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PHOTS OF RELIGIOUS PLACES OF GOPESWER,गोपेश्वर, के धार्मिक स्थलों की फोटो

Started by Devbhoomi,Uttarakhand, September 23, 2009, 06:36:34 AM

Devbhoomi,Uttarakhand

चार धाम यात्रा करने वाले लोगों के लिए गोपेश्वर एक उत्तम स्थान है। यहाँ कुछ पल रूककर भक्त अपनी थकान तो मिटाते ही हैं साथ ही यहीं स्थित प्राचीन शिव मंदिर के दर्शन भी करते हैं।

यह स्थान बहुत से मंदिरों के बीचो-बीच स्थित है। इसलिए यात्री यहां आराम करने के लिए पड़ाव डालते हैं। दरअसल, धार्मिक आस्था का केन्द्र होने के अलावा यह स्थल देश के मनोरम पर्यटन स्थलों में भी शामिल है। गोपेश्वर का प्राचीन नाम गोस्थल या गोथल था। केदारखण्ड से पता चलता है कि भगवान् शिव ने यहां घोर तपस्या की थी तथा कामदेव को भस्म की जाने वाली घटना भी यहीं घटित हुई थी।

मान्यता है कि राजा सगर के शासन काल में एक गाय प्रतिदिन लिंग स्थल पर आती थी और उसके थनों से स्वत: दुग्धा धारा लिंग के ऊपर गिरने लगती थी।

जब राजा सगर को इस बात का पता चला तो सच्चाई जानने के लिए वह गाय के पीछे-पीछे चल दिए। अपनी आंखों से संपूर्ण घटनाक्रम को जानकर राजा हैरान हो गये। गाय जहां दूध अर्पित करती थी, वहां से पत्तों को हटाने पर पता चला कि एक शिवलिंग पत्तों के नीचे हैं।

वहां शिवलिंग देखकर उन्होंने वहां मंदिर बनाना चाहा, मगर मंदिर निर्माण की नींव निरंतर धांसती चली गई। आज भी वर्तमान मंदिर के आसपास कुछ निचली भूमि देखी जा सकती है। कहा जाता है कि भैरव की स्थापना के बाद ही मंदिर का निर्माण संभव हो पाया। यह एक मान्य तथ्य है कि भैरव के दर्शन के बिना भगवान् शिव का दर्शन संभव नहीं हो पाता।

राजा सगर द्वारा इस घटनाक्रम को अपनी आंखों से देखने के बाद ही इस स्थान को गोथल के नाम से जाना जाने लगा। धीरे-धीरे इसका नाम गोपेश्वर हो गया। मंदिर से कुछ दूरी पर राजा सगर के नाम से सगर गांव आज भी स्थित है।


http://www.dharmyatra.org/gopeshwar.html

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Vasudhara

Water falls have always captivated the human imagination. 5 Kms. from Mana village, toward the west is the Vasudhara fall with a sheer drop of 145 mtrs.,

set in a background of snowy peaks, glaciers and rocky heights. Violent wind sometimes sprays out the entire volume of the water falling and it appears that the water fall ceases for a minute or two, giving rise to a lot of superstitious ideas to the locals.

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मौडि़वी की पूजा बिन कैसे होगी राजजात

source dainik jaagaran

गोपेश्वर (चमोली)। उत्तराखंड सदियों से धर्म- अध्यात्म की धरती रही है। देशभर के करोड़ों हिंदुओं की आस्था के केंद्र बदरी- केदार धाम के अलावा यहां कई पौराणिक स्थल व मंदिर हैं, जो इस राज्य के कण- कण में भगवान का वास करने संबंधी उक्तियों को चरितार्थ करते हैं। इसके अलावा मेलों, धार्मिक यात्राओं व अन्य विशेष पूजा आयोजनों के जरिए यहां के लोक का प्रभु से जुड़ाव साफ उजागर होता है।

ऐसा ही एक आयोजन है नंदा देवी की राजजात यात्रा। प्रति 12 वर्ष में आयोजित होने वाली इस यात्रा में हजारों की संख्या में श्रद्धालु जुटते हैं। पूरे विधि- विधान व वैदिक रीतियों के साथ यात्रा का आयोजन किया जाता है और भक्त सुख, शांति की कामना करते हैं। अगली यात्रा वर्ष 2012 में प्रस्तावित है, लेकिन अब तक यात्रा शुरू करने के लिए अनिवार्य मौड़िवी पूजा नहीं की जा सकी है।

इससे यह सवाल बहस का विषय बन गया है कि क्या इस बार मौड़िवी पूजा बिना ही यात्रा की जाएगी। उल्लेखनीय है कि 280 किमी की राजजात एशिया की सबसे लंबी पैदल यात्रा है। परंपरा के मुताबिक यात्रा के शुभारंभ से छह वर्ष पूर्व मौड़िवी पूजा किया जाना अनिवार्य है। लोकमान्यताओं के अनुसार नौटी व मैठाणा गांव में 12 वर्ष में दो बड़ी पूजाएं मौडि़वी व राजजात का आयोजन होता है। क्षेत्र की भूम्याल देवी के रूप में उफराई देवी की पूजा की जाती है। ऐसे में अपर्णा देवी जन- जन की पूज्या मानी जाती है। देवी की यात्रा को ही मौड़िवी के नाम से जाना जाता है, जबकि नंदा देवी की यात्रा राजजात कहलाती है। मान्य रीति के मुताबिक मौड़िवी के बाद ही राजजात आयोजित की जा सकती है।

उल्लेखनीय है कि नौटी सहित उफरांई देवी की पूजा छातोली, कल्याड़ी, बैनोली, देवल व चौण्डली आदि गांवों में भी होती है। यहां लोग नया अनाज तैयार होने पर उपयोग से पूर्व देवी को भोग चढ़ाते हैं। देवी का प्रिय भोग चौंसा-भात है। श्रद्धालु उफरांई ढांग केनीचे मौडि़वी नामक स्थान पर इसे पकाते हैं। खास बात यह है कि यह प्रसाद बर्तन में नहीं, बल्कि पत्थरों में खाने की परंपरा है।

दूसरी ओर, नंदा देवी को क्षेत्रीय लोग अपनी ध्याण (विवाहित पुत्री) रूप में मानते हैं। राजजात यात्रा का तात्पर्य नंदा के कैलाश प्रस्थान यानी विदाई से है। यही वजह है कि विदाई से पूर्व ध्याणी की पूजा के रूप में मौड़िवी पूजा की जाती है। नंदा देवी राजजात का वर्ष 2000 में आयोजन हुआ था, तो छह वर्ष पूर्व 1994 में मौडिवी पूजा का भी आयोजन किया गया था।

इससे पहले भी सभी यात्राओं से पूर्व यह पूजा अबाध रूप से की गई है, लेकिन वर्ष 2012 की यात्रा की तैयारियां पूरी हो चुकी हैं और इस बार अब तक मौड़िवी पूजा नहीं की जा सकी है, जबकि कायदे से यह पूजा वर्ष 2006 में ही हो जानी चाहिए थी।

जिला पंचायत अध्यक्ष विजया रावत ने बताया कि वर्ष 2012 में राजजात होगी। ऐसे में मौड़िवी का निर्वाह न होना धर्मप्रेमियों को अखरने लगा है। उन्होंने राजजात यात्रा की तैयारियों से पूर्व मौडिवी की मान्य परंपराओं का निर्वहन न होने को लेकर धार्मिक बहस को छेड़ दिया है।

मौडिवी के बिना लोग राजजात को आधा अधूरा मानने की बात कहने लगे हैं। इस बाबत, मंदिर के पुजारी मदन प्रसाद ने बताया कि भूम्याल की पूजा बिना गांव की कोई भी सामूहिक पूजा आयोजित करना धार्मिक परंपराओं के विपरीत होने के साथ ही शास्त्रसम्मत भी नहीं है।

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                     जब रासलीला की चाह में शिव बने गोपी
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रुद्र हिमालय में स्थित गोपेश्वर को प्राचीन एवं पवित्रतम तीर्थ माना जाता है। पुराणों के अनुसार इंद्रियों के नियंता और पशुओं के पति भगवान शिव को यहां गोपेश्वर या गोपीनाथ भी कहा जाता है और इन्हीं के नाम पर चमोली जिले के इस कस्बे को गोपेश्वर नाम मिला।

शिव का नाम गोपीनाथ पड़ने के पीछे एक रोचक कहानी है। लोकमान्यता है कि सृष्टि रचनाकाल में जब गोलोक में भगवान श्रीकृष्ण राधा के साथ महारासलीला में निमग्न थे, तो उन्हें देख भगवान शिव में भी गौरी के साथ रासलीला करने की इच्छा जाग्रत हुई, परन्तु भगवान त्रिपुरारी, स्वयं त्रैलोक्यनाथ कृष्ण नहीं बन सकते थे और उनकी अद्र्धागिनी गौरी भी राधा नहीं बन सकती थी।

इसलिए भगवान शिव स्वयं गोपी बन गए और गौरी ने गोप का रूप धारण किया और दोनों रासलीला में मग्न हो गए, लेकिन अंतर्यामी भगवान श्रीकृष्ण को उन्हें पहचानने में देर नहीं लगी और उन्होंने मुस्कराते हुए भगवान शिव को गोपीनाथ की उपाधि प्रदान की। गोपीनाथ का मंदिर स्थित होने के कारण गोपेश्वर को यह नाम दिया गया।

इसकी एक और वजह मानी जाती है। कहते हैं कि राजा सगर की सात हजार गायें थीं। उसके ग्वाले आसपास के क्षेत्र में इन गायों को चराते थे। उनमें से एक गाय हमेशा जंगल में स्थित एक शिवलिंग को अपने दूध से नहलाती थी। ग्वाले ने जब यह बात राजा को बताई, तो उन्होंने स्वयं मौके पर पहुंचकर यह नजारा देखा।

चूंके उस समय ग्वालों को गोप कहा जाता था, इसलिए राजा ने उस शिवलिंग अथवा भगवान शिव को गोपेश्वर नाम से पुकारा और गोपीनाथ मंदिर की स्थापना की गई। मान्यता के मुताबिक गोपीनाथ मंदिर के कारण ही गोपेश्वर का भी नाम रखा गया।