Author Topic: Gairsain: Uttarakhand Capital - गैरसैण मुद्दा : अब यह चुप्पी तोड़नी ही होगी  (Read 175489 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Pant Ji,

People have different views on this subject. Most of the members are not understanding the issue. There is totally a political conspiracy on this issue just to divert the attention of people from this issue.

Can anybody answer this questions why the tenture of Dixit Ayog was extended 11 times during these 8 yrs ?

As regards this 2000 crs rupees, this has been preserved by Centre only this purpose not other which will be lapsed if the capital is not shifted within the stipultated time frame.
 

Dear All,

In my last letter i had mentioned that the current scenario is demeaning, infrastructure, health, education and employment first. We should thing that what is the priority for us. Have you made any call to your relatives in Uttarakhnd and try to know the major issue of there? They need development, they need education for his/her child, the need water harvesting for fields and they need a good and fair administration.
Do you think why we are demanding now a Capital when we know that the other lots of major issues are pending? Why not we decentralized our administration and open small secretariat in every district so that the people can resolve his and her issue in the district. We are know very well that how much our villagers are financially strong to go capital to resolve his/her issue and you know very well that how much time you have to come to resolve your issue and the first thing the local administration will view only your districts problem. It is very fastest, economical and effective process and  it also generate various jobs.
We should understand that the hills always more expensive than plains. Cost of constriction is double than plains because of unavailability of materials and transportation cost become it more expansive. 
I thought it will be better if we will make district level online group and concentrate on district level and share our experience at here.
Now I hope all members will understand that we use our power and strength to develop our state.

We use 2000 Cr. Rupee in Development of Uttarakhand not for in a Capital. It is wastage of Money.

Jai Goljeu jai Uttarakhand


पंकज सिंह महर

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सवाल विकास का नहीं, वो तो उ०प्र० से भी हो ही रहा था। सवाल अस्तित्व का है, अस्मिता है, सपनों का है, भावनाओं का है और भविष्य का है।

पहाड़ तक विकास नहीं पहुंच पा रहा था, उ०प्र० का अधिकांश क्षेत्र मैदानी होने के कारण नीतियां भी मैदानी क्षेत्रों को ध्यान में रखकर बनाई जाती थी, इसलिये अलग राज्य की अवधारणा बनी, पर्वतीय राज्य की और इस पर्वतीय राज्य की राजधानी मैदानी क्षेत्र में होने से आज फिर वही समस्या आ रही है, जो पहले आ रही थी। इसलिये गैरसैंण.....मांग रहे हैं। कुछ कारण और भी हैं, राजनैतिक और सामाजिक....

Sunder Singh Negi/कुमाऊंनी

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सुविधा पहाड़ों के नाम पर, मौज मैदानों की.

एक और बडी खबर एक बडा खुलासा


Aug 31,12:18 amबताएं


देहरादून। उत्तराखंड को मिले विशेष राज्य के दर्जे के बात हो या अन्य विशेष केंद्रीय सहायता की, राज्य की विकट भौगोलिक परिस्थितियों की वजह से मिलने वाली इन सुविधाओं से उत्तराखंड की सरकारें पहाड़ों को लाभान्वित नहीं कर पाई हैं। राज्य का सिर्फ मैदानी क्षेत्र इसका सुख भोग रहा है।

उत्तराखंड को विशेष राज्य का दर्जा दो देशों के साथ सीमा से जुड़े होने और विकट भौगोलिक स्थिति के कारण प्राप्त हुआ है। इसके तहत केंद्र सहायतित योजनाओं में मिलने वाली आर्थिक मदद 90:10 के अनुपात में अनुदान और ऋण के रूप में मिलता है। इसी वजह से राज्य को कई योजनाएं भी मिलती हैं। पहाड़ों में इन योजनाओं का लाभ कहीं दिखाई नहीं देता। यदि कोई योजना मंजूर भी हो जाती है तो वह भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाती है। केंद्र सरकार हिमालयी राज्यों के नाम पर कई योजनाएं संचालित कर रही है। इन योजनाओं का लाभ उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्रों को होता नहीं दिखाई दे रहा है। कार्मिकों के मामले में विभिन्न विभागों की हालत देखिए कि देहरादून, हरिद्वार, रुड़की, हल्द्वानी तथा ऊधमसिंह नगर में हर विभाग में ओवर स्ट्रेंथ है। पहाड़ों में लगभग सभी विभाग खाली पड़े हुए हैं। वहां काम कर रहे इक्का दुक्का कार्मिकों के हित में प्रस्तावित प्रोत्साहन नीति को भी प्रभावशाली कर्मचारी नेता लागू नहीं होने दे रहे हैं।

विधायकों-मंत्रियों को स्थानांतरण में अपना कोटा चाहिए। उनके ये विशेषाधिकार किसी पारदर्शी नीति को लागू नहीं होने दे रहे हैं। विधायकों, मंत्रियों तथा कर्मचारी नेताओं का एक तरह से नेक्सेस काम कर रहा है। यदि दुर्गम स्थान पर कार्य कर रहे कार्मिक को सुगम स्थल पर भी आवास भत्ता और अन्य लाभ मिलने लगें तो किसे आपत्ति हो सकती है। इससे दुर्गम स्थलों की कार्य व्यवस्था में सुधार जरूर आएगा। लेकिन यह पारदर्शी नीति नेताओं के विशेषाधिकार समाप्त कर देगी। पूरी नौकरी सुगम स्थलों पर करने वाले कर्मचारी नेता भी इसे पचा नहीं पाएंगे। इसलिए यह नेक्सेस इस तरह की किसी नीति को लागू नहीं होने देना चाहता है। कैबिनेट में भी ऐसी नीतियों को पारित न होने देने के प्रति इस तरह के स्वार्थ बढ़चढ़ कर कार्य कर रहे हैं। एक तथ्य यह भी है कि औद्योगिक पैकेज विशेष राज्य के कारण मिला पर इसका लाभ पर्वतीय क्षेत्र को मामूली भी नहीं मिल पाया है। पर्वतीय क्षेत्र के लिए बनी औद्योगिक नीति भी ठंडे बस्ते में है।

उत्तर प्रदेश में रहते हुए पहाड़ों की उपेक्षा का आरोप लगाने वालों की अब आंखें खुल जानी चाहिए। पर्वतीय राज्य बनने के बाद यदि अपनी सरकार ही पहाड़ों की उपेक्षा करेगी तो उसका नुकसान पिछड़े और दुर्गम क्षेत्रों को ही तो उठाना पड़ेगा।

dayal pandey/ दयाल पाण्डे

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Dear Friends,
                   Namaskar Gairsain Trupes came back at Delhi after compliting a successful Mission, detail give you Later.

पंकज सिंह महर

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गैरसैंण छोड़कर देहरादून की दुहाई
28 July, 2009 नीरज जोशी
 
 उत्तराखण्ड को बने नौ साल हो गये लेकिन राज्य की राजधानी को लेकर अभी भी असमंजस बरकरार है. खबर है कि दीक्षित आयोग ने भी सुझाव दिया है कि राज्य की राजधानी का निर्धारण करते वक्त भौगोलिक परिस्थितियों का भी ध्यान रखा जाना चाहिए। साफ है, दीक्षित आयोग भी एक तरह से देहरादून को ही राजधानी बनाये रखने का पक्षधर है। यह हास्यास्पद हो सकता है लेकिन सच्चाई यही है कि गैरसैंण को राजधानी बनाने का विरोध करनेवाले वे लोग हैं जो अलग राज्य का ही समर्थन नहीं करते थे। गैरसैंण को राजधानी बनाने के पीछे तर्क यह था कि यह उत्तराखण्ड के गढ़वाल और कुमाऊं दोनों मण्डलों के मध्य में पड़ता है। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से गढ़वाल और कुमाऊं से समान दूरी के तर्क पर दिल्ली से नजदीकी का तर्क राजधानी बनाने के सवाल पर हावी हो गया है।

राजधनी चयन को लेकर कांग्रेस के मुख्यमंत्री एनडी तिवारी द्वारा गठित किये गये आयोग को भी सात आठ साल राजधनी ढूंढने के लिए मिले । पता नही इस बीच वे आठ साल में राजधनी के नाम कहां सैर सपाटे और तपफरी कते रहे इसे तो वे ही जानें। लेकिन यह तिवारी जी के कार्यकाल में ही तय हो गया था कि दीक्षित आयोग ने राजधनी चयन के नाम पर कुछ नही करना है। शायद ऐसी ही सलाह उन्हें राजनैतिक दलों की ओर से भी मिली हो। जो भी हो दीक्षित आयोग की यह कथित रिर्पोट जिसे जारी करने में आज भी राजनैतिक दल डर रहे हैं इस लोकसभा चुनाव से पहले ही सरकार को मिल गई थी। लेकिन इस रिपोर्ट को न जारी करने के संबंध में राज्य के दो प्रमुख दलों भाजपा और कांग्रेस में एका रहा क्योंकि यहां दोनों को ही एक खतरे का आभास हो रहा था कि अगर आयोग की रिपोर्ट में राजधनी कहीं पहाड़ में ही बनने की बात होगी तो राज्य में पहाड़ी मैदानी का वाद सुलगेगा जिसमें दोनों ही दलों को नुकसान होगा। इसलिए इस चैप्टर को चुनाव समपन्न होने तक दबा दिया गया। और उत्तराखंड में उठा राजनैतिक बवंडर थमते और निशंक की ताजपोशी के बाद जो खबर लीक की गई वह यह नही थी कि दीक्षित आयोग ने राज्य की राजधनी कहां बनाने को कहा है। बल्कि बताया यह गया कि राज्य की राजधनी के लिय केन्द्र ने आरंभ में ही जो दो सौ करोड़ रूपये दिये थे वे लैप्स होने की डर से अन्य निर्माण कार्यों में लगा दिये गये हैं, वह भी केन्द्र की अनुमति के बाद। जिसमें से आधे से कुछ कम तो खर्च भी कर दिये गये हैं और बाकी में से 100 करोड़ से भी अधिक तमाम निर्माण कार्यों के लिए आवंटित कर दिये गये हैं। इसलिए यह बताने की जरूरत ही नही कि दीक्षित आयोग ने क्या कहा है। आयोग की आंशिक रिर्पोटों के हवाले से तो यही कहा जा रहा था कि उसे पहाड़ में राजधनी बनाने पर हर जगह भौगोलिक या अन्य किस्म के नुख्स दिखाई दिये हैं।

यह मान भी लिया जाना चाहिए कि दीक्षित आयोग ने जो कहा है, या रिपोर्ट में जो है वह राज्य में सत्ता चला रहे दलों की प्रतिध्वनी है और कम से कम भाजपा और कांग्रेस तो यह कभी नही चाहते कि राजधनी देहरादून से हटाकर अपने लिए कोई समस्या खड़ी की जाय। पहाड़ की दुरूहताओं को सहज करना कभी उनके बूते की बात नही रही इसलिए देहरादून में जो रमणिक जनजीवन उन्हें नसीब हो रहा है उसका मूक आनंद ही बेहतर है। इसलिए उन्हें न विरोध की आवश्यकता है और न समर्थन की। भाजपा और कांग्रेस राजधनी को कहीं अन्यत्र तय किये जाने के मामले में इसीलिए चुप्पी की मुद्रा में है। अब इन दिनों उन्होंने मीडिया के माध्यम से एक कैम्पेन सा चला दिया है कि राज्य की राजधनी के लिए केन्द्र से मिले दो सौ करोड़ खर्च कर दिये जाने के बाद अब अगर कहीं राजधनी मिले भी तो पैसा कहां से आयेगा? वैसे सवाल तो इससे आगे भी हैं कि किसी भी पहाड़ी भू-भाग में 200 करोड़ में कौन सी राजधनी बनेगी? और इससे दुर्गम भौगोलिक इलाके में कितना इन्फ्रास्ट्रक्चर बना लिया जायेगा? फरवरी 2002 में कांग्रेस के सत्ता में आने के समय वर्तमान केन्द्रीय मंत्री हरीश रावत केन्द्र सरकार से राज्य के लिए जो पैकेज मांग रहे थे वह दस हजार करोड़ था। इसमें से आधा यानि पांच हजार करोड़ राजधनी के लिए मांगा जा रहा था। यह वास्तविकता है कि चाहे रामनगर हो या गैरसैंण पहाड़ में 200 करोड़ में राजधनी बनाना हास्यास्पद बात तो है ही। अब इसे चाहे कोई राजनैतिक हथियार की तरह इस्तेमाल करे या वास्तविकता के रूप में।

हकीकत तो यह है कि भाजपा के इससे पहले के मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूरी भी विकेन्द्रीकरण के नाम पर राज्य के हर जिला मुख्यालय में अलग अलग विभागों को स्थापित कर यह जता चुके थे कि राजधनी तो कहीं नही जाने वाली विभाग भेज कर लोगों का मन भले ही रख लिया जाय। इन सब बातों से करब करीब कापफी पहले यह स्पष्ट हो गया था कि राज्य के राजनैतिक दल राजधनी को देहरादून से इतर कहीं भी नही ले जाना चाहते। इसके बावजूद कुछ लोगों को जो वास्तव में ही पहाड़ में राजधनी के हिमायती हों कुछ आशाऐ रही हों इसके बावजूद इसमें उत्तराखंड क्रांतिदल नामकी सत्ता लोलुप पार्टी को नही गिना जा सकता। हो सकता है उसने कभी इस मुद्दे को पाला पोसा हो लेकिन अब उसके कुछ नेता सत्ता की चरण वंदना और कमाई की आश में ऐसे चंपू बन गये हैं कि वे भूल चुके हैं कि कभी राजधनी के लिए वे गैरसैंण चुन आये थे। भाजपा से जितना घालमेल उक्रांद नामक क्षेत्रीय दल कर चुका है उससे यह आश भी नही बंधती कि भविष्य में उसे संसदीय राजनीति में खाता खोलने का मौका भी मिल जाय। 

बावजूद इसके राजधनी को पहाड़ में बनाने को लेकर छिटपुट आंदोलन हो रहे हैं। कुछ दबाव समूह चाहे खानापूर्ति के लिए ऐसा कर रहे हैं या अपने अस्तित्व और विरोध की राजनीति को जिंदा रखने के लिए वे गाहे-बगाहे चौराहों पर बैठ रहे हों। जिन्होंने उत्तराखंड राज्य गठन के समय विशाल तादात में सारे नेतृत्व को धता बताकर स्वत:स्फूर्त होते जनोदालनों को देखा है और मंसूरी, खटीमा रामपुर तिराहा एवं लाल किले की समर्पित भीड़ को देखा है वे मान सकते हैं कि जनता राजधनी के आंदोलन में अभी तक भगीदार नही बनी है। ऐसा होना निहायत जरूरी है। लेकिन राज्य बनने के बाद पहचान के सवाल पर आंदोलन में कूदे लोग शायद राजधनी के नाम पर कोई रूचि नही लेना चाहते। जहां तक सवाल गैरसैंण का है तो यह झुनझुना उक्रांद का था भाजपा की गोद में बैठकर उसने इसे तिलांजली देदी है। हाल फिलहाल तो गैरसैंण से किसी भी तरह की नजदीकी रखने वाले ही आंदोलन कर रहे हैं। लेकिन राजनैतिक दलों के देहरादून में आसन जमा लेने के बाद इस आसन को डुलाने की क्षमता अगर किसी में है तो वह जनता के पास है। इसलिए राजधनी के मसले पर देखना यह होगा कि एक निडर और विशालकाय स्वत:स्फूर्त आंदोलन से राज्य छीन लेने वाली जनता आखिर राजधनी के मामले में क्या रूख अपनाती है।

साभार- http://visfot.com/index.php/peoples_power/1269.html

राजेश जोशी/rajesh.joshee

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पंकज भाई
सवाल  भावनाओं का तो है पर भावनाएँ हैं कहाँ अफसर पहाड़ में नहीं रहना चाहते क्योंकि वो साहब हैं. नेता पहाड़ में नहीं रहना चाहते क्योंकि वोह जन प्रतिनिधि हैं और उनका राजधानी में रहना जरुरी है.  जवान पहाड़ में नहीं रहना चाहते क्योंकि वहाँ  शिक्षा और रोजगार नहीं है.  सरकारी कर्मचारी इसलिए नहीं रहना चाहते क्योंकि उनको अपने बच्चो के भविष्य की चिंता है.  जब कोई उस पहाड़ में रहना ही चाहते तो फिर किसका गैरसैन और किसकी राजधानी.  आप ही बताइए हमारे ७० विधायकों में से कितने ऐसे हैं जिनका स्थायी निवास आज पहाड़ में है.  सब पहाड़ का नाम लेकर, पहाड़  के वासियों के साथ छल कर रहे है इसमें जनता, अधिकारी, कर्मचारी, नेता और अफसर सभी शामिल हैं.

हेम पन्त

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We are back from Yatra...We got good  response from public.. and ground reality is that public is in favour of Gairsain... and a big movement is not so far now....

I m having net problem in my office... will get back to you very soon with complete report on our Gairsain Yatra..

 

Rajen

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प्रिय पन्त जी,
आपका बिचार उत्तम है.  आप चाहते हैं की उत्तराखंड का बिकाश हो और हम भी तो इसी की कामना कर रहे हैं.  जरा सोचिये 'गैरसैण' जो कि अब पहाड़ के लोगों की अस्मिता का प्रश्न बन गया है, यदि उत्तराखंड की राजधानी बन जाती है तो  निश्चय ही समूचे पहाड़ का चहुंमुखी बिकाश होगा.  कहते हैं कि बिकास सड़क के रस्ते आता है, तो नई राजधानी को हर जिले से सड़क से सीधे जोड़ा जाएगा, नए क्षिक्षण संस्थान खुलेंगे, शिक्षा का प्रसार - प्रचार होगा, रोजगार  के  नए  आयाम खुलेंगे, लोगों की जीवन शैली बदलेगी, सोच  बदलेगी. 
इस बिषय पर जितने भी तर्क दिए जा सकते हैं कम ही होंगे.  मेहता जी का तर्क कि यदि राजधानी देहरादून ही रहनी थी तो फिर राजधानी आयोग बनाने और उसे लगातार बनाये रखने के पीछे क्या भावना थी, एक दम सही है. 
अब समय की मांग है कि हमें क्षेत्र वाद से हट कर नयी सोच के साथ आगे आना चाहिए जिससे कि सचमुच ही उत्तराखंड (पहाडों) का बिकास हो.


Dear All,

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Do you think why we are demanding now a Capital when we know that the other lots of major issues are pending? Why not we decentralized our administration and open small secretariat in every district so that the people can resolve his and her issue in the district. We are know very well that how much our villagers are financially strong to go capital to resolve his/her issue and you know very well that how much time you have to come to resolve your issue and the first thing the local administration will view only your districts problem. It is very fastest, economical and effective process and  it also generate various jobs.
We should understand that the hills always more expensive than plains. Cost of constriction is double than plains because of unavailability of materials and transportation cost become it more expansive. 
I thought it will be better if we will make district level online group and concentrate on district level and share our experience at here.
Now I hope all members will understand that we use our power and strength to develop our state.

We use 2000 Cr. Rupee in Development of Uttarakhand not for in a Capital. It is wastage of Money.

Jai Goljeu jai Uttarakhand


Rajen

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राजेश जी,
आपकी बात सत्य है.  मेरे गाँव से देहरादून 600 किलोमीटर दूर है तो मेरे गाँव का कोइ ब्यक्ति यदि अपने बिधायक से मिलकर अपनी बात रखना चाहता है तो यह उसके लिए असंभव है.  यदि वह बिधायक करीब 150-200 किमी के दायरे में होगा तो संभव है कि कई लोग अपने 'चहेते' नेता के पास जाकर उनकी मिजाज पुरसी कर सकते हैं.
:D

पंकज भाई
सवाल  भावनाओं का तो है पर भावनाएँ हैं कहाँ अफसर पहाड़ में नहीं रहना चाहते क्योंकि वो साहब हैं. नेता पहाड़ में नहीं रहना चाहते क्योंकि वोह जन प्रतिनिधि हैं और उनका राजधानी में रहना जरुरी है.  जवान पहाड़ में नहीं रहना चाहते क्योंकि वहाँ  शिक्षा और रोजगार नहीं है.  सरकारी कर्मचारी इसलिए नहीं रहना चाहते क्योंकि उनको अपने बच्चो के भविष्य की चिंता है.  जब कोई उस पहाड़ में रहना ही चाहते तो फिर किसका गैरसैन और किसकी राजधानी.  आप ही बताइए हमारे ७० विधायकों में से कितने ऐसे हैं जिनका स्थायी निवास आज पहाड़ में है.  सब पहाड़ का नाम लेकर, पहाड़  के वासियों के साथ छल कर रहे है इसमें जनता, अधिकारी, कर्मचारी, नेता और अफसर सभी शामिल हैं.


Rajen

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आपकी इस बात का मैं 101% समर्थक हूँ.  

 नेता पहाड़ में नहीं रहना चाहते क्योंकि वोह जन प्रतिनिधि हैं और उनका राजधानी में रहना जरुरी है. सब पहाड़ का नाम लेकर, पहाड़  के वासियों के साथ छल कर रहे है.

 

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