गैरसैंण छोड़कर देहरादून की दुहाई
28 July, 2009 नीरज जोशी
उत्तराखण्ड को बने नौ साल हो गये लेकिन राज्य की राजधानी को लेकर अभी भी असमंजस बरकरार है. खबर है कि दीक्षित आयोग ने भी सुझाव दिया है कि राज्य की राजधानी का निर्धारण करते वक्त भौगोलिक परिस्थितियों का भी ध्यान रखा जाना चाहिए। साफ है, दीक्षित आयोग भी एक तरह से देहरादून को ही राजधानी बनाये रखने का पक्षधर है। यह हास्यास्पद हो सकता है लेकिन सच्चाई यही है कि गैरसैंण को राजधानी बनाने का विरोध करनेवाले वे लोग हैं जो अलग राज्य का ही समर्थन नहीं करते थे। गैरसैंण को राजधानी बनाने के पीछे तर्क यह था कि यह उत्तराखण्ड के गढ़वाल और कुमाऊं दोनों मण्डलों के मध्य में पड़ता है। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से गढ़वाल और कुमाऊं से समान दूरी के तर्क पर दिल्ली से नजदीकी का तर्क राजधानी बनाने के सवाल पर हावी हो गया है।
राजधनी चयन को लेकर कांग्रेस के मुख्यमंत्री एनडी तिवारी द्वारा गठित किये गये आयोग को भी सात आठ साल राजधनी ढूंढने के लिए मिले । पता नही इस बीच वे आठ साल में राजधनी के नाम कहां सैर सपाटे और तपफरी कते रहे इसे तो वे ही जानें। लेकिन यह तिवारी जी के कार्यकाल में ही तय हो गया था कि दीक्षित आयोग ने राजधनी चयन के नाम पर कुछ नही करना है। शायद ऐसी ही सलाह उन्हें राजनैतिक दलों की ओर से भी मिली हो। जो भी हो दीक्षित आयोग की यह कथित रिर्पोट जिसे जारी करने में आज भी राजनैतिक दल डर रहे हैं इस लोकसभा चुनाव से पहले ही सरकार को मिल गई थी। लेकिन इस रिपोर्ट को न जारी करने के संबंध में राज्य के दो प्रमुख दलों भाजपा और कांग्रेस में एका रहा क्योंकि यहां दोनों को ही एक खतरे का आभास हो रहा था कि अगर आयोग की रिपोर्ट में राजधनी कहीं पहाड़ में ही बनने की बात होगी तो राज्य में पहाड़ी मैदानी का वाद सुलगेगा जिसमें दोनों ही दलों को नुकसान होगा। इसलिए इस चैप्टर को चुनाव समपन्न होने तक दबा दिया गया। और उत्तराखंड में उठा राजनैतिक बवंडर थमते और निशंक की ताजपोशी के बाद जो खबर लीक की गई वह यह नही थी कि दीक्षित आयोग ने राज्य की राजधनी कहां बनाने को कहा है। बल्कि बताया यह गया कि राज्य की राजधनी के लिय केन्द्र ने आरंभ में ही जो दो सौ करोड़ रूपये दिये थे वे लैप्स होने की डर से अन्य निर्माण कार्यों में लगा दिये गये हैं, वह भी केन्द्र की अनुमति के बाद। जिसमें से आधे से कुछ कम तो खर्च भी कर दिये गये हैं और बाकी में से 100 करोड़ से भी अधिक तमाम निर्माण कार्यों के लिए आवंटित कर दिये गये हैं। इसलिए यह बताने की जरूरत ही नही कि दीक्षित आयोग ने क्या कहा है। आयोग की आंशिक रिर्पोटों के हवाले से तो यही कहा जा रहा था कि उसे पहाड़ में राजधनी बनाने पर हर जगह भौगोलिक या अन्य किस्म के नुख्स दिखाई दिये हैं।
यह मान भी लिया जाना चाहिए कि दीक्षित आयोग ने जो कहा है, या रिपोर्ट में जो है वह राज्य में सत्ता चला रहे दलों की प्रतिध्वनी है और कम से कम भाजपा और कांग्रेस तो यह कभी नही चाहते कि राजधनी देहरादून से हटाकर अपने लिए कोई समस्या खड़ी की जाय। पहाड़ की दुरूहताओं को सहज करना कभी उनके बूते की बात नही रही इसलिए देहरादून में जो रमणिक जनजीवन उन्हें नसीब हो रहा है उसका मूक आनंद ही बेहतर है। इसलिए उन्हें न विरोध की आवश्यकता है और न समर्थन की। भाजपा और कांग्रेस राजधनी को कहीं अन्यत्र तय किये जाने के मामले में इसीलिए चुप्पी की मुद्रा में है। अब इन दिनों उन्होंने मीडिया के माध्यम से एक कैम्पेन सा चला दिया है कि राज्य की राजधनी के लिए केन्द्र से मिले दो सौ करोड़ खर्च कर दिये जाने के बाद अब अगर कहीं राजधनी मिले भी तो पैसा कहां से आयेगा? वैसे सवाल तो इससे आगे भी हैं कि किसी भी पहाड़ी भू-भाग में 200 करोड़ में कौन सी राजधनी बनेगी? और इससे दुर्गम भौगोलिक इलाके में कितना इन्फ्रास्ट्रक्चर बना लिया जायेगा? फरवरी 2002 में कांग्रेस के सत्ता में आने के समय वर्तमान केन्द्रीय मंत्री हरीश रावत केन्द्र सरकार से राज्य के लिए जो पैकेज मांग रहे थे वह दस हजार करोड़ था। इसमें से आधा यानि पांच हजार करोड़ राजधनी के लिए मांगा जा रहा था। यह वास्तविकता है कि चाहे रामनगर हो या गैरसैंण पहाड़ में 200 करोड़ में राजधनी बनाना हास्यास्पद बात तो है ही। अब इसे चाहे कोई राजनैतिक हथियार की तरह इस्तेमाल करे या वास्तविकता के रूप में।
हकीकत तो यह है कि भाजपा के इससे पहले के मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूरी भी विकेन्द्रीकरण के नाम पर राज्य के हर जिला मुख्यालय में अलग अलग विभागों को स्थापित कर यह जता चुके थे कि राजधनी तो कहीं नही जाने वाली विभाग भेज कर लोगों का मन भले ही रख लिया जाय। इन सब बातों से करब करीब कापफी पहले यह स्पष्ट हो गया था कि राज्य के राजनैतिक दल राजधनी को देहरादून से इतर कहीं भी नही ले जाना चाहते। इसके बावजूद कुछ लोगों को जो वास्तव में ही पहाड़ में राजधनी के हिमायती हों कुछ आशाऐ रही हों इसके बावजूद इसमें उत्तराखंड क्रांतिदल नामकी सत्ता लोलुप पार्टी को नही गिना जा सकता। हो सकता है उसने कभी इस मुद्दे को पाला पोसा हो लेकिन अब उसके कुछ नेता सत्ता की चरण वंदना और कमाई की आश में ऐसे चंपू बन गये हैं कि वे भूल चुके हैं कि कभी राजधनी के लिए वे गैरसैंण चुन आये थे। भाजपा से जितना घालमेल उक्रांद नामक क्षेत्रीय दल कर चुका है उससे यह आश भी नही बंधती कि भविष्य में उसे संसदीय राजनीति में खाता खोलने का मौका भी मिल जाय।
बावजूद इसके राजधनी को पहाड़ में बनाने को लेकर छिटपुट आंदोलन हो रहे हैं। कुछ दबाव समूह चाहे खानापूर्ति के लिए ऐसा कर रहे हैं या अपने अस्तित्व और विरोध की राजनीति को जिंदा रखने के लिए वे गाहे-बगाहे चौराहों पर बैठ रहे हों। जिन्होंने उत्तराखंड राज्य गठन के समय विशाल तादात में सारे नेतृत्व को धता बताकर स्वत:स्फूर्त होते जनोदालनों को देखा है और मंसूरी, खटीमा रामपुर तिराहा एवं लाल किले की समर्पित भीड़ को देखा है वे मान सकते हैं कि जनता राजधनी के आंदोलन में अभी तक भगीदार नही बनी है। ऐसा होना निहायत जरूरी है। लेकिन राज्य बनने के बाद पहचान के सवाल पर आंदोलन में कूदे लोग शायद राजधनी के नाम पर कोई रूचि नही लेना चाहते। जहां तक सवाल गैरसैंण का है तो यह झुनझुना उक्रांद का था भाजपा की गोद में बैठकर उसने इसे तिलांजली देदी है। हाल फिलहाल तो गैरसैंण से किसी भी तरह की नजदीकी रखने वाले ही आंदोलन कर रहे हैं। लेकिन राजनैतिक दलों के देहरादून में आसन जमा लेने के बाद इस आसन को डुलाने की क्षमता अगर किसी में है तो वह जनता के पास है। इसलिए राजधनी के मसले पर देखना यह होगा कि एक निडर और विशालकाय स्वत:स्फूर्त आंदोलन से राज्य छीन लेने वाली जनता आखिर राजधनी के मामले में क्या रूख अपनाती है।
साभार-
http://visfot.com/index.php/peoples_power/1269.html