गैरसैंण यात्रा के बाद व्यस्तता के कारण नेट पर सही तरीके से बैठने का समय नहीं मिला। इस बीच जब समय मिला तो कुछ पुरानी मेल देखने को मिली। इनमें गैरसैंण राजधानी को लेकर हमारे कुछ साथियों के विचार अलग थे। स्वस्थ लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोध और असहमति समाज का मजबूत आधार तैयार करती हे। इसलिये हमने इन असहमतियों को गैरसैंण राजधानी बनाने के लिये महत्वपूर्ण माना है। इन असहमतियों का महत्व इसलिये भी है कि इसी बहाने जो जानकारियां अभी तक सरकार या सुविधाभोगी राजनीति करने वाले राजनीतिक दल दे रहे थे उन पर बातचीत करने का मंच बना है। सभी सहमत-असहमत साथियों का स्वागत है।
गैरसैंण राजधानी से जो साथी असहमत हैं उनकी दो शंकायें हैं पहला राज्य की राजधानी से पहले विकास मुद्दा है दूसरा गैरसैंण को राजधानी बनाने का मतलब पैसा और समय का दुरपयोग है। यह दोनों बातें सबको इसलिये ठीक लगती हैं क्योंकि इन बातों को एक सुनियोजित साजिश के तहत फैलाया जाता है। पहले विकास के सवाल पर आते हैं। विकास एक सतत चलने वाली प्रक्रिया है। यह एक रात में खड़ा नहीं होता। राजधानी का सवाल विकास से जुड़ा महत्वपूर्ण मुद्दा है। राजधानी का सवाल विकास के विकेन्द्रीकरण से जुड़ा है। इसे भावना या गैरसैंण के राज्य के बीच में होने के साथ नहीं जोड़ा जाना चाहिये। जब 1992 में गैरसैंण को राजधानी बनाने की बात ने जोर पकड़ा तो तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार ने वहां शिक्षा निदेशालय का कार्यालय खोलने पर सहमति की। वह खुला भी। पहाड़ के लोग जो अपने छोटे-मोटे कामों के लिये इलाहाबाद जाते थे उन्हें गैरसैंण में कार्यालय खुलने से यह आशा बंधी कि भविष्य में शिक्षा के क्षेत्रा में यह मील का पत्थर साबित होगी। पौड़ी और अल्मोड़ा में मिनी सचिवालय खोलने पर भी सहमति बनी। ये दो उदाहरण में विकास के विकेन्द्रीकरण को समझने के लिये दे रहा हूं। उत्तर प्रदेश में सरकार बदली। यह सरकार उन लोगों की बनी जो राज्य विरोधी थे। और यह बातें एक बार पिफर हाशिए में धकेल दी गयी। समझा जा रहा था राज्य बनने से पहले कुछ कार्यालय और बड़े संस्थान पहाड़ में खुल जायेंगे तो विकास के विकेन्द्रीकरण का सिलसिला शुरू होगा। लेकिन नासमझ राजनीतिज्ञों, नौकरशाहों और माफिया के गठजोड़ ने ऐसा नहीं होने दिया।
साठ के दशक के बाद जितने भी राज्य बने उन्होंने अपने नाम, राजधानी, परिसीमन, विकल्पधारियों और संसाधनों के बंटवारे का ब्लू प्रिंट पहले ही तैयार किया था। यही कारण है कि पूर्वोत्तर के पर्वतीय राज्य, हिमाचल आदि में पहाड़ की राजधानी पहाड़ में ही रही। वहां नये सिरे से इन शहरों को राजधानी के लिये तैयार किया गया। उत्तराखंड का भी पूरा ब्लू प्रिंट तैयार था लेकिन जो लोग सत्ता में आये उनके लिये जनता के ब्लू प्रिंट का कोई मतलब नहीं रहा। यही कारण है कि पहली अंतरिम सरकार ने परिसीमन, परिसंपत्तियों, विकल्पधारियों, नाम और राजधानी के सवाल को उलझाये रखा। विकास की बात करने वाले लोगों को यह सोचना होगा कि सारे निगम हमें घाटे में मिले। इनकी सारी परिसंपत्तियों पर उत्तर प्रदेश का कब्जा हो गया। यहां सिंचाई विभाग की संपत्ति आज भी उत्तर प्रदेश के पास है। परिसीमन से पर्वतीय क्षेत्रा से कम हुयी छह सीटों के विकास के पैसे का नुकसान राज्य को हुआ है। हम मानते हैं कि विकास ही प्रमुख मुद्दा है। लेकिन वह विकास विकेन्द्रीकृत होना चाहिये। देहरादून विकास का माडल नहीं हो सकता। आप लोग इस बात पर विचार करें कि अभी राज्य में नौ विश्वविद्यालय और कई संस्थान काम कर रहे हैं। इनमें अधिकतर देहरादून, रुड़की और उसके आसपास के पचास किलोमीटर के क्षेत्रा तक सिमट गये हैं। इस तरह के विश्वविद्यालय और संस्थान पहाड़ में क्यों नहीं खोले जा सकते हैं। अंग्रेज और उसके बाद भारतीय अंग्रेज जब अपने बच्चों के लिये अच्छे स्कूल नैनीताल, मसूरी और देहरादून में खोल सकते हैं तो हम अपने विकास के लिये गैरसैंण को माडल क्यों नहीं बना सकते। जिस देहरादून से आपका मोह है वह सुविधभोगी लोगों ने अपने लिये बनाया, विकास के लिये नहीं। कभी बंजारों का शहर अब माफिया का शहर है। इस शहर में सांस्कृतिक विकास के नाम पर हर छह महीने में उत्तराखंड सुन्दरी की प्रतियोगिता होती है जिसका उदघाटन प्रदेश का कोई मंत्री करता है। यहां ढ़ाचागत विकास के नाम पर बड़े होटल, रेस्तरां बन रहे हैं। पिछले दिनों के रिकार्ड को उठकर देख लें तो देहरादून में दिल्ली से आकर लोगों ने अपसंस्कृति के रैकेट चलाये हैं जिन्हें यही राजनीतिक लोग शह दे रहे हैं जो गैरसैंण का विरोध् कर रहे हैं।
जहां तक आप लोग राजधनी से बड़ा सवाल विकास का मानते हैं, इसके लिये लोग लंबी लड़ाई लड़ रहे हैं। पहाड़ को कथित विकास के नाम पर जिस तरह मुनापफाखोरों के हवाले किया जा रहा है उसके खिलापफ पहाड़ की जनता लगातार सड़कों पर है। पहाड़ तमाम नदियां जेपी और थापर के हवाले कर दी गयी हैं। ढाई सौ से अधिक बांध् प्रस्तावित हैं। लोगों को जल, जंगल और जमीन के अधिकारों से बंचित किया जा रहा है। गांवों को उजाड़ने को विकास का नाम दिया जा रहा है। टिहरी को डुबाकर हमारी लाशों के ऊपर नये शहरों का निर्माण हो रहा है और हम विकास का मतलब नहीं पहचान पा रहे हैं। हम अभी तक सरकार द्वारा समझा दिये गये विकास को ही पहाड़ के लिये सही मान बैठे हैं। जिस विकास की आप लोग बात कर रहे हैं वह तीन लोगों के लिये उपयोगी है। पहला सत्ताधरी दूसरा नौकरशाह और तीसरा काम करने वाले ठेकदार के लिये। इसलिये हम विकास के विकेन्द्रीकरण और पहाड़ को मुनाफाखोरों के हाथों से बचाने के लिये गैरसैंण को राजधानी बनाकर पहाड़ को सरक्षित करने की दिशा में कदम बढ़ाना चाहते हैं।
दूसरा सवाल है राजधानी के लिये पैसा खर्च होने का। यह एक काल्पनिक और समझाई गई आशंका है। पैसा कौन से मदों में कैसे आता है और उसका खर्च करने का क्या तरीका है उसे समझना जरूरी है। असल में विकास को पैसा खर्च करना नहीं जान पाये। या अपने हितों के लिये इसे इस्तेमाल करते रहे। राज्य बनने से पहले उत्तराखंड विकास के मद में 650 करोड़ रुपये योजनागत बजट का होता था। कई अन्य मदों से भी यहां के विकास के लिये भारी पैसा आता रहा है। यह पैसा जितनी तेजी से आया उतनी ही तेजी के साथ अव्यावहारिक योजनाओं के चलते राजनीतिज्ञों और नौकरशाहों की जेब में चला जाता था। उस समय विकास के नाम पर खडंजा संस्कृति का विकास हुआ। आज राज्य का योजनागत बजट 47 सौ करोड़ से अधिक है। गैरयोजनागत के अलावा कई मदों से अरबों के वारे-न्यारे हो रहे है। उत्तराखंड में 17 हजार गांव हैं। यहां इस समय 45 हजार से ज्यादा एनजीओ काम कर रहे हैं अर्थात एक गांव में तीन-तीन एनजीओ औसतन हैं। इनके माध्यम से भी पैसा ठिकाने लगाया जा रहा है। सरकारी चील तो पहले से ही मौजूद है। यह पैसा करोड़ों में नहीं अरबों में है जो विकास के नाम पर बहाया जा रहा है। जो काम आज से तीस साल पहले हो रहे थे वही हर साल दुबारा किये जा रहे हैं। यह टिकाऊ विकास न होने और उस पर ठोस निगरानी न होने को कारण है। खैर! जब राजधनी गैरसैंण बनाने के लिये ब्लू प्रिंट तैयार हुआ तो उस पर एक हजार करोड़ खर्च होने का अनुमान लगाया गया। लेकिन अस्थायी राजधनी देहरादून में अब तक इसी काम पर 400 करोड़ से अधिक खर्च हो चुका है और इतने के ही काम प्रस्तावित हैं। इससे इस बात को समझा जा सकता है गैरसैंण राजधानी बनाने के खिलाफ सरकार और राजनीतिक पार्टियां किस तरह जनता के साथ छल कर रही हैं। इस पर फिर कुछ और बातें होंगी। देहरादून और गैरसैंण राजधानी के फर्क को राजनीतिज्ञों के चरित्र से समझने की भी जरूरत है। कुछ उदाहरण आपके सामने रख रहा हूं।
-टिहरी के सांसद और सत्तर के दशक में राज्य आंदोलन की अगुवाई करने वाले स्व. त्रोपन सिंह नेगी की धर्मपत्नी ने बस नहीं देखी थी।
-रानीखेत विधनसभा सीट से दो बार विधायक रहे उत्तराखंड राज्य के प्रमुख स्तम्भ स्व. जसवन्त सिंह बिष्ट अपने विधायक रहते हुये कभी कार में सफर नहीं किया। वे विधायक रहते अपने खोतों में काम करते थे।
-समाजवादी नेता और उत्तराखंड राज्य के स्तंभ स्व. विपिन त्रिपाठी के पास मोबाइल नहीं था। वे कभी सरकारी वाहन का उपयोग नहीं करते थे। अपने जीते जी वे देहरादून के विधायक निवास में नहीं रहे।
-पहाड़ के गांधी स्व. इन्द्रमणि बडोनी ने विधायक रहते हुये भी पहाड़ की सांस्कृतिक पहचान के लिये काम किया। वे सादगी की प्रतिमूर्ति थे।
-पौड़ी जनपद और नैनीताल में लोगों ने श्रमदान से सड़कों का निर्माण किया।
-विश्व प्रसिद्ध वैज्ञानिक डा. डीडी पंत ने राज्य आंदोलन और पहाड़ में विकास के विकेन्द्रीकरण के लिये बहुत काम किया।
-वीर चन्द्रसिंह गढ़वाली आजीवन अभावों में पहाड़ के विकास के लिये अलख जगाते रहे।
-उत्तराखंड राज्य आंदोलन के प्रणेता स्व. ऋषिवल्लभ सुन्दरियाल ने अपने परिवार की परवाह न करते हुये लंबी लड़ाई लड़ी।
-राज्य और पहाड़ की बेहतरी का सपना देखने वाले इन मनीषियों की पीढ़ियां आज भी जीने के लिये संघर्ष कर रही हैं।
ये सब मनीषी उत्तराखंड में विकास के विकेन्द्रीकरण के समर्थक रहे हैं। इसलिये गैरसैंण हमारी भावनाओं की नहीं विकास के सही दर्शन की मांग है।
दूसरी ओर-
-उत्तराखंड की अंतरिम सरकार ने सबसे पहले अपनी सुविधओं के लिये आलीशान विधायक निवास बनाया।
-राजधानी चयन के लिये असंवैधनिक आयोग का गठन किया।
-अपने स्वार्थों के लिये परिसंपत्तियों के मामले में उत्तर प्रदेश के सामने आत्मसमपर्ण किया।
-विकल्पधारियों के मामले को लटकाये रखा।
-परिसीमन पर मैदानी क्षेत्रों का समर्थन किया।
-उत्तराखंड के विधायकों के पास आलीशान गाड़ियों के काफिले हैं।
-मोटरसाइकिल पर चलने वाले तमाम नेताओं के पास बड़ी गाड़ियां हैं।
-सबने अपने घर देहरादून और दिल्ली में बनाये हैं।
-कई मंत्रियों और विधायकों की दूसरे राज्यों में भी संपत्ति है।
-ज्यादातर के बच्चे कांवेंट स्कूलों और विदेश में हैं।
गैरसैंण और देहरादून राजधानी के फर्क को इन उदाहरणों से समझा जा सकता है। आप फैसला करें आप किस तरफ हैं। और अंत में जनकवि डा. अतुल सती की एक कविता-
सोचने में पाबंदी नहीं है
हमने सोचा विकास के बारे में,
प्रगति, शिक्षा और उन्नति के बारे में,
पर्यावरण, वन और पेड़ों के बारे में,
हमने सोचा जड़ी-बूटियों,
बांधें और बिजली के बारे में,
पर्यटन, उद्योग और काम के बारे में,
नशाबंदी और रोजगार के बारे में,
हमने चाय के बागानों और पीली केसर के बारे में सोचा,
और भी बंद आंखों, कितनी ही बातों के बारे में सोचा,
हमने जुलूस, प्रदर्शन और भूख हड़तालें पायीं,
बयान, नारे और बाद में आश्वासन पाये,
हमने लाशें और बलात्कारित लोग कमाये,
हमारी जमीनों में आंसू बो दिये गये,
और दुनिया भर के पत्राकार पर्यटन कर रहे हैं,
हमने बहुत कुछ पाया है,
अंधेरा ही अंधेरा,
और अंधेरा में अब हम कुछ और सोचने लगे हैं,
हम बंदूकों बौर गोलियों के बारे में सोचने लगे हैं,
हम बारूद और बमों के बारे में सोचने लगे हैं,
हम न जाने क्या-क्या सोच रहे हैं,
और हम सोचेंगे,
हमें सोचने से कोई रोक नहीं सकता,
जब तक कि सोचने में पांबदी नहीं है।