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PHOTS OF RELIGIOUS PLACES OF GOPESWER,गोपेश्वर, के धार्मिक स्थलों की फोटो

Started by Devbhoomi,Uttarakhand, September 23, 2009, 06:36:34 AM

Devbhoomi,Uttarakhand

रूद्रनाथ मंदिर

गोपेश्वर से 18 किलोमीटर दूर अंतिम 10 किलोमीटर की पैदल यात्रा।

समुद्र तल से 2,286 मीटर ऊंचाई पर यह मंदिर एक घने जंगल के बीच स्थित है। पक्की सड़क से आप सागर ग्राम पहुंचते हैं, जहां से पैदल यात्रा सुंदर घास के मैदानों तथा जंगलों से होकर आरंभ होती है और आपको रूद्रनाथ, हाथी पर्वत, नंदा देवी, नंदा घूंटी, त्रिशूली तथा कई अन्य पर्वतों का दृश्य दिखाती हैं, जो मंदिर की अद्भुत पृष्ठभूमि है।



रूद्रनाथ मंदिर पंच केदारों में से एक है तथा यहां भगवान शिव की पूजा नीलकंठ महादेव के रूप में होती है। यह भारत का संभवत: एकमात्र मंदिर है जहां भगवान शिव की पूजा प्रतीक स्वरूप नहीं, बल्कि वास्तविक रूप में शांत एवं सर्वोच्च शक्ति की तरह की जाती है। प्राकृतिक चट्टान का यह मंदिर कई कुंड़ों यथा सूर्यकुंड, चंद्रकुंड, ताराकुंड आदि से घिरा है।

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अनुसूया माता मंदिर,अत्री आश्रम

गोपेश्वर से 19 किलोमीटर दूर कम से कम 5 किलोमीटर पैदल यात्रा
गोपेश्वर के ऊपर एक बड़े गांव मंडल से अनुसूया माता मंदिर के 5 किलोमीटर की पैदल यात्रा आरंभ होती है।

पैदल-पथ बालकाल्या नदी के किनारे-किनारे जाता है तथा यह जंगलों तथा चबूतरानुमा धान के खेतों से गुजरता है। इस मंदिर पर संतान विहीन माता-पिता संतान का वर पाने आते हैं।


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अनुसूया माता मंदिर,अत्री आश्रम

एक घने वन के बीच एक पर्वत के नीचे यह मंदिर स्थित है। भूरे पत्थरों के टुकड़ों से निर्मित इस मंदिर का शिखर नागर शैली में निर्मित है, जबकि मंदिर के आगे का भाग हाल ही में पुनर्निर्मित हुआ है। आप मंदिर समिति की अतिथिशाला में ठहर सकते है, जहां आपको बिस्तर एवं भोजन प्राप्त होगा।

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यहां रति ने अपने पति के लिये तपस्या की थी



गोपीनाथ मंदिर से लगभग आधा किलोमीटर दूर गांव में वैतरणी या रति कुंड नाम का एक जलाशय है। कहा जाता है कि जब भगवान शिव ने रति के पति कामदेव को भस्म कर डाला, तब रति ने इसी जगह मछली का रूप लेकर भगवान शिव की आराधना की थी। उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उसके पति को पुनर्जीवित कर दिया था।

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वैतरणी कुंड के साथ-साथ अन्य समूहों के मूर्ति-विहीन मंदिर का निर्माण भी कत्यूरी शासन के दौरान ही हुआ। उस समय सभी मंदिरों के लिये मंदिर के निकट पानी का स्रोत होना आवश्यक होता था और उस समय गोपेश्वर में रहने वाले छोटे समुदाय के लोगों के लिये यह कुंड जलापूर्ति कर देता था।


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