Author Topic: Journalist and famous Photographer Naveen Joshi's Articles- नवीन जोशी जी के लेख  (Read 58143 times)

Himalayan Warrior /पहाड़ी योद्धा

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Joshi JI.

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नवीन जोशी

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....क्योंकि हमने अपनी `ताकतों´ को अपनी `कमजोरी´ बना लिया है !
कहते हैं `पूत के पांव पालने में ही दिख जाते हैं´, लेकिन `पालने´ की उम्र से बहुत पहले बाहर निकलकर 10 वर्ष के होने जा रहे उत्तराखण्ड के `पांव´ कहां जा रहे हैं, यह कहना अभी भी मुश्किल ही बना हुआ है। इस उम्र तक आने में इसके `पालनहारों´ ने इसे कई दिशाओं में चलाने के दावे-वादे किऐ हैं, लेकिन यह कहीं पहुंचना तो दूर शायद अभी ठीक से चलना भी प्रारंभ नहीं कर पाया है। इसकी इस `गत´ का कारण एक से अधिक नावों का सवार होना भी माना जा सकता है, लेकिन असल कारण यह है कि इस अत्यधिक संभावनाओं वाले राज्य ने अपनी ताकतों को अपनी कमजोरी बना लिया है। हमने अपने संसाधनों का सदुपयोग करना दूर, उन पर पाबन्दियां लगा कर उन्हें निरुपयोगी बना दिया है। दरवाजे बन्द कर दिऐ हैं। हम ढांचागत सुविधाऐं बढ़ाने जैसे कार्य नहीं कर रहे हैं, कर रहे हैं तो बिना सोचे-समझे, और बेहद जल्दबाजी में, बिना गहन अध्ययन के दूसरों के ज्ञान को बिना पड़ताल किऐ आत्मसात करने के। ऐसे में एक कदम आगे बढ़ाते हैं तो दो कदम पीछे लौटने को मजबूर होते हैं।
बात कहीं से भी शुरू कर लीजिऐ। उत्तराखण्ड को पर्यटन प्रदेश कहा गया। लेकिन सैलानियों की जरूरतों का खयाल नहीं रखा गया। पर्यटक स्थलों में ढांचागत सुविधाओं को बढ़ाना व सुधारना तो दूर 10 वर्ष बाद भी पर्यटन विभाग का ढांचा ही नहीं बनाया गया। हालत यह है कि राज्य की पर्यटन राजधानी नैनीताल में विभाग के नाम पर केवल तीन कर्मचारी हैं। राज्य में बाहर से आवागमन की सुविधाऐं नहीं बढ़ाई गईं। जो सैलानी पहुंचते भी हैं, उन्हें अपेक्षित मौज मस्ती के अवसर देने से हमारी संस्कृति पर दाग लग जाते हैं। लिहाजा हमने उनसे प्रकृति के अलावा अपनी संस्कृति सहित सब कुछ छुपाकर रखा है। हम उन्हें अच्छी शराब तक नहीं दे सकते। शराब कहने सुनने में शायद बुरा लग रहा हो, लेकिन याद रखना होगा कि हमे अपने यहां पर्यटन विस्तार के लिए गोवा, मारीशश व सिंगापुर आदि सस्ते और `सर्वसुविधा´ वाले पर्यटक स्थलों से मुकाबला करना है, तभी हम पर्यटन प्रदेश बन सकते हैं। लेकिन जाहिर है, हम ऐसा नहीं कर सकते। कोई भी व्यक्ति जब जीवन के बेहद तनाव भरे क्षणों से बमुश्किल छुटि्टयां निकालकर घर से बाहर निकलता है तो स्वच्छन्दता चाहता है, और उसे हम अपने यहां स्वच्छन्दता तो हरगिज नहीं दे सकते। हां, आते ही उनका स्वागत हमारे `मित्र पुलिस´ के परेशानहाल जवान `यहां पार्किंग ही नहीं है तो इतनी बड़ी गाड़ियां लेकर आते ही क्यों हो´ सरीखी फिब्तयां कस कर करते हैं। हम पर्वतारोहण कराकर ही देश-दुनिया के सैलानियों को आकर्षित कर सकते थे, लेकिन हमने 40 हजार रुपऐ से अधिक शुल्क नियत कर इस ओर भी रास्ते जैसे बन्द कर दिऐ हैं।
बात वापस शराब पर मोड़ते हैं। `सूर्य अस्त...´ के रूप में अभिशप्त हमारे पहाड़ के जहां हजारों घर शराब की भेंट चढ़ रहे हैं, वहीं यह भी सार्वभौमिक सत्य है कि करों के बाद शराब ही हमारे राज्य की तिजोरी की सर्वाधिक `सेहत´ सुधार रही है। बावजूद हमारे `तारणहार´ मुंह में शराब पर राज्य की तिजारी की निर्भरता खत्म करेंगे´ का `राम´ बोलते हुऐ बगल में `हर वर्ष शराब विक्रेताओं के लक्ष्य 10 से 25 फीसद तक बढ़ाकर´ छुरियां भांज रहे होते हैं। बावजूद शराब के शौकीनों के अनुसार उत्तराखण्ड की शराब देश में सर्वाधिक महंगी और गुणवत्ता में घटिया है। राज्य की सेहत सुधार रही शराब सैलानियों को पिलाकर हम अपनी आर्थिकी भी सुधार सकते थे, किन्तु हमने शराब का काम करने वाले लोगों को `शराब माफिया´ शब्द दे दिया गया है, इसलिए हम खुद यह काम नहीं कर सकते, भले इस  शब्द का लोकलाज भय दिखाकर बाहर के लोग हमें  शराब पिलाकर मार डालें, और खुद `फिल्म निर्माता´ और इस लायक तक हो जाऐं कि सरकारों को बदल डालें।
हमने अपनी वन संपदा, चिड़ियां, जैव संपदा बचाई है, जिसे दिखाकर भी हम सैलानियों से लाखों कमा सकते हैं। राज्य की आर्थिकी की प्रमुख धुरी जल, जंगल, जमीन और जवानी भी हो सकते हैं। बात राज्य के 65 फीसद से अधिक भूभाग पर फैले वनों से शुरू करें तो इन पर रोजगार की भी प्रचुर संभावनाऐं हो सकती थीं। लेकिन हमारे यहां जो भी वन संपदा सम्बंधी कार्य करेगा, उनके लिए `वन माफिया´ शब्द मानो `पेटेंट´ कर दिया गया है। चीड़, यूकेलिप्टस, पापुलर जैसे पेड़ जो हमारी आर्थिकी का मजबूत आधार हो सकते हैं, उन्हें हमने `विदेशी´, `पर्यावरण  शत्रु´ और बांज के जंगलों के `घुसपैठिऐ´ आदि  शब्द दे डाले हैं। लीसा खोप कर हमारे यहां हजारों लोगों के घरों में चूल्हा जलता था, हमारी पिछली पीढ़ी लीसे के छिलकों से पढ़कर ही आगे बढ़ी, लेकिन लीसे का कारोबार जो करे वह `लीसाचोर´, लिहाजा इस क्षेत्र में कारोबार करने के रास्ते भी हमारे लिऐ बन्द। भले बाहर के लोग सारे जंगल तबाह कर डालें। इसी प्रकार हमारे यहां की खड़िया, रेता, बजरी आदि का कारोबार करने वाले `खनन माफिया´, सो हम अपने खेतों से पत्थर भी नहीं उठा सकते। भले अपनी उपजाऊ जमीनों पर हम खाईयां खुदवाकर अथवा खनन सामग्री के ढेर लगाकर उन्हें हमेशा के लिए बंजर बना दें। भले हमारी जीवनदायिनी नदियां, जमीनें कौड़ियों के भाव बाहर वालों को सालों, दशकों के लिए लीज पर दे दी जाऐं। हम पूरे एशिया को अकेले `आक्सीजन´ देने की क्षमता वाले अपने वनों को अपने `विकास की बलि देकर´ बचाने वाले गांवों को बदले में `कार्बन क्रेडिट´ लेकर सड़क की बजाय सीधे सस्ती या मुफ्त `रोप वे´ अथवा `हवाई सेवा´ दे सकते थे, पर ऐसी सोच सोचने में ही शायद अभी हमें वर्षों लगें।
`जल´ की बात करें तो हमें अपने पानी के उपयोग पर सख्त आपत्ति है। बड़े बांधों का हम विरोध करेंगे, छोटे हम बनाऐंगे नहीं। कोई हम जल विद्युत परियोजनाओं का विरोध करने वालों से पूछे तो सही कि हममें से कुछ को छोड़कर अन्य ने खुद कितना पानी बचाया। हम पर्यावरणप्रेमियों ने अखबारों में अपने प्रचार के लिए छपने में खर्च किऐ कागज से अधिक कितना पर्यावरण बचाया है। क्या हम दावे से कह सकते हैं कि जिन सड़कों का हमने विरोध किया, वैसी सड़कें हमने अपने घर तक भी नहीं बनने दीं। पर्यावरण बचाने के लिए क्या हमने अपनी लंबी गाड़ियां लेने से परहेज किया। हम कब तक `छद्मविद्´ बने रहेंगे। हमने अपने पनघट बन्द कर हमने गांव गांव तक डीजल चालित आटा चिक्कयां बना लीं। जल संरक्षण के परंपरागत प्रबंध `बज्या´ दिऐ। गांवों के पुश्तैनी कार्य करने में हमें  शर्म आती है। सड़कें हमारे गांव में आईं तो समृद्धि को करीब लाने के बजाय हमारे लिए `पलायन´ का रास्ता खोलने वाली साबित हुईं। हमारी सिंचाई विभाग की अरबों की परिसंपत्तियों पर यूपी आज भी कब्जा जमाऐ बैठा है। कुल मिलाकर हम अपनी करोड़ों रुपऐ की आय दे सकने वाली जल संपदा से कोई लाभ लेने का तैयार नहीं।
बात `जवानी´ की करें तो हमारे पढ़े-लिखे युवा जो अपनी दुरूह भौगोलिक व कठिनतम् प्राकृतिक परिस्थितियों से कम मेहनत के भी अच्छे एथलीट, कवि, लेखक, कलाकार,
खिलाड़ी, वैज्ञानिक, राजनीतिज्ञ, बुद्धिजीवी व प्रशासनिक अधिकारी के रूप में प्रदेश ही नहीं देश के लिए विश्वसनीय मानवशक्ति हो सकते हैं , आज भी राज्य बनने से पूर्व की ही तरह `पलायन´ करने को मजबूर हैं। जो यहां बचते हैं, उन्हें भी राज्य `पेट पालने लायक´ रोजगार नहीं दिला पा रहा। लिहाजा वह नशे की अंधेरी खाई में बढ़ रहे हैं। वरन उनमें राष्ट्रविरोधी विचारधारा से प्रभावित होने का खतरा भी बेहद बढ़ गया है। कोई स्वरोजगार करने की सोचे भी तो सरकारी योजनाऐं उसे बेरोजगार से `कर्जदार´ बनाने पर तुली हुई हैं।
उपजाऊ जमीनें हमारे यहां शुरू से कम थीं, लेकिन ताकत के तौर पर जो तराई-भावर की उपजाऊ कृषि भूमि थी, उस पर हमने फसलों के बजाय उद्योग उगा लिऐ। जो कब `कट´ जाऐं, कुछ भरोसा नहीं। तब तक इन्हें बेचकर `उजड़े´ किसान भी खेती भूल, कीमत खर्च कर, चाकरी करने शहर जा चुके होंगे।
लोक संस्कृति के रूप में हम समृद्ध थे, किन्तु हमने अपनी पहचान नाड़ा बाहर लटके धारीदार `घोड़िया´ पैजामा, फटा कुर्ता और टेढ़ी बदबूदार टोपी पहने 'जोकर नुमा' व्यक्ति के रूप में बना ली। अपनी `दुदबोली´ को बोलने में `शरम´ की, और मानो किस्मत फोड़ ली। उसे लिखने, पढ़ने की बात तो बहुत दूर की ठैरी। स्वयं की पहचान, स्वयं में अपनी पहाड़ी होने की `शिनाख्त´ के निशानों को छुपाने में हमारा कोई सानी नहीं। `धौनी´ से लेकर हमारा आम पहाड़ी अपनी पहचान बताने में आख़िरी दम तक संकोच नहीं छोड़ता। अपने धुर पहाड़ी गांव में `डीजे´ पर `बोलो तारा रा रा´ पर `भांगड़ा´ करने में हम `माडर्न लुक´ देने वाले ठैरे। कैसेट में हमारी बहनें रंग्वाली पिछौड़ा पहनकर घास काटने और अपने परदेश गऐ `हीरो´ के लिए हिन्दी फिल्मी गीतों की पहाड़ी `पैरोडी´ गाने वाली ठैरीं।
इसी तरह हम जड़ी बूटी, आयुर्वेद, ऊर्जा, शिक्षा आदि प्रदेश भी बनने के भी दावे कर रहे हैं, पर उनकी तैयारी भी हमारी कितनी और कैसी है, जरा सोचें तो खुद समझ में आ जाता है। ऐसे में `जब जागें, तभी सवेरा´ मानकर हम स्वयं और अपनी क्षमताओं को पहचान व निखारकर समिन्वत रूप में सर्वोत्तम योगदान देने की कोशिश करें, और दूसरों की तिजोरियां भरने के बजाय अपने `घर´ को सजाऐं।

नवीन जोशी

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मेरे कुमाउनी ललित निबंध "पाख और घ्वड़ " का  कुमाउनी-हिन्दी के वरिष्ठ लेखक डॉ. प्रयाग जोशी द्वारा किया गया अनुवाद (मैं इस सम्मान से स्वयं को धन्य मानता हूँ)
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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जोशी जी अति रोचक एव अति महतवपूर्ण जानकारी आपके द्वारा यहाँ पर दी जा रही है! मेरापहाड़ पोर्टल आपका आभार प्रकट करता है!  मुझे एक जिग्याशा है उत्तराखंड के प्रसिद्ध लोक गायक स्वर्गीय गोपाल बाबु गोस्वामी जी पुराने फोटो अगर कही से उपलब्ध हो जाय! अगर आपके संग्रह में कही है तो कृपया करके मेरी यह इच्छा पूरी कर दीजिये !

नवीन जोशी

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भारत की जगह मनाया पाकिस्तान का स्वतन्त्रता दिवस !
अंग्रेजी जमाने के पब्लिक स्कूलों में 14 अगस्त को ही कर दी गई स्वतन्त्रता दिवस मनाने की खानापूर्ति, जो है शत्रु राष्ट्र पाकिस्तान का स्वतन्त्रता दिवसभारत वर्ष 15 अगस्त की मध्यरात्रि को आजाद हुआ था, इसी दिन देश के प्रथम प्रधानमन्त्री जवाहर लाल नेहरू ने लाल किले पर पहली बार ब्रिटिश हुकूमत के प्रतीक `यूनियन जैक´ को उतारकर तिरंगा झण्डा फहराया था। चूंकि ब्रितानी हुकूमत से मध्य रात्रि में सत्ता हस्तान्तरण हुआ था, और `टाइम जोन´ के अनुसार उस समय भारत के साथ ही आजाद और तत्काल विभाजित हुऐ पड़ोसी शत्रु राष्ट्र पाकिस्तान में 14 अगस्त की ही तारीख चल रही थी, इसलिए वहां एक दिन पहले ही यानी 14 अगस्त को स्वतन्त्रता दिवस मनाने की परंपरा रही है। लेकिन शायद शिक्षा नगरी कही जाने वाली सरोवरनगरी में सर्वोत्कृष्ट ज्ञान प्रदान करने का दंभ भरने वाले खासकर पब्लिक स्कूलों को इस ऐतिहासिक व अति महत्वपूर्ण तथ्य से कोई सरोकार नहीं है, इसलिए नगर के कई स्कूलों में 14 अगस्त को ही आजादी का जश्न मना लिया। इनमें से एक ऑल सेंट्स कालेज ने राष्ट्रद्रोह माने जाने योग्य इस कृत्य को छुपाने के लिए शातिर तरीके से जिला अधिकारी शैलेश बगौली को ही आयोजन का बतौर मुख्य अतिथि बना लिया।
देश, प्रदेश के अन्य शहरों से इतर सरोवरनगरी के पब्लिक स्कूलों में राष्ट्रीय पर्वों को एक दिन पहले मनाना राष्ट्र द्रोह की श्रेणी में आता हो या नहीं यह कानूनविदों का काम है, लेकिन यह अपने आप में अनूठा मामला हो सकता है। गौरतलब है कि यदि गणतन्त्र दिवस अथवा गांधी जयन्ती के मौकों को एक दिन पहले मना लिया जाता है, तो सम्भवतया इसमें अधिक बुराई न लगे, किन्तु असंख्य व अनाम शहीदों की शहादत से प्राप्त आजादी के पर्व को अभीष्ट दिन से पहले और वह भी शत्रु राष्ट्र के स्वतन्त्रता दिवस के दिन मना लिया जाऐ, तो यह निश्चित तौर पर आपत्तिजनक मामला लगता है। इस बाबत स्कूलों का पक्ष यह है कि वह 14 अगस्त को केवल बच्चों के सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करते हैं, ताकि अगले दिन बच्चे सार्वजनिक कार्यक्रमों में प्रतिभाग कर सकें। लेकिन सच्चाई यह भी है कि ऐसे स्कूलों के बच्चे कम ही नियत दिन सार्वजनिक कार्यक्रमों में भाग लेते हैं और उनके यहां राष्ट्रीय पर्वों को सामान्यतया झण्डारोहण भी नहीं किऐ जाते। वैसे शिक्षा नगरी के पब्लिक स्कूलों द्वारा राष्ट्रीय पर्वों की उपेक्षा का पहला मामला नहीं है, वरन यहां अक्सर ऐसा होता है। यहां राष्ट्रीय पर्वों पर अक्सर अवकाश घोषित कर दिया जाता है। इस बाबत डीएम शैलेश बगौली का कहना था कि नगर के पब्लिक स्कूलों द्वारा परंपरा के रूप में ऐसा किये जाने की बात कही जा रही है, बावजूद वह मामले का गहनता से अध्ययन करेंगे।
यह `देश के प्रति गद्दारी´ है: बिष्ट
सरोवरनगरी में 14 अगस्त को कई विद्यालयों में स्वतन्त्रता दिवस समारोह मनाऐ जाने पर वयोवृद्ध स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी व यूपी सरकार में मन्त्री रहे डुंगर सिंह बिष्ट की बेहद कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की। उन्होंने ऐसे आयोजनों को `देश के प्रति गद्दारी´ और देश की स्वतन्त्रता का `नितान्त अपमान´ की संज्ञा दी, साथ ही इस कृत्य की कड़ी भर्त्सना करने की बात कही, और युवाओं व जनता को इसके खिलाफ खड़े होने का आह्वान किया।
इस दौरान श्री बिष्ट ने खुलासा किया कि पूर्व में अंग्रेजी शासनकाल में बने नैनीताल व देश के अन्य पब्लिक स्कूल `अंग्रेजों के प्रति स्वामिभक्ति दिखाने के लिए´ स्वतन्त्राता दिवस मनाते ही नहीं थे। इस पर उन्होंने स्वयं एक दशक पूर्व नैनीताल में आन्दोलन किया था, जिसके बाद यहां के स्कूलों ने एक दिन पूर्व ऐसे आयोजन करने प्रारंभ कर दिऐ। उन्होंने कहा कि नगर के ऐसे कई पब्लिक स्कूल 15 अगस्त को झण्डारोहण ही नहीं करते। उन्होंने प्रशासनिक अधिकारियों पर निशाना साधते हुऐ कहा कि यह जिलों में डीएम एवं राज्य सरकार की जिम्मेदारी है। उन्हें यह सुनिश्चित करना चाहिऐ कि उनके जिले में राष्ट्रीय पर्व वैधानिक तरीके से मनाऐ जाऐं एवं राष्ट्रीयता का अपमान न हो। यदि होता है तो स्वयं कार्रवाई करने के अलावा राज्य व केन्द्र सरकार को कड़ी कार्रवाई की सिफारिश करनी करनी चाहिऐ।
घूमे, फिर, ऐश किया और क्या.....
स्वतन्त्राता दिवस पर ध्वजारोहण तक कमरों में ही पड़े देश के `कर्णधार´
जी हां, देश जब 15 अगस्त को आजादी की 63वीं वर्षगांठ मनाकर आजादी की लड़ाई में स्वयं के जीवन को होम करने वाले अनाम शहीदों को याद कर रहा था, ऐसे में देश के हजारों `कर्णधार´ सैलानियों के रूप में अपने परिजनों के साथ सरोवरनगरी में `घूम फिर कर ऐश´ कर रहे थे, और नगर के पर्यटन व्यवसायियों की शुरुआती बेचैनी को मिटाकर उन्हें मुस्कुराने का मौका दे रहे थे। खास बात यह थी कि सुबह जब नगर के नन्हे स्कूली बच्चे प्रभात फेरी निकाल रहे थे, और आठ बजे जब सभी जगह राष्ट्रध्वज फहराया जा रहा था, तब तक सड़कें खाली थीं, और सैलानी होटलों के कमरों में ही पड़े हुऐ थे।
यूं यह नयी बात नहीं है। करीब एक दशक से राष्ट्रीय पर्वों पर आस पास की साप्ताहिक छुटि्टयों को साथ लेकर पर्यटन नगरी में हजारों की संख्या में सैलानी उमड़ते हैं। कभी कभी यह संख्या एक दिन में लाखों तक भी पहुंच जाती है। इस वर्ष रविवार को स्वतन्त्रता दिवस होने के कारण शनिवार अपराह्न तक नगर में काफी कम सैलानी थे। मीडिया रिपोर्टों में नगर में भीड़ भाड़ न होने सम्बंधी खबरों के आने के बाद स्वतन्त्राता दिवस की सुबह भी बड़ी संख्या में सैलानी यहां पहुंचे। ऐसे में नगर की फ्लैट मैदान स्थित पार्किंग पूरी तरह भर गई, और जिला प्रशासन को हाल ही में केन्द्रीय गृह मन्त्रालय के अधीन बतौर शत्रु संपत्ति आऐ मैट्रोपोल परिसर के मैदान को पार्किंग के लिए खोलना पड़ा। इस दौरान नगर भर में सैलानियों की अच्छी खासी भीड़भाड़ और सीजन जैसे ही वाहनों के जाम के हालात रहे। निकटवर्ती पर्यटक स्थलों पर भी काफी भीड़ भाड़ रही।
...और सलामी लेने को कोई नहीं मिला
राज्य पर जहां पहले थोक की संख्या में लाल बत्ती धारियों और अब दायित्वधारियों की फौज खड़ी करने के आरोप लगते हैं। नैनीताल जिले में ही दो मन्त्री और आधा दर्जन के करीब दायित्वधारी है। जिला मुख्यालय पर्यटन नगरी है, और जिले के प्रभारी मन्त्री का दायित्व राजय के पर्यटन मन्त्री के पास है, बावजूद स्वतन्त्रता दिवस के मौके पर आयोजित होने वाली एनसीसी कैडेटों की परेड की सलामी लेने के लिए कोई मन्त्री, दायित्वधारी नेता उपलब्ध नहीं हुआ। ऐसे में मण्डलायुक्त द्वारा सलामी लेने के कयास लगाऐ जा रहे थे, लेकिन वह भी नहीं आऐ। ऐसे में डीएम शैलेश बगौली को मजबूरी में सलामी लेनी पड़ी। मुख्यालय में दिन भर वह ही कभी झण्डारोहण, तो कभी महापुरु षों की मूर्तियों पर पुष्पांजलि अर्पित करने और कभी पौधारोपण कार्यक्रम के लिए दौड़ लगाते रहे। इस दौरान और किसी की फजीहत हुई तो वह थे, बच्चे, जो सुबह तड़के बिना कलेवा किऐ प्रभात फेरी करने घर से निकले और शाम ढले ही घर लौट पाऐ। परेड, सलामी के आयोजन में नगर की जनता भी गिनने लायक ही थी।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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जोशी जी यह आश्चर्य जनक घटना है और शर्मनाक भी! 

मुझे और शर्मिंदा हो रही है यह घटना हमारे राज्य में हुयी वह भी शिक्षा एव पर्यटन के प्रसिद्ध सरोवर नगरी में !


नवीन जोशी

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नवजीवन का सन्देश भी देती है बारिश:
जी हाँ, एक ओर जहाँ बारिश पहाड़ों पर कहर बरपा रही है, वहीँ वह हमेशा की तरह अमृत तुल्य जल राशि से युवा पहाड़ों में (छीड़) झरनों, गाड़-गधेरों व नदियों में कल-कल के निनाद के साथ नए रंग भरकर प्राकृतिक सुन्दरता में चार चाँद भी लगा रही है, आइये हम भी पीछे की बातों से सबक लेते हुए प्रकृति के संकेतों व संदेशों को जीवन में आत्मसात कर आगे बढें.

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नवीन जोशी

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....फिर क्या हो. (दिवंगत गिर्दा को श्रद्धांजलि के साथ)
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पिछले लेख "क्योंकि हमने अपनी ताकतों को अपनी कमजोरी बना लिया है" में मैंने एक पक्ष रखने की कोशिश की थी, ऐसे में यह सोचना जरूरी हो जाता है कि जब हम अपने संसाधनों (मूलतः पानी, जवानी और जंगलों) का उपयोग नहीं होने देना चाहते तो ऐसे में हमारा भविष्य बेरोजगारी, मुफलिसी से भरा होने वाला है, ऐसा न हो, इससे बचने के लिए क्या करें ?
हम 'भोले-भाले' पहाड़ियों को हमेशा ही सबने छला है, पहले दूसरे छलते थे, और अब अपने छल रहे हैं. हमने देश-दुनिया के अनूठे 'चिपको आन्दोलन' वाला वनान्दोलन लड़ा, इसमें हमें कहने को जीत मिली, लेकिन सच्चाई गिर्दा बताते थे, गिर्दा को वनान्दोलन के परिणामस्वरूप पूरे देश के लिए बने वन अधिनियम से हमारे हकूक और अधिक पाबंदियां आयद कर दिए जाने की गहरी टीस थी.  इसी तरह हमने राज्य आन्दोलन से अपना नयां राज्य तो हासिल कर लिया पर  राज्य बनने से बकौल गिर्दा ही,"कुछ नहीं बदला कैसे कहूँ, उत्तराखंड नाम बदला, चार-चार मुख्यमंत्री बदले", पर नहीं बदला तो हमारा मुकद्दर, और उसे बदलने की कोशिश तो हुई ही नहीं. बकौल गिर्दा, हमने गैरसैण राजधानी इसलिए माँगी थी ताकि अपनी 'औकात' के हिसाब से राजधानी बनाएं, छोटी सी 'डिबिया सी' राजधानी, हाई स्कूल के कमरे जितनी 'काले पाथर' के छत वाली विधान सभा, जिसमें हेड मास्टर की जगह विधान सभा अध्यक्ष और बच्चों की जगह आगे मंत्री और पीछे विधायक बैठते, इंटर कोलेज जैसी विधान परिषद्, प्रिंसिपल साहब के आवास जैसे राजभवन तथा मुख्यमंत्रियों व मंत्रियों के आवास. पहाड़ पर राजधानी बनाने के का एक लाभ यह भी कि बाहर के असामाजिक तत्व, चोर, भ्रष्टाचारी वहां गाड़ियों में उल्टी होने की डर से ही न आ पायें, और आ जाएँ तो भ्रष्टाचार कर वहाँ की सीमित सड़कों से भागने से पहले ही पकडे जा सकें, गिर्दा कहते थे कि अगर गैरसैण राजधानी ले जाकर वहां भी देहरादून जैसी ही 'रौकात' करनी है तो अच्छा है कि उत्तराखंड की राजधानी लखनऊ से भी कहीं दूर ले जाओ. यह कहते हुए वह खास तौर पर 'औकात' और 'रौकात' पर ख़ास जोर देते थे.
खैर...., बात शुरू हुई थी फिर करें क्या से, पर गिर्दा मन-मस्तिष्क में ऐसे बैठे हैं कि... गिर्दा भी बड़े बांधों के विरोधी थे, उनका मानना था के हमें पारंपरिक घट-आफर जैसे अपने पुश्तैनी धंधों की ओर लौटना होगा, यह वन अधिनियम के बाद और आज के बदले हालातों में शायद पहले की तरह संभव न हो, ऐसे में सरकारों व राजनीतिक दलों को सत्ता की हिस्सेदारी से ऊपर उठाकर राज्य की अवधारण पर कार्य करना होगा, सड़कें इसलिए न बनें कि वह बेरोजगारों के लिए पलायन के द्वार खोलें, वरन घर पर रोजगार के अवसर ले कर आयें, हमारा पानी बिजली बनकर महानगरों को ही न चमकाए व ए.सी. ही न चलाये वरन हमारे पनघटों, चरागाहों को भी 'हरा' रखे. हमारी जवानी परदेश में खटने की बजाये अपनी ऊर्जा से अपना 'घर' सजाये, हमारे जंगल पूरे एशिया को 'प्राणवायु' देने के साथ ही हमें कुछ नहीं तो जलौनी लकड़ी, मकान बनाने के लिए 'बांसे', हल, दनेला, जुआ बनाने के काम तो आयें, हमारे पत्थर टूट-बिखर कर रेत बन अमीरों की कोठियों में पुतने से पहले हमारे घरों में पाथर, घटों के पाट, चाख, जातर या पटांगड़ में बिछाने के काम तो आयें. हम अपने साथ ही देश-दुनियां के पर्यावरण के लिए बेहद नुक्सानदेह पनबिजली परियोजनाओ से अधिक तो दुनियां को अपने धामों, अनछुए प्राकृतिक सुन्दरता से भरपूर स्थलों  को पर्यटन केंद्र बना कर ही और अपनी 'संजीवनी बूटी' सरीखी जड़ी-बूटियों से ही कमा लेंगे. हम अपने मानस को खोल अपनी जड़ों को भी पकड़ लेंगे, तो लताओं की तरह भी बहुत ऊंचे चले जायेंगे......आगे फिर कभी....

नवीन जोशी

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इस वर्ष ही 20 अप्रैल 2010 को गिर्दा से बातचीत पर आधारित आलेख जो राष्ट्रीय सहारा में 21 अप्रैल को इसी रूप में प्रकाशित हुआ:
वनान्दोलन से ठगे जाने की टीस भी है आन्दोलनकारियों को

पहाड़ के छोटे से भूभाग का आन्दोलन बना था देश भर के लिए वन अधिनियम 1980 का प्रणेता, लेकिन इससे पहाड़ वासियों को मिला कुछ नहीं उल्टे हक हुकूक छिन गऐ


1972 से शुरू हुऐ पहाड़ के एक छोटे से भूभाग का वन आन्दोलन, चिपको जैसे विश्व प्रसिद्ध आन्दोलन के साथ ही पूरे देश के लिए वन अधिनियम 1980 का प्रणेता भी रहा। लेकिन यह सफलता भी आन्दोलनकारियों की विफलता बन गई। दरअसल शासन सत्ता ने आन्दोलनकारियों के कंधे का इस्तेमाल कर अपने हक हुकूक के लिए आन्दोलन में साथ दे रहे पहाड़वासियों से उल्टे उनके हक हुकूक और बुरी तरह छीन लिऐ थे। आन्दोलनकारियों को अपने ही लोगों के बीच गुनाहगार की तरह खड़ा कर दिया था। आन्दोलनकारियों में यह टीस आज भी है।वनान्दोलन से गहरे जुड़े जनकवि गिरीश तिवारी `गिर्दा´ से जब वनान्दोलन की बात चलते हुऐ वन अधिनियम 1980 की सफलता तक पहुंचती है, उनके भीतर की टीस बाहर निकल आती है। वह खोलते हैं, 1972 में वनान्दोलन शुरू होने के पीछे लोगों की मंशा अपने हक हुकूकों को बेहतरी से प्राप्त करने की थी। यह वनों से जीवन यापन के लिए अधिकार की लड़ाई थी। सरकार स्टार पेपर मिल सहारनपुर को कौड़ियों के भाव यहां की वन संपदा लुटा रही थी। इसके खिलाफ ऐतिहासिक वन आन्दोलन हुआ, लेकिन जो वन अधिनियम मिला, उसने स्थितियों को और अधिक बदतर कर दिया है। इससे जनभावनाऐं साकार नहीं हुईं। जनता की स्थिति यथावत बनी हुई है। तत्कालीन पतरौलशाही के खिलाफ जो आक्रोश था, वह आज भी है। औपनिवेशिक व्यवस्था ने जन के जंगल के साथ जल भी हड़प लिया। वन अधिनियम से वनों का कटना नहीं रुका, उल्टे वन विभाग का उपक्रम वन निगम ही और विल्डर वनों को बेदर्दी से काटने लगे। साथ ही ग्रामीण भी परिस्थितियों के वशीभूत ऐसा करने को मजबूर हो गऐ। अधिनियम का पालन करते वह अपनी भूमि के व्यक्तिगत पेड़ों तक को नहीं काट सकते थे। उन्हें हक हुकूक के नाम पर गिनी चुनी लकड़ी भी मीलों दूर मिलती। इससे उनका अपने वनों से आत्मीयता का रिश्ता खत्म हो गया। वन जैसे उनके दुश्मन हो गऐ, जिनसे उन्हें अपनी व्यक्तिगत जरूरतों की चीजें तो मिलती नहीं, उल्टे वन्यजीव उनकी फसलों और उन्हें नुकसान पहुंचा जाते हैं। इसलिऐ अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए ग्रामीण महिलाऐं वनाधिकारियों की नज़रों से बचने के फेर में बड़े पेड़ों की टहनियों को काटने की बजाय छोटे पेड़ों को जल्द काट गट्ठर बना उनके निसान तक छुपा देती हैं। इससे वनों की नई पौध पैदा ही नहीं हो रही। पेड़ पौधों का चक्र समाप्त हो गया है। अब आप गांव में अपना नया घर बनाना दूर उनकी मरम्मत तक नहीं कर सकते। आपका न अपने निकट के पत्थरों, न लकड़ी की `दुन्दार´, न `बांस´ और न छत के लिऐ चौडे़ `पाथरों´ पर ही हक रह गया है। पास के श्रोत का पानी भी आप गांव में अपनी मर्जी से नहीं ला सकते। अधिनियम ने गांवों के सामूहिक गौचरों, पनघटों आदि से भी ग्रामीणों का हक समाप्त करने का shaडयन्त्र कर दिया। उनके चीड़ के बगेटों से जलने वाले आफर, हल, जुऐ, नहड़, दनेले बनाने की ग्रामीण काष्ठशालाऐं, पहाड़ के तांबे के जैसे परंपरागत कारोबार बन्द हो गऐ। लोग वनों से झाड़ू, रस्सी को `बाबीला´ घास तक अनुमति बिना नहीं ला सकते। यहां तक कि पहाड़ की चिकित्सा व्यवस्था का मजबूत आधार रहे वैद्यों के औशधालय भी जड़ी बूटियों के दोहन पर लगी रोक के कारण बन्द हो गऐ। दूसरी ओर वन, पानी, खनिज के रूप में धरती का सोना बाहर के लोग ले जा रहे हैं, और गांव के असली मालिक देखते ही रह जा रहे हैं। इसके साथ ही गिर्दा वन अधिनियम के नाम पर पहाड़ के विकास को बाधित करने से भी चिन्तित हैं। उनका मानना है कि विकास की राह में अधिनियम के नाम पर जो अवरोध खड़े किऐ जाते हैं उनमें वास्तविक अड़चन की बजाय छल व प्रपंच अधिक होता है। जिस सड़क के निर्माण से राजनीतिक हित ने सध रहे हों, वहां अधिनियम का अड़ंगा लगा दिया जाता है।

नवीन जोशी

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गिर्दा को अश्रुपूरित श्रद्धांजलि के साथ:







Originally can be seen here : http://rashtriyasahara.samaylive.com/epapermain.aspx?queryed=14&eddate=08%2f23%2f2010

 

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