दोस्तों गैरसैण राजधानी बनाने की खबर जोरों पर है ,लेकिन दोस्तों इसके लिए पैसे भी खर्च करने पडेगें ये बात बिलकुल सही है लेकिन ये पैसे आंयेगें कहाँ से हमारी सरकार तो गरीब है और सरकार चलाने वालों ने तो हमारी उत्तराखंड को कंगाल बना कर रखा हुआ है, अगर आप लोग इन लोगों के घरों मैं गाकर देखें तो इअतनी बड़ी-बड़ी बिल्डिंगें बना रखी और इनका बैंक बैलेंस भी क्या कहें बेंक मैं भी सायद जगह नहीं होगी और ये लो रहतें है एक सचे नेता की तरह एक कुरता पायजामा पहनकर(जैसे भिखारी घूम रहा हो) इन लोगों ने तो उत्तराखंड जी जनता को, हकीकत मैं देखा जे तो जनता भिखारी की तरह रहती है!
और दूसरी बात ये है कि- केंद्र सरकार ने जो पैसे उत्तराखंड सरकार को गैरसैण राजधानी बनाने के लिए आबंटित किये थे,वो पैसे कहाँ हैं और किसके पास है किसी को मालुम भी है!
मुझे लगता नहीं कि उत्तराखंड कि सरकार ने कुछ विकाश किया हो, न ही कुछ रोजगार के साधनों मैं विकाश हुआ है और न ही गाँवों का विकास हुआ है तो वो पैसा गया कहाँ?
ये नेता लोग भी देहरादून कि तरह,गैरसैण को भी अपने महलों का स्वर्ग बना देगें, गैरसैण मैं राज्य भवन बाद मैं बनेगा,लेकिन नेताओं के महल पहले खड़े हो जांयेंगे, और जनता विचारी हात्मलते रह जायेगी
गैरसैण राजधानी बनाने के लिए जो पैसा इन्हें मिला था, सायद इन लोगों ने उसे या कहन जमीन खरीद ली होगी या तो कहीं और सहारों अपने महल खड़े कर दिए होंगें , या कहन अपने फाइव स्टार होटले खोल दिए होंगे इस लिए ये अब गैरसैण राजधानी बनाने से मुकर रहे हैं!
ऊताराखंड की गरीब जनता की परिशानी ये लोग क्या समझेंगें , इनको तो ये भी सायद मालुम नहीं होग की उत्तराखंड मैं कितने गाँव हैं और कितने गांवों सड़कें हैं और कितने गांवों बिजली-पानी है,अरे दोस्तों इन नेताओं को जब अपनी भाषा बोलनी नहीं आती है तो ये क्या समझेंगे उन गरीब गांववालों की परिशानी और कितनी दिक्ककतों का सामना हम लोगों को करना पड़ता है!
देहरादून से ये लोग बार बार दिली पहुँच जाते हैं सरकारी खर्चे पर और अपने पूरे परिवार के साथ एक फाइव स्टार होटल मैं जाकर ठहरते हैंऔर बिल दाल देतें हैं सरकारी तिजोरी मैं, सच मैं अगर आज भी उस तिजोरी को खोला जाय तो वहां केवल कागज के तुकडे मिलेंगें बिलों के रूप मैं, इन लोगों को गैसें राजधानी बनाने का जो वायदा किया था ये लोग सायद उसे खा पीकर डकार गए और पानी पीना भूल गए, अब इन लोगों को पानी गैरसैण मैं पिलाना पड़ेगा !