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Pandav Nritya: Mythological Dance - पांडव नृत्य उत्तराखंड का पौराणिक नृत्य

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, August 24, 2009, 11:45:38 PM

Devbhoomi,Uttarakhand




Devbhoomi,Uttarakhand


Devbhoomi,Uttarakhand



Devbhoomi,Uttarakhand


lpsemwal

Pandav Nritya at Bhatgaon (my village). Mr. S.K. Muttoo then principal secretary Uttrakhand participated. Department of culture recorded this.

Pandav Nritya

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

पांडव नृत्य में दिखी समृद्ध संस्कृति की झलक

Uttar Kashi | Last updated on: November 20, 2012 12:00


उत्तरकाशी। चिन्यालीसौड़ प्रखंड के श्रीकोट गांव में पांडव नृत्य में क्षेत्र की समृद्ध संस्कृति की झलक देखने को मिली। समारोह में मुख्य अतिथि शहरी विकास मंत्री प्रीतम सिंह पंवार ने परंपराओं के संरक्षण की दिशा में इस प्रयास की सराहना की।
गढ़वाल के गांवों में पांडव नृत्य की परंपरा वर्षों पुरानी है। पांडव नृत्य के माध्यम से दैवीय शक्तियों का आह्वान कर क्षेत्र की सुख समृद्धि की कामना की जाती है। चिन्यालीसौड़ प्रखंड के श्रीकोट गांव में 80 साल बाद एक बार फिर पांडव नृत्य का आयोजन किया गया। पांडव नृत्य के पांचवें दिन समारोह में मुख्य अतिथि शामिल हुए काबीना मंत्री प्रीतम पंवार ने कहा कि परंपराएं ही क्षेत्र विशेष की पहचान होती हैं। इन्हें संरक्षित रखा जाना चाहिए। वर्षों बाद पांडव नृत्य की परंपरा को पुनर्जीवित करने वाली प्रधान रोशनी कैंतुरा ने कहा कि इसे आगे भी जारी रखा जाएगा। पांडव नृत्य का समापन 21 नवंबर को किया जाएगा। इस मौके पर इलम सिंह कैंतुरा, देवचंद रमोला, आमोद पंवार, राजेंद्र पंवार सहित चिलोट, बमणती, कोठाल्डी, बरेठ, मोरगी आदि गांवों से बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए। समारोह में प्रदीप पंवार और इलम सिंह महंत ने अपने गायन से लोगों का मन मोह लिया।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

नारायण तुलसी विवाह संग शुरू होगा पांडव नृत्य

जागरण प्रतिनिधि, रुद्रप्रयाग: केदारघाटी के दरमोला में पांडव नृत्य की अनूठी परम्परा है, यहां पांडवों को गढ़वाल के प्राचीन इतिहास से जोड़ते हुए प्रत्येक वर्ष एकादशी पर्व पर भगवान नारायण एवं तुलसी विवाह के साथ पांडव नृत्य का आयोजन किय जाता है। स्थानीय लोग इसे शुभ मानते हैं। इन तथ्यों का स्कन्द पुराण एवं केदारखंड में विस्तार से वर्णन मिलता है।

गढ़वाल क्षेत्र में विभिन्न स्थानों पर प्रत्येक वर्ष नवंबर माह से लेकर फरवरी तक पाण्डव नृत्य का आयोजन होता है। जिला मुख्यालय से सटी ग्राम पंचायत दरमोला एकमात्र ऐसा गांव है, जहां सदियों से चली आ रही परम्परा के अनुसार प्रत्येक वर्ष एकादशी पर्व पर ग्रामीण देव निशाणो के साथ मंदाकिनी व अलकनंदा के तट पर स्नान के लिए पहुंचते हैं। मान्यता है कि इस दिन भगवान नारायण एवं तुलसी का विवाह हुआ था, क्योंकि इस दिन भगवान विष्णु पांच महीनों की निन्द्रा से जागते हैं। वहीं भगवान बद्रीविशाल, लक्ष्मीनारायण, शंकरनाथ, नागराजा, देवी, हित, ब्रहमडुंगी, भैरवनाथ समेत कई नेजा-निशाण एकादशी की पूर्व संध्या पर संगम तट पर स्नान के लिए लाए जाते हैं। पूरी रात जागरण के पश्चात एकादशी पर्व पर सुबह सभी देवताओं की पूजा-अर्चना एवं हवन के बाद ही देवताओं के निशाणों को गांव में ले जाया जाता है। इसी दिन से ही पांडव नृत्य का भव्य आयोजन शुरु हो जाता है।

इस दौरान मुख्य रुप से पाण्डवों के बाणों एवं अस्त्र-शस्त्रों की पूजा की अनूठी परंपरा है। ग्रामीणों का कहना है कि स्वर्ग जाने से पहले भगवान कृष्ण के आदेश पर पाण्डव अपने अस्त्र-शस्त्र यहीं छोड़ कर मोक्ष के लिए स्वर्गारोहणी की ओर चल दिए थे। इसी लिए यहां के लोग पाण्डवों के अस्त्रों के साथ नृत्य करते हैं।

क्या कहते हैं पुजारी

गढ़वाल क्षेत्र का दरमोला गांव ऐसा गांव है, जहां प्रतिवर्ष पांडव नृत्य का आगाज बड़ी आस्था के साथ किया जाता है। यह परम्परा सदियों से चली आ रही है।

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