Author Topic: Districts Of Uttarakhand - उत्तराखंड के जिलों का विवरण एवं इतिहास  (Read 78604 times)

Devbhoomi,Uttarakhand

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बागेश्वर जिला

आध्यात्मिक शहर के रूप में मशहूर बागेश्वर उत्तरांचल का ही नहीं देश का एक प्रसिद्ध तीर्थ स्थल है। यह खूबसूरत और लुभावनी प्राकृतिक आबोहवा के बीच बसा है। भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त यह शहर सरयू, गोमती और विलुप्त भागीरथी के विहंगम संगम पर बसा है। इस जगह के धार्मिक महत्व की वजह से श्रद्धालु इसे बेहद पवित्र मानते हैं।
बागनाथ मंदिर में बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। विशेषरूप से सावन के पवित्र महीने में भारी संख्या में लोग भगवान शिव की पूजा करने यहां पधारते हैं। उत्तरायणी और शिवरात्रि मेले का यहां पर बड़े धूमधाम से आयोजन किया जाता है। ये मेले पूरे कुमायूं क्षेत्र के सबसे पवित्र मेले माने जाते हैं।
कहा जाता है कि नीलपर्वत जो सरयू और गोमती नदियों के बीच है , 33 करोड़ देवी-देवताओं का निवास स्थल है।
बागेश्वर और उसके आसपास के कुछ सर्वाधिक लोकप्रिय पर्यटन स्थलों में बागनाथ मंदिर , बैजनाथ , कौसानी , पिंडारी ग्लेशियर , कफनी ग्लेशियर आदि प्रमुख हैं।
वस्तुत: बागेश्वर पिंडारी और कफनी ग्लेशियर के रास्ते में है। अनुकूल मौसम के दौरान यहां पर विभिन्न तरह के ट्रेकिंग और पर्वतारोहण संबंधी गतिविधियों का आयोजन किया जाता है।
घाटी में स्थित होने की वजह से बागेश्वर की जलवायु तुलनात्मक रूप से गर्म और आर्द्र है। लेकिन ऊंचाई पर स्थित जगहें ठंडी है।
लीची , आम , आंवला जैसे फल और चीड़, बाँज और बुरांश आदि पेड़ पर्याप्त संख्या में यहां पाए जाते हैं। इस जगह पर हिरण , कस्तूरी , बाघ और जंगली मुर्गे रहते हैं।
यद्यपि बागेश्वर छोटी जगह है, लेकिन अपनी प्राकृतिक आभा, खूबसूरती, मंदिर और धार्मिक महत्व के अन्य स्थानों की वजह से यह शहरी जीवन की एकरसता से दूर मनबहलाव और मौजमस्ती के लिए एक महत्वपूर्ण ठिकाना बन गया है।



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बागेश्वर का इतिहास सैकड़ों वर्ष पुराना है। बागेश्वर मंदिर से प्राप्त पत्थर के शिलालेख से इस विषय की अच्छी-खासी जानकारी मिलती है। माना जाता है कि शिलालेख 9वीं सदी का है और इसे दक्षिणी दिशा में बागेश्वर स्थित मंदिरों के समूह में पत्थर पर कत्यूरी राजा भुदेव ने खुदवाया था।
यद्यपि शिलालेख अब बर्बाद हो चुका है लेकिन प्रिंसेस और एटकिंसन जैसे विद्वानों द्वारा इसकी कापियां तैयार कर ली गई थीं।
माना जाता है कि भूदेव या पृथ्वी के देवता ने इस क्षेत्र पर 855 ईसा पूर्व से 860 ईसा पूर्व तक शासन किया था। शिलालेख से राजा द्वारा मंदिर को दिए गए दान की जानकारी मिलती है।
शिलालेख में 9 राजाओं के नामों का उल्लेख है। ये सभी राजा एक ही वंश के नहीं थे और शायद इन लोगों ने 7वीं और 9वीं सदी के बीच शासन किया।
इस शिलालेख में जिन नामों का उल्लेख हुआ है, उनमें जय कुल भुक्ती, अंबीर पालिका, विश्णुधर्मन, विशय, स्वर्नेश्वर ग्राम और न्याय क्षेत्र शामिल हैं। माना जाता है कि ये सभी नाम इस क्षेत्र को दिए गए थे
कत्यूरी राजाओं के बाद आने वाले चंद वंशी शासकों ने भी मंदिरों को अच्छा-खासा दान किया था। राज लक्ष्मी चन्द (1597-1621) ने बागनाथ मंदिर की मरम्मत कराई थी , जिसे उस समय व्याघ्रेश्वर मंदिर कहा जाता था। बागेश्वर के चारो तरफ स्थित मंदिरों में दत्तात्रेय मंदिर एक है। यह पूरे उत्तराखंड में भगवान दत्तात्रेय का एक मात्र मंदिर है।
इस स्थल के बारे में शिलालेखों और प्राचीन मंदिरों से ही जानकारियां मिलती हैं। संभवतः इसके बारे में अधिक लिखित जानकारियां उपलब्ध नहीं हैं। बागेश्वर कूमायूं की पहाड़ियों में स्थित जगहों में से पहली जगह है जहां मानव सभ्यता विकसित हुई और सामाजिक , सांस्कृतिक और राजनीतिक विकास को ऊंचाई मिली।

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बागेश्वर उत्तराखंड के सबसे अधिक प्रख्यात आध्यात्मिक शहरों में से एक है और इस शहर से कई रुचिकर पौराणिक कथाएं जुडी़ हुई हैं।
एक लोकप्रिय कथा के अनुसार माना जाता है कि अगर किसी की यहां मृत्यु होती है तो उसे जीवन-मृत्यु के जटिल बंधन से मुक्ति मिल जाती है और वह मोक्ष का भागीदार होता है। मानस खंड के अनुसार गोमती और सरयू नदियों के बीच नीलगिरी (बागेश्वर) है। इस पर्वत के महत्व की तुलना मेरू या सुवर्णाचल से की जाती है।
मत्स्य पुराण में भी नीलगिरी की चर्चा एक पवित्र तीर्थस्थल के रूप में है। पूर्वजों का अंतिम संस्कार करने के लिए यह एक पवित्र स्थल माना जाता है। मानस खंड के अनुसार शिवगणों में से एक चंडीश ने भगवान शिव की इच्छा से नीलगिरी पर दूसरे बनारस की स्थापना की थी। इस अवसर पर कई साधु-संत, रूद्रकन्याएं, एकदशरूद्र, आठ वसू, 12 आदित्य, दैत्य और सर्प उपस्थित थे।
दूसरे बनारस की स्थापना होने के बाद भगवान शिव पार्वती के साथ यहां आए। उसी समय आकाशवाणी के जोर देने पर भगवान ने एक शिवलिंग की स्थापना की। इस शिवलिंग को शिवगणों द्वारा वनिश्वर के नाम से संबोधित किया जाता था। बागेश को शिव की नाभि के रूप में भी जाना जाता है।
मानस खंड में सरयू को गंगा, गोमती को यमुना, नीलगिरी को विंध्य या सूर्वांचल और पीपल के पेड़ को अक्षय कहा गया है। माधव की बिंदूमाधव के रूप में मूत्ति और नदियों के संगम को प्रयाग कहा जाता है। यहां स्थापित बागेश को विश्‍वेश्‍वर और शहर को बनारस कहा जाता है।

बागेश्वर जिले का मानचित्र


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कला-संस्कृति

बागेश्वर को अक्सर उत्तराखंड की आध्यात्मिक राजधानी के रूप में संबोधित किया जाता है। यह विभिन्न तरह की कलाओं, संगीत और नृत्य रूपों का संगम है। काफी संख्या में मंदिरों की वजह से यहां धार्मिक आस्था और सोच वाले लोगों की बहुलता है। इस पक्ष का इस क्षेत्र की कला और संस्कृति पर भी गहरा प्रभाव है।
सांस्कृतिक प्रभाव (नृत्य और संगीत): पहाड़ी क्षेत्र और खराब मौसम की वजह से बागेश्वर का जीवन, कृषि आदि हरे-भरे और उर्वर मैदान की तुलना में कठिन है। नतीजतन इस क्षेत्र के नृत्य रूप की लय धीमी है। झोड़ा या छपेली धीमी लय वाले नृत्य रूप हैं जो न्योली एक उदास गाने) की उदासी से भरी धुन पर संपादित होते हैं। छोलिया नृत्य का एक अन्य रूप है जिसे सिर्फ राजपूत करते हैं।
झोड़ा़, चांचरी और छपेली हुडका की धुनों पर संपादित होते हैं। स्थानीय वाद्ययंत्र जैसे ढ़ोल, निशाण, नगाड़े, रणसिंघा, छोलिया और तुरही भी नृत्य प्रदर्शनों के आकर्षण को बढ़ा देते हैं।
धर्मः बागेश्वर में रहने वाली अधिकांश आबादी हिंदू है। उनमें से अधिकांश सनातन धर्म की बेहद पुरानी शिक्षा और सिद्धांतों को मानते हैं। मंदिरों में मंगलवार, शनिवार और महत्वपूर्ण त्योहारों के अवसर पर बड़ी संख्या में लोग आते हैं। रामायण और अन्य धार्मिक ग्रन्थों का पाठ यहां के लोगों के जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण भगवान शिव और देवी शक्ति को काफी सम्मान दिया जाता है।
हिंदू राजा द्वारा शहर की स्थापना की गई थी, इसलिस यहां पर हिदुत्व का प्रभाव स्पष्ट है। प्राचीन काल से यानी ब्रिटिश शासन के पहले से यहां हिंदू शासक शासन करते रहे। लेकिन आज सच्चे अर्थों में इसकी तस्वीर महानगरीय हो गई है, क्योंकि इस्लाम, ईसाई, बौद्ध समेत सभी धर्मों के लोग हिंदुओं के साथ समरसता स्थापित करके रह रहे हैं।
भाषा (स्थानीय): अल्मोड़ा हिमालयी के कुमायूं क्षेत्र का एक हिस्सा है। यहां के लोगों की प्राथमिक भाषा कुमायूं है। यहां बोली जाने वाली अन्य भाषाएं हिंदी और अंग्रेजी हैं।
शहर के लोग: बागेश्वर के लोग बेहद दोस्ताना और मेहनती है। इससे यहां आने का मजा कई गुणा बढ़ जाता है।
यहां के लोग मजबूत लेकिन छोटे कद के होते हैं। इस शहर की साक्षरता दर काफी ऊंची 71.94 फीसदी है।

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परंपरागत लिबास  : इस क्षेत्र के लोगों का परंपरागत वस्त्र साधारण, कम महंगा और पहाड़ी क्षेत्र के खराब मौसम और कठिन जीवन के लिए उपयुक्त है।
यहां के पुरूष सामान्य तौर पर कुर्ता (लंबी और ढ़ीली शर्ट) या शर्ट, पायजामा (घुटने के नीचे से त्वचा से सटा हुआ), सदरी(जैकेट), टोपी और घुटने तक लंबा कोट (यह ठंड के दिनों में ही पहना जाता है) आदि पहनते हैं।
निहायत ग्रामीण / सुदूर क्षेत्र में काला यी छींटदार लहंगा ( घाघरा ) उसके ऊ पर पूरी बाँह का ब्लाउज जिसे स्थानीय बोली में आँगड भी कहते है, पहना जाता है सिर पर ओढ़ने वाले दुपट्टे को पिछौडा़ कहते हैं। शादी ब्याह या विशेष अवसर व त्य ौ हार पर यह विशिष्ट रंग का होता है जिसे “ रंगवाली पिछौड़ा ” कहा जाता है यह पिछौड़ा कुमायूँ के सुहागन / विवाहित महिलाओं की पहचान कराता है।
यद्यपि आधुनिक समय में बड़ी संख्या में लोग ट्राउजर और बटन लगी शर्ट, कोट और सलवार-कमीज आदि पहनने लगे हैं, लेकिन ग्रामीण इलाकों में अधिकांश पुरुष और स्त्रियां अभी भी आम दिनों में परंपरागत कपड़े ही पहनते हैं।
जीवन के परंपरागत तरीकेः
बागेश्वर के लोग बेहद जोशीले और दोस्ताना स्वभाव के हैं। वे साधारण जीवन और ऊंची सोच में यकीन करते हैं। उनके जीवन का यह पक्ष उनके साधारण घर, खाने-पीने की आदतें, कपड़े और अन्य चीजों से सच्चे अर्थों में परिलक्षित होता है।
यहां के सामान्य लोग गहरे तौर पर धार्मिक हैं। उनका जीवन विभिन्न तरह के पर्व-त्योहारों और रीति-रिवाजों से घिरा हुआ है।
इस क्षेत्र की स्थानीय भाषा कुमायूं है। हिंदी और अंग्रेजी भी यहां बोली जाती है।
यहां के लोग कड़ी मेहनत करने वाले हैं और बड़ी संख्या में लोग कृषि कार्य से जुड़े़ हुए हैं। कुमायूं पहाड़ी क्षेत्र के लोगों की जीविका का मुख्य साधन कृषि है।
लोगों की भोजन संबंधी आदतें साधारण हैं। दोपहर के भोजन में दाल-भात और रात के भोजन में रोटी-सब्जी आम है।

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रुद्रप्रयाग जिला
रुद्रप्रयाग भारत के उत्तरांचल राज्य के रुद्रप्रयाग जिले में एक शहर तथा नगर पंचायत है। रुद्रप्रयाग अलकनंदा तथा मंदाकिनी नदियों का संगमस्थल है। यहाँ से अलकनंदा देवप्रयाग में जाकर भागीरथी से मिलती है तथा गंगा नदी का निर्माण करती है। प्रसिद्ध धर्मस्थल केदारनाथ धाम रुद्रप्रयाग से ८६ किलोमीटर दूर है। भगवान शिव के नाम पर रूद्रप्रयाग का नाम रखा गया है। रूद्रप्रयाग अलकनंदा और मंदाकिनी नदी पर स्थित है। रूद्रप्रयाग श्रीनगर (गढ़वाल) से 34 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। मंदाकिनी और अलखनंदा नदियों का संगम अपने आप में एक अनोखी खूबसूरती है। इन्‍हें देखकर ऐसा लगता है मानो दो बहनें आपस में एक दूसरे को गले लगा रहीं हो। ऐसा माना जाता है कि यहां संगीत उस्‍ताद नारद मुनि ने भगवान शिव की उपासना की थी और नारद जी को आर्शीवाद देने के लिए ही भगवान शिव ने रौद्र रूप में अवतार लिया था। यहां स्थित शिव और जगदम्‍बा मंदिर प्रमुख धार्मिक स्‍थानों में से है।


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अगस्‍तमुनि-

रूद्रप्रयाग से अगस्‍तमुनि की दूरी 18 किलोमीटर है। यह समुद्र तल से 1000 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यह मंदाकिनी नदी के तट पर स्थित है। यह वहीं स्‍थान है जहां ऋषि अगस्‍त्‍या ने कई वर्षों तक तपस्‍या की थी। इस मंदिर का नाम अगस्‍तेश्रवर महादेव ने ऋषि अगस्‍त्‍या के नाम पर रखा था। बैसाखी के अवसर पर यहां बहुत ही बड़ा मेला लगता है। अधिक संख्‍या में श्रद्धालु यहां पर आते हैं और अपने ईष्‍ट देवता से प्रार्थना करते हैं।






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गुप्‍तकाशी-

गुप्‍तकाशी का वहीं महत्‍व है जो महत्‍व काशी का है। यहां गंगा और यमुना नदियां आपस में मिलती है। ऐसा माना जाता है कि महाभारत के युद्ध के बाद पांण्‍डव भगवान शिव से मिलना चाहते थे और उनसे आर्शीवाद प्राप्‍त करना चाहते हैं। लेकिन भगवान शिव पांडवों से मिलना नहीं चाहते थे इसलिए वह गुप्‍ताकाशी से केदारनाथ चले गए। गुप्‍तकाशी समुद्र तल से 1319 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यह एक स्‍तूप नाला पर स्थित है जो कि ऊखीमठ के समीप स्थित है। कुछ स्‍थानीय निवासी इसे राणा नल के नाम से बुलाते हैं। इसके अलावा पुराना विश्‍वनाथ मंदिर, अराधनेश्रवर मंदिर और मणिकारनिक कुंड गुप्‍तकाशी के प्रमुख आकर्षण केन्‍द्र है




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सोनप्रयाग-

सोनप्रयाग समुद्र तल से 1829 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यह केदारनाथ के प्रमुख मार्ग पर स्थित है। सोन प्रयाग प्रमुख धार्मिक स्‍थलों में से एक है। ऐसा कहा जाता है कि सोन प्रयाग के इस पवित्र पानी को छू लेने से बैकुठ धाम पंहुचाने में मदद मिलती है। सोनप्रयाग से केदारनाथ की दूरी 19 किलोमीटर है। यह वहीं स्‍थान है जहां भगवान शिव और पार्वती का विवाह हुआ था। सोनप्रयाग से त्रियुगीनारायण की दूरी बस द्वारा 14 किलोमीटर है और इसके बाद पांच किलोमीटर पैदल यात्रा करनी होगी।


 

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