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Do you know this Religious Facts About Uttarakhand- उत्तराखंड के धार्मिक तथ्य

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 12, 2009, 10:58:04 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

गढ़वाल के विभिन्न भागों में लगभग 61 मुख्य विष्णु मन्दिर स्थापित हैं। इनमें से कुछ को नीचे सूचीबद्ध किया गया है।

    * बद्रीनाथ का बद्रीविशाल मन्दिर
    * विष्णु प्रयाग में विष्णु मन्दिर
    * मन्द प्रयाग का नारायण मन्दिर
    * चन्द्रपुरी (मन्दाकिनी घाटी) का मुरलीमनोहर मन्दिर
    * तपोवन के निकट सुभेन नामक स्थल पर स्थित भविष्य बद्री मन्दिर
    * पान्डुकेश्वर का ध्यान बद्री या योग बद्री मन्दिर
    * जोशीमठ का नरसिंह मन्दिर

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गढ़वाल में पूजित देवी देवताओं के अन्य स्वरुप निम्न हैं।


प्राचीन समय में गढ़वाल में रहने वाले नागाओं के वंशज आज भी सर्प का पूजा करते हैं। इस क्षेत्र में अनेकों सर्प मन्दिर स्थापित हैं। उदाहरणार्थ कुछ सर्प मन्दिर निम्न हैं।

    * पान्डुकेश्वर का शेष नाग मन्दिर
    * रतगाँव का भेकल नाग मन्दिर
    * तालोर का सांगल नाग मन्दिर
    * भरगाँव का बम्पा नाग मन्दिर
    * निति घाटी में जेलम का लोहन देव नाग मन्दिर
    * देहरादून घाटी नाग सिद्ध का बामन नाग मन्दिर

Devbhoomi,Uttarakhand

नृसिंह मंदिर में सुशोभित हुई शंकराचार्य की गद्दी
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भगवान बदरीविशाल की शीतकालीन पूजा स्थली पांडुकेश्वर में उद्वव व कुबेर जी को विराजित करने के बाद शनिवार को आदिजगत गुरु शंकराचार्य की गद्दी जोशीमठ पहुंची। वैदिक मंत्रोच्चार के साथ रावल ने पूजा-अर्चना कर शंकराचार्य गद्दी को नृसिंह मंदिर में सुशोभित किया। इसके साथ ही रावल भी अगले छह माह के लिए अपने घर केरल रवाना हो गए हैं।

शनिवार प्रात: पांडुकेश्वर स्थित योग ध्यान बद्री मंदिर में पूजा-अर्चना के बाद रावल केशवन प्रसाद नंबूदरी शंकराचार्य की गद्दी एवं सैकड़ों भक्तों के साथ जोशीमठ स्थित नृसिंह मंदिर पहुंचे। मार्ग में कई स्थानों पर श्रद्धालुओं ने शोभा यात्रा का पुष्प बरसाकर स्वागत किया।

सीमा सड़क संगठन की ओर से भी मारवाड़ी स्थित मुख्यालय में शोभा यात्रा का स्वागत किया। जोशीमठ नृसिंह मंदिर पहुंचने पर धर्माधिकारी जगदंबा प्रसाद सती, वेदपाठी भुवन चंद्र उनियाल, कुशलानंद बहुगुणा, सत्य प्रसाद चमोला एवं राधाकृष्ण थपलियाल ने वेदो मंत्रोच्चार के साथ रावल केशवन प्रसाद नंबूदरी से सभी पौराणिक धार्मिक नियमों के अनुसार पूजा अर्चना संपन्न कराई। इसके बाद शंकराचार्य की गद्दी को यथास्थान विराजित किया।


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उत्तराखंड में रंवाई एक ऐसी सुरम्य व अद्भुत घाटी है जो अपने में गौरवशाली इतिहास तथा कला व संस्कृति संजोये है..यहाँ पांडवों के साथ-साथ दुर्योधन की पूजा भी होती है और यहाँ इसका बाकायदा मंदिर भी है..सबसे कम पलायन करने वाली यह घाटी पूरे उत्तराखंड के लिए एक आदर्श बन सकती है. रंवाई में बहने वाली यमुना व टौंस के पानी ने यहाँ के लोगों में सदियों से वीरता की ऐसी लौ जलाए रखी कि टेहरी राजशाही भी यहाँ के लोगों से थर-थर कॉपती थी. यहाँ के लोगो ने निरंकुश राजशाही का हमेशा डटकर मुकाबला किया, जिससे राजा इन्हें ढंडकी (क्रांतिकारी) के नाम से संबोधित करता था. 30 मई 1930 को यमुना के किनारे तिलाड़ी के मैदान में राजशाही से टक्कर लेते हुए यहाँ के आन्दोलनकारियों ने जिस प्रकार की शहादत दी उसकी गूँज उस समय ब्रिटेन के अखबारों तक में सुनाई दी.

कम ही लोग जानते हैं कि तिलाड़ी का आन्दोलन रंवाई राजशाही के खिलाफ 18वां ढंडक था. इनका जिक्र यहाँ के पुराने लोक गाथाओं एव लोकगीतों में आता है जो यहाँ के इतिहास की अमूल्य धरोहर है. राजशाही के जमाने में एक प्रचलन था कि यदि राजपरिवार के किसी सदस्य की मौत होती थी तो पूरे राज्य के पुरुषों को मुंडन करवाना पड़ता था, जो अपना मुंडन नहीं करवाता था उसे राजद्रोह का दोषी माना जाता था. एक बार रंवाई के एक युवा ने यह शर्त मानने से इनकार कर दिया. वह एक बार बचपन में भी तब लगातार दो दिन तक रोया था जब राज परिवार के किसी के मरने पर उसका उसके घरवालों ने जबरदस्ती मुंडन कर दिया गया था. यह बात उसके दिल में गहरा घाव कर गई थी. दूसरा मौक़ा आया तो वह इस निरंकुश क़ानून का विरोध करने के लिए डांगरा (स्थानीय हथियार) कमर में लटकाकर राजा से सीधे बात करने टेहरी दरबार के लिए रवाना हो गया. वहां जाकर दरबारियों ने उसे गेट पर ही पकड़ लिया पर उसने वहीँ हंगामा खड़ा कर दिया और अपना डांगरा थामकर मरने-मारने पर उतारू हो गया. वह अपनी बात राजपरिवार तक पहुंचाने की जिद पर अड़ा था..

राजा राज्य से बाहर गया था. हंगामा सुनकर रानी ने बाहर निकललकर हंगामे का कारण जानना चाहा तो युवक ने बेधड़क अपनी बात रानी को बताई और कहा कि ये कौन सा अंधा क़ानून है कि आपके परिवार में किसी के मरते ही पूरे राज्य के निवासियों का सर मुंडवा दिया जाता है. यह कहाँ का न्याय है? रानी को दृढ़ता से रखी गयी इस साहसी युवक की बात तर्कसंगत लगी और रानी ने घोषणा करवा दी कि अब के बाद राज परिवार में किसी की मौत पर सर मुड़वाना जनता के लिए जरूरी नहीं बल्कि स्वैच्छिक होगा. इस तरह के ऐतिहासिक क्रान्ति के दस्तावेज यहाँ की लोक कथाओं व लोक गीतों में भरी पडी है, जिसमे शोधकर कर इन तथ्यों को यहाँ के इतिहास में संजोने की जरूरत है. यहाँ के समाज सेवियों ने यमुनोत्री जिले की मांग को सरकार से मनवाकर इस पिछड़े क्षेत्र के विकास के लिए नये द्वार खोल दिए

लेखक विजेंद्र रावत उत्‍तराखंड के वरिष्‍ठ पत्रकार हैं

http://www.news.bhadas4media.com

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Do know this ?

श्री बदरीनाथ धाम के कपाट खुलने पर भगवान बदरीनाथ के शृंगार, अभिषेक हेतु राज दरबार नरेंद्रनगर से परंपरानुसार गाडू घड़ी तेल कलश यात्रा निकाली जाती है। विभिन्न पड़ावों पर तेल कलश यात्रा के दर्शनों व भगवान बदरीनाथ के आशीर्वाद के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ जुटी रहती है




एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

चंपावत जिले में मंदिरों की भरमार है। हर मंदिर के साथ जुड़ी धार्मिक एवं अनूठी मान्यताएं आस्था की लौ को और प्रगाढ़ करती है। ऐसी ही एक अनोखी मान्यता के लिए जाना जाता है सीमांत मंच क्षेत्र में स्थित गुरू गोरखनाथ बाबा मंदिर। कहा जाता है यहां के मंदिर में जलने वाली अखंड धूनी सतयुग से रोशन है। धूनी की राख को ही प्रसाद के रूप में दर्शनार्थियों को दिया जाता है। यहीं वजह है कि हजारों श्रद्धालु बाबा के दर पर शीश नवाने आते हैं।
http://www.amarujala.com/city/CityGallery.aspx?id=1666&cid=115

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देवता करते हैं दिवंगत भक्ताें का श्राद्ध



अगस्त्यमुनि। देवभूमि में देवताआें (पश्वा) की ओर से भी अपने दिवंगत हो चुके भक्ताें का श्राद्ध करवाया जाता है। जिले में जखोली ब्लाक क्षेत्रांतर्गत घंघासू बांगर में एक ऐसा स्थान है जहां पर देवता (पश्वा) स्वयं तर्पण देकर स्वर्ग सिधार चुके मनुष्याें का श्राद्ध करते हैं। इस मौके पर यहां पर मेला भी लगता है, जिसे स्थानीय भाषा में तोष मेला कहते हैं।
प्रत्येक वर्ष अनन्त चतुर्दशी के दिन घंघासू बांगर क्षेत्रांतर्गत मथ्या गांव, भुनाल गांव, बक्सीर, डांगी और खौड़ के ग्रामीणाें की ओर से नागनाथ घुणेश्वर देवता का मेला आयोजित किया जाता है। मेले के तहत शुक्रवार को बक्सीर भंडार से जागराें और मंत्रों के बीच चांदी के ढोल, चांदी का पाथा, चांदी के दो सूरजमुखी, चांदी की दो रुप छड़ी, बल्लभ, क्षेत्रपाल के चांदी के पत्यौण और चांदी के थाल के साथ भगवान की उत्सव डोली भक्ताें के साथ भैरारी मंदिर में रात्रि प्रवास के लिए पहुंचेगी। रात्रि भर यहां जागरण होगा। तोष मेले से पूर्व देव डोली को ब्रह्मकमल से सजाया जाता है। शनिवार को तोष मेला आयोजित होगा। देव डोली देव खेत जाकर भक्ताें को दर्शन देगी। इसके बाद देवता (पश्वा) की ओर से स्वर्ग सिधार चुके मनुष्याें का तर्पण कर श्राद्ध की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। प्रक्रिया पूर्ण होने के बाद शुद्धिकरण के लिए इस स्थान पर बारिश होती है।

http://www.amarujala.com/city/Rudraprayag/Rudraprayag-49993-14.html