Author Topic: Gairsain: Uttarakhand Capital - गैरसैण मुद्दा : अब यह चुप्पी तोड़नी ही होगी  (Read 175499 times)

पंकज सिंह महर

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जीवन जी, आपका स्वागत है विचारों सहित।

विकास के कई रुप होते हैं, विकास की एक स्ट्रीम होती है, उसी स्ट्रीम से विकास होता है, एक सतत प्रक्रिया है विकास, जो प्रशासनिक प्रणाली हमारे देश में लागू है, उसके लिये विकास को आम आदमी तक पहूंचाने के लिये एक लम्बी प्रकिया है। जिसका स्वरुप ग्राम सभा, विकास खण्ड, तहसील, जिले और म्ण्डल होते हैं। इन सभी का केन्द्र बिन्दु होती है प्रदेश की राजधानी।
अब सवाल है राजधानी का, यह सब प्रकिया समरुप उ०प्र० से भी लागू हो रही थी। अलग राज्य का सवाल क्यों उठा, उसके विस्तार में जाने की आवश्यकता नहीं है। पर्वतीय राज्य की अवधारणा का ही प्रतिफल उत्तराखण्ड राज्य है। तो उसकी राजधानी भी पर्वतीय क्षेत्र में ही अवस्थित होनी चाहिये, तभी तो पर्वतीय राज्य की अवधारणा पूर्ण हो पायेगी। फिर भावनायें भी कुछ होती हैं, जनमत भी कुछ होता है, जनता की आकांक्षायें और अपेक्षायें भी कुछ होती हैं।
जहां तक आपने कहा कि हमें भावनाओं में नहीं बहना चाहिये, लेकिन जब हम भावनाओं में बहे, तभी हम अलग उत्तराखण्ड राज्य ले पाये, नहीं तो इसके लिये आन्दोलन १८६२ से चल रहा था।
अभी तक लोगों में यह भ्रान्ति है कि देहरादून में जो राजधानी बनी है, उसी से काम चलाया जा सकता है, यह तर्क सही है, लेकिन वास्तविकता यह है कि यह प्रदेश की अस्थाई राजधानी है, जिस दिन इसे स्थाई घोषित किया जायेगा, जो सेटअप आज हम गैरसैंण ले जाने के लिये कह रहे हैं, वहीं सेटअप देहरादून में बनाया जायेगा, जो कि इससे कहीं अधिक खर्चीला होगा। हमारा यह कहना है कि जो पैसा आप कल के  दिन देहारादून में स्थाई राजधानी के  लिये खर्च करोगे उसे  जनभावनाओं के अनुरुप गैरसैंण में खर्च कर दो। जब खर्चा होना ही है तो जनता की भावना के अनुसार हो। पहाड़ की राजधानी मैदानी क्षेत्र में हो, य्ह भी अटपटा लगता है।
एक बहुत बड़ी साजिश उत्तराखण्ड/पहाड़ के विरोधियो द्वारा की जा रही है, इसे रोकने के लिये हमें जागृत होना पड़ेगा, आप-हम तो व्यवहारिकता देख रहे हैं और वे लोग दुरदर्शिता से देख रहे हैं। मैं स्पष्ट दूं कि अभी हुये परिसीमन से पहाड़ॊं की ६ सीट समाप्त हो गई  और मैदानी जिलॊं मॆं मिल गई। २०२६ के परिसीमन में यह संख्या बढ़ेगी, क्योंकि पहाड़ आज खाली हो रह हैं और जनता पलायन कर मैदानी क्षेत्रों में आ रही  है। यह उसी दिन का इंतजार कर रहे  हैं, उस दिन हम सबको फिर अपने पहाड़ी क्षेत्र के अस्तित्व की लड़ाई लड़नी होगी। तब न जाने कितने लोग बचेंगे यह आवाज उठाने के लिये। इसलिये यह लड़ाई लड़ी जा रही है और यह लड़ाई जरुरी है।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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I fully endorse Pankaj JI views on the issue..

जीवन जी, आपका स्वागत है विचारों सहित।

विकास के कई रुप होते हैं, विकास की एक स्ट्रीम होती है, उसी स्ट्रीम से विकास होता है, एक सतत प्रक्रिया है विकास, जो प्रशासनिक प्रणाली हमारे देश में लागू है, उसके लिये विकास को आम आदमी तक पहूंचाने के लिये एक लम्बी प्रकिया है। जिसका स्वरुप ग्राम सभा, विकास खण्ड, तहसील, जिले और म्ण्डल होते हैं। इन सभी का केन्द्र बिन्दु होती है प्रदेश की राजधानी।
अब सवाल है राजधानी का, यह सब प्रकिया समरुप उ०प्र० से भी लागू हो रही थी। अलग राज्य का सवाल क्यों उठा, उसके विस्तार में जाने की आवश्यकता नहीं है। पर्वतीय राज्य की अवधारणा का ही प्रतिफल उत्तराखण्ड राज्य है। तो उसकी राजधानी भी पर्वतीय क्षेत्र में ही अवस्थित होनी चाहिये, तभी तो पर्वतीय राज्य की अवधारणा पूर्ण हो पायेगी। फिर भावनायें भी कुछ होती हैं, जनमत भी कुछ होता है, जनता की आकांक्षायें और अपेक्षायें भी कुछ होती हैं।
जहां तक आपने कहा कि हमें भावनाओं में नहीं बहना चाहिये, लेकिन जब हम भावनाओं में बहे, तभी हम अलग उत्तराखण्ड राज्य ले पाये, नहीं तो इसके लिये आन्दोलन १८६२ से चल रहा था।
अभी तक लोगों में यह भ्रान्ति है कि देहरादून में जो राजधानी बनी है, उसी से काम चलाया जा सकता है, यह तर्क सही है, लेकिन वास्तविकता यह है कि यह प्रदेश की अस्थाई राजधानी है, जिस दिन इसे स्थाई घोषित किया जायेगा, जो सेटअप आज हम गैरसैंण ले जाने के लिये कह रहे हैं, वहीं सेटअप देहरादून में बनाया जायेगा, जो कि इससे कहीं अधिक खर्चीला होगा। हमारा यह कहना है कि जो पैसा आप कल के  दिन देहारादून में स्थाई राजधानी के  लिये खर्च करोगे उसे  जनभावनाओं के अनुरुप गैरसैंण में खर्च कर दो। जब खर्चा होना ही है तो जनता की भावना के अनुसार हो। पहाड़ की राजधानी मैदानी क्षेत्र में हो, य्ह भी अटपटा लगता है।
एक बहुत बड़ी साजिश उत्तराखण्ड/पहाड़ के विरोधियो द्वारा की जा रही है, इसे रोकने के लिये हमें जागृत होना पड़ेगा, आप-हम तो व्यवहारिकता देख रहे हैं और वे लोग दुरदर्शिता से देख रहे हैं। मैं स्पष्ट दूं कि अभी हुये परिसीमन से पहाड़ॊं की ६ सीट समाप्त हो गई  और मैदानी जिलॊं मॆं मिल गई। २०२६ के परिसीमन में यह संख्या बढ़ेगी, क्योंकि पहाड़ आज खाली हो रह हैं और जनता पलायन कर मैदानी क्षेत्रों में आ रही  है। यह उसी दिन का इंतजार कर रहे  हैं, उस दिन हम सबको फिर अपने पहाड़ी क्षेत्र के अस्तित्व की लड़ाई लड़नी होगी। तब न जाने कितने लोग बचेंगे यह आवाज उठाने के लिये। इसलिये यह लड़ाई लड़ी जा रही है और यह लड़ाई जरुरी है।

पंकज सिंह महर

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हमें इनके कुचक्र को समझना होगा, इनसे आज से ही लड़ना होगा, नहीं तो हम और हमारा पहाड़ कहीं का नहीं रहेगा। भाईयो, खाली प्रैक्टिकल होकर नहीं दूरदर्शी होकर सोचो, परिसीमन की मार पलायन के कारण पहाड़ों को निरन्तर झेलनी ही होगी। उत्तराखण्ड के मैदानी जिलों में लगातार विधान सभा क्षेत्रों में वृद्धि होती जायेगी, फिर वोट की राजनीति के लिये कुछ भी कर देने वाले राजनीतिज्ञ उन्हीं जनपदों पर फोकस करेंगे, जहां से उनकी सरकार बनेगी, फिर उत्तराखण्ड का हाल वही होगा, जो उत्तर प्रदेश के समय में था। फिर हमारी इस लड़ाई और ५२ शहादतों का क्या होगा? जो लड़ाई हमने पर्वतीय क्षेत्र की उपेक्षा के विरोध में लड़ी थी, उसका क्या होगा?
आज पर्वतीय क्षेत्र के विरोधी ये लोग तो चुपचाप तमाशा देख रहे हैं और प्रतीक्षा कर रहे हैं कि कैसे भी राजधानी मैदानों में ही रहे।
मेरा अनुरोध है कि बिना पूरे तथ्यों पर गौर किये बिना अपनी प्रतिक्रिया अपने आप को होशियार और समझदार दिखाने के लिये न दें। गैरसैंण के पक्षकार भी कोई पागल या वेवकूफ नहीं है, वे लोग राष्ट्रीय स्तर के अर्थवेत्ता, भूगर्भ शास्त्री, राजनीतिज्ञ, पत्रकार, बुद्धिजीवी, जनकवि, सामाजिक कार्यकर्ता, आदि हैं, जो रमन मैग्सेसे और पद्म श्री आदि जैसे अनेक पुरस्कारों से अलंकृत भी हैं।

Sunder Singh Negi/कुमाऊंनी

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जन्ता का फैसला ही अन्तिम फैसला होता है, चाहे वो सरकार चुनने मे हो या विकाश करने मे हो। जन्ता जीसे समथॅन देती या जीस का समथॅन करती है वही होता है। इस लिए गैरसैण को जन्ता का भरपूर समथॅन है तो राजधानी वही बननी चाहिए। और जो जन्ता कह रही है कि वही से समपुणॅ उत्तराखण्ड का विकाश होगा। तो वह होगा भी। इस लिए हमे किसी आयोग की कुतॅक रिपोट की जरूरत नही है क्योकी हमारे पास जन्ता की रिपोट है।

KAILASH PANDEY/THET PAHADI

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All D best to team tembers.

Jai Urrakhand
Jai Bharat

Sunder Singh Negi/कुमाऊंनी

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आप रूख करो पहाड का,
हम दुवाओ की जंजीर जोडते है।
पहुचो तुम सलामत गैरसैण,
हम हवाओ से पैगाम भेजते है।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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From: Pooran Kandpal <kandpalp@yahoo.com>


Mitro, ye mein ke shak nhen. Rajdhani zaroor Gairsain jan chenchh. 42 shaheed le puchherayi, kyele baha hamul aapan khoon. kyele khei hamul goi aapan chhatim. ya baat gaddinasheenon hoon puchhi jan chenchh.kandpal
 

 
 

 

Pooran Chandra Kandpal

Sahityakar


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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From: "sain singh rawat" <sainsingh_rawat@rediffmail.com>
 
Subject: Re: [Members-MeraPahad] AAJ NAHI TO KAL YE HOGA - RAJDHANI GAIRSAIN
IN my view Capital Should be Gairesand
Reason is being it is in Centre Place of Garhwal and Kumano and
Best Reason is it is Real Pahari Area , Un-develpoped which will Get Developed After it Becomes Capital.

As Deharadun is Saturated and no Place for further Development.
it is not looks Really Pahari or Uttrakhand Capital.

Garisand Can be Developed by Developing Road Railway. Goverments Quarters,

All Goverment office, more Jobs for Real Pahari People.

dhanyavad

sainsingh

Devbhoomi,Uttarakhand

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गैरसैण को राजधानी बनाने का उधेध्य विकास से ही है. सर्वप्रथम तो गैरसैण उत्तराखंड के केंद्र में बसा हुआ है. राजधानी शब्द का मूल ही केद्र है. गैरसैण की सीमा उत्तराखंड के दोनों क्षेत्रों को टच करती है गढ़वाल क्षेत्र को भी और कुमाओं. कहने का मतलब ये है कि दोनों क्षेत्र के लिए ये सबसे नजदीकी बिंदु है.
दूसरा सबसे बड़ा मुद्दा है विकास का. आज अगर देहरादून का कुछ विकास हुआ है तो उसमे राजधानी का भी अपना एक अमूल्य योगदान है. राजधानी बनने के बाद देहरादून का चहुमुखी विकास हुआ है. ये  आप सभी लोग जानते है. अगर राजधानी को गैरसैण बनाया जाता है तो उत्तराखंड के शहरी क्षेत्रों के अलावा ग्रामीण क्षेत्रों के विकास कि भी सम्भावना भी बढ़ सकती है.  जिस गति से राजधानी बनने के बाद देहरादून और उसके आस पास के इलाकों का विकास हुआ, शायद उसी गति से उत्तराखंड के अन्य पहाडी क्षेत्रों का विकास हो सकता है.
मैं ज्यादा विस्तार में ना जाकर ये कहना चाहता हूँ कि यदि राजधानी के नाम पर देहरादून का विकास हो सकता है तो राजधानी के नाम पर गैरसैण का विकास भी हो सकता है और अगर गैरसैण का विकास होता है तो इसका मतलब ग्रामीण क्षेत्रों का भी विकास हो सकता है. आज बहुत सारे लोगों ने अपने खेत खलिहान बेचकर देहरादून या उसके आस पास के क्षेत्रों में जमीन जायदाद लेकर बस गए है, क्यों?, क्यों पहाड़ के गाँव खली हो रहे है और पहाड़ के शहरी क्षेत्रों में भीड़ बढ़ रही है? इसका उत्तर शायद आप लोग मुझसे ज्यादा अछि तरह बता सकते है.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Yaad karo ye din..



Yaad karo struggle dino ke photos.



 

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