Author Topic: Gairsain: Uttarakhand Capital - गैरसैण मुद्दा : अब यह चुप्पी तोड़नी ही होगी  (Read 175500 times)

Sunder Singh Negi/कुमाऊंनी

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दयाल दा अभी तो हम वीरोधियों के लिए मुलायम शब्दो का प्रयोग कर रहे है।
वैसे एक कवि भाव होने के नाते (मै, हम) कठोर शब्दो का प्रयोग नही करना चाहते है।
मगर हम तब कठोर शब्दो का प्रयोग करंगे जब हमै कठोर शब्दो का प्रयोग करने को मजबूर किया जायेगा।


जैसे वहा की मिटटी सही नही है, वहा पानी नही है, वहा से हवाई पटटी दूर है। आदी.........   

Sunder Singh Negi/कुमाऊंनी

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दाज्यु आपने सही बात कही है। बहुत अच्छा

Sunder Singh Negi/कुमाऊंनी

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पंकज दा बहुत खूब बहूत खूब आपने तो खाल ही नीकाल दी।

खीमसिंह रावत

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एक अनपढ़ जस विचार म्यार ले छा हो महाराज जी:-

पहले आन्दोलन हुवा उत्तराखंड के नाम पर, आन्दोलनकारियों ने कुर्बानी दी उत्तराखंड के नाम पर/ किन्तु हमारे जन नायक, हमारे शासकों ने हमारी भावनाओं को नहीं समझा बल्कि अहसान कर उत्तराखंड न बनाकर उत्तराँचल बना दिया/ शायद जब २००० में उत्तराँचल राज्य बनाया था तो उस समय कहा गया की अस्थाई राजधानी देहरादून होगी/ इसका मतलब क्या हुआ कि स्थाई राजधानी कही और बनेगी/ और दूसरी बात यह है कि गैरसैण को राजधानी बनाने का प्रस्ताव उत्तराखंड राज्य बनने से पहले का है/ जो लोग क्षेत्र वाद कह रहे हैं वह ठीक नहीं है/ उत्तराँचल से जब उत्तराखंड नाम दिया गया तब यह तर्क दिया कि जनता उत्तरांचल नाम को आत्मसात नहीं कर पा रहे हैं आन्दोलनकारियों के साथ अन्याय हुआ है उत्तराँचल नाम थोपा गया है/

उत्तराखंड  की राजधानी के लिए जितने भी आयोग बिठाए गए हैं वे सब बेकार का समय गवाया गया है जितने रुपये आयोगों पर खर्च किया गया उतने से तो राजधानी का काम शुरू हो जाता, शायद  आज तक हमारी राजधानी बनकर तैयार भी हो जाती/ हम अंग्रेजों की ही चाल चल रहे हैं फूट डालो राज करो / क्या गढ़वाल क्या कुमाऊ गैरसैण से दोनों का विकास है दोनों का ही फायदा है/
तर्क दिया जाता है की गैरसैण में सुविधा नहीं है राजधानी बनाने का खर्चा भी ज्यादा आएगा, भूकंप का भी डर है/ महाशय अगर सारी सुविधाएं होती तो फिर क्या जरुरत थी वहां राजधानी बनाने के लिए इतनी कोशिश की/ वर्त्तमान समय को  न देखो बल्कि भविष्य को देखो, दूरदृशी बन कर देखो /

मैं गैरसैण राजधानी बनाने का  पुरजोर समर्थन करता हूँ


 :)  :)  :)

Sunder Singh Negi/कुमाऊंनी

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रावत जी आपके विचार पढकर अच्छा लगा हमारी उजॉ बढी है आपके विचारो से।

dajyu/दाज्यू

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तो अब आते हैं कि क्या गैरसैण केवल कुछ पगलाये लोगों का भावनात्मक मुद्दा ही है या इसके पीछे कोई अन्य कारण भी है। लेकिन पहले मैं कुछ खाये,पीये अघाये लोगों यह बता दूँ कि उत्तराखंड राज्य प्राप्ति आन्दोलन भी कोई भावनात्मक मुद्दा नहीं था। इसकी संकल्पना को बनने, पकने और आन्दोलन का रूप लेने में पर्याप्त समय लगा। यह केवल एक राज्य के भौगोलिक धरातल को कम कर अपने लिये जमीन छांट लेने की लड़ाई नहीं थी बल्कि हिमालय के समाजों की अलग भौगोलिक  परिवेश में जीने वाले  लोगों की परेशानियों को समझने में सक्षम सरकार की स्थापना करने की लड़ाई थी। हिमाचल हो  या मेघालय सभी हिमालयी समाजों ने अपने अपने हिस्से के राज्य हमसे पहले प्राप्त कर लिये।

अब चुंकि व्हाई गैरसैण कहने वाले उत्तराखंड प्रेमी लोग पढ़े-लिखे हैं और अंग्रेजी बोलना बेहतर समझते हैं तो उनके लिये कुछ अंग्रेजी सन्दर्भ देने की कोशिश कर रहा हूँ। जीन-जैकस रूसो एक दार्शनिक हुआ करते थे। उनके बारे में दो शब्द

Jean-Jacques Rousseau is one of the most influential thinkers during the Enlightenment in eighteenth century Europe. His first major philosophical work, A Discourse on the Sciences and Arts, was the winning response to an essay contest conducted by the Academy of Dijon in 1750. In this work, Rousseau argues that the progression of the sciences and arts has caused the corruption of virtue and morality. This discourse won Rousseau fame and recognition, and it laid much of the philosophical groundwork for a second, longer work, The Discourse on the Origin of Inequality. The second discourse did not win the Academy’s prize, but like the first, it was widely read and further solidified Rousseau’s place as a significant intellectual figure. The central claim of the work is that human beings are basically good by nature, but were corrupted by the complex historical events that resulted in present day civil society.

तो रूसे साहब मानते थे कि विज्ञान  व  कला के विस्तार से नैतिक गुणों का ह्रास होना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, और इंसान स्वभावत: अच्छे ही होते हैं लेकिन घटनायें या दुर्घटनायें या परिस्थितियां उन्हें बुरा बना देती हैं, ऐसे ही लोग समाज-निर्माण करते हैं। उन्होने यह भी कहा कि

A political society is like a human body. A body is a unified entity though it has various parts that have particular functions. And just as the body has a will that looks after the well-being of the whole, a political state also has a will which looks to its general well-being. The major conflict in political philosophy occurs when the general will is at odds with one or more of the individual wills of its citizens.

एक संगठित राज्य एक मानव शरीर की तरह है, जिस तरह शरीर के प्रत्येक हिस्से का अपना एक कार्य होता है उसी तरह राज्य के अलग अलग हिस्से अलग अलग कार्य करते हैं और एक अच्छे राज्य के लिये भी इसके सभी भागों का  सुचारु रूप से कार्य करना आवश्यक है। उन्होने यह भी कहा  कि यदि राजनैतिक सत्ता , जन भावनाओं के अनुसार काम नहीं करती तो राज्य में विवाद होना अवश्यम्भावी है।

ऐसे ही एक भूगोलवेत्ता थे कार्ल रिटर जिन्होने राज्य के जैविक विकास के सिद्धांत का प्रतिपादन किया। इस सिद्धांत को फ्रेडरिक रैटजल, हॉसहॉफ़र और रुडोल्फ जैसे कई लोगों ने माना और आगे बढ़ाया।

Ostensibly based upon the geopolitical theory of American naval officer Alfred Thayer Mahan, and British geographer Halford J. Mackinder, German geopolitik adds older German ideas. Enunciated most forcefully by Friedrich Ratzel and his Swedish student Rudolf Kjellén, they include an organic or anthropomorphized conception of the state, and the need for self-sufficiency through the top-down organization of society.[9] The root of uniquely German geopolitik rests in the writings of Karl Ritter who first developed the organic conception of the state that would later be elaborated upon by Ratzel and accepted by Hausfhofer.

राज्य के जैविक विकास के सिद्धांत के अनुसार जिस प्रकार शरीर कोशिकाओं का बना होता है वैसे ही राज्य का हर स्थान मानव शरीर की एक कोशिका की तरह काम करता है। यही कोशिकायें समान इच्छा शक्ति, समान आकांक्षा, समान गुण-धर्म वाले लोगों के आवास में बदल जाती हैं और राज्य के गुण-धर्म को प्रभावित करती हैं।  तो एक राज्य का गुण-धर्म उनमें स्थित स्थानों और उन स्थानों में रहने वाले व्यक्तियों की भावना का प्रतिरूप होता है। डार्विन नें लगभग यही सिद्धांत जीव-विकास के लिये प्रतिपादित किया था।

अमरीकी भूगोलविज्ञानी स्टीलसी ने माना की किसी भी राज्य में एक ऐसा ऊर्जा केन्द्र होता है जो राज्य को जीवित रखता है। स्टीलसी नें एक नाभिस्थल की संकल्पना की और कहा किसी भी राज्य के भविष्य का निर्धारण उसके नाभि-स्थल (महत्वपूर्ण स्थल) से होता है। हाँलाकि स्टीलसी ने स्पष्ट रूप से यह नहीं कहा कि यह नाभिस्थल ही राजधानी का स्थान है लेकिन कई विद्वानों नाभि-स्थल को राजधानी के रूप में प्रतिपादित किया।

अब यदि उत्तराखंड राज्य हिमालय समाज को एक अलग परिप्रेक्ष्य में रखकर उसका योजनाबद्ध विकास करने के लिये बना है और इसका मूल गुण-धर्म पहाड़ी है तो इसकी राजधानी पहाड़ में होनी चाहिये ना कि मैदानी इलाके में, और यह स्थान नाभि की तरह राज्य के मध्य भाग के आसपास होना चाहिये। इस स्थिति में गैरसैण एक उपयुक्त स्थान बैठता है।

अल्ल इतुके... चर्चा जारी रहेगी।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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One of the reasons people who are not favoring the issue is that they are not fully aware about the history of Uttarakhand struggle and need of the development.

In my previous posts, I have written the Centre Govt has already preserved around 2000 Crs for so for shifting of the capital which will lapse in 2010, if the capital is not shifted. So this is the high time for Govt now to shift capital utilizing this huge amount. Later, if it is shifted, Govt will have to incur heavy amount in shifting the Capital.

Sunder Singh Negi/कुमाऊंनी

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इसी लिए तो ये मुद्दा तूल पकडता जा रहा है सर जी

हेम पन्त

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Mehta ji,
We are getting success to tell the importance of Gairsain as capital, to many young Uttarakhandis... They are now getting our point and joining us in this agitation..

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Please go through the news and how much your state has developed during these closed to 9 yrs time.

On ground of fast development, everybody wish to have Gairsain as Capital of Uttarakhand.

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News. 1..
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थैंग गांव न दशा सुधरी न दिशाAug 24, 10:47 pmबताएं
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गोपेश्वर (चमोली)। राज्य बनने के आठ साल बाद भी जनपद का सीमावर्ती थैंग गांव में समस्याओं का अंबार लगा हुआ है। यह गांव आज भी विकास की राह देख रहा है।

विकासखंड जोशीमठ का यह गांव किसी परिचय का मोहताज नहीं है। यह गांव रामदाना, आलू, राजमा दाल, खुमानी व विभिन्न प्रजाति के सेब आदि फलों के उत्पादन के लिए जाना जाता है। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि सड़क मार्ग से 8 किमी की दूरी पर स्थित यह गांव आज भी मूलभूत सुविधाओं से वंचित है। पर्यटन की अपार संभावनाएं संजोए इस गांव में प्रकृति मेहरबान तो रही, लेकिन इस गांव का आज तक विद्युतीकरण नहीं हो पाया। इसके साथ ही पर्यटन के लिहाज से महत्वपूर्ण इस गांव में संचार सुविधा तक बहाल नहीं हो पायी है। गांव में वर्षो पूर्व खुले हाईस्कूल में आज तक अध्यापकों की नियुक्ति नहीं हो पायी। गांव में सड़क मार्ग तो दूर, पैदल मार्ग की भी समुचित व्यवस्था नहीं है। ग्रामीणों के लिए समुचित चिकित्सा व्यवस्था की भी नहीं है। पूर्व जिला पंचायत सदस्य भवान सिंह चौहान व प्रकाश रावत का कहना है कि गांव की दयनीय स्थिति को लेकर वे कई बार शासन प्रशासन से गुहार कर चुके हैं, लेकिन सरकार ने आज तक गांव की सुध ही नहीं ली।

http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttranchal/4_5_5730659.html
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सड़क की दुर्दशा पर भड़के ग्रामीणAug 26, 10:45 pmबताएं
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उत्तरकाशी। सड़क की दुर्दशा पर प्रशासन के खिलाफ संग्राली गांव का गुस्सा आखिर सड़क पर फूट पड़ा। ग्रामीणों ने तेखला-संग्राली मोटर मार्ग को लेकर ढोल-बाजों के साथ जुलूस प्रदर्शन किया। चेतावनी दी कि यदि सड़क की मरम्मत जल्द शुरू न हुई तो वे अनिश्चितकालीन चक्का जाम शुरू कर देंगे।

ढाई सौ करोड़ वरुणावत पैकेज में ट्रीटमेंट सवालों के कटघरे में है, वहीं इस पैकेज ने संग्राली गांव की जिन्दगी में तूफान खड़ा किया हुआ है। गांव तक की सड़क पर ट्रीटमेंट के दौरान भारी वाहनों के चलने से मार्ग पूर्ण रूप से क्षतिग्रस्त है। ग्रामीण कई बार जिलाधिकारी डा. बीवीआरसी पुरुषोत्तम से शिकायत कर चुके हैं, पर अभी तक सड़क निर्माण को लेकर कोई कदम नहीं उठाया जा रहा।

ग्रामीणों ने बुधवार को मुख्यालय में ढोल बाजों के साथ जोरदार प्रदर्शन के साथ ही कलेक्ट्रेट में जमकर हंगामा काटा। जिलाधिकारी को सौंपे ज्ञापन में मांग की गई है कि सड़क शीघ्र दुरुस्त नहीं की गई तो ग्रामीण अनिश्चितकालीन चक्का जाम शुरू कर देंगे। उन्होंने क्षेत्रीय विधायक गोपाल रावत को भी पत्र भेजा है। ग्रामीणों ने कहा कि विधायक प्रशासन पर सड़क निर्माण को लेकर दबाव बनाए अन्यथा संग्राली गांव के आंदोलन में शामिल होकर उनका समर्थन करें। ज्ञापन सौंपने में क्षेत्र पंचायत सदस्य पवना देवी, प्रधान सुख शर्मा, पूर्व प्रमुख सुरेश चौहान, कमल सिंह रावत, सुबोध भट्ट, रविन्द्र भट्ट, जगदीश प्रसाद नौटियाल, मदन लाल, संतोष कुमार, समेत अन्य शामिल रहे।

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news 3
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कौन सुनेगा श्रमिकों की परेशानियांAug 24, 10:52 pmबताएं
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नई टिहरी गढ़वाल। कहने को तो सरकार की ओर से श्रमिकों के लिए विभिन्न कानून बनाए गए हैं। श्रमिक व श्रमदाता के बीच बेहतर समन्वय बनाने व कर्मचारियों के शोषण पर नजर रखने व कार्रवाई करने के लिए श्रम विभाग का गठन तो किया गया है, लेकिन संसाधनों के अभाव में यह भी लक्ष्य प्राप्त नहीं कर पा रहे हैं। आलम यह है कि टिहरी व उत्तरकाशी के लिए महज पांच कर्मचारी नियुक्त किए गए हैं, जबकि इन जिलों में विभिन्न जल विद्युत परियोजनाओं में हजारों श्रमिक कार्यरत हैं। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर श्रमिकों की समस्याएं कौन सुनेगा।

श्रम कानूनों का कड़ाई से पालन करने के लिए सरकार ने श्रम विभाग तो बना दिया, लेकिन इसका ढांचा ही नहीं बन पाया है। संविधान की समवर्ती सूची में शामिल श्रम टिहरी के श्रम अधिकारी के पास उत्तरकाशी की भी जिम्मेदारी है, लेकिन दोनों जनपदों में विभाग के पास कर्मचारियों का टोटा बना हुआ है। टिहरी में श्रम अधिकारी के साथ एक लिपिक व चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी है, जबकि उत्तरकाशी में भी एक लिपिक व एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी तैनात है। खास बात यह है कि इन दोनों जिलों में दर्जनों छोटी-बड़ी लघु जल विद्युत परियोजनाएं चल रही है। जहां बड़ी संख्या में श्रमिक कार्य कर रहे हैं। इन श्रमिकों की कई समस्याएं भी है, लेकिन जब विभाग के पास कर्मचारी ही नहीं हैं तो श्रम कानूनों को लागू कराने के लिए कैसे कार्य हो रहा है, यह गौर करने वाली बात है। इसके अतिरिक्त विभाग के पास बचपन संरक्षण अधिनियम, बंधुवा श्रमिक निवारण सहित कई कार्यक्रम हैं, लेकिन ये भी महज कागजों में ही चल रहे हैं। हद तो यह है कि विभाग के पास अपना वाहन व कंप्यूटर तक उपलब्ध नहीं है। श्रम अधिकारी उमेश चंद्र राय स्वीकारते हैं कि संसाधनों के अभाव में कार्य करने में परेशानी हो रही है। उन्होंने बताया कि गत वर्ष टिहरी में बाल श्रमिकों से संबंधित 60 छापे टिहरी व 30 छापे उत्तरकाशी में मारे गए। दोनों जिलों में पांच-पांच बाल श्रमिकों को मुक्त कराया गया। जिनके पुनर्वास की प्रक्रिया चल रही है। उन्होंने बताया कि भवन एवं अन्य सन्न निर्माण कर्मकार अधिनियम में पंजीकरण के लिए सरकारी व गैर सरकारी निर्माण एजेंसियों को पत्र लिखा गया है। लेकिन अब तक सरकारी एजेंसियों ने इसके लिए पंजीकरण नहीं कराया है। उन्होंने बताया कि पंजीकरण के लिए कार्रवाई की जा रही है।


 

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