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विकास के कई रुप होते हैं, विकास की एक स्ट्रीम होती है, उसी स्ट्रीम से विकास होता है, एक सतत प्रक्रिया है विकास, जो प्रशासनिक प्रणाली हमारे देश में लागू है, उसके लिये विकास को आम आदमी तक पहूंचाने के लिये एक लम्बी प्रकिया है। जिसका स्वरुप ग्राम सभा, विकास खण्ड, तहसील, जिले और म्ण्डल होते हैं। इन सभी का केन्द्र बिन्दु होती है प्रदेश की राजधानी।
अब सवाल है राजधानी का, यह सब प्रकिया समरुप उ०प्र० से भी लागू हो रही थी। अलग राज्य का सवाल क्यों उठा, उसके विस्तार में जाने की आवश्यकता नहीं है। पर्वतीय राज्य की अवधारणा का ही प्रतिफल उत्तराखण्ड राज्य है। तो उसकी राजधानी भी पर्वतीय क्षेत्र में ही अवस्थित होनी चाहिये, तभी तो पर्वतीय राज्य की अवधारणा पूर्ण हो पायेगी। फिर भावनायें भी कुछ होती हैं, जनमत भी कुछ होता है, जनता की आकांक्षायें और अपेक्षायें भी कुछ होती हैं।
जहां तक आपने कहा कि हमें भावनाओं में नहीं बहना चाहिये, लेकिन जब हम भावनाओं में बहे, तभी हम अलग उत्तराखण्ड राज्य ले पाये, नहीं तो इसके लिये आन्दोलन १८६२ से चल रहा था।
अभी तक लोगों में यह भ्रान्ति है कि देहरादून में जो राजधानी बनी है, उसी से काम चलाया जा सकता है, यह तर्क सही है, लेकिन वास्तविकता यह है कि यह प्रदेश की अस्थाई राजधानी है, जिस दिन इसे स्थाई घोषित किया जायेगा, जो सेटअप आज हम गैरसैंण ले जाने के लिये कह रहे हैं, वहीं सेटअप देहरादून में बनाया जायेगा, जो कि इससे कहीं अधिक खर्चीला होगा। हमारा यह कहना है कि जो पैसा आप कल के दिन देहारादून में स्थाई राजधानी के लिये खर्च करोगे उसे जनभावनाओं के अनुरुप गैरसैंण में खर्च कर दो। जब खर्चा होना ही है तो जनता की भावना के अनुसार हो। पहाड़ की राजधानी मैदानी क्षेत्र में हो, य्ह भी अटपटा लगता है।
एक बहुत बड़ी साजिश उत्तराखण्ड/पहाड़ के विरोधियो द्वारा की जा रही है, इसे रोकने के लिये हमें जागृत होना पड़ेगा, आप-हम तो व्यवहारिकता देख रहे हैं और वे लोग दुरदर्शिता से देख रहे हैं। मैं स्पष्ट दूं कि अभी हुये परिसीमन से पहाड़ॊं की ६ सीट समाप्त हो गई और मैदानी जिलॊं मॆं मिल गई। २०२६ के परिसीमन में यह संख्या बढ़ेगी, क्योंकि पहाड़ आज खाली हो रह हैं और जनता पलायन कर मैदानी क्षेत्रों में आ रही है। यह उसी दिन का इंतजार कर रहे हैं, उस दिन हम सबको फिर अपने पहाड़ी क्षेत्र के अस्तित्व की लड़ाई लड़नी होगी। तब न जाने कितने लोग बचेंगे यह आवाज उठाने के लिये। इसलिये यह लड़ाई लड़ी जा रही है और यह लड़ाई जरुरी है।