Author Topic: Gairsain: Uttarakhand Capital - गैरसैण मुद्दा : अब यह चुप्पी तोड़नी ही होगी  (Read 75747 times)

Sunder Singh Negi/कुमाऊंनी

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हमारे इन नेताओ का तो वही हाल है कि (नाच न जाने आंगन टेडा।)

Sunder Singh Negi/कुमाऊंनी

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सायद ये नेता कुर्सी के चक्कर मे ये भी भूल गये है कि वक्त सबसे बडा बलवान होता है।
यानी इन लोगो को ये नही पता कि अगले चुनाव मे जनता हमारी जमानत भी बन्द कर सकती है।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Baba Mohan Uttarakhandi Jisne Rajdhani Shift Karne ke liye 08 Aug 2004 mai ek lambe "Aamran Ansan" ke baad apne praan tyag Diye..

Aaj inki Punay Tithi hai Lekin Kisi ko is yodha ki khabar hi nahi.

We have only Regional Party called "UKD". During the struggle time everybody fought the state under UKD banner. It is unfortunate that there many leaders in the UKD who has lost people faith and could not do anything after formation of the state.  

dayal pandey/ दयाल पाण्डे

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Sarkar ko praja ki jaan ki chinta nahi hai to vikas ki kya hogi, Baba Mohan Uttarakhandi isake bade Udaharan hain Kya us Andolankari ko bachaya nahi ja sakta tha? jiske sangharsh ke badolat Kurshi naseev hui thi

राजेश जोशी/rajesh.joshee

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Dear friends,
Gairsain is not just a place in Uttarakhand it is merged in the soul of all Uttarakhandi Martyr, who gave their supreme sacrifice to inception of this Hill state.  It is just not a political issue, it is the matter or sentiments of the Pahari people.  
If it is not appropriate to shift capital of the state due to any reasons in public interest, then this place should be at-least developed in a manner that it would have an existence at national and international level and become prime town of the state.  But even after 9 years of inception of this state there is no sign of development in this hill town.  
The issue of capital has become a political issue but my concern is more about the existence and identity of Gairsain Town and concerns of the people of this hill state about their Uttarakhand.
The governments should at least have done what they could in last 9 years for Gairsain, if it is not possible to shift capital there.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Joshi Ji,

It is also a failure on part of people of Uttarakhand as they chose wrong parties to rule in the state which immdediately forget the capital issue after formation of the state.

At least once people of Uttarakhand give mandate to UKD and then see that happens on this issue.

Dear friends,
Gairsain is not just a place in Uttarakhand it is merged in the soul of all Uttarakhandi Martyr, who gave their supreme sacrifice to inception of this Hill state.  It is just not a political issue, it is the matter or sentiments of the Pahari people. 
If it is not appropriate to shift capital of the state due to any reasons in public interest, then this place should be at-least developed in a manner that it would have an existence at national and international level and become prime town of the state.  But even after 9 years of inception of this state there is no sign of development in this hill town. 
The issue of capital has become a political issue but my concern is more about the existence and identity of Gairsain Town and concerns of the people of this hill state about their Uttarakhand.
The governments should at least have done what they could in last 9 years for Gairsain, if it is not possible to shift capital there.

हेम पन्त

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अमर क्रान्तिकारी बाबा मोहन उत्तराखण्डी का उनकी पुण्य तिथि पर शत-शत नमन...आपका बलिदान व्यर्थ नहीं जायेगा..

Devbhoomi,Uttarakhand

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अमर क्रान्तिकारी बाबा मोहन उत्तराखण्डी का उनकी पुण्य तिथि पर शत-शत नमन...आपका बलिदान व्यर्थ नहीं जायेगा..


sahi kaha apne pantji

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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From various surveys has been observed that people of Uttarakhand wish the permanent capital to be Gairsain only.

It is unfortunately whosoever party ruled in the state never give importance to Capital issue.

Let us not keep silient and raise voice on this issue.

हुक्का बू

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मेरे नाती हेम ने एक ब्लाग पर खतरनाक टाईप का लेख चेपा है, आप  लोग भी पढिये-


कई साल पहले की बात है 2 भाई थे, इतिहास में Write Brothers के नाम से प्रसिद्ध हैं. उन्होंने एक सपना देखा, सपना था आदमी को हवा में उड़ाने की तकनीक विकसित करने का. लोगों ने उनकी खिल्ली उड़ाई, कुछ लोगों ने उन्हें ’सिरफिरा’ कहा.

आज हवाई जहाज में उड़ते हुए हम एयर होस्टेस की खूबसूरती निहारते हुए और पत्रिकाएं उपन्यास पड़ते हुए सफर खतम कर देते हैं पर शायद ही कोई Write Brothers को याद करता होगा.
ऐसे ही सिरफिरों ने फिर एक सपना देखा. 1857 में कुछ सिरफिरों ने सोचा क्यूं ना भारत से अंग्रेजों को खदेड़ दिया जाये. कोशिश की, पूरी सफलता तो नही मिली, लेकिन और लोगों के दिमाग में सपना जगा गये. आखिर 90 साल बाद 15 अगस्त 1947 को भारत आजाद हुआ. अब साल में एक-दो बार उन ’सिरफिरों’ को याद कर लो तो बहुत है. क्यूंकि भाई अब तो आजादी शब्द समलैंगिकता और ना जाने किन-किन बेहूदा मसलों के लिये प्रयोग किया जाने लगा है.


अपने पहाड़ी लोग भी कम ’सिरफिरे’ जो क्या ठैरे? भारत को आजादी मिलने के समय से ही कहने लगे कि हमें अलग राज्य चाहिये. 1994 में तो हद ही कर दी, कहने लगे- आज दो अभी दो, उत्तराखण्ड राज्य दो. उस टाइम भी कुछ विद्वान लोग अवतरित हुए. एक ’विद्वान’ तब कहते थे- "उत्तराखण्ड राज्य मेरी लाश पर बनेगा". उत्तराखण्ड का मुख्यमंत्री बनने का मौका मिला तोइ चूके नहीं. एक और भाई सैब थे, ये बोलते थे- "राज्य तो शायद नही बन पायेगा, अगर केन्द्र शासित प्रदेश (Union Territory) हो जाये तो हमें मन्जूर है. (नाम नही बोलुंगा- दोनों लोग उच्च पद पर आसीन है, नाम लेने से पद की गरिमा को ठेस पहुंच सकती है.)


जो भी हुआ फिर, नवम्बर 2000 में उत्तराखण्ड राज्य बन ही गया. इन ’सिरफिरों’ का सपना भी सच हो गया? ’विद्वान’ लोग बोले राजधानी Temporary रखते हैं अभी. समिति बनाओ वो ही बतायेगी असली वाली राजधानी कहां होगी? समिति ने 9 साल लगा दिये यह बताने में कि Temporary वाली राजधानी ही Permanent के लायक है. और यह भी बोला कि पहाड़ की तरफ़ तो देखना भी मत, स्थाई राजधानी के लिये, वहां तो समस्याएं ही समस्याएं हैं. (उन्होंने बताया तो हमें भी यह पता लगा). समिति ने कहा है कि नया शहर बसाने में तो खर्चा भी बहुत होगा.

लेकिन फिर कुछ नये टाइप के ’सिरफिरे’ पैदा हो रहे हैं. उनका कहना है कि समस्याओं से भाग क्यों रहे हो? उन्हें हल करो. राजधानी बनानी है प्रदेश की जनता की सुविधा के लिये, नेताओं और नौकरशाहों की सुविधा के लिये नहीं. बांध बनाने के लिये तो पुराने शहरों, दर्जनों गांवों को उजाड़ कर नया शहर बना रहे हो, राजधानी के लिये भी बनाओ एक नया शहर!!!! ’सिरफिरे’ कह रहे हैं - ना भावर ना सैंण, उत्तराखण्ड की राजधानी होगी गैरसैंण. अब देखते हैं फिर क्या करते हैं ये ’सिरफिरे’? कुछ विद्वान ऐसा भी कह गये हैं - "No Pain Without Gain", विद्वानों ने कहा है तो भई ठीक ही कहा होगा. तो करो संघर्ष, अब उत्तराखण्ड की राजधानी को गैरसैंण पहुंचा कर ही दम लेना है हां!!!


 

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