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Folk Songs Of Uttarakhand : उत्तराखण्ड के लोक गीत

Started by पंकज सिंह महर, September 11, 2009, 03:48:13 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कथगा खैल्या (How Much Will You Eat (Take Bribe) ?
कवि :नरेन्द्र सिंह नेगी (पौड़ी गाँव, पौड़ी )
1- Stanza
कमीशन कि मीट भात, रिश्वत को रेलों
कमीशन कि शिकार भात, रिश्वत को रेलों
रिश्वत को रैलो रे ...
बस कर बै ! बिंडी ना सपोड़ अब कथगा खैल्यौ ..
कथगा जि खैलो रे ...
यनि घुळणु रैल्यो , कनकै पचैल्यो
दुख्यारो ह्व़े जैल्यो रे
कमीशन कि मीट भात, रिश्वत को रेलों
रिश्वत को रैलो रे
बस कर बै ! बिंडी ना सपोड़ अब कथगा खैल्यौ
Stanza -2
घुण्ड -घुन्ड़ो शिकार -सुरवा कमर-कमर भात रे
भात रे भात बासमती भात
घुण्ड -घुन्ड़ो शिकार -सुरवा कमर-कमर भात रे
इथगा खाण -पचाण तेरे बसै बात रे ..
मैगे की मरीं जनता ..हे जनता ..
कनक्वे बुथैल्यो रे...
बस कर बै ! बिंडी ना सपोड़ अब कथगा खैल्यौ
Stanza -3
नयो नयो राज उत्तराखंड आसमा छन लोग
लोग जी लोग आसमा लोग
नयो नयो राज उत्तराखंड आसमा छन लोग
बियाणा छन डाम यख लैन्दो को छ जोग
कुम्भ न्हेगे भूलू ..हे भूलू ...
अब आपदा नहेल्यो रे
बस कर बै ! बिंडी ना सपोड़ अब कथगा खैल्यौ

Stanza -4

नियुक्त्युं की रस मलाई , ट्रांसफ़रों को हलवा
हलवा रे हलवा सोहन हलवा
नियुक्त्युं की रस मलाई , ट्रांसफ़रों को हलवा
माना कि भागमा तेरा , चेलों को जलवा
चेलों को जलवा , चेलों को जलवा
बिंडी मिट्ठो नि खलौवु त्यूँ सूगर बढी जालो रे
बस कर बै ! बिंडी ना सपोड़ अब कथगा खैल्यौ
Stanza - ५
छप्पन डामों की डड्वार कै कैन बांटी
बांटी रे बांटी कै कैन बांटी
छप्पन डामों की डड्वार कै कैन बांटी
स्टरडिया की रबडी कथगौन्न चाटी
कथगौन्न चाटी कथगौन्न चाटी
बारम चुनौ छ भूलू हे भूलू ..
हंसल्यो कि रोल्यो रे
बस कर बै ! बिंडी ना सपोड़ अब कथगा खैल्यौ
Stanza- 6
कमीशन को डेंगू रोग . सर्यीं दिल्ली मा फैल्युं
फैल्युं रे फैल्युं रे दिल्ली मा फैल्युं रे
कमीशन को डेंगू रोग . सर्यीं दिल्ली मा फैल्युं
नेता अफसर लीगेनी भोरी भोरी थैल्युं रे
भोरी भोरी थैल्युं, भोरी भोरी थैल्युं
भोरे गेन बिदेसी बैंक ..हे बैंक
भोरे गेन बिदेसी बैंक .अब कख कुचोल्यो रे
बस कर बै ! बिंडी ना सपोड़ अब कथगा खैल्यौ
Stanza -7
रास्ट्रमंडल खेल टू जी घोटाला
घोटाला रे घोटाला टू जी घोटाला
रास्ट्रमंडल खेल टू जी घोटाला
अरबों .खरबों को माल लगेयाली छाला
लगेयाली छाला , लगेयाली छाला
ये देस की लाज प्रभो कनक्वे बच्योले रे ....
बस कर बै ! बिंडी ना सपोड़ अब कथगा खैल्यौ
(The poem is symbolic and humorous. In Hindi or Indian language, taking bribe is called bribe eating (Ghoos Khana ) and Narendra Singh Negi used the meaning of bribe taking in that sense to make poem humorous and satirical
the literal meaning of poem is
You are eating the commission as goat meat
You are eating the commission as Basmati rice
How much will you eat bribe?
How will you digest the commission?
You only can digest this much huge commission!
The people are dying because of inflation
There was hope from new province Uttarakhand
The government is building 56 dams but there is scarcity of milk
there is corruption in appointment, transfer.
Officers, politicians all are busy in taking bribe
Bribe takers depositing money in foreign banks
there was huge corruption in commonwealth game too)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

होटल की नौकरी

होटल बण्यू दफ्तर
कलम कर्छी चा ...... २
मिन काद्गा देखि सुप्निया
किस्मत इनि चा ई की लचारी चा

ईं नौकरी का बाना
सैरयूं सैरयूं घुमी मि
इन नौकरी का मिल
खाई मिल ठोकरी

होटल बण्यू दफ्तर
कलम कर्छी चा ...... २
मिन काद्गा देखि सुप्निया
किस्मत इनि चा ई की लचारी चा

घर भैठींन गरीब ही रैन
दुखी लाचारी मा पढ़े कैन मिन ... २
होटल बण्यू दफ्तर
कलम कर्छी चा ...... २
मिन काद्गा देखि सुप्निया
किस्मत इनि चा ई की लचारी चा

इंटर कैरी मिन बी ऐ भी कैर्याली
डिग्री बिसरमैकु सिरयाँण धैर्याली ... २
होटल बण्यू दफ्तर
कलम कर्छी चा ...... २
मिन काद्गा देखि सुप्निया
किस्मत इनि चा ई की लचारी चा

धरती मा दौड़ी दौड़ी खुटे घिस गेन ... २
होटलों का भांडा धोये धोये हाथ सड़े गेन .... २
होटल बण्यू दफ्तर
कलम कर्छी चा ...... २
मिन काद्गा देखि सुप्निया
किस्मत इनि चा ई की लचारी चा

नेतओं मा जैकी फ़ैल दिखाई
नेताओं न फ़ैल देखि मूक लुकाई .... २
होटल बण्यू दफ्तर
कलम कर्छी चा ...... २
मिन काद्गा देखि सुप्निया
किस्मत इनि चा ई की लचारी चा

मना की बात कैल नि जानि
आंख्युं को पाणी आज नि उबानि .... 2
होटल बण्यू दफ्तर
कलम कर्छी चा ...... २
मिन काद्गा देखि सुप्निया
किस्मत इनि चा ई की लचारी चा

बालकृष्ण डी ध्यानी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

एक गढ़वाली लोक गीत

ना बास घुगुती चैत की
खुद लगिंच माँ मैत की ... २

डाली फुल्ली माँ फूलों की
खुद लगिंच माँ भूलों की ... २

बाट देख्दी रों बाबा आल
चैत फूल कंडी माँ मि कु ल्याल ... २

ना बास घुगुती चैत की
खुद लगिंच माँ मैत की ...

मिन सोची मा भैजी आल
रखड़ि भंटे माँ मिथे द्याल... २

ना बास घुगुती चैत की
खुद लगिंच माँ मैत की ...

स्वामी जी इनि माँ निर्दयी
फोन भी चिठ्ठी नि देई ... २

ना बास घुगुती चैत की
खुद लगिंच माँ मैत की ...

आदि रात मा उठदु
काठी झंगोरा माँ कुटदु ... २

ना बास घुगुती चैत की
खुद लगिंच माँ मैत की ...

सासु जेठानी माँ देंदी गालि
नन्द भारी छुँयाळी ... २

ना बास घुगुती चैत की
खुद लगिंच माँ मैत की ...

क़्या कु बाबा न दूर देनी
बेटी अपरि भूल गैनी ... २

ना बास घुगुती चैत की
खुद लगिंच माँ मैत की ...

डाली फुल्ली माँ फूलों की
खुद लगिंच माँ भूलों की ...

खुद लगिंच माँ भूलों की ...
खुद लगिंच माँ भूलों की ...

कण लगा जी जरूर बतवा जी
एक गढ़वाली लोक गीत ना बास घुगुती चैत की
उत्तराखंडी गीत
उत्तराखंडी भाषा को बढ़वा देने के लिये
उत्तराखंड मनोरंजन
बालकृष्ण डी ध्यानी
-देवभूमि बद्री-केदारनाथ
अब भोळ भेंट हुली जी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बल कैल - कैल सुण यो गीत जरा बता ओ ती ".........
चंद्रा छोरी, आजादी चंद्रा ये.
तिले धारु बोला या.''
'चंद्रा छोरी आजादी चंद्रा ये.
तिले धारु बोला याI''
बल 'घास काटो घाशिलू चंद्रा ये''
बल 'घास काटो घाशिलू या''.
'जै बुण्णा तू जानदि चंद्रा ये''....
'वे बुण्णा रसीलो या''.II...............
बल ग्यु बुत गिलम चन्द्रा ये बल ग्यु बुत गिलमा या''
हरि ककडी जनी चन्द्रा ये, तू मेरा दिलमा या''
सच्ची चन्द्रा छोरि.........

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


प्रयाग पाण्डे
August 9
बेडु पाको बारों मासा, ओ नरैण काफल पाको चैता ..... ....मेरी छैला ॥
बेडु पाको बारों मासा, ओ नरैण काफल पाको चैता ..... मेरी छैला
रुणा - भुणा दिना ऐगी , ओ नरैण मैंकें पूजा मैता .....,मेरी छैला
बेडु पाको बारों मासा, ओ नरैण काफल पाको चैता ..... .मेरी छैला
आपूं खानी पान - सुपारी , मैं कै दिनी बीडी ..... ..........मेरी छैला
बेडु पाको बारों मासा, ओ नरैण काफल पाको चैता ..... मेरी छैला
अल्मोडे की नंदा देवी, ओ नरैण फुल चढोनि पाती .... मेरी छैला
बेडु पाको बारों मासा, ओ नरैण काफल पाको चैता ..... मेरी छैला
त्यार खुटा कांटो बुडो , ओ नरैण मेरि खुटी पीडा ......मेरी छैला
बेडु पाको बारों मासा, ओ नरैण काफल पाको चैता ..... मेरी छैला

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कुमाऊँनी लोक गीत :-
हो नी काटो , नी काटो झुमरयाली बाँज , बंजानी धुरा ठंडो पानी |
ठंडो पानी , ठंडो पानी , बाँज बंजानी धुरा ठंडा पानी |
नैपाल की धनपुतली , कमर खुकुरी |
बरमा जानी धनपतली ,कमर खुकुरी |
ठंडो पानी , ठंडो पानी , बाँज बंजानी धुरा ठंडो पानी |
हो नी काटो , नी काटो झुमरयाली बाँज , बंजानी धुरा ठंडो पानी |
म्हैना आयो चैत को हो कोई न कोई आलो |
जैको भाई , चाई रौली , गत भिटौली ल्यालो |
ठंडो पानी , ठंडो पानी , बाँज , बंजानी धुरा ठंडो पानी|
हो नी काटो , नी काटो झुमरयाली बाँज , बंजानी धुरा ठंडो पानी |
यो दिन यो बार मेरी ऊमर की बात |
भुलुलो , भुलुलो कुंछी , बांकी उन्छी याद |
ठंडो पानी , ठंडो पानी , बाँज बंजानी , धुरा ठंडो पानी |
हो नी काटो , नी काटो झुमरयाली बाँज , बंजानी धुरा ठंडो पानी |
भावार्थ :

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

न्यौली
काटन्या काटन्या पोली आयो चौमासु को वना |
बगंयाँ पाणी थमी जांछो नी थामीनो मना ||
.............................
हात को रुमाल छुट्यो पाणी का खाल में |
कै पापी लै खिति छू मैं दुणा जंजाल में ||
.............................
बरमा जांछ रेलगाड़ी , मथुरा जान्याँ कार |
बची रौंला चिठ्ठी दुला , मरी जूंला तार ||
....................
धोती मैली टोपी मैली ध्वे दिन्यो क्वे छै ना |
परदेसा मां मरी जूंला रवे दिन्यो क्वे छै ना ||
..........................
कथै कुनुं को सुणाछ , बड दुःख भारी |
घर जानूं सैणि रिसें , भैर करजदारी ||

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

धैं पै आज द्वीवि - चार लाइन कुमाउँनी न्यौलिक सुणों :-
काटन्या काटन्या पोली आयो चौमासु को वना |
बगंयाँ पाणी थमी जांछो नी थामीनो मना ||
.............................
हात को रुमाल छुट्यो पाणी का खाल में |
कै पापी लै खिति छू मैं दुणा जंजाल में ||
.............................
बरमा जांछ रेलगाड़ी , मथुरा जान्याँ कार |
बची रौंला चिठ्ठी दुला , मरी जूंला तार ||
....................
धोती मैली टोपी मैली ध्वे दिन्यो क्वे छै ना |
परदेसा मां मरी जूंला रवे दिन्यो क्वे छै ना ||
..........................
कथै कुनुं को सुणाछ , बड दुःख भारी |
घर जानूं सैणि रिसें , भैर करजदारी ||

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

ये उच्ची-उच्ची डाडीं काठी
ये गैरि गैरि रौत्येली धाटी
न जावा न जावा छोडी़ की अपडि जल्म भूमी माटी
बोल्यु माना ,बोल्यु माना बोल्यु माना
सैतीं पाल्यी सयाणु कैकी ,जाणा छां मुख्ख मोडी़ की
कख मिललु यनु सुख यनु चैन
ब्वै की कुछली छोडी़ की
रिती -रिवाज मुल्क छोड़णा छां
तुम कै सुख का बाना
बोल्यु माना बोल्यु माना बोल्यु माना
अपडू छोडी बिरणा पैथर
कब तक भजणा रैल्या छोरो
झूटा सुपिन्यों का खातिर
अफु थै कब तक ठगणा रैल्या छोरो
इखी मिल जालु सभी सुख तुम थैं
जरा मन मा त ठाना
बोल्यु माना बोल्यु माना बोल्यु माना
जल्म लियुं च जैं धरती मा ,कर्ज चुकाण पडलु तुम थै
मां का दूदा सौं देणू छौ ,बोडि की औण पडलु तुम थैं
तुमारू बाटू हेरणा छिन ये
यूं बाटो बिसरयां ना
बोल्यु माना बोल्यु माना बोल्यु माना
काफल बेडू तिमला हिंसर
युकुं स्वाद भूली न जै तू
अपडा़ पहाडी़ मयलु पराण राखी पविञ,
मैलु न कै तू
क्येकु लगदिन ये बडुली-पराज
खुद क्या होन्दी भूल्यां ना
बोल्यु माना बोल्यु माना बोल्यु माना.................... गीत नरेन्दर सिहं नेगी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

 
जोहार (मुनस्यारी) क्षेत्र का एक प्रसिद्ध पारम्परिक लोकगीत

नैनीताल हाथी आयो, चाँदी क सुन केशर।
पाई क पोलिया लायूँ, त्वै दिन भुल बेसर।
बाली भौजा तेरी बलाय, त्वै दिन भुल बेसर॥ नैनीताल हाथी आयो.........॥
गाँठी की नेवड़ लायूँ, त्वै दिन भुल बेसर।
बाली भौजा तेरी बलाय, त्वै दिन भुल बेसर॥ नैनीताल हाथी आयो.........॥
आङै की कैंचुवा लायूँ, त्वै दिन भुल बेसर।
बाली भौजा तेरी बलाय, त्वै दिन भुल बेसर॥ नैनीताल हाथी आयो.......॥