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Enrich Your Knowledge On Uttarakhand - उत्तराखंड के बारे संक्षिप्त जानकारी

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 23, 2007, 03:06:40 PM

Devbhoomi,Uttarakhand

                      अष्ट भैरवों की छत्रछाया में है अल्मोड़ा
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चंद राजाओं के वंशज बालोकल्याण चंद ने 1563 ईसवी में अल्मोड़ा को यूं ही कुमाऊं की राजधानी नहीं बनाया। इसके पीछे यहां के पौराणिक महत्व के दृष्टिगत यह निर्णय लिया होगा। अल्मोड़ा नगर की महत्ता, विशिष्टता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यह नगर नवदुर्गा व अष्ट भैरवों की छत्र छाया में अपने स्थापना काल से ही रहा है।

एक नगर में अष्ट भैरव, नवदुर्गा के मंदिर बिरले ही देखने को मिलते हैं। इसीलिए अल्मोड़ा को अपने विशिष्ट सांस्कृतिक, अध्यात्मिक व ऐतिहासिक महत्व के लिए जाना जाता है। कहा जाता है कि जहां भैरव विराजमान होते हैं वहां अनिष्ट, दु:ख दरिद्रता की छाया निकट नहीं आती। यहां तो अष्ट भैरव विराजमान हैं, जिसके कारण अल्मोड़ा नगरी प्रदेश, देश ही नहीं अंतर्राष्ट्रीय मंच में अपना विशिष्ट स्थान रखती है। इसे लोग अष्ट भैरव व नवदुर्गा का ही आशीर्वाद मानते हैं।

यहां हम अल्मोड़ा नगर के अष्ट भैरवों का जिक्र कर रहे हैं। अष्ट भैरवों के नाम में लोक बोली का अपना पूरा प्रभाव है। यही कारण है कि स्थानीय बोली भाषा के आधार पर अष्ट भैरवों के नाम प्रचलित हैं। नगरवासी भैरवों को अपना ईष्टदेव मानते हैं। नगर के उत्तर दिशा में प्रवेश द्वार पर खुटकुणी भैरव का ऐतिहासिक मंदिर है। जाखनदेवी के समीप भैरव का मंदिर है, जो अष्ट भैरव में एक है। इसी प्रकार लाला बाजार के पास शै भैरव मंदिर है। जिसका निर्माण चंदवंशीय राजा उद्योत चंद ने कराया था।

बद्रेश्वर मंदिर से पूरब की ओर अष्ट भैरवों में एक भैरव शंकर भैरव के नाम से आसीन हैं। थपलिया मोहल्ले में गौड़ भैरव का मंदिर स्थापित है। चौघानपाटा के समीप अष्ट भैरवों में एक मंदिर बाल भैरव का है। यह मंदिर भी चंद राजाओं के काल का बताया जाता है। पल्टन फील्ड के पास गढ़ी भैरव विराजमान हैं, जो दक्षिण दिशा के प्रवेश द्वार पर रक्षा के लिए स्थापित किए गए हैं।

पल्टन बाजार में ही अष्ट भैरवों में बटुक भैरव का मंदिर बना है। रघुनाथ मंदिर के समीप तत्कालीन राजमहल के दक्षिण की ओर काल भैरव मंदिर स्थापित है। इसी क्रम में बिष्टाकुड़ा के समीप अष्ट भैरव में एक प्राचीन भैरव मंदिर की स्थापना भी चंदवंशीय राजाओं के काल की मानी जाती है। एडम्स इंटर कालेज के समीप भी एक भैरव मंदिर है। इसे भी अष्ट भैरवों में एक बाल भैरव नाम से उच्चारित किया जाता है।

यूं तो पूरे नगर में भगवान भैरव के 10 मंदिर विभिन्न स्थानों में हैं। कुछ बुजुर्गो का कहना है कि दो मंदिर निजी तौर पर बनाए गए हैं। यूं तो भैरव मंदिर में दु:खों के निवारण, अनिष्ट का हरण करने की कामना से लोग रोज मत्था टेकने जाते हैं। लेकिन शनिवार को भैरव मंदिरों में खासी भीड़ रहती है।


http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttranchal/4_5_6369963.html

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यहाँ के कुछ विशिष्ट खानपान है

    * आलू टमाटर का झोल
    * चैंसू
    * झोई
    * कापिलू
    * मंडुए की रोटी
    * पीनालू की सब्जी
    * बथुए का परांठा
    * बाल मिठाई
    * सिसौंण का साग
    * गौहोत की दाल

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गढ़वाली लोकनृत्यों के २५ से अधिक प्रकार पाए जाते हैं इनमें प्रमुख हैं-

१. मांगल या मांगलिक गीत
२. जागर गीत,
३. पंवाडा,
४. तंत्र-मंत्रात्मक गीत,
५. थड्या गीत,
६. चौंफुला गीत,
७. झुमैलौ,
८. खुदैड़,
९. वासंती गीत,
१०. होरी गीत,
११. कुलाचार,
१२. बाजूबंद गीत,
१३. लामण,
१४. छोपती,
१५. लौरी,
१६. पटखाई में छूड़ा,
१७. न्यौनाली,
१८. दूड़ा,
१९. चैती पसारा गीत,
२०. बारहमासा गीत,
२१. चौमासा गीत,
२२. फौफती,
२३. चांचरी,
२४. झौड़ा,
२५. केदरा नृत्य-गीत,
२६. सामयिक गीत,
२७. अन्य नृत्य-गीतों में - हंसौड़ा, हंसौडणा, जात्रा, बनजारा, बौछड़ों, बौंसरेला, सिपैया, इत्यादि। इन अनेक प्रकार के नृत्य-गीतों में गढ़वाल की लोक-विश्रुत संस्कृति की झलक स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है

(Source Wikepiedhttp://hi.wikipedia.org/wiki/)

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गढ़वाल का लोक नृत्य

जहां का संगीत इतना समृद्ध है, वहां का लोकनृत्य भी उसी श्रेणी का है। इनमें पुरुष व स्त्री, दोनों ही के नृत्य हैं, एवं सम्मिलित नृत्य भी आते हैं। इन लोक नृत्यों में प्रमुख हैं:

    * लांगविर नुल्याः
    * बरादा नटि
    * पान्डव नृत्य
    * धुरंग एवं धुरिंग

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गढ़वाल का लोक संगीत

गढ़वाल भी समस्त भारत की तरह संगीत से अछूता नहीं है। यहां की अपनी संगीत परंपराएं हैं, व अपने लोकगीत हैं। इनमें से खास हैं:

    * छोपाटी
    * चौन फूला एवं झुमेला
    * बसंती
    * मंगल
    * पूजा लोकगीत
    * जग्गार
    * बाजुबंद
    * खुदेद
    * छुरा

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सेम मुखेम

यह जगह समुद्र तल से 2903 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यह मंदिर नाग राज का है। यह मंदिर पर्वत के सबसे ऊपरी भाग में स्थित है। मुखेम गांव से इस मंदिर की दूरी दो किलोमी.है। माना जाता है कि मुखेम गांव की स्थापना पंड़ावों द्वारा की गई थी।

Devbhoomi,Uttarakhand

ब्रिटिशकालीन बंगला हुआ जर्जर
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ब्रिटिशकालीन डीएफओ बंगले में कभी जवाहर लाल नेहरू रुका करते थे, आज उस बंगला पर संकट के बादल छाए हैं। 1888 में निर्मित इस ऐतिहासिक बंगले का अस्तित्व धीरे-धीरे खोता जा रहा है। डीएफओ कार्यालय कालसी से चकराता शिफ्ट होने पर शायद इसके भाग्य बदलें।

7229 फीट ऊंचाई पर जंगलों के बीच सुविधाओं से युक्त यह बंगला अपने चारों ओर प्राकृतिक सौंदर्य से लबरेज है। अंग्रेजी हुकूमत में इसको रिडार बंगले के नाम से जाना जाता था। छावनी बाजार से तीन किलोमीटर दूर स्थित जंगलात चौकी नामक स्थल पर अंग्रेजों ने 1888 में लाखों रुपये की लागत से बनाया था।

कभी इसमें आईएफएस स्तर के डीएफओ पूरे वर्ष रहते थे। अब इसके दरवाजे साल में कभी-कभी ही खुलते हैं। देवदार की बेशकीमती लकड़ी से निर्मित इस बंगले के अस्तित्व पर संकट के बादल छाए हुए हैं। जंगलों की सुरक्षा को करने के लिए अंग्रेजों ने चकराता से तीन किलोमीटर दूरी पर वन प्रभाग कार्यालय, आवासीय भवन, गेस्ट हाउस व डीएफओ बंगला बनाया था। उस दौरान नियमित रूप से जंगलों का निरीक्षण किया जाता था, जिससे कीमती पेड़ों का अवैध कटान नहीं हो पाता था।

शरदकाल में हिमपात के कारण तीन माह के लिए कार्यालय को कालसी शिफ्ट किए जाने की व्यवस्था बनाई गई थी, लेकिन वर्ष 1979 में हिमपात के दौरान कालसी शिफ्ट हुआ चकराता वन प्रभाग कार्यालय वापस चकराता नहीं पहुंच पाया। जिसके चलते जंगलों में अवैध पातन की घटनाएं बढ़ी हैं। बंगला व वन कर्मियों के आवासीय भवन जर्जर हो गए। मॉनीटरिंग समिति के कॉर्डिनेटर केएस पंवार का कहना है कि पिछले एक दशक से वन विभाग कार्यालय को कालसी से चकराता शिफ्ट कराने की मांग चल रही है।

मुख्य सचिव सुभाष कुमार ने चकराता वन प्रभाग कार्यालय को चकराता शिफ्ट करने के निर्देश के बाद, बंगले के दिन बहुरने के आसार हैं। उधर, चकराता के प्रभागीय वनाधिकारी डॉ. धीरज पांडे का कहना है कि बंगले में बिजली व पानी की समस्या को दूर कराने के प्रयास किए जा रहे हैं। 30 आवासीय व कार्यालय भवनों में से 17 भवन जर्जर हालत में हैं। 13 भवनों में वन निगम कार्यालय चल रहे हैं। जर्जर भवनों को ठीक कराने का प्रस्ताव शासन को भेजा जा चुका है।

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Famous Fair of Uttarakhand

देवीधुरा मेला (चंपावत),
पूर्णागिरि मेला (चंपावत),
नंदा देवी मेला (अल्मोड़ा),
गौचर मेला (चमोली),
वैशाखी (उत्तरकाशी),
माघ मेला (उत्तरकाशी),
उत्तरायणी मेला (बागेश्वर),
विशु मेला (जौनसार बावर),
पीरान कलियार (रूड़की), और

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उत्तराखण्ड में बहुत से शैक्षणिक संस्थान हैं। जैसे-

रुड़की का भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (पहले रुड़की विश्वविद्यालय)
पंतनगर का गोविन्द बल्लभ पंत कृषि एवँ प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय
वन्य अनुसंधान संस्थान, देहरादून
देहरादून स्थित भारतीय सैन्य अकादमी
इक्फ़ाई विश्वविद्यालय
भारतीय वानिकी संस्थान
पौड़ी स्थित गोविन्द बल्लभ पंत अभियांत्रिकी महाविद्यालय
द्वाराहाट स्थित कुमाऊँ अभियांत्रिकी महाविद्यालय।

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Main Railway Stations
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देहरादून
हरिद्वार
रूड़की
कोटद्वार
काशीपुर
हल्द्वानी
ऊधमसिंह नगर
रामनगर
काठगोदाम