Author Topic: Articles By Dr. B. L. Jalandhari - बी. एल. जालंधरी द्वारा लिखे गए लेख  (Read 13804 times)

Dr. B L Jalandhari

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                                                           उत्तराखंडी भाषा प्राण विहीन लिपि देवनागरी
                                                                         डॉ बिहारीलाल जलंधरी
       विश्व में लगभग छः हजार से अधिक बोलियाँ हैं ! इन बोलियों में से कई बोलियाँ भाषा के रूप में परिणत हो गई हैं !  भाषा के रूप में परिणत होने वाली बोलियों में कुछ भारत में बोली जाने वाली बोलियाँ भी हैं, जिन्हें भारत गणराज्य के संबिधान की अष्टम सूची में स्थान दे दिया गया है !  किसी बोली को भाषा के रूप में स्वीकारा जाना उस बोली को बोलनेवालों की अपनी बोली के प्रति निष्ठा और उसे सम्मान जनक स्थान दिलाना उस समाज की सफलता है जिसने अपनी बोली को भाषा के रूप में स्थान दिलाने में अपने व अपने समाज के सम्मान के लिए इस उद्देश्य को प्राथमिकता से उजागर किया और बोली को भाषा के रूप में स्वीकारने व स्थान दिलाने में एकता दिखाई !
          भाषा के इस उद्देश्य में हम कहाँ हैं! उत्तराखंड एक छोटा सा प्रदेश जिसका भूभाग उत्तर्पूर्ब के छोटे पहाडी प्रदेशों के सामान है तथा इनकी परिस्तिथियाँ भी सामान हैं जिसप्रकार उन प्रदेशों की सीमायें दूसरे देशों से मिली हैं उसी प्रकार उत्तराखंड प्रदेश की सीमा भी चीन और नेपाल क्रमशः दो देशों से जुडी है ! उत्तर्पूर्ब के समान उत्तराखंड प्रदेश समान परिस्तिथियों वाला प्रदेश हैं ! इस मायने में केंद्र सरकार ने जिन नीतियों और मानदंडों को लेकर उत्तर्पूर्ब के प्रदेशों के साथ ब्यवहार किया है उसी प्रकार के ब्यवहार की अपेक्षा उत्तराखंड प्रदेश के साथ भी की जानी चाहिए ! यहाँ हम केवल भाषा की बात करते हैं ! उत्तर्पूर्ब के कुल सात प्रदेशों की अपनी सात भाषाएँ तथा उनकी प्रथक लिपि भी हैं ! जिनकी भाषा लिपि नहीं है उन्हों ने बंगला लिपि को माध्यम मानकर उसमे अपनी स्थानीय भाषा के प्राण अक्षरों को जोड़ा है ! जिसके उपरांत वह उस लिपि में अपनी बोली को स्वछन्द रूप से प्रयोग करने लगे, फल्श्वरूप आज उनकी बोली भाषा का रूप लेकर भारतीय संबिधान की अष्टम सूची में बिराजमान हो गई है ! यहाँ प्रश्न उठता है की उत्तर्पूर्ब के इन सात प्रदेशों को अलग-अलग लिपि या दूसरी लिपि में अपनी भाषा के स्थानीय अक्षरों को जोड़ने की क्यों आवश्यकता पड़ी ! इन सात छोटे पहाड़ी प्रदेशो की केवल एक लिपि भी हो सकती थी परन्तु नहीं हो सकी !  इनकी एक लिपि न होने का मुख्य कारन है उनकी अपनी भाषाई अस्मिता ! वह अपनी भाषाई पहचान को बरकरार रखना चाहते थे सो उन्हों ने किया अपनी भाषा को प्रतिष्ठित कर दिया !  यहाँ हम तुलना नहीं कर रहे हैं ! उत्तराखंड प्रदेश कई मायनों में उन प्रदेशों से आगे हैं परन्तु भाषाई अस्मिता को सम्मान जनक स्तिथि तक पहुचने में इन प्रदेशो से कई दसक पीछे है !
          उत्तराखंड प्रदेश के भाषा विशेषज्ञों का मानना है की उत्तराखंड की भाषा (गढ़वाली-कुमाउनी) की लिपि देवनागरी ही है ! उत्तराखंड में यहाँ की भाषा की लिपि के सम्बन्ध में जो साक्ष्य मिले उनमे अधिकांश शब्द ब्राह्मी लिपि के हैं ! अधिकांश ताम्रपत्रों में स्थानीय बोली में राजे महाराजाओं के फरमान हैं ! जिनकी लिपि ब्राह्मी है ! इन ताम्र पत्रों के लेखों में संकृत भाषा का अधिक प्रभाव है ! यहाँ के किसी भी राजा ने अपनी भाषा को अधिक महत्व नहीं दिया है ! ना ही अपने राज्य में प्रयुक्त लोक भाषा को पठान पाठन का माध्यम बनाया ! यह स्तिथि गढ़वाल-कुमाऊं में समान रूप से रही !

dinesh dhyani

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पहाड़ी भाषा बने अच्छी बात है लेकिन इससे पहले हमें गढ़वाली कुमाउंनी बोलियों को बचाने का प्रयास भी करना होगा।


श्रृद्धेय,
श्रीमान जलन्धरी जी सादर, आपने भाषा के विशद विषय को चुना है इसके लिए साधुवाद! आपने गढ़वाली और कुमांउनी दो बोलियों को मिलाकर उत्तराखण्डी भाषा की बात की है। इस दिशा में विस्तृत विचार विमर्श और भाषा संबधी सभी औपचारिकताओं को पूरा करने के बाद ही कुछ कहा जा सकता है। लेकिन उससे पहले मैं एक निवेदन करना चाहॅंूगा कि हमारे समाज में आज जो हालात बन रहे हैं उनमें तो इन दोनों बोलियों का अस्तित्व ही खतरे में है। हम लोग अपनी बोलियों में न तो बात करते हैं और न ही इनमें साहित्य प्रकाशित हो रहा है। जो कि इनके भविष्य के लिए शुभ नही है। सभा बैठकें हो या परिवार हम अपनी बोलियों को छोड़ते जा रहे हैं। मैं जानता हूॅं कि सच कहना आज के जमाने में इतना आसान नही है लेकिन सच से कब तक बचा जा सकता है।
हालात यह है कि गांव का एक बच्चा यहंी पढकर यहींे के स्कूल में टीचर या अन्य प्रकार के रोजगार में आ जाता है तो वह अपनी उक्त बोलियों को नही बोलता, उसे अपनी बोलियों में बोलने में शर्म महसूस होती है फिर नगरों महानगरों में बसे अधिसंख्य लोगों के बारे में क्या कहना है। चन्देक लोग हैं जो अपनी बोली और संस्कृति के बारे में सजग हैं लेकिन इन बोलियों को तभी बचाया जा सकता है जब इनके बोलने वालों की संख्या बढ़े, इनमें साहित्य प्रकाशित हो लेकिन आज इन बोलियों के बोलने वालों की संख्या लगातार कम हो रही है। भाषाविदों ने विश्व की जिन बोलियों के अस्तित्व पर संकट बताया है और कहा कि अगर यही दशा रही तो आने वाले पन्द्रह साल के दौरान विश्व की सैकड़ों बोलियां लुप्त हो जायेंगी उनमें दुर्भाग्य से हमारी ये दोनों बोलियां भी शामिल हैं।
इसलिए हमें भाषा के साथ साथ इन बोलियों को बचाने का प्रयास भी करना होगा। मात्र गीत, संगीत के माध्यम से बोलियों को नही बचाया जा सकता है। इस दिशा में समाज में चेतना और साहित्यकारो ंको आगे आना होगा। तभी इन बोलियों को भाषा के रूप में स्थान दिलाया जा सकता है। आपका प्रयास सराहनीय है। इस हेतु पुनः आपको साधुवाद!

धन्यवाद।

Dr. B L Jalandhari

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                                                         उत्तराखंडी भाषा प्राण विहीन लिपि देवनागरी
                                                                               डॉ बिहारीलाल जलंधरी

विश्व में लगभग छः हजार से अधिक बोलियाँ हैं ! इन बोलियों में से कई बोलियाँ भाषा के रूप में परिणत हो गई हैं !  भाषा के रूप में परिणत होने वाली बोलियों में कुछ भारत में बोली जाने वाली बोलियाँ भी हैं, जिन्हें भारत गणराज्य के संबिधान की अष्टम सूची में स्थान दे दिया गया है !  किसी बोली को भाषा के रूप में स्वीकारा जाना उस बोली को बोलने वालों की अपनी बोली के प्रति निष्ठा और उसे सम्मान जनक स्थान दिलाना उस समाज की सफलता है जिसने अपनी बोली को भाषा के रूप में स्थान दिलाने में अपने व अपने समाज के सम्मान के लिए इस उद्देश्य को प्राथमिकता से उजागर किया और बोली को भाषा के रूप में स्वीकारने व स्थान दिलाने में एकता दिखाई !
भाषा के इस उद्देश्य में हम कहाँ हैं! उत्तराखंड एक छोटा सा प्रदेश जिसका भूभाग उत्तर्पूर्ब के छोटे पहाडी प्रदेशों के सामान है तथा इनकी परिस्तिथियाँ भी सामान हैं जिसप्रकार उन प्रदेशों की सीमायें दूसरे देशों से मिली हैं उसी प्रकार उत्तराखंड प्रदेश की सीमा भी चीन और नेपाल क्रमशः दो देशों से जुडी है ! उत्तर्पूर्ब के समान उत्तराखंड प्रदेश समान परिस्तिथियों वाला प्रदेश हैं ! इस मायने में केंद्र सरकार ने जिन नीतियों और मानदंडों को लेकर उत्तर्पूर्ब के प्रदेशों के साथ ब्यवहार किया है उसी प्रकार के ब्यवहार की अपेक्षा उत्तराखंड प्रदेश के साथ भी की जानी चाहिए ! यहाँ हम केवल भाषा की बात करते हैं ! उत्तर्पूर्ब के कुल सात प्रदेशों की अपनी सात भाषाएँ तथा उनकी प्रथक लिपि भी हैं ! जिनकी भाषा लिपि नहीं है उन्हों ने बंगला लिपि को माध्यम मानकर उसमे अपनी स्थानीय भाषा के प्राण अक्षरों को जोड़ा है ! जिसके उपरांत वह उस लिपि में अपनी बोली को स्वछन्द रूप से प्रयोग करने लगे, फल्श्वरूप आज उनकी बोली भाषा का रूप लेकर भारतीय संबिधान की अष्टम सूची में बिराजमान हो गई है ! यहाँ प्रश्न उठता है की उत्तर्पूर्ब के इन सात प्रदेशों को अलग-अलग लिपि या दूसरी लिपि में अपनी भाषा के स्थानीय अक्षरों को जोड़ने की क्यों आवश्यकता पड़ी ! इन सात छोटे पहाड़ी प्रदेशो की केवल एक लिपि हो सकती थी परन्तु नहीं हो सकी !  इनकी एक लिपि न होने का मुख्य कारन है उनकी अपनी भाषाई अस्मिता ! वह अपनी भाषाई पहचान को बरकरार रखना चाहते थे सो उन्हों ने किया अपनी भाषा को प्रतिष्ठित कर दिया !  यहाँ हम तुलना नहीं कर रहे हैं ! उत्तराखंड प्रदेश कई मायनों में उन प्रदेशों से आगे हैं परन्तु भाषाई अस्मिता को सम्मान जनक स्तिथि तक पहुचने में इन प्रदेशो से कई दसक पीछे है !
उत्तराखंड प्रदेश के भाषा विशेषज्ञों का मानना है की उत्तराखंड की भाषा (गढ़वाली-कुमाउनी) की लिपि देवनागरी ही है ! उत्तराखंड में यहाँ की भाषा की लिपि के सम्बन्ध में जो साक्ष्य मिले उनमे अधिकांश शब्द ब्राह्मी लिपि के हैं ! अधिकांश ताम्रपत्रों में स्थानीय बोली में राजे महाराजाओं के फरमान हैं ! जिनकी लिपि ब्राह्मी है ! इन ताम्र पत्रों के लेखों में संस्कृत भाषा का अधिक प्रभाव है ! यहाँ के किसी भी राजा ने अपनी भाषा को अधिक महत्व नहीं दिया है ! ना ही अपने राज्य में प्रयुक्त लोक भाषा को पठान पाठन का माध्यम बनाया ! यह स्तिथि गढ़वाल-कुमाऊं में समान रूप से रही ! इतिहास गवाह है की जिस बोली को राजकीय या शासकीय संरक्षण नहीं मिला वह कभी भाषा के रूप में परिणत नहीं हो पाई, यही दशा आज गढ़वाली कुमाउनी की है !  गढ़वाल और कुमाऊ के राजवंशों ने अपनी राजभाषा संस्कृत मानकर उसमे कम किया है ! संस्कृत भाषा जिसपर ब्राह्मणों का अधिपत्य मन जाता था उसके अध्ययन के लिए भी स्कूल कॉलेज का उल्लेख बहुत कम मिलता है ! कुछ गुरुकुलों का अवश्य उल्लेख मिलता है परन्तु गुरुकुलों में कुछ खास घरानों के बच्चो को ही पढाया जाता था ! आम आदमी तथा आम आदमी की भाषा से राजपरिवार का कुछ लेना देना नहीं था ! एक मायने में कहा जाय की आम आदमी को शिक्षा से दूर रखा गया ! राज्य में जब शिक्षा संस्कृत भाषा के आधार पर कामचलाऊ बनी हुई थी तो आम आदमी की बोली के विकास  के विषय में सोचना कितना कठिन था ! उस समय के राजे ब्राह्मणों द्वारा संस्कृत के आधार पर दी गयी शिक्षा पद्धति पर खुश थे ! संस्कृत भाषा में पौराणिकता का गुण था जो आज भी बरकरार है ! राजाओं का संस्कृत मोह ने ही उत्तराखंड की स्थानीय गढ़वाली और कुमाउनी भाषा को कभी तबज्जो नहीं दिया ! जबकि लोक मानस में यहाँ की स्थानीय बोली निरंतर बोली जाती रही हैं !
उत्तरखंड में सोलह सो सदी के बाद देवनागरी लिपि का शुद्ध रूप मिलता है ! सोलह सो सदी के बाद सामाजिक चेतना उभरने लगी थी ! कंपनी सरकार का देश में कई रियासतों को हड़पने की नीति चल रही थी ! मुग़ल रियाशत के पतन का जिम्मेदार बादशाह औरंगजेब के अत्याचार से पीड़ित होकर उसके छोटे भाई दाराशिकोह ने गढ़वाल के राजा की शरण ली ! उस  दोरान का पत्र ब्यवहार भी देवनागरी व फारशी लिपि में देखने को मिलता है ! सोलह सो सदी में चित्रकार मोलाराम ने अपने चित्रों में देवनागरी लिपि में नामंकन किया है !  उसके उपरांत देवनागरी ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा ! इस बीच कंपनी सरकार ने शिक्षा का प्रचार प्रशार कर दिया ! जगह जगह डी ए बी स्कूल खुलवाए गए, छात्रावास बनाए गए ! इन स्कूलों में स्थानीय धनाड्य परिवारों के बच्चों ने शिक्षा प्राप्त की ! इन विद्यालयों से क्षेत्रीय बोलियों के कुछ विद्यार्थियों ने अपनी स्थानीय बोली को हिंदी भाषा की लिपि देवनागरी के माध्यम से लिखना आरम्भ किया ! स्थानीय बोली में एक के बाद एक कबी, साहित्यकार उत्पन्न हुए तथा उन्हों ने उत्तराखंड को उत्त्तराखंड की बोली में साहित्य का असीमित भंडार बनाकर दिया ! प्रत्येक कबी व साहित्यकार ने अपनी कृति में स्थनीय बोली को लिखने के लिए देवनागरी कमी पाई !  फल्श्वरूप उन्होंने अपने मन की शांति में लिए कहीं बिंदी, कहीं संस्कृत का शब्द तो कहीं उर्दू का जेर जबर लगाकर तसल्ली कर ली, परन्तु जब वह पुस्तक पाठक के पास पहुंची तो पाठक भ्रमित हो गया ! उसे अपनी ही बोली पढने में अटपटी लगने लगी ! नतीजा यह हुआ की उत्तराखंड की इन दोनों बोलियों का लिखित भाषा के रूप में प्रचार प्रशार ही नहीं हुआ !  इसलिए यह दोनों बोलियाँ आज भी अपने अस्तित्व के लिए लड़ रही हैं !

dinesh dhyani

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भाषा का काॅकटेल उचित नही।
श्रृद्धेय
ड़ाक्टर जलन्धरी जी सादर, पुनः एक विचार जो कई दिनों से कचोट रहा था आपके सम्मुख रख रहा हूॅं। इसे आप हमारा पैत्रिक बंधनों से पीड़ित होना समझें जैसा कि आपने अपने एक वक्तव्य में भी कहा है, या कुछ और लेकिन हमें जो लगा आपके सम्मुख रख दिया। चूॅंकि मैं समझता हूं कि भाषा एक विशद विषय है और इस बारे में किसी प्रकार की जल्दबाजी या गुटबाजी अथवा किसी प्रकार की खेमेबंदी से काम नही चलेगा। इस विषय में साहित्यकारों, लेखकों एवं विद्वानों की सहमति के आधार पर निर्णय लिया जाए तो वह स्वच्छ एवं उचित होगा। अन्यथा वही होगा जो पर्वू में उत्तराखण्ड मे हुआ। भाषा की संजीदगी अगर आप और हम नही समझेगंे तो बाहर वालों के लिए तो वह व्यापार मात्र ही होगा। जैसा कि पर्वू में तिवारी सरकार में भी कोई मोहम्मद जी गढ़वाली बोली सिखाने का इस्टीट्यूट चला रहे हैं और कोई खुराना जी गढ़वाली भाषालिपि का सृजन करते हैं और राजभवन में उनका सम्मान भी होता है। और हमारे साहित्यकार तालियां बजाकर समोसा और चाय पीते रहते हैं। कम से कम हम भाषा जैसे विषय को व्यापार न बनने दें यह भी तो हमारी ही दायित्व है।
पिछले कुछ दिनों से देखने में आया है कि हमारे कुछ विद्वान और चिंतक गढ़वाली एवं कुमाउंनी बोलियों को एक संयुक्त भाषा के रूप में स्थापित करने की सोच रहे हैं। यह बात समझ नही आ रही है कि किसी भी भाषा को जबरदस्ती किसी बंधन में बांधकर कैसे एक किया जा सकता है? दूसरी ओर यह भी देखने में आ रहा है कि वे लोग भाषा संबधी पोस्टमार्टम कर रहे हैं जिनका किसी भी सूरत में उक्त बोलियों के साहित्य से दूर-दूर का संबध भी नही रहा है।
इसी परिपेक्ष्य में डाक्टर साहब का प्रयास सराहनीय है लेकिन आपको भी मित्रवत एवं एक अदना लेखक होने के नाते सादर निवेदन है कि भाषाओं को अपनी वास्तविकता एवं पूर्व वेग से बहने दिया जाए। किसी प्रकार की ड़ाक्टरी या आॅपरेशन करने का प्रयास घातक होगा। हां हमें दोनों बोलियों को बोलना चाहिए, दोनों को उत्तराखण्ड की राज भाषा बनाया जा सकता है लेकिन जबरदस्ती किसी भाषा या बोली को गड़मड्ड करने का प्रयास समझ से परे है। आशा है हमारे सुधी विद्वान एवं चिंतक इस विषय पर या तो विस्तृत धरातल पर बात करंेगे अन्यथा इस प्रकार की प्रक्रिया उक्त बोलियों के लिए लाभकारी तो कदापि नही होगी।
आशा है इस दिशा में संजीदगी से सोचेंगे और भविष्य में भाषा संबधी विषयों पर किसी प्रकार की हील हवली नही होने देंगे। भाषा की विशदता एवं जटिलता के लिए सार्थक प्रयास होने चाहिए और अब समय आ गया है कि गढ़वाली एवं कुमाउंनी को भाषा का दर्जा देने के लिए सभी प्रयास किए जाने चाहिए। आशा है हमारी उक्त बोलियों को उचित सम्मान एवं स्थान मिलेगा।
सादर,

आपका मित्र
दिनेश ध्यानी

Dr. B L Jalandhari

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बोली का साहित्यकार सम्मान का हकदार
                                                                            डI.  बिहारीलाल जलंधरी

        यह सर्ब विदित है कि बोलियाँ स्वतन्त्र रह कर ही विकसित हुई ! इस प्रकार विश्व मे तेरह भाषाये ऐसी  हैं जिसमे प्रत्येक को पन्द्रह करोड से अधिक लोग बोलते हैं ! इन् मे प्रत्येक भाषा का अपना अलग क्षेत्र है ! यदि किसी दौर मे एक क्षेत्र का भाषा भाषी दूसरे क्षेत्र मे चला जाता है ऐसी स्थिति में वह अपनी भाषा को अवश्य ही अपने पैत्रिक स्थान से दूर अपने साथ ले जाता है ! इस प्रकार की कई भाषाएं हैं ! जिनका विकास अपने पैत्रिक स्थान से बाहरी क्षेत्र मे अधिक हुआ ! विश्व की इन् भाषाओं मे कई भाषाये अतिपरिनिष्ठ हैं तथा कुछ परिनिष्ठ ! इन् भाषाओं मे प्रत्येक की अपनी बोली तथा कई उपबोलियाँ भी है जिसके एक रुप को एक व्यक्ति, परिवार या समाज तथा उनके अश्रितों के साथ प्रयोग किया जाता  है ! यह उनकी अपनी बोली है जिसे वह अपनी भाषा के रुप मे मानते हैं ! वह भाषा ही उनकी अपनी मात्र भाषा होती है ! यह भाषा उनकी व्यक्तिगत बोली हो सकती है ! एक मायेने मे कहा जा सकता है कि विश्व मे उतनी ही व्यक्ति बोलियाँ हैं या जीवित भाषा के उतने ही स्वरुप हैं  जितने उनके बोलने वाले !
          बोली का एक छोटा सा उदाहरण यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है कि किस प्रकार बोली अपने परिनिष्ठ स्वरूप के ओर बढी ! वाक को परिनिष्ठ भाषा का स्वरूप कैसे प्राप्त होता है ! इसके उत्तर के लिए परिस्तिथियाँ निहित हैं ! उदाहरण के रुप मे चोदहवीं और पन्द्र्हवीं सताब्दी से पहले लंदन की बोली का उत्कर्ष नहीं हुआ था अंग्लोसेक्सन इंगलैंड से विन्चेस्टर की बोली  नवी से ग्यारहवी  सताब्दी तक  साहित्य का परिवर्धित और परिनिष्ठित  रुप में रही किन्तु १०६६  ईस्वी मे नार्मन लोगों के आगमन ने इस परम्परा को नष्ट कर दिया और तीन क्रमगत  सताब्दियों तक इंगलैंड की बोलियाँ समान रुप से व्यवहार मे आती रही ! जीवन के उच्चस्थरीय विकास की चाहत में राज्य की जनसंख्या धीरे धीरे नगरों, महानगरों मे आकार रहने लगी ! व्यवहार की भाषा मे कई बोलियों के शब्दों का प्रयोग होता रहा ! फलश्वरूप इसी दौर में सभी बलियो के सयुक्त रुप का प्रयोग होने से लंदन की बोली का उत्कर्ष हुआ ! लंदन इंगलैंड का नाभिकीय क्षेत्र था ! लोग गांव से विभिन्न बोलियों का रुप लेकर लंदन आते रहे ! इस प्रकार काफी समय तक लंदन की बोली मे बहुत बिभिन्नताये रही ! उसका स्वरूप तब स्थिर हो पाया जब सत्रह्वी सताब्दी के बाद एक्सफोर्ड और  केम्ब्रिज  विश्व विध्यालयों के शिक्षित लोगों के उच्चारण और उनकी वाक प्रव्रतियों को परिनिष्ठित मान लिया गया तब भी यह स्थायित्व से दूर थी  और पेरिश की भाषा फ्रेन्च की तुलना मे अधिक स्वतन्त्र थी ! पेरिश की फ्रेन्च भाषा का अपना एक निश्चित इतिहास रहा है ! पहले तो फ्रान्स की बोली फ्रंसियाँ राष्ट्र द्वारा संरक्षित की गई उसे साहित्यिक भाषा के रुप मे अपनाया गया !  भाषा को संरक्षण मिलने के कारण उसे मूलतः मध्यम वर्ग द्वारा अपनाया गया जिस कारण वह मध्यम वर्ग की बोली कही जाने लागी ! इस भाषा को राज दरबार द्वारा स्वीकार करने के कारण इसका धीरे धीरे सम्पूर्ण राज्य के प्रान्तों मे अभूतपूर्व प्रयोग होने लगा  !  लब्धिनिष्ठ  सहित्याकारों द्वारा इसका प्रयोग किया गया और प्रत्येक स्थान पर इस भाषा को प्राथमिकता दी गई ! बाद मे पेरिस की भाषा फ्रेन्च का विस्तार देश के प्रान्तों की ओर अनिवार्य शिक्षा, राष्ट्रिय एकता और सुनियोजित मुद्रण प्रणाली के कारण बढ्ता गया ! इस प्रकार फ्रेन्च के निर्माण मे स्थानीय बोलियों ने बहुत ही काम सहयोग दिया है ! भाषा को जब किसी राजा दरबार या शासकीय तन्त्र का संरक्षण मिल जाता है तब उस राजा या शासन द्वारा प्रदत नियमों के अनुसार उस भाषा  पूरे राज्य मे अनिवार्य कर दिया  गया !  उसके बाद ही उस राज्य मे राज्य द्वारा संरक्षित भाषा मे कार्य शुरु हो सका  ! 
          भारत देश मे अनेक आदि भाषाओं का कोई परिनिष्ठित इतिहास नहीं है अतः उन्हें बोली के रुप मे लिया जा सकता है ! यह ऐसा द्रष्ठिकोंन  है  कि जो भाषा के लिखित और साहित्यिक रुप पर आधारित है ! प्रायः वाक के लिए लिखित रुप को भाषा कहा जाता है! जिसे अङ्कित करने के लिए अंकन पद्धती का होना  आवश्यक  होता है यह वह पद्धती  है जो उस भाषा के स्थानीय वाक समुदाय को परिभाषित्   और  उच्चारित करती हो !
         वर्तमान मे कई क्षेत्र की बोलियों मे साहित्यकार साहित्य सृजन कर रहे हैं परन्तु बोली मे लिखे गए साहित्य को प्रायः सन्देह की द्रष्ठी से क्यों देखा जाता है  जो साहित्यकार बोली मे साहित्य स्रज़न कर रहे हैं उन सहित्यकारों को परिनिष्ठित भाषा की शिक्षा प्राप्त होती है और वे स्वयम को उस से अप्रभावित नहीं रख पाते ! कभी ऐसी स्थिति उत्पन्न होती है कि उनका चिन्तन परिनिष्ठित भाषा मे होता है और वे उसे बोली कि ध्वनि संरचना और ब्याकरण के अनुसार अनुदित मात्र कर देते हैं ! ऐसी स्थिति मे उनका शब्द संग्रह परिनिष्ठित भाषा से अत्यन्त प्रभावित होता है और उसी प्रकार उसकी शैली वाक्य रचना और अभिव्यक्ति भी प्रस्तुत करती है !
          वस्तुतः मध्य हिमालय क्षेत्र की बोलियों के साहित्यिक स्वरूप के आधार पर हम यह नहीं कह सकते हैं कि तत्समय मे जनता मे साहित्यिक सृजन हुआ ! जो बोली यदि समाज के अशिक्षित वर्ग तक ही सीमित रह जाती है उसमे साहित्य के स्रोत नहीं फूटते है बोली का साहित्य उन्हीन क्षेत्रों मे प्रकट होता है जहाँ पर उसे सामाजिक सम्मान प्राप्त होता है और शिक्षित व्यक्ति उसे बोलने का अव्यस्त होता है ! जो लेखक  उन बोलियों से अनभिज्ञ है और बोलियों को परिनिष्ठित भाषाओं के स्थान पर अपदस्थ समझते है वे प्रायः उसे सीखने के लिए उनमें हास्य और व्यंग्य की रचना करने का प्रयत्न करते हैं किन्तु जिस क्षेत्र मे बोली अब भी सम्पूर्ण समाज के दैनिक विचार विनिमय का माध्यम है और समाज के प्रत्येक वर्ग द्वारा बोली जाती है वहाँ वह साहित्य के मध्यम के रुप मे परिपुष्ठ होकर किसी भी परिनिष्ठित भाषा का सामना कर सकती है ! इस सम्बन्ध मे तुलसी दास ने कहा था :-
                                   "भाषा भावती भोरी मति भोरी, हैसिवे जोग हाँसे नहीं खोरी"
          कहा जा सकता है कि क्षेत्रीय बोलियों का कोई लिखित पौराणिक साहित्य नहीं होता या जिन बोलियों को उसके चर्चित क्षेत्र मे राजकीय संरक्षण प्राप्त नहीं होता ऐसी बोलियों को लिपिवद्ध भी नहीं किया जा सका ! इन  बोलियों का मौखिक साहित्य पर आधारित लोकगीत,  दन्तकथा कहानियाँ ही स्थानीय धरोहर के रुप मे सुरक्षित हैं ! वर्तमान मे स्थानीय बोलियाँ इसी रुप मे  अपनी श्रुति साहित्यक परम्परा लिए भविष्य के लिए असुरक्षित होती जा रही है ! श्रुति साहित्यक होने के कारण यह साहित्यिक परम्परा दिन प्रतिदिन अपने स्थान से  स्खलित होती जा रही है ! यदि कभी इस बोलियों के लिपिवद्ध करने कि आवश्यकता समझी गई तो किसी भी लिपि मे इसे लिपिवद्ध किया गया परन्तु इसकी स्थानीय बोली की ध्वनियों को उस लिपि मे पूर्ण  रुप से उच्चारित नहीं किया जा सका ! जिसके कारण स्थानीय भाषा अपनी मूल ध्वनियों के अभाव मे हमेशा अधूरी  रही !
          उपरोक्त परिस्थितियों के रहते हुए जो साहित्यकार अपनी निज भाषा या बोली मे साहित्य सृजन कर रहे हैं निसन्देह उस बोली या भाषा बोलने वाले समाज को अपनी भाषा के सहित्याकारों,  भाषा पर शोध करने वाले विध्यर्थियों, कवियों का सम्मान करना चाहिए ! यह उस समाज के लिए महानता का परिचायक भी है !

Dr. B L Jalandhari

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भाषा का सूक्ष्म एवं गंभीर अर्थ भेद 

उत्तराखंड की गढ़वाली - कुमाउनी भाषा का अध्ययन भाषा बिज्ञान के आधार पर बहुत ही महत्व  पूर्ण है ! भाषा के शब्दों का गाम्भीर्य एबम सूक्ष्म अर्थ के जो  प्रव्रातियाँ उत्तराखंड की भाषा के पाई जाती हैं अन्य भाषाओँ में कतिपय इनका अभाव मिलता है ! यहाँ की स्थानीय भाषा के शब्दों में सूक्ष्मातिशूक्ष्म बिबरन उसका वैशिष्ट्य और बारीकी से बिश्लेषण से ही स्थानीय भाषा की ध्वनियों  की शक्ति का  पता चलता है !
यहाँ की भाषा के कई शब्दों में इतना अधिक अर्थभेद रहता है जिनका स्पष्ठीकरण अन्य शब्दों द्वारा ब्यंजित करने में असंभव सा लगता है ! इन शब्दों को उत्तराखंड की गढ़वाली कुमाउनी भाषा को लिखने वाली प्रयुक्त  देवनागरी लिपि में स्थानीय ध्वनियों को स्पष्ट नहीं लिखा जा सकता !
जहाँ तक शूक्ष्म अर्थभेद वाले शब्दों के गाम्भीर्य को वैज्ञानिक विश्लेषण के आधार पर अध्ययन किया जाता है वहां उत्तराखंड की भाषा के कुछ शब्दों का उल्लेख करना आवश्यक समझा जाता है ! जैसे हिंदी में किसी वस्तु के जलने की गंध को सुगंध या दुर्गन्ध कहा जाता हैं या फिर उस वस्तु का नाम लेकर उस से निकलने वाली गंध को स्पष्ट किया जाता है  परन्तु उत्तराखंड की गढ़वाली कुमाउनी भाषा में इसे अलग अलग नाम तथा असंख्य शूक्ष्मभेदी पहचान से जाना जाता है ! एक अन्य शब्द जिसे गति की माप के लिए लिया गया है जैसे - तेज - अधिक तेज - अत्यधिक तेज का उल्लेख मिलता है ! भाषा विज्ञानं के आधार पर इसकी प्रत्येक स्तिथि के सम्बन्ध प्रत्येक स्थान पर विश्लेषण किया जा सकता है परन्तु उत्तराखंड की स्थानीय भाषा के शब्द इसप्रकार के शब्द विश्लेषण से कुछ अलग हटकर हैं ! वह उस गति मापक शब्द के आरम्भ से लेकर अंत तक की स्तिथि तथा उसके निश्चित समय में घटने की स्तिथि, किस प्रकार उस शब्द का प्रयोग किस स्तिथि के लिए किया जा रहा है इसप्रकार पूरे वाक्य के स्थान पर केवल एक शब्द में अपनी पूरी बात कहना, यह उत्तराखंड की भाषा के गांभीर्य का द्योतक है ! किसी भी भाषा में जब वाक्य का निर्माण किया जाता है उस समय उस के साथ ब्याकरण के उन सभी  प्रवृतियों का प्रयोग किया जाता है जो भाषा विज्ञानं के आधार पर युक्ति सांगत हैं ! कई वाक्यों में व्याकरणिक  प्रवृतियों का प्रयोग होने पर भी वाक्य में सम्पूर्णता का अभाव मिलता है ! यहाँ उत्तराखंड की भाषा के लिए गागर में सागर वाली बात अवश्य चिरतार्थ  होती है ! यहाँ इस सागर से कुछ गति की मापक स्थानीय शब्दों का प्रयोग किया जाता है तो भाषा में शब्दों के इस गांभीर्य को समझने के लिए समय नहीं लगेगा ! जैसे - "कतमत" "कई बे"  तथा "हड़बड़" शब्द कार्य करने की प्रवृति युक्त हैं ! जिसमे शीघ्र -अतिशीघ्र -शीघ्रातिशीघ्र के अर्थ का अभाष हो रहा है किन्तु इस तीनों प्रवृतियों के अलावा इन शब्दों के साथ साथ कई प्रवृतियाँ साथ चल रही हैं या महसूश की जा रही हैं !

यह शब्द केवल उदाहरण स्वरुप है इसप्रकार के अनेकानेक शब्दों का पूरे उत्तराखंड की गढ़वाली कुमाउनी भाषा क्षेत्र में प्रयुक्त किये जाते हैं ! उत्तराखंड अधिकांश पहडी क्षेत्र है अतः यहाँ की संस्कृति रीती रिवाजों पर पहडी धरती का प्रभाव है ! यहाँ की धरती के कण कण में यहाँ के जन का सीधा सम्बन्ध है यहाँ का मानव जिस कार्य की प्रवृति के लिए जिस स्थान पर जाता है उसी स्थान पर कार्य संपन्न करते हुए वह कार्य के साथ साथ नित नए शब्दों की  स्रश्थी भी करता रहता है ! इसी लिए यहाँ की स्थानीय भाषा में बिभिन्न जीव जंतु, पशु पक्षी, नदी नाले, पर्वत घाटियों, बार त्यौहार, मेले, प्रातः काल से सायं कल तक का बारीकी से विवरण मिलता है ! प्रत्येक वस्तु के स्वभाव विशेषता उसकी ध्वनि, बोल, स्वर आदि के लिए ऐसे शब्दों की स्रश्थी हुई  है की उस शब्द का उचारण करते ही उस वस्तु विशेष या स्थान विशेष, जाती विशेष के सम्बन्ध में सांकेतिक व सूक्ष्म अर्थ मिल जाता है ! यदि इन विशेष सांकेतिक और शूक्ष्म अर्थ को लिपिबद्ध करने की आवश्यकता समझी गई, ऐसी स्तिथि में वह विशेष सांकेतिक व शूक्ष्म अर्थ वाले शब्दों को उच्चारण सम्मत लिपिबद्ध नहीं किया जा सका ! इसी कमी के उजागर न होने की स्तिथि में आजतक भी उत्तराखंड की यह भाषाए बोली के स्थान पर ही खड़ी हैं !   यही एक एषा कारन है जिसकी वजह से उत्तराखंड की गढ़वाली कुमाउनी भाषा का साहित्य फल फूल नहीं सका !

एक माइने में कहा जय की स्थान, वस्तुओं का सांगोपांग विवरण प्रस्तुत करना तथा उसकी सूक्ष्मतिशूक्ष्म प्रवृतियों का वर्गीकरण तथा  उनका नामकरण करना उत्तराखंड की गढ़वाली कुमाउनी भाषा की अपनी एक निजी विशेषता है ! इन शब्दों से सूक्ष्म अर्थभेद की व्यंजना हो जाती है ! यहाँ  की भाषा यहाँ के प्रत्येक पदार्थ के विचित्रं और सूक्ष्मतम परिवर्तन के लिए अति विशिष्ट गुण युक्त है ! यह क्षेत्र प्राकृति धान्य है ! अतः प्राकृतिक वस्तुओं का अपार वैभब तथा बैबिध्य होने के कारण सूक्ष्म अर्थभेद के द्वारा ही उन शब्दों का उनकी स्थानीय ध्वनियों के साथ स्पष्ठीकरण करना सम्बभ  हैं !

उत्तराखंड की गढ़ावाली कुमाउनी भाषा की सथानीय ध्वनि जिन्हें यहाँ की भाषा का प्राण भी कहा जा सकता है इन ध्वनियों का स्थान देवनागरी लिपि में नहीं है, यदि स्थानीय भाषा के इस प्राण को लेखन के लिए प्रयुक लिपि  के साथ जोड़ा जाता है तो उत्तराखंड की भाषा की सूक्ष्मता तथा सांकेतिकता अन्य भाषाओँ की तुलना में उच्च स्थान पर स्थापित होगी !

 

डॉ. बिहारीलाल जलंधरी


Dr. B L Jalandhari

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आस्था की बेदी को खून का स्नान
 
डॉ. बिहारी लाल जलंधरी
 
देव भूमि के नाम से चर्चित मध्य हिमालयी क्षेत्र का वर्णन धार्मिक और अध्यात्मिक शिक्षा के गुरु के रूप में प्रत्येत पौराणिक धर्मशाश्त्र में मिलता है ! हिमालयन  क्षेत्र  जिसे पौराणिक काल में उत्तर्व्रित भी कहा गया  यह देवताओं की तपस्थली क्षेत्र था ! जम्मू कश्मीर से लेकर उत्तर्पूर्ब के खाशी परबत मालाओं तक का सुमार इस क्षेत्र में किया जाता है ! इस सम्पूर्ण क्षेत्र में मध्य हिमालय क्षेत्र का नाम चर्चित रहा है ! स्कंद पुराण का केदारखंड अध्याय केवल मध्य हिमालय की ब्याख्या करता है ! इस क्षेत्र में अधिकांश देवी देवताओं के मंदिर है इसी क्षेत्र में कई योगी महात्माओं ने अपने मठों  की स्थापना की !  पुराने समय के मैथ जिन्हें उस समय के विश्व विद्यालय कहा जाता था जो उस समय शिक्षा के साथ-साथ धर्म प्रचार का भी कार्य करते थे उसी रीती पर बने आज के मठों के माध्यम से शिक्षा और धर्म प्रचार का कार्य हो रहा है !
यह सर्ब विधित है की शांति की तलास में यहीं कई साधू संत आये ! इस शांत वातावरण वाली भूमि को उनहूँ ने अपनी ताप स्थली के रूप में चुना ! फल्श्वरूप उनके ताप का प्रभाव यहाँ के वातावरण के साथ साथ यहाँ के आम इन्शान पर पड़ा ! जितने भी शिद्ध आये और उन्हूने अपनी साधना के माध्यम से यहाँ के लोगों के जन जीवन को सवारने, भूत प्रेतों से रक्षा करने, बुराई से बचने, महामारियों से बचने, छोटे बच्चों को बल बुध्ही देने, अच्छी फसल के लिए बारिश देने, उचित समय पर मेघों का आह्वान करने, ताकत्बर बैल देने, दुधारू पशु देने सम्बन्धी कई मिन्नतें मांगी ! कोई भी एक मिन्नत पूरी होने के उपरांत उस शिद्ध शधक को खुश करने के लिए बलि दी जाती थी ! यहाँ तक की शिद्ध शाधक जो कुछ भी अपने भक्त से मांगता था अपनी मिन्नत की ख़ुशी में भक्त उस मांग को  जरूर पूरी करता था ! पौराणिक काल से यह परम्परा चलती आ रही है ! पौराणिक काल में जो शिद्ध शाधक यहाँ अपने मठ बनाकर इह लोक से परलोक को गमन कर गए थे या कहीं की उन्हों ने समाधी ले ली थी उनके भक्तिओं या अनुयाइयों ने उशी स्थान पर उनके मंदी बना दिए ! भक्तों का कुनबा बढ़ने की स्तिथि में वह एक स्थान से दुसरे स्थान पर भहे स्तानान्तरित हुए परन्तु वह अपने साथ अपनी आस्था के प्रतीक उस धिध साधार या देवी को ले जाना नहीं भूले ! इसी परम्परा के चलते मध्य हिमाई क्षेत्र में एक ही देवी या देवता के कई मंदिर मिलते हैं ! पहले कुनबा और फिर गाँव तथा उसके बाद पूरा क्षेत्र में जब भी कोई घर से किसी काम के लिए बहार निकलता वह अपने देवी देवता से उस कार्य की सफलता के लिए प्रार्थना करता था वर्तमान तक भी सभी समाजों में यह परिपाटी है !
मध्य हिमालयी क्षेत्र में जिन शिधा साधकों ने ख्याति पी उनमे कई का नाम उल्लेखनीय है ! इसमें नाथ बाबाओं का नाम उल्लेखनीय है ! जैसे भैरब नाथ,  मछंदर नाथ,नर्शिंह नाथ, जालंधर नाथ, गोरख नाथ, नाग नाथ, चौरंगी नाथ, अध्वेत नाथ, शिध्वाली नाथ, ग्वेल, कलुवा, हरु हित, बीर,  घंदियल,  यहाँ तक बाहरवीं शताब्दी के बढ़ जगत गुरु संकराचार्य द्वारा निर्मित मध्य हिमालय क्षेत्रे के दो मंदिरों का नाम भी बद्री नाथ, केद्र नाथ नाम से रखा गया ! उसके बाद जितने भी गुरु मंदिरों की स्थापना हुई उनके नाम के अंतिम अक्षर नाथ ही लगाया गया ! प्रत्येक कुंवा या गाँव ने इनमे से अपने एक शधक को देवता मानकर अपना ग्राम देवता बना दिया तथा उसका मंदिर उछ स्थल पर या गाँव से ऊपर छोटी पर बना दिया ! मध्य हिमालयी क्षेत्र में सभी देवी देवताओं के मंदिर ऊँची चोटियों पर बने हैं ! इसी प्रकार देवियों के मंदिर जगह जगह स्थापित हैं ! यहाँ देवी और देवता सामान रूप से विराजमान हैं! किसी भी देवी देवता में भेद भाव नहीं है ! स्थानीय लोगों द्वारा अपने देवताओं का आह्वान जागर के रूप में किया जाता है! इस अवसर पर यह शिद्ध सहाधर और देवी देवता अपने भक्तों पर अपनी भावना रखते हैं तथा नाचते हैं ! नचले समाया इनके द्वारा जो कुछ भी माँगा जाता है उशे उसका भक्त पूरा करता है ! यहाँ खाडू या कांतू (बागी) की ही बलि चढ़ती है ! बहुत कम मामले देखे गए जब मुर्गे की बलि मांगी जाती है ! अधिकतर मुर्गे तो उदा दिया जाता है !
आस्था प्रतीक मन जेने वाले इस क्षेत्र में लोगों के दिलों में श्रधा है ! अपने देव के प्रति श्रधा रखते हुए केवल ऊँची चोटियों के कंदिर ही नहीं परन्तु छोटे छोटे थानों पर भी बेजुवां जानवरों की बलि दी जाती है ! यहाँ तक देखा गया की उत्तराखंड में कई देवी देवता ऐसे हैं जिनको पुत्र के जनम पर, पुत्री के जनम पर, लड़की के ससुराल में बच्चे होने पर बकरा या मंदा दिया जाता है ! यहाँ तक जितनी बार कुनवे में बच्चे पैदा होते हैं यदि उनके द्वारा देवता की पूजा की जाती है तो सबसे पहले एक बकरी मरी जाती है ! इस परम्परा को स्थानीय सामान्य भाषा में भीतर चुखियाना कहते हैं ! एक मायने में कहा जाय तो यहाँ होने वाली प्रत्येक पूजा में बलि अवश्य चढ़ती है ! बहुत कम क्षेत्र के लोगों में मंदितों में बलि के खिलाप जागरूकता उत्पन्न हुई है ! कई स्थान एइसे हैं जहाँ केवल श्रीफल नारियल में पूजा होती है ! वहां श्रीफल नारियल में पूजा के पश्चात् देवी देवता का प्रकोप नहीं हुआ न ही किसी भक्त तो कोइ हानि हुई !
मध्य हिमालय क्षेत्र में स्थित कई मंदिरों में हर साल या हर तीसरे साल मेला लगता है ! इसी मेला में देवी देवता के भक्त मिन्नत मानते हैं तथा उस मिन्नत के रूप में कोई निशान इस मंदिर से ले जाते हैं ! जैसे खाडू और काँटा (बागी) के गली पर बंधी रस्सी का टुकड़ा, मंदिर पर बंधी चुनी आदि तो देवी या देवता की धरोहर के रूप में अपने साथ ले जाते हैं ! जब उनकी मिनट पूरी होती हैं तब वह उशी रूप में रस्से के साथ बागी या मैंडा या दोनों साथ लेट हैं तथा देवी को खुश करने के लिए उनकी बलि देते हैं !
यह सिलसिला लगातार चल रहा है ! बड़े बड़े मेलों का आयोजन हो रहा है जहाँ हजारों के हिसाब से बेजुवां जानवर मेंडे और बागियों की बलि दी जाती हैं ! गढ़वाल कुमाऊं दुसंत पर बना कलिंका का मंदिर में हर तीसरे साल मेला लगर है ! यहाँ पशु बलि रोकने की बहुत कोशिस की गई परन्तु लोगों के दिल में घर कर गई आस्था की भावना के सामने सभी प्रयाश बोने साबित हो जाते हैं ! यह भी देवी की ही शक्ति मानी जा रही है ! इस प्रकार के मेलों के दोरान जिस मंदिर स्थल पर आयोजन होता है वहां की मिट्टी भी खून से लाल हो जाती है ! मंदिर से लेकर उसके दूर दराज क्षेत्र तक जगह जगह बेजुवां जानवरों का खून पूरे वर्ष भर मेले की यद् को तजा कर देता है !
जहाँ बलि के माध्यम से खून देने की बात आती है वहां यदि अपनी भावना बलि के स्थान पर श्रीफल दूध और चावल से अपने देवी देवता को मानाने की कोशिस की जाय तो निशंदेह ही आपका देवता मान जायेगा ! परन्तु यह परिवार या कुनबे में एक सदस्य द्वारा प्रस्तावित होने के बजे सभी सदस्यों के साथ वह सदस्य जिसपर देवता प्रकट होता है उस से भी सलाह

Dr. B L Jalandhari

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इतिहास के पन्नो तक सिमटता  गांव 
उत्तराखण्ड प्रदेश मे गढ़वाल कुमाऊं सीमा से कुछ किलोमीटर दूरी पर चारों तरफ उन्ची चोटियों से घिरा मेर गावं खेतू जो विकाश खण्ड बीरोंखाल और पट्टी खाटली   के अन्तर्गत आता है ! लम्बे चोड़े खेत चरागाह विशाल जंगल पूरी हरियाली के बीच बसा मेरा गावं आज अपनों के लिए बान्हें पसारे खड़ा है ! गावं की चोटी पर बैठकर मन्द मन्द हवा के झोंकों के साथ हिमालय दर्शन का आनन्द लिया जा सकता है ! लम्बे चोड़े  खेतों के बीच पौराणिक कला को बिखेरती आलिशान बंगले और तिबारियां  हैं ! कई परिवारों द्वारा गावं छोड जाने के पश्चात यहाँ तिवारी तथा बंगले वर्तमान मे खण्डहर मे तब्दील हो गए हैं ! मेरे गावं मे आज कुछ ही परिवार हैं जो गावं छोड कर जा चुके परिवारों को गावं आने पर आश्रय प्रदान करते हैं ! गावं अधिक उंचाई पर है गावं का क्षेत्रफल अधिक होने के कारण गावं की भूमि से तीन गधेरे  नुमा नदियाँ निकलती हैं जिनमे पानी के श्रोत तो हैं जो कुछ भुकम्पन के बाद रिसाव होने के कारण अपना स्थान बादल देते हैं ! इन् स्रोतों द्वारा केवल पीने के लिए ही पानी उपलब्ध हो पाता है ! सिंचाई न होने के कारण गावं को दोनों खेतियों के लिए इन्द्रदेव के भरोसे बारीश पर ही निर्भर रहना पडता  है ! गावं के बडे चरागाह और परिवारों के अपने निजी जंगल होने से प्रत्येक परिवार पर्याप्त मवेशी पालता है लम्बी चौड़ी खेतिबाड़ी वा पशु पालन होने से गावं मे कभी अन्न धन की कमी नहीं रही !
          मुझे बचपन की याद आती है जब गावं के अड्तालीश मवार हिस्से होते थे लेकिन  जैसे जैसे नगरों महानगरों की सान शौकत और चकाचोंद की बाते सुनी जाती थी तथा गावं मे स्वास्थ्य वा शिक्षा की समस्या होने के कारण गावं खाली होता गया रख रखाव के अभाव मे  बंगले तथा तिवारी खण्डहर मे बदलते गए !
          मेरा गावं मुख्य मोटर मार्ग से लगभग तीन किलोमीटर दूर है ! गावं के अगल बागल वाले नौलापुर और केदारगली गावं भी मोटर मार्ग से बन्चित हैं ! सन् १९७४ मे केदारगाली के पूर्व स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी तथा पूर्व जिला अध्यक्ष रह चुके स्वर्गीय हरि शर्मा ने बीरोंखाल केदारगली खेतू कलिंका जोगीमाधी तक मोटर मार्ग स्वीकृत करवाय था दुफुटी बनने के बाद पहले टेन्डर के लिए बीरोंखाल से निर्माण आरम्भ हो गया था परन्तु ग्राम डुमैला वासियों ने अपने जंगल बचाने के लिए मोटर मार्ग बन्द करवा दिया ! तब से आज तक यह मार्ग आरम्भ नहीं हो सका ! फलश्वरूप इस क्षेत्र के लोग मोटरमार्ग के लिए दुखी हैं !
         मेरे गावं मे जहाँ सतगुरु बाबा की सन्त कुटी थी जिसमे बाबा के शिष्य आस पास गावं  के बच्चों को पढ़ाया करते थे आज वह गावं एक अद प्राथमिक विद्यालय के लिए तरस रहा है! यहाँ के नोनिहल दो किलोमीटर दूर दूसरे गावं केदारगली तथा ढौर के आधारिक विद्यालयों  मे पढने के लिए जाते हैं ! हाइ स्कूल और इन्टर कोलेज की बात तो दूर है ! गावं से तीन किलोमीटर पर हाइ स्कूल घोडियाना खाल तथा इन्टर कोलेज बीरोंखाल हैं ! इन् सभी स्कूलों के निर्माण मे मेरे गावं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई !
          मेरा गावं आज भी कई बुनियादी समस्याओं के लिए तरस रहा है ! यहाँ के वाशिंदे अपनी मेहनत के बल पर शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र मे आगे बढ रहे हैं ! इन् मे सबसे पहले राष्ट्रिय आन्दोलन से जुड़े उस व्यक्ति का नाम प्रथम है  अध्यातमिक गुरु सचिदानन्द शास्त्री "सतगुरु बाबा" के दूसरे नम्बर के पुत्र श्री महेश चन्द शर्मा बचपन से ही प्रतिभाशाली थे ! डी ए बी कलेज बीरोंखाल से शिक्षा ग्रहण कर आगे की पढाई के लिए अपने बडे भई ईश्वरीचन्द शर्मा के साथ कराँची चले गए ! सन् १९३० मे अपनी पढाई छोड़कर महात्मा गान्धी से प्रेरित होकर राष्ट्रिय आन्दोलन के कूद पडे !  आन्दोलन मे रहते हुए अन्ग्रेगी पत्रिका "प्रोसेशी" तथा तथा हिन्दी गुजराती पत्रिका  "भविष्यबाणी" का कुशल सम्पादन किया !पत्रिकाओं मे आन्दोलन की उत्प्रेरक खबर छपने पर कई बार उन्हें जेल भेज गया ! वे सन् १९३२ मे अफ्रीका पहुँचे तथा उसके बाद फ्रान्स चले गए ! सन् १९३८ मे वापस कराँची आकार दुबारा पत्रिका आरम्भ कर दी ! सन् १९४२ मे भारत छोडो आन्दोलन मे भाग लिया ! इनको बन्दी बनाकर कराँची जेल मे डाल दिया गया जहाँ से १९४५ मे रिहा हुए ! शर्मा जी राष्ट्रिय आन्दोलन के दोरान कई संस्थाओं से जुड़े रहे ! जैसे सिन्ध फार्वर्ड ब्लोक के उपप्रधान, आगरा अवध प्रान्तीय सभा, गढ़वाल सभा, चपरासी सभा, विद्यार्थी एसोसिएसन सिन्ध,  आर्य समाज, थियोसोफिकल सोसाइटी आदि कई सभाओं के सभापति रहे ! गांव के श्री रामसिंह बछेला रावत जिम कार्बेट के मुन्सी थे भवानी दत्त जुयाल, दुर्गा दत्त जलंधरी, तोता राम ध्यानी, गोबिन्द राम जुयाल, किशन दत्त जलन्धरी, राजेश्वर धौलाखंडी, नारायण दत्त जुयाल, रामकिशन जुयाल, गीता राम ध्यानी, राष्ट्रपति से संचार श्री अवार्ड प्राप्त महेशा नन्द जलन्धरी, सालिक राम ध्यानी, गुना नन्द ध्यानी, आदि दिवंगत लोगों ने अपने क्षेत्र मे कीर्तिमान स्थापित किए !
          वर्तमान की विडम्बना और हमारे पुर्खों का अपने परिवार की ओर लापरवाही यहाँ स्पष्ठ होती है कि जीवन भर कार्बेट के मुशी रहे राम सिंह के पुर्त श्री उमेद सिंह रावत लगातार छः बार गावं फोरस्पन्चायत के प्रधान रहे ! परन्तु अशिक्षा और सुझबूझ न होने के कारण वह गावं के लिए सरकारी योजनाओं द्वारा प्रदत धन से रती भर सदुपयोग नहीं कर पाए ! फोरसपंचायत होने से अकेले गावं की ग्रामसभा का बज़ट भी अन्य ग्राम सभाओं के अनुसार ही था परतु वावजूद इस गावं की स्थिति बद्तर है ! वर्तमान मे गांव के होनहार   डॉ. दिनेश चन्द्र ध्यानी उत्तराखण्ड राज्य के मुख्य चिकित्सा अधिकारी के पद से सेवा निवृत हुए, प्रोफ आनन्द स्वरूप शर्मा डी ए बी कालेज देहरादून से सेवा निवृत होकर देहरादून कोर्ट मे वकालत कर रहे हैं, श्री सुरेशा नन्द जलन्धरी ग्रीफ से पेनियर इन्जीनियर पद से सेवानिवृत होकर गावं विकाश कर्यों मे चाड बढ कर भाग ले रहे हैं, टेरितोरियल  आर्मी से सेवानिवृत होकर गोबिन्द सिंह रावत, ओमप्रकाश जुयाल, जयानंद धौलाखंडी, किरोडिमल कालेज मे उच्च पदस्थ हरिचन्द ध्यानी, सुपर बाजार मे बासुदेव ध्यानी तथा मोहन सिंह रावत, जगदीश जुयाल, रमेश धौलाखंडी आदि का ध्यान ग्राम सुधार के कर्यों के लिए अग्रेषित है !
          उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद गावं से फोर्सपंचायत छिन गई है जो अब ग्राम सभा सिन्दुड़ी  के साथ मर्ज कर दी गई है ! मुख्य मोटर मार्ग से गाव तक जाने के लिए पहुँच के लिए इस गावं के लिए एक खच्चर बटिया अभी तक नहीं बन पाई है गावं से नवयुवक १०वी तथा १२वी कक्षा पास करने के बाद रोजगार की तलाश मे लगातार निकलते जा रहे हैं गावं धीर धीरे खाली होने के कगार पर है ! यही स्थिति रही तो आने वाले समय मे इस  ऐतिहासिक स्मृति वाले गावं मे केवल पूर्बजों   की धरोहर अवशेष मात्र न रह जायेगी !
 
 (डॉ. बिहारीलाल जलंधरी)
"गऊँ आखरों" के   सृजक, (उत्तराखण्ड की भाषा गढ़वाली कुमाउनी के स्थानीय ध्वनियों को अक्षर के रुप मे देवनागरी लिपि मे स्थान दिलाने के लिए हेमवती नन्दन बहुगुणा गढ़वाल विश्व विद्यालय से कार्यरत-ताकी उत्तराखंडी भाषा अपनी पूर्ण ध्वनियों के साथ देवनागरी लिपि मे लिखी जा सके), एबम प्रधान  संपादक देवभूमि की पुकार, पूर्व केन्द्रीय कार्यकारिणी पदाधिकारी उक्रांद, संस्थापक सदस्य मुख्य सचेतक अखिल भारतीय उत्तराखण्ड महासभा, प्रधान तुग्लाकाबाद गाव,  महासचिव उत्तरान्चल परिवार, संरक्षक उत्तांचल सांस्कृतिक मंच सङ्गम विहार,

Dr. B L Jalandhari

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उत्तराखण्ड की बोली भाषा पर एक सम्बाद
मुम्बई से खुशल सिंह रावत
 
मुम्बई दादर स्थित काशीनाथ गुरु सभा ग्रह मे श्री पूर्ण मंरल की काब्य कृति वा निर्त्य नातिका जुन्यली आस के लोकार्पण समारोह के तुरन्त बाद उत्तराखण्ड की बोली  भाषा पर एक सम्बाद सम्पन्न हुआ ! आयोजकों ने इस कार्य क्रम मे गिने छुने लोगों को आमन्त्रित किया था ! इस बैठक मे वह अधिक लोग उपस्थित थे जिनको उत्तराखण्ड की बोली भाषा के लिए दूर दूर तक कोई सरोकार नही हैं ! हर बैठक मे पहुंचने वाले चेहरे ही इस बैठक मे मौजुद थे ! बक्ताओं ने अपने विचारों मे यह बताने की कोसिश नहीं की कि उत्तराखण्ड की बोली और भाषा मे क्या अन्तर है ! अचम्भित करने वाली बात यह थी कि किसी भी बक्ता ने प्रवासियों मे उत्तराखण्ड की बोली के विलुप्त होने के कारनों के विषय मे बोलने की कोशिस नहीं की ! उत्तराखण्ड की भाषा का औचित्य, उत्तराखण्ड की भाषा पर कार्य रत लोगों को प्रोत्साहन देने के लिए क्या कदम उठाए जाने चाहिए, भाषा के स्वरूप क्या हो, जिन लोगों द्वारा क्षेत्रीय भाषाओं पर कार्य किया है उसका लाभ क्षेत्रीय जाता को कैसे मिले   इस सम्बन्ध मे किसी भी बक्ता ने विचारों का आदान प्रदान नहीं किया ! उत्तराखण्ड कि गढ़वाली कुमाउनी भाषा पर सभी लोगों ने जो बते रखी  वह अपनी जगह ठीक थी ! उत्तराखण्ड की वह मान्यता प्राप्त और शासन  द्वारा संरक्षित भाषा जो सभी जगह बोली लिखी पढी पढाई जा सके इसमे गढ़वाली कुमाउनी दोनों  या दोनों मे से एक ही हो सक्ती है या यदि दोनों का विश्व दिध्यालय स्थर पर शोद  सम्पन्न हो रखा  है उसे उत्तराखण्ड की भाषा का आधार  बनाया  जाना चाहिए ! मुम्बई मे पहली बार बोली भाषा पर इस प्रकार  का कार्यक्रम किया गया, भविष्य मे भी इसी प्रकार के आयोजन कर उत्तराखण्ड की भाषा को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए !
इस  बैठक का निष्कर्ष यही  निकला कि वर्मन मे प्रवाशी केवल अपनी रोजी रोटी के लिए चिन्तित हैं ! वह अपनी बोलि-भाषा के लिए व्यर्थ मे अपना किमती समय नहीं गवाना चाहते हैं  फिर भी इस्प्रकर की यह छोटी सी पहल को नजर अन्दाज नहीं किया जाना चाहिए बल्कि इसी प्रकार के सम्बाद जारि  रहने चाहिए ताकि वह दिन जरूर आएगा जब हमारी उत्तराखण्ड की एक भाषा बन कर तैयार हो सकेगी !
जिसमे प्रोफ राधा बल्लभ दोभाल, भीष्म कुक्रेती, दिनेश धोंदियल, भगत सिंह शाह, भीम सिंह रातोर, बलदेव राना संजय बलोदी, आदि वक्ताओं ने अपने अपने विचार दिए ! यह कार्य क्रम उत्तरांचल विचार मंच और हिमादरी हिमालायन कल्चुरल सोचिएटी के सयुक्त तत्वाधान मे सम्पन्न हुआ !

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                     बोली का साहित्यकार सम्मान का हकदार
डा. बिहारीलाल जलंधरी
यह सर्ब विदित है कि बोलियाँ स्वतन्त्र रह कर ही विकसित हुई ! इस प्रकार विश्व मे तेरह भाषाये ऐसी  हैं जिसमे प्रत्येक को पन्द्रह करोड से अधिक लोग बोलते हैं ! इन् मे प्रत्येक भाषा का अपना अलग क्षेत्र है ! यदि किसी दौर मे एक क्षेत्र का भाषा भाषी दूसरे क्षेत्र मे चला जाता है ऐसी स्थिति में वह अपनी भाषा को अवश्य ही अपने पैत्रिक स्थान से दूर अपने साथ ले जाता है ! इस प्रकार की कई भाषाएं हैं ! जिनका विकास अपने पैत्रिक स्थान से बाहरी क्षेत्र मे अधिक हुआ ! विश्व की इन् भाषाओं मे कई भाषाये अतिपरिनिष्ठ हैं तथा कुछ परिनिष्ठ ! इन् भाषाओं मे प्रत्येक की अपनी बोली तथा कई उपबोलियाँ भी है जिसके एक रुप को एक व्यक्ति, परिवार या समाज तथा उनके अश्रितों के साथ प्रयोग किया जाता  है ! यह उनकी अपनी बोली है जिसे वह अपनी भाषा के रुप मे मानते हैं ! वह भाषा ही उनकी अपनी मात्र भाषा होती है ! यह भाषा उनकी व्यक्तिगत बोली हो सकती है ! एक मायेने मे कहा जा सकता है कि विश्व मे उतनी ही व्यक्ति बोलियाँ हैं या जीवित भाषा के उतने ही स्वरुप हैं  जितने उनके बोलने वाले !
बोली का एक छोटा सा उदाहरण यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है कि किस प्रकार बोली अपने परिनिष्ठ स्वरूप के ओर बढी ! वाक को परिनिष्ठ भाषा का स्वरूप कैसे प्राप्त होता है ! इसके उत्तर के लिए परिस्तिथियाँ निहित हैं ! उदाहरण के रुप मे चोदहवीं और पन्द्र्हवीं सताब्दी से पहले लंदन की बोली का उत्कर्ष नहीं हुआ था अंग्लोसेक्सन इंगलैंड से विन्चेस्टर की बोली  नवी से ग्यारहवी  सताब्दी तक  साहित्य का परिवर्धित और परिनिष्ठित  रुप में रही किन्तु १०६६  ईस्वी मे नार्मन लोगों के आगमन ने इस परम्परा को नष्ट कर दिया और तीन क्रमगत  सताब्दियों तक इंगलैंड की बोलियाँ समान रुप से व्यवहार मे आती रही ! जीवन के उच्चस्थरीय विकास की चाहत में राज्य की जनसंख्या धीरे धीरे नगरों, महानगरों मे आकार रहने लगी ! व्यवहार की भाषा मे कई बोलियों के शब्दों का प्रयोग होता रहा ! फलश्वरूप इसी दौर में सभी बलियो के सयुक्त रुप का प्रयोग होने से लंदन की बोली का उत्कर्ष हुआ ! लंदन इंगलैंड का नाभिकीय क्षेत्र था ! लोग गांव से विभिन्न बोलियों का रुप लेकर लंदन आते रहे ! इस प्रकार काफी समय तक लंदन की बोली मे बहुत बिभिन्नताये रही ! उसका स्वरूप तब स्थिर हो पाया जब सत्रह्वी सताब्दी के बाद एक्सफोर्ड और  केम्ब्रिज  विश्व विध्यालयों के शिक्षित लोगों के उच्चारण और उनकी वाक प्रव्रतियों को परिनिष्ठित मान लिया गया तब भी यह स्थायित्व से दूर थी  और पेरिश की भाषा फ्रेन्च की तुलना मे अधिक स्वतन्त्र थी ! पेरिश की फ्रेन्च भाषा का अपना एक निश्चित इतिहास रहा है ! पहले तो फ्रान्स की बोली फ्रंसियाँ राष्ट्र द्वारा संरक्षित की गई उसे साहित्यिक भाषा के रुप मे अपनाया गया !  भाषा को संरक्षण मिलने के कारण उसे मूलतः मध्यम वर्ग द्वारा अपनाया गया जिस कारण वह मध्यम वर्ग की बोली कही जाने लागी ! इस भाषा को राज दरबार द्वारा स्वीकार करने के कारण इसका धीरे धीरे सम्पूर्ण राज्य के प्रान्तों मे अभूतपूर्व प्रयोग होने लगा  !  लब्धिनिष्ठ  सहित्याकारों द्वारा इसका प्रयोग किया गया और प्रत्येक स्थान पर इस भाषा को प्राथमिकता दी गई ! बाद मे पेरिस की भाषा फ्रेन्च का विस्तार देश के प्रान्तों की ओर अनिवार्य शिक्षा, राष्ट्रिय एकता और सुनियोजित मुद्रण प्रणाली के कारण बढ्ता गया ! इस प्रकार फ्रेन्च के निर्माण मे स्थानीय बोलियों ने बहुत ही काम सहयोग दिया है ! भाषा को जब किसी राजा दरबार या शासकीय तन्त्र का संरक्षण मिल जाता है तब उस राजा या शासन द्वारा प्रदत नियमों के अनुसार उस भाषा  पूरे राज्य मे अनिवार्य कर दिया  गया !  उसके बाद ही उस राज्य मे राज्य द्वारा संरक्षित भाषा मे कार्य शुरु हो सका  ! 
भारत देश मे अनेक आदि भाषाओं का कोई परिनिष्ठित इतिहास नहीं है अतः उन्हें बोली के रुप मे लिया जा सकता है ! यह ऐसा द्रष्ठिकोंन  है  कि जो भाषा के लिखित और साहित्यिक रुप पर आधारित है ! प्रायः वाक के लिए लिखित रुप को भाषा कहा जाता है! जिसे अङ्कित करने के लिए अंकन पद्धती का होना  आवश्यक  होता है यह वह पद्धती  है जो उस भाषा के स्थानीय वाक समुदाय को परिभाषित्   और  उच्चारित करती हो !
वर्तमान मे कई क्षेत्र की बोलियों मे साहित्यकार साहित्य सृजन कर रहे हैं परन्तु बोली मे लिखे गए साहित्य को प्रायः सन्देह की द्रष्ठी से क्यों देखा जाता है  जो साहित्यकार बोली मे साहित्य स्रज़न कर रहे हैं उन सहित्यकारों को परिनिष्ठित भाषा की शिक्षा प्राप्त होती है और वे स्वयम को उस से अप्रभावित नहीं रख पाते ! कभी ऐसी स्थिति उत्पन्न होती है कि उनका चिन्तन परिनिष्ठित भाषा मे होता है और वे उसे बोली कि ध्वनि संरचना और ब्याकरण के अनुसार अनुदित मात्र कर देते हैं ! ऐसी स्थिति मे उनका शब्द संग्रह परिनिष्ठित भाषा से अत्यन्त प्रभावित होता है और उसी प्रकार उसकी शैली वाक्य रचना और अभिव्यक्ति भी प्रस्तुत करती है !
वस्तुतः मध्य हिमालय क्षेत्र की बोलियों के साहित्यिक स्वरूप के आधार पर हम यह नहीं कह सकते हैं कि तत्समय मे जनता मे साहित्यिक सृजन हुआ ! जो बोली यदि समाज के अशिक्षित वर्ग तक ही सीमित रह जाती है उसमे साहित्य के स्रोत नहीं फूटते है बोली का साहित्य उन्हीन क्षेत्रों मे प्रकट होता है जहाँ पर उसे सामाजिक सम्मान प्राप्त होता है और शिक्षित व्यक्ति उसे बोलने का अव्यस्त होता है ! जो लेखक  उन बोलियों से अनभिज्ञ है और बोलियों को परिनिष्ठित भाषाओं के स्थान पर अपदस्थ समझते है वे प्रायः उसे सीखने के लिए उनमें हास्य और व्यंग्य की रचना करने का प्रयत्न करते हैं किन्तु जिस क्षेत्र मे बोली अब भी सम्पूर्ण समाज के दैनिक विचार विनिमय का माध्यम है और समाज के प्रत्येक वर्ग द्वारा बोली जाती है वहाँ वह साहित्य के मध्यम के रुप मे परिपुष्ठ होकर किसी भी परिनिष्ठित भाषा का सामना कर सकती है ! इस सम्बन्ध मे तुलसी दास ने कहा था :-
"भाषा भावती भोरी मति भोरी, हैसिवे जोग हाँसे नहीं खोरी"
कहा जा सकता है कि क्षेत्रीय बोलियों का कोई लिखित पौराणिक साहित्य नहीं होता या जिन बोलियों को उसके चर्चित क्षेत्र मे राजकीय संरक्षण प्राप्त नहीं होता ऐसी बोलियों को लिपिवद्ध भी नहीं किया जा सका ! इन  बोलियों का मौखिक साहित्य पर आधारित लोकगीत,  दन्तकथा कहानियाँ ही स्थानीय धरोहर के रुप मे सुरक्षित हैं ! वर्तमान मे स्थानीय बोलियाँ इसी रुप मे  अपनी श्रुति साहित्यक परम्परा लिए भविष्य के लिए असुरक्षित होती जा रही है ! श्रुति साहित्यक होने के कारण यह साहित्यिक परम्परा दिन प्रतिदिन अपने स्थान से  स्खलित होती जा रही है ! यदि कभी इस बोलियों के लिपिवद्ध करने कि आवश्यकता समझी गई तो किसी भी लिपि मे इसे लिपिवद्ध किया गया परन्तु इसकी स्थानीय बोली की ध्वनियों को उस लिपि मे पूर्ण  रुप से उच्चारित नहीं किया जा सका ! जिसके कारण स्थानीय भाषा अपनी मूल ध्वनियों के अभाव मे हमेशा अधूरी  रही !
उपरोक्त परिस्थितियों के रहते हुए जो साहित्यकार अपनी निज भाषा या बोली मे साहित्य सृजन कर रहे हैं निसन्देह उस बोली या भाषा बोलने वाले समाज को अपनी भाषा के सहित्याकारों,  भाषा पर शोध करने वाले विध्यर्थियों, कवियों का सम्मान करना चाहिए ! यह उस समाज के लिए महानता का परिचायक भी है !

 

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