Author Topic: Hill Jatra - हिल जात्रा  (Read 33991 times)

हेम पन्त

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हिल जात्रा- HILL JATRA
« Reply #10 on: September 03, 2008, 12:48:38 PM »

हेम पन्त

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हिल जात्रा- HILL JATRA
« Reply #11 on: September 03, 2008, 12:51:59 PM »
हिल-जात्रा का सबसे चर्चित चरित्र "लखिया भूत" की फोटो. पिछले कई सालों से लखिया भूत का चरित्र श्री यशवंत महर जी निभा रहे हैं। लखिया भूत को महादेव शिव का एक गण माना जाता है, जो हिलजात्रा में शिवजी के प्रतिनिधि के तौर पर आता है।


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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हिल जात्रा- HILL JATRA
« Reply #12 on: September 08, 2008, 08:03:42 PM »
Hill Jatra is a distort? Hal (Plough) Jatra?. Hill Jatra simply means the adoration (worshipping) of Hal (Plough) which good crop yield. In this context the Hill Jatra which is celebrated in Pithoragarh has prominent place. In 15th Century during the regime of Chand King a four member delegation comprising of Mahar brothers from Pithoragarh reached Nepal to participate in ?Indra Jal? festival. Mahar brothers won the festival by their intelligence and bravery. After that they reached Pithoragarh with all the material used in the festival as inward. Kumour brothers founded ?Bin Jakhani?, ?Chassar?, ?Kumour? villages and started celebrating the ?Indra Jal? festival of Nepal every year in the month of Bhadrapad on "goura mahesh" departure day Hill Jatra . Even today religious Anushathan is celebrated with all equipment worshipping material and masks obtained from "Indra Jala Fastival" in Nepal tradition with "Srave Bhavantu Sukhina Srave Santu Niramaya" theme with traditional and fervor in Pithoragrah. The main character of Hill Jatra is "Lakhia Bhoot" which is originated from the Jata of angry Lord Shiva after the "Bhashama" of "Gauri" in the YashKund of her father Prajapati. So Lakhia Bhoot is also called "Lateshwer". Lakhia is worshiped as "Bhumiya" god is Kumour village. so to keep him elated villagers has a provision of sacrifice at the end of festival

http://www.youtube.com/watch?v=u35WqSVuCtM

पंकज सिंह महर

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Re: हिल जात्रा- HILL JATRA
« Reply #13 on: September 16, 2008, 02:16:01 PM »
हिल जात्रा पर एक समाचार     

Hill Jatra
    Jun 23rd, 2008 | By Kamlesh Padaliya | Category: Articles, Uttarakhand
22 June:Hill Jatra is a distort “Hal (Plough) Jatra”. Hill Jatra simply means the adoration (worshipping) of Hal (Plough) which good crop yield. In this context the Hill Jatra which is celebrated in Pithoragarh has prominent place.


In 15th Century during the regime of Chand King a four member delegation comprising of Mahar brothers from Pithoragarh reached Nepal to participate in “Indra Jal” festival. Mahar brothers won the festival by their intelligence and bravery. After that they reached Pithoragarh with all the material used in the festival as inward. Kumour brothers founded “Bin Jakhani”, “Chassar”, “Kumour” villages and started celebrating the “Indra Jal” festival of Nepal every year in the month of Bhadrapad on "goura mahesh" departure day Hill Jatra .


Even today religious Anushathan is celebrated with all equipment worshipping material and masks obtained from "Indra Jala Fastival" in Nepal tradition with "Srave Bhavantu Sukhina Srave Santu Niramaya" theme with traditional and fervor in Pithoragrah.
The main character of Hill Jatra is "Lakhia Bhoot" which is originated from the Jata of angry Lord Shiva after the "Bhashama" of "Gauri" in the YashKund of her father Prajapati. So Lakhia Bhoot is also called "Lateshwer". Lakhia is worshiped as "Bhumiya" god is Kumour village. so to keep him elated villagers has a provision of sacrifice at the end of festival .

Beside this the center of attraction of Hill Jatra is white clothed deer which is worshipped as regional god. Old, child, lata, lati, farmer, women and Galiaya ox. too are forces to take cognizance of.
In presenting “Hill Jatra” Lakhia Bhoot is exhibited as con trolled by two body gaurds and the controlled energy is used for genuine purposes is the main theme.

साभार- http://www.theindiapost.com/?p=2772

Rajen

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Re: हिल जात्रा- HILL JATRA
« Reply #14 on: June 01, 2009, 09:28:14 AM »
पिथोरागढ़ जिले में "हिलजात्रा" महोत्सव:

पूरे बिश्व में मेले और त्यौहार सामाजिक गतिविधियों का एक महत्वपूर्ण अंग हैं.  यह सभी जगह अलग-अलग ढंग से मनाये जाते हैं.  इन परंपरागत मेलों और त्योहारों का सम्बन्ध धार्मिक विश्वासों, लोकमतों, स्थानीय रीति रिवाजों, बदलते मौसमों, फसलों आदि से है.  हमारे देश में अनेक धर्म और उनसे जुड़े केवल बिभिन्न उत्सव ही नहीं हैं बल्कि अपनी विविध साँस्कृतिक परम्परों के कारण उन्हें अलग-अलग ढंग से मनाया भी जाता है.  इससे प्रकार कुमाओं, पिथोरागढ़ जनपद में कुछ उत्सव समारोह पूर्वक मनाये जाते हैं, हिल्जात्रा उनमें से एक है.
जनपद पिथोरागढ़ में "कुमौड़" गाँव में गौर-महेश्वर पर्व के आठ दिन बाद प्रतिवर्ष हिलजात्रा का आयोजन होता है.  यह उत्सव भादो माह में मनाया जाता है.  मुखौटा नृत्य-नाटिका के रूप में मनाये जाने वाले इस महोत्सव का कुख्य पात्र लाखिया भूत, महादेव शिव का सबसे प्रिय गण, बीरभद्र मन जाता है.  प्रतिवर्ष इस तिथि पर लाखिया भूत के आर्शीवाद को मंगल और खुशहाली का प्रतीक मन जाता है.  हिलजात्रा उत्सव पूरी तरह कृषि से सम्बन्धित माना गया है. 

Rajen

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Re: हिल जात्रा- HILL JATRA
« Reply #15 on: June 01, 2009, 09:47:23 AM »
हिल्जात्रा की शुरुआत नेपाल से हुई थी. किंवदंती है की नेपाल के राजा ने खुश होकर यह जात्रा (जो नेपाल में इन्द्र जात्रा के रूप में मनाई जाती है) भेंट स्वरुप कुमाऊं के चार महर भईयौं, कुंवर सिंह महर, चैहज सिंह महर, चंचल सिंह महर और जाख सिंह महर को प्रदान की थी.  इस जात्रा के साथ-साथ इस महोत्सव में काम आने वाले बिभिन्न मुखौटे तथा हल इत्यादि वस्तुएं भी प्रदान की थीं.  जिसे लेकर ये चारों महर भाई कुमाऊं में स्थित पिथोरागढ़ लौट आये और सर्वप्रथम कुमौड़ गाँव में 'हिलजातरा' के नाम से उत्सव मनाया.  तब से लेकर आज तक यह प्रतिवर्ष भादो मास में गौरा महोत्सव पर्व के आठ दिन बाद मनाई जाती है.  इस उत्सव का आरम्भ और समापन बड़े हर्ष और उल्लास के साथ किया जाता है.  कुमौड़ के अतिरिक्त भी कई अन्य गावों में इस पर्व को मनाया जता है किन्तु लाखिया भूत के पात्र का प्रदर्शन केवल कुमौड़ गाँव में ही किया जाता है.

सुबह से ही हिलजातरा में स्वांग भरने वाले अपने लकडी के मुखोटों को सजाने - चमकाने मैं लगे रहते हैं.  दोपहर में कुमौड़ गाव में डेढ़ सौ साल पुराने झूले के पास दुकानें सजनी शुरू हो जाती हैं.  सर्वप्रथम गाँव के सामने मुखिया आदि लाल झंडों को लेकर गाजे-बाजे व नगाडों के साथ कोट (ग्यारहवीं शताब्दी में बना स्थान जहाँ पर महर थोकदारों ने अपना आवास बनाया था) के चक्कर लगते हैं.  फिर घुड़सवार का स्वान भर कर एक ब्यक्ति काठ, घास-फूस के घोडे में आता है और अपने करतब दिखता है फिर स्वांग दिखने का सिलसिला शुरू हो जाता है. 

Rajen

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Re: हिल जात्रा- HILL JATRA
« Reply #16 on: June 01, 2009, 10:11:39 AM »
हुक्का-चिलम पीते हुए, मछुवारे, शानदार बैलों की जोडियाँ, छोटा बल्द , बड़ा बल्द, अड़ियल बैल (जो हल में जोतने पर लेट जाता है), हिरन चीतल, ढोल नगाडे, हुडका, मजीरा, खड़ताल अर घंटी की संगीत लहरी के साथ नृत्य करती नृत्यांगानाएं, कमर में खुकुरी और हाथ में दंड लिए रंग-बिरंगे वेश में पुरुष, धान की रोपाई का स्वांग करते महिलायें ये सब मिल कर एक बहुत ही आकर्षक दृश्य प्रस्तुत करते हैं जिसे लोग मंत्रमुग्ध हो निहारते हैं.  अचानक ही गावं से तेज नगाडों की आवाज आने लगती है.  यह संकेत है हिलजात्रा के प्रमुख पात्र 'लाखिया भूत' के आने का.  सभी पात्र इधर-उधर पंक्तियौं में बैठ जाते हैं और मैदान खाली कर दिया जाता है.  तब हाथों में काला चंवर लिए काली पोशाक में, गले में रुद्राक्ष एंड कमर में रस्सी बांधे लाखिया भूत प्रकट होता है.  सभी लोग लाखिया भूत की पूजा अर्चना करते हैं और घर-परिवार, गाँव की खुशहाली के लिए आर्शीवाद मांगते हैं.  लाखिया भूत सब को आर्शीवाद देकर वापस चला जाता है.  फिर प्रत्येक पात्र धीरे-धीरे वापस जाते हैं. 

भले ही आज का बर्तमान दौर संचार क्रांति का दौर बन चुका हो, किन्तु लोगों में अपनी सांस्कृतिक बिरासत को बचाने की भरपूर ललक दिखी देती है.  कम से कम गाँव में मनाये जाने इन उत्सवों से तो यही प्रतीत होता है.  इससे लोगों के बीच अटूट धार्मिक बिश्वास तो पैदा होता ही है साथ ही लोक कलाओं का दूसरी पिढ़ियों में आदान-प्रदान भी होता है.


आलेख: शबनम खान, बी.ए. तृतीय वर्ष, पी.जी. कालेज, पिथोरागढ़.

Rajen

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Re: हिल जात्रा- HILL JATRA
« Reply #17 on: June 04, 2009, 01:45:11 PM »
हिलजात्रा में प्रयोग होने वाले कुछ मुखौटे:

 



Rajen

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Re: हिल जात्रा- HILL JATRA
« Reply #18 on: June 14, 2009, 09:19:49 AM »

Rajen

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Re: हिल जात्रा- HILL JATRA
« Reply #19 on: June 14, 2009, 09:21:20 AM »

 

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