर जौरासीगढ़ की ओर आए। रास्ते में रात होने पर उन्होंने हेंवल नदी के किनारे ठाईगला में विश्राम किया। यहां रघु चमोली का निवास था। भगत सिंह ने यहीं शिला को एक ऊंचे स्थान पर स्थापित कर दिया। रघु चमोली की भैंस हर रोज इस शिला के ऊपर स्वयं दूध की धार डालकर शिला को स्नान कराया करती थी। यह देख चमोली ने शिला को कुल्हाड़ी से खंड-खंड कर दिया। इसका एक खंड सुरकंडा में, दूसरा कुंजापुरी में व तीसरा चंद्रबदनी में गिरा, जबकि चौथा घंडियाल के नाम से प्रसिद्ध हुआ। बाद में सजवाणों ने जौरासीगढ़ छोड़ दिया और कोट नामक स्थान में क्वीलीगढ़ की स्थापना की। यहीं से शुरू होती है सरू की कहानी। वह दोगी पट्टी की कुमारी थी और क्वीलीगढ़ के सजवाण शासक पर मोहित हो गई। उसके पिता ने कई जगह उसका विवाह कराने की कोशिश की, लेकिन सरू घर से भागकर क्वीलीगढ़ आ गई। गढ़ाधिपति ने उससे विवाह कर लिया। इसके बाद दोनों प्रेमपूर्वक रहने लगे। एक दिन सजवाण की अनुपस्थिति में सरू का जीजा उसके घर पहुंचा। सरू ने उसकी खूब आवभगत की। बाद में जब सजवाण वापस आया, तो वह सरू को लेकर शंकित हो गया व उसके साथ मारपीट की। क्षुब्ध सरू घर से रोते हुए निकल गई और गढ़ के पास ही बने ताल में कूदकर जान दे दी। यह ताल आज भी सरू के ताल नाम से जाना जाता है। सजवाण को गलती का अहसास होता है, तो वह सरू की तलाश में निकल जाता है। लोकगीतों में इसका वर्णन इस तरह मिलता है। सरू की मौत व अधिपति की मनोदशा खराब होने के बाद सजवाणों ने क्वीलीगढ़ को छोड़ दिया व अलग- अलग स्थानों पर जाकर बस गए।

http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttranchal/4_5_5925024.html