Author Topic: House Wood carving Art /Ornamentation Uttarakhand ; उत्तराखंड में भवन काष्ठ कल  (Read 13230 times)

Bhishma Kukreti

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 देवलसारी (जौनपुर,  टिहरी गढ़वाल )  के  श्री कोणेशवर महादेव मंदिर में काष्ठ कला , अलंकरण अंकन , नक्कासी
गढ़वाल, कुमाऊं , देहरादून , हरिद्वार ,  उत्तराखंड  , हिमालय की भवन  (तिबारी, जंगलेदार निमदारी  , बाखली , खोली , मोरी , कोटि बनाल    ) काष्ठ , अलकंरण , अंकन , लकड़ी नक्कासी  )   -153   

संकलन - भीष्म कुकरेती
  देवलसारी मसूरी पुजालटी   (जौनपुर टिहरी गढ़वाल ) गांव  के   ट्रैक में देवदारु वन के बीच में स्थित है।  कहा तो जाता है कि मंदिर 1600  ईश्वी  में निर्मीय हुआ किन्तु अधिसंख्यों की राय है 1800 ईश्वी में ही निर्मित हुआ होगा।  कुछ साल पहले मंदिर का जीर्णोद्धार किया गया।
   सम्भवतया पहले  श्री कोणेश्वर देवालय  की दीवारें भी जौनसार , रवाईं  देवालयों की भांति लकड़ी की ही रही होंगी।  यदि गहरे से चिंतन किया जाय तो  गढ़वाल , कुमाऊं , जौनसार के सभी मंदिर  घर जैसे ही थे हर गांव का  लोक मंदिर छोटे मौलिक  रूप में थे।  आधुनिकता व  पैसे की छळ बळाट व मैदानी चकाचौंध  से  लोगों ने मैदानी शैली अपनाकर मंदिरों की मौलिकता ही चम्पत करवा दी है ।  देवलसारी  का सीधा अर्थ है बल  देवों  के पुंगड़  या देव खेत क्षेत्र।  यहीं कम से कम २०० साल पुराण 3 पुर  श्री कोणेश्वर महादेव मंदिर है।  कहा जाता है बल इस  मंदिर की मौलिक दीवारें भी लकड़ी की थीं जो अब कंक्रीट की हो गयी  हैं।  बाकी  देवलसारी के 3  पुर  देवालय के  द्वार , छत  लकड़ी की हैं और अपने मौलिक रूप में हैं।
 देवलसारी के श्री कोणेश्वर  मंदिर तक पंहुचने के लिए दसेक सीढ़ियां है और  मंदिर मजबूत नींव पर टिका है।  तिपुर  नुमा देवलसारी के श्री कोणेश्वर  महादेव मंदिर में लकड़ी की नक्कासी विवेचना हेतु दो बिंदुओं पर सघन ध्यान देना होगा -पहला   मंदिर के द्वार पर काष्ठ कला , अलंकरण  अंकन या नक्कासी  व दूसरा  लकड़ी की छतों में यदि कलाकृति है तो। 
छतों के  आकार  व शैली  से  स्वतः ही अनुमान लगता है कि  देवलसारी के महादेव मंदिर  पर रवांई , नेलंग या लद्दाख क्षेत्र के बौद्ध स्थाप्य कला का पूरा प्रभाव है जैसे  सुंगडा  हिमाचल के महेश्वर मंदिर की छत पर बुद्ध मंदिरों का पूरा प्रभाव दीखता है वैसे ही देवलसारी के  श्री कोणेश्वर मंदिर की छत पर बौद्ध मंदिर छत शैली का पूरा प्रभाव है।  तीन मंजिल की प्रत्येक छत का रूप पिरामिड जैसे है यही नहीं पूरा  आकार   भी पिरामिड का ही रूप दीखता है याने ' बैठवा तिरभुज ' . सबसे ऊपर के पिरामिडीय काष्ठ आकृति के ऊपर देव प्रतीक हुक्के की नली या पर्या जैसे नक्कासी है -घट , ड्यूल व  तुमड़  नुमा आकृति .  तीनों मंजिलों  की छतें लकड़ी की सपाट  लम्बे पटलों से बने हैं। तीनों अलग अलग पिरामिड आकृति आकर्षक है व  उस समय के प्लानर /डिजायनर को सभी नमन करेंगे ऐसी आकृति के बारें डिजायन बनाने व उसे डिजायन को मूर्त रूप देने हेतु . पुनः नमन .
           देवलसारी  के श्री कोणेश्वर  महादेव मंदिर के खोली /प्रवेश द्वार में भी सुंदर काष्ठ अलंकरण अंकन हुआ है।  प्रवेश द्वार में लकड़ी की नक्कासी की प्रशंसा होनी ही चाहिए। 
काष्ठ कला दृष्टि से प्रवेश द्वार (खोली ) के स्तम्भ /सिंगाड़  गढ़वाल के आम तिबारियों या खोलियों  की स्तम्भ /सिंगाड़  जैसे ही हैं।  सिंगाड़  की बनावट मजबूत है जो देवदारु की लकड़ी ही दे सकती है।  सिंगाड़ /स्तम्भ का आधार चौकोर पर्या /बरोलळी जैसे है , जिसके ऊपर दो ड्यूल हैं व ड्यूल के ऊपर उर्घ्वगामी  पद्म  पुष्प दल (सीधा कमल फूल ) आकर अंकन हुआ है। इसके ऊपर  स्तम्भ चौकोर कड़ी का रूप ले मुरिन्ड /मथिण्ड  /शीर्ष फलक से मिल जाता है।   
         देवलसारी  के श्री कोणेश्वर  महादेव मंदिर के खोली /प्रवेश द्वार के दरवाजों पर भी काष्ठ  कला अंकन दर्शन होते हैं। दरवाजों पर यद्यपि ज्यामितीय कटान हुआ है किन्तु पट्टों  पर प्रतीकात्मक  आकृतियां खुदी है , दरवाजों पर  बाहर भीतर झाँकने हेतु खोळ /ढड्यार  भी हैं।
  निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि पिरामिड शक्ल लिए    देवलसारी (टिहरी गढ़वाल ) के श्रीकोणेश्वर  महादेव  मंदिर में ज्यामितीय , प्राकृतिक व मानवीय  मिश्रण हुआ है व  मंदिर के तीनों पिरामिडीय आकृति की छतें तो मन लुभानवी हैं व  सबसे  अधिक याद रहने वाली आकृतियां हैं। 

  सूचना व फोटो आभार :हर्ष डबराल व मित्र

Copyright @ Bhishma Kukreti, 2020

गढ़वाल, कुमाऊं , देहरादून , हरिद्वार ,  उत्तराखंड  , हिमालय की भवन  (तिबारी, जंगलेदार निमदारी  , बाखली , खोली , मोरी कोटि बनाल     ) काष्ठ , अलकंरण , अंकन लोक कला ( तिबारी  - 
Traditional House Wood Carving Art (in Tibari), Bakhai , Mori , Kholi  , Koti Banal )  Ornamentation of Garhwal , Kumaon , Dehradun , Haridwar Uttarakhand , Himalaya -
  Traditional House Wood Carving Art (Tibari) of  Tehri Garhwal , Uttarakhand , Himalaya   series
House wood carving art in Shri Koneshwar Mahadev temple, Delvalsari ,  Tehri  Garhwal , Devalsari Temple  wood Roof art , Wood Carving  art in Devalsari temple
घनसाली तहसील  टिहरी गढवाल  में  भवन काष्ठ कला , नक्कासी ;  टिहरी तहसील  टिहरी गढवाल  में  भवन काष्ठ कला , नक्कासी ;   धनौल्टी,   टिहरी गढवाल  में  भवन काष्ठ कला, लकड़ी नक्कासी ;   जाखनी तहसील  टिहरी गढवाल  में  भवन काष्ठ कला , नक्कासी ;   प्रताप  नगर तहसील  टिहरी गढवाल  में  भवन काष्ठ कला, नक्कासी ;   देव प्रयाग    तहसील  टिहरी गढवाल  में  भवन काष्ठ कला, नक्कासी ; House Wood carving Art from   Tehri;     

Bhishma Kukreti

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  गंगोलीहाट बजार  में रामगढ़ वूलन दुकान , मकान  की पहली मंजिल में काष्ठ कला , अलंकरण , नक्कासी 

गढ़वाल,  कुमाऊँ , हरिद्वार उत्तराखंड , हिमालय की भवन  ( बाखली  ,   तिबारी , निमदारी , जंगलादार  मकान ,  खोली  ,  कोटि बनाल   )  में काष्ठ कला अलंकरण, नक्कासी   -  174

 संकलन - भीष्म कुकरेती
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गंगोली हाट प्रसिद्ध पातालभवनेश्वर गुफा के निकटवर्ती क्षेत्र हैI इस क्षेत्र से भी कई बाखलियों व भवनों की सूचना मिली जिनमे काष्ठ कला चर्चा लायक हैं I इसे ही एक बाखली की सूचना  गंगोली हाट बजार की मिली है जिसे आम  लोक  लैंडमार्क सुविधा रूप में रामगढ़ वूलन  वालों की बाखली या मकान नाम से पुकारते हैं  I

 रामगढ़ वूलन दुकान मकान के पहली मंजिल के एक हिस्से की फोटो मिली है I मकान 1957  में निर्मित हुआ है किन्तु परम्परागत  शैली को अपनाया गया  है I मकान दुपुर है , तल मंजिल में दुकाने हैं व पहली मंजिल में रहवास है I

 पहली मंजिल के दरवाजा ढकने की पद्धति कुछ कुछ जौनसार , नेलंग घाटी, गमशाली- मलारी घाटियों के मकानों से मिलती है . प्रस्तुत रामगढ़  वूलन मकान  की पहली मंजिल का लम्बा बरामदा है जिसे वर्टिकली लम्बे लम्बे पटलों /तख्तों  के दरवाजों से  बंद कर दिया गया  है I दरवाजों पर आयताकार ज्यामितीय कटन से कल अंकित है व उपरी छोर में कांच लगे हैं  I बरामदे के नीचे दो फिट ऊँचे  संरचना है जिसमे वर्टिकली लकड़ी की डन्डियों की सजावट है व सुन्दरता वृद्धिकारक हैं .

भवन की छत टिन की व ढलवां है ?

गंगोलीहाट (पिथोर्गढ़ )  बजार में रामगढ़ वूलन दुकान भवन में ज्यामितीय कला का उम्दा उदाहरन पेश हुआ है, कला से आँखों को तृप्ति मिली है  व बाकी कोई अलंकरण शैली इस मकान में देखने को नही मिली I .

 सूचना आभार : राजेंद्र  रावल व फोटो आभार लकीर (इंटरनेट)

सूचना व फोटो आभार :

यह लेख  भवन  कला संबंधित  है न कि मिल्कियत  संबंधी।  . मालिकाना   जानकारी  श्रुति से मिलती है अत: नाम /नामों में अंतर हो सकता है जिसके लिए  सूचना  दाता व  संकलन कर्ता  उत्तरदायी  नही हैं .

Copyright @ Bhishma Kukreti, 2020  कैलाश यात्रा मार्ग   पिथोरागढ़  के मकानों में लकड़ी पर   कला युक्त  नक्कासी ;  धारचूला  पिथोरागढ़  के मकानों में लकड़ी पर   कला युक्त  नक्कासी ;  डीडीहाट   पिथोरागढ़  के मकानों में लकड़ी पर   कला युक्त  नक्कासी ;   गोंगोलीहाट  पिथोरागढ़  के मकानों में लकड़ी पर   कला युक्त  नक्कासी ;  बेरीनाग  पिथोरागढ़  के मकानों में लकड़ी पर   कला युक्त  नक्कासी;  House wood art in Pithoragarh

Bhishma Kukreti

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 नेलंग घाटी के एक भग्न मकान की तिबारी में काष्ठ  कला , अलंकरण  अंकन , नक्कासी

गढ़वाल,  कुमाऊँ , उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी, निमदारी , जंगलादार  मकान , बाखली  , खोली  , कोटि बनाल )  में काष्ठ कला अलंकरण, नक्कासी   - 175

 संकलन - भीष्म कुकरेती   
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 नेलंग - जाड घाटियां  चीन युद्ध के बाद  भारतियों के लिए 2015  से  खुला।  इस दौरान  बगोरी या जाड  गाँवों  में कई घर भग्न अवश्था में पंहुच गए।  कुछ घरों की बनावट कोटि बनाल  के तरीके से निर्मित हुए थे याने  पत्थर व देवदारु की लकड़ी से बने होंगे तो पूर्ण रूप से धरासायी नहीं हुए हैं।  उनमे से एक मकान की फोटो उपलब्ध हुयी है। 
मकान में पहली मंजिल में चार सिंगाड़  (चर सिंगाड्या  ) और तीन ख्वाळ (तिख्वळ्या  )  तिबारी स्थापित थी। . तिबारी के  दूसरे भाग  के   बरमदे को  खड़े पटिल ों  से ढका गया है।
भग्न तिबारी  के  सिंगाड़ों  /स्तम्भों  में कला , अलंकरण  बिलकुल गढ़वाल के  अन्य क्षेत्र की तिबारियों  जैसे ही है।  अर्थात आधार पर उलटे कमल से निर्मित कुम्भी फिर ड्यूल फिर सीधा कमल दल  फिर स्तम्भ का लौकी शक्ल अख्तियार करना व बाद में  ड्यूल व कमल दल  व फिर स्तम्भ थांत  शक्ल अख्तियार कर मुरिन्ड /मथिण्ड  से मिल जाते हैं। 
  नेलंग घाटी , जाड घाटी -नाग घाटी   वालों के लिए   शीत  ऋतू में नरेंद्र शाह के समय से  नीचे डुंडा  में  गुनसा  निश्चित कर दिया था।
मकान से निश्चित होता है कि नेलंग घाटी में  मकान काष्ठ  कला तिब्बत  (दाबा  घाटी ) व  गढ़वाल का मिश्रण है। 

सूचना व फोटो आभार : इंटरनेट
यह लेख  भवन  कला संबंधित  है न कि मिल्कियत हेतु . मालिकाना   जानकारी  श्रुति से मिलती है अत: अंतर हो सकता है जिसके लिए  सूचना  दाता व  संकलन कर्ता  उत्तरदायी  नही हैं .
Copyright @ Bhishma Kukreti, 2020
 Traditional House Wood Carving Art (Tibari, Nimdari, Bakhali,  Mori) of   Bhatwari , Uttarkashi Garhwal ,  Uttarakhand ;   Traditional House Wood Carving Art (Tibari, Nimdari, Bakhali,  Mori) of  Rajgarhi ,Uttarkashi ,  Garhwal ,  Uttarakhand ;   Traditional House Wood Carving Art (Tibari, Nimdari, Bakhali,  Mori) of  Dunda, Uttarkashi ,  Garhwal ,  Uttarakhand ;   Traditional House Wood Carving Art (Tibari, Nimdari, Bakhali,  Mori) of  Chiniysaur, Uttarkashi ,  Garhwal ,  Uttarakhand ;   उत्तरकाशी मकान लकड़ी नक्कासी , भटवाडी मकान लकड़ी नक्कासी ,  रायगढी    उत्तरकाशी मकान लकड़ी नक्कासी , चिनियासौड़  उत्तरकाशी मकान लकड़ी नक्कासी   श्रृंखला जारी रहेगी


Bhishma Kukreti

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पूर्व जाडंग    (भटवाडी उत्तरकाशी ) के   एक भग्न भवन में काष्ठ कला , अंकन , अल्नक्र्ण , नक्कासी

गढ़वाल,  कुमाऊँ , उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी, निमदारी , जंगलादार  मकान , बाखली  , खोली  , कोटि बनाल )  में काष्ठ कला अलंकरण, नक्कासी   - 154
 संकलन - भीष्म कुकरेती

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 जुडांग  भारत  का सीमावर्ती  आखरी गाँव  है जो तिब्बत सीमा पर है व कभी यहां बसाहत  थी
1962 के  चीन युद्ध के  बाद कई सीमावर्ती गाँवों को नीचे स्थान्तरित करना पड़ा।  उनमे से एक गाँव  उत्तरकाशी के भटवाड़ी में जाडंग भी है।   जाडंग के लोग डूडा स्थान्तरित हुए हैं।   1963 के पहले के जाडंग  में मकानों अब ध्वस्त हो गए हैं या जीर्ण शीर्ण हो गए हैं।  खोजी  ब्लौगर   गीतांजली  ने    जाडंग के  एक ऐसे ही जीर्ण शीर्ण भवन की सूचना दी जो  पूर्व   जाडंग की भवन काष्ठ कला पर प्रकाश डालने के लिए काफी है और  उत्तराखंड में क्षेत्रीय हिसाब से भवनों में काष्ठ कला विशेषता को समझने के लिए  अत्त्यावश्य्क हैं। 
पूर्व जाडंग गाँव /घाटी   (भटवाडी ,   उत्तरकाशी     )  के   प्रस्तुत     जीर्ण शीर्ण मकान तिपुर मकान है  (तल मंजिल + २ और उपर मंजिल ) है। मकान दुखंड है याने बाहर भी कमरे व अंदर भी कमरे।   जैसा कि   नेलंग घाटी के बोगारी गाँव के मकानों के अध्ययन से पता चलता है कि  नेलंग , जाडंग , व नागा घाटियों में मकान में लकड़ी अधिक इस्तेमाल की गयी हैं व तल मंजिल  गौशला व भण्डारीकरण हेतु  प्रयोग होता था  , जाडंग  के इस भवन में भी लगता है कि   इस भवन  में भी तल मंजिल  गौशाला व भडार थे व रहना वसना ऊपरी दो मंजिलों में होता था। 
 मकान की पहली मंजिल में तिबारी के पूरे लक्षण अभी तक विद्यमान हैं।   तिबारी  में तीन स्तम्भ (सिंगाड़ ) हैं जो दो ख्व्वाळ /खोली /द्वार बनाते हैं।  सिंगाड़ गढ़वाल के  अन्य क्षेत्र के तिबारियों  जैसे ही हैं याने आधार पर  अधोगामी पद्म पुष्प से बना कुम्भी /पथ्वड़  आकर , फिर ड्यूल  (ring  type  wood plate  )  फिर ऊर्घ्वाकार पद्म पुष्प दल (सीधा कमल फूल ) व फिर सिंगाड़ की मोटाई  कम होना , यहां से मेहराब व सिंगाड़ का थांत  स्वरूप लेना व अंत में ऊपर मुरिन्ड /मथिण्ड  की कड़ी से मिल जाना।  सिंगाड़  के  थांत   आकृति में  अष्ट दलीय पुष्प , तितली नुमा पुष्प , व ज्यामितीय कटान से लता आभासी चित्र कुरेदे गए हैं। 
 मेहराब  तिपत्ति (trefoil ) नुमा है व मेहराब के बारी तल के बाजु वाले त्रिभुजों में बारीक  प्राकृतिक  अलंकरण  ( फर्न नुमा  व  पत्तियां ) की  बारीक नक्कासी हुयी है। 
पहली मंजिल के मुरिन्ड की कड़ी पर भी सिंगाड़ों के मिलन स्थान से ऊपर कमल दल जैसी आकृति  उत्कीर्ण हुयी है।      सिंगाडों के मिलन स्थलों के बीच कड़ी में  ज्यामितीय  अलंकरण उत्कीर्ण हुआ है।  कड़ी में नक्कासी का  सुंदर नमूना पेश  हुआ है । 
 तिबारी के भीतरी खंड के कमरों के दरवाजों में  ज्यामितीय  कला प्रयोग हुआ  है।
  पूर्व जाडंग गाँव /घाटी  (भटवाडी ,   उत्तरकाशी  ) के प्रस्तुत मकान की दूसरी मंजिल के सामने भाग में  जो भी लकड़ी प्रयोग हुयी है वह पटिला  (पतला स्लीपर )  रूप में है  और कहीं भी कोई कला दर्शन नहीं होते हैं।
  छत ढलवां है व छत आधार कड़ी  में तीर के पश्च भाग  (मिथकिय  कला  समाहित होना ) का जैसी आकृति तीर बनती उत्कीर्ण हुयी है जो स्वयं भी तीर बनती हैं व एक दुसरे जब मिलते हैं तो  वहां शगुन रूप में कोई पर्तीकात्मक जायमितीय अलंकरण उत्कीर्ण हुआ है। 
निष्कर्ष निकल सकते हैं कि पूर्व जाडंग  (भटवाड़ी , उत्तरकाशी ) के उजड़े मकान में  मिथकीय ,  ज्यामितीय अलंकरण  है जो लकड़ी नक्कासी का उम्दा उदाहरण है। 

सूचना व फोटो आभार :  गीतांजली बनर्जी 
गीतांजलि बनर्जी "थ्री हिडन वैलीज ऑफ उत्तरकाशी :नेलंग , नागा , जाडंग"  (गूगल सर्च )
 लेख  भवन  कला संबंधित  है न कि मिल्कियत हेतु . मालिकाना   जानकारी  श्रुति से मिलती है अत: अंतर हो सकता है जिसके लिए  सूचना  दाता व  संकलन कर्ता  उत्तरदायी  नही हैं .
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 Traditional House Wood Carving Art (Tibari, Nimdari, Bakhali,  Mori) of   Bhatwari , Uttarkashi Garhwal ,  Uttarakhand ;   Traditional House Wood Carving Art (Tibari, Nimdari, Bakhali,  Mori) of  Rajgarhi ,Uttarkashi ,  Garhwal ,  Uttarakhand ;   Traditional House Wood Carving Art (Tibari, Nimdari, Bakhali,  Mori) of  Dunda, Uttarkashi ,  Garhwal ,  Uttarakhand ;   Traditional House Wood Carving Art (Tibari, Nimdari, Bakhali,  Mori) of  Chiniysaur, Uttarkashi ,  Garhwal ,  Uttarakhand ;       

Bhishma Kukreti

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 लोहाघाट चम्पवात में  पांडे परिवार के 116 साल पुराने भवन में काष्ठ  कला व कुमाऊं में भवन कला  परिवर्तन की विवेचना

कुमाऊँ ,गढ़वाल,  हरिद्वार उत्तराखंड , हिमालय की भवन  ( बाखली  ,   तिबारी , निमदारी , जंगलादार  मकान ,  खोली  ,  कोटि बनाल   )  में काष्ठ कला अलंकरण, नक्कासी   - 155
 संकलन - भीष्म कुकरेती

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   लोहाघाट  चम्पावत में  पांडे    परिवार के पास एक ऐसा भवन है जो हैमीना नामक ब्रिटिश नागरिक ने  116 साल पहले  (सन 1904  इ में  ) निर्माण करवाया था  पण्डे परिवार की मिल्कियत है।   यह या इस तरह के 116 साल पहले  यूरोपीय नागरिकों  द्वारा निर्मित मकानों की    इनका डॉक्यूमेंटेसन  आवश्यक है।  इन मकानों  से पता चल सकेगा कि उत्तराखंड में मकानों की बनावट किस भांति बदली व नईबनावट कैसे  उत्पन्न हुयी।  पाण्डे परिवार के आज की मिल्कियत वाला 116  साल पहले निर्मित भवन  जिसे  हैमीना ब्रिटिश नागरिक ने  निर्माण  किया था भी कुमाऊं  या उत्तराखंड में  मकानों   की बनावट में तब्दीली का  एक  मील पत्थर है जिससे दिशा  निर्देश मिलता  है कि उत्तराखंड में भवन निर्माण शैली कैसी ढळकी।   इस मकान को  स्व  केशव चंद्र पांडे ने खरीदी थी व अब उनकी चौथी पीढ़ी यहाँ रहती है। 
पांडे परिवार के 116 साल पहले निर्मित भवन को ऊपरी  तौर पर आधुनिक भवन ही कहा जाएगा ,. बड़ी बड़ी खिड़कियां , हाँ मकान की छत ढलवां है तो पारम्परिक भी लगती है।  यदि ध्यान से देखें तो  ढलवां छत ही नहीं तल मंजिल में दरवाजों के काष्ठ शैली व पहली मंजिल में  बालकोनी की बनावट वास्तव में आधुनिकता है पर  परम्परागत बाखलियों की बनावट का प्रभाव  साफ़  साफ़ दर्शाता है।  याने  लोहाघाट , चम्पावत में पांडे परिवार का यह भवन एक संधि काल या दो बनावटों का मिश्रण है।  मकान के तल मंजिल  के तीन दरवाजे भी बाखली संस्कृति की याद दिलाते हैं व पहली मंजिल पर बरामदा भी बाखलियों में मोरी के प्रभाव को दर्शाता है। 
लोहाघाट , चम्पावत में पांडे परिवार के इस भवन मे लकड़ी  (दरवाजों व खिड़कियों के सिंगाड़ों व मुरिन्डों )  पर नक्कासी ज्यामितीय ढंग कीहै व कोई विशेष याद  रखने लायक कला भी नहीं है। 
इस भवन का चयन केवल इसलिए किया गया कि   समझा  जाय कि  भवनों पर ब्रिटिश कला का प्रभाव किस तरह आया व संभवतया आगे चलकर यह भी निर्णीत हो जायेगा कि  किस समय से  कुमाऊं के बाखलियों की बनावट बदलने शुरू हुयी।  1904 में   हैमीना नामक ब्रिटिश नागरिक द्वारा निर्मित मकान दर्शाता है  कि आधुनक मकान सीधे नहीं  अपितु पहले पहल कुछ हद्द तक बाखली संस्कृति का प्रभाव भी  रहा यान ट्रांजिट  पीरियड में (संधि कल ) में दोनों तरह के बनावटों का मिश्रण भी देखने को मिलता है। 
सूचना व फोटो आभार : सुमन पांडे, लोहाघाट
यह लेख  भवन  कला संबंधित  है न कि मिल्कियत  संबंधी।  . मालिकाना   जानकारी  श्रुति से मिलती है अत: नाम /नामों में अंतर हो सकता है जिसके लिए  सूचना  दाता व  संकलन कर्ता  उत्तरदायी  नही हैं .
Copyright @ Bhishma Kukreti, 2020
Bakhali House wood Carving Art in  Champawat Tehsil ,  Champawat, Uttarakhand;  Bakhali  House wood Carving Art in  Lohaghat Tehsil ,  Champawat, Uttarakhand;  Bakhali , House wood Carving Art in  Poornagiri Tehsil ,  Champawat, Uttarakhand;  Bakhali , House wood Carving Art in Pati Tehsil ,  Champawat, Uttarakhand;  चम्पावत , उत्तराखंड में बाखली  , भवन काष्ठ कला, नक्कासी ;  चम्पावत    तहसील , चम्पावत , उत्तराखंड में बाखली  , भवन काष्ठ कला, नक्कासी ; लोहाघाट तहसील   चम्पावत , उत्तराखंड में बाखली  , भवन काष्ठ कला, नक्कासी ;    पूर्णगिरी तहसील ,    चम्पावत , उत्तराखंड में बाखली  , भवन काष्ठ कला, नक्कासी ;   पटी तहसील    चम्पावत , उत्तराखंड में बाखली  , भवन काष्ठ कला, नक्कासी ;   

Bhishma Kukreti

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व्यासचट्टी (बणेलस्यूं ) में  बाबा कमली वाले की धमर्शाला में काष्ठ कला , अलंकरण , नक्कासी

गढ़वाल,  कुमाऊँ , उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी, निमदारी , जंगलादार  मकान , बाखली  , खोली  , मोरी ,  कोटि बनाल   ) काष्ठ कला अलंकरण अंकन, नक्कासी   -  156
 
 संकलन - भीष्म कुकरेती
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   व्यासचट्टी  पूड़ी गढ़वाल में नयार  व गंगा नदियों  के संगम पर बसा है व बणेलस्यूं , मन्यार स्यूं  व ढांगू पट्टियों  का संगम स्थल भी व्यासचट्टी है।  कहा जाता है कि यहां ऋषि व्यास ने तपस्या की थी (सम्भवतया माणा  वाले व्यास ऋषि का सर्दियों का वस् स्थान रहा हो ) . 
सदियों से संगम होने के कारण देश भर के यात्रिओं व निकटवर्ती भक्तों के लिए व्यास चट्टी एक महत्वपूर्ण  धार्मिक स्थल रहा है।   ब्रिटिश काल में ही स्वर्गाश्रम के बाबा कमली वाले संस्थान ने ऋषिकेश बद्रीनाथ मार्ग पर  कई चट्टियों में धर्मशालाएं निर्मित की थी व बहुत सी चट्टियों में निशुक्ल आयुर्वेद चिकित्सालय खोले थे।  व्यास चट्टी में भी बाबा कमली वाओं ने उस समय के हिसाब से बड़ी धर्मशाला निर्मित की थी।  संभवत:  प्रस्तुत  धर्मशाला 1937   के आस पास  इस धर्मशाला का निर्माण हुआ होगा।  आज यह धर्मशाला भग्नावेश नहीं अपितु ध्वस्त हो चुकी है।
    धर्मशाला दुपुर है व् दुखंड /तिभित्या  है (एक कमरा अंदर व एक  कमरा  बाहर  ) . इस धर्मशला में बाहर तल मंजिल व पहली मंजिल में दो दो बरामदे थे   पहली मंजिल के बरामदे में जाने के लिए खोली थी।  बरामदे के एंड वाले भाग में कमरे हैंथे . यहलेखक बचपन में दो बार इस धर्मशाला में बिखोत / बैशाखी मेले में  रात गुजार चुका  है। 
धर्मशाला निमदारी नुमा है व भवन निर्माण में आधुनिक शैली भी अपनायी गयी है।  निमदारी  पहली मंजिल के दोनों बरामदे में लगी है।  बरामदे या पहली मंजिल तल मंजिलमे कड़े बड़े बड़े पिल्लरों के ऊपर बौळी  व कड़ियों रख कर निर्मित हुए हैं।  निमदारी के स्तम्भ  लकड़ी के मजबूत कड़ी के ऊपर सज्जित हैं।    प्रत्येक बरामदे  में चौदह चौदह स्तम्भ है जो  आधार कड़ी पर खड़े हैं व ऊपर मुरिन्ड /मथिण्ड की कड़ी से मिल जाते हैं व मुरिन्ड कड़ी छत आधार पट्टिका के नीचे है।
स्तम्भों के आधार से ढाई फिट ऊंचाई पर लकड़ी की रेलिंग है जिस पर लकड़ी के जंगल हैं उन पर त्रिभुजकर पट्टिकाएं लगिहैं। 
  स्तम्भ व दरवाजों में जायमितीय अलंकरण कुरेदा गया है।  प्राकृतिक व मानवीय अलकंरण कहीं भी नहीं दीखता है या  आभास  भी नहीं हो रहा है। 
 व्यास चट्टी के बाबा काली कमली वाली की धर्मशाला का  निम दारी भवन शैली  व कल दृष्टि से इसलिए महत्व है कि   बाबा कमली वाले की धर्मशाला की निमदारी बता सकने में सफल होगी कि कब और कैसे निम दारी शैली  दक्षिण गढ़वाल में फैली।  1937 के लगभग की निम दरी   क्षेत्र में भवन निर्माण व काष्ठ  कला का इतिहास  समझने में भी पेश करेगी। 
निष्कर्ष है कि बाबा कमली वाले की व्यासचट्टी में धर्मशाला में केवल ज्यामितीय अलंकरण हुआ है।

सूचना व फोटो आभार : कमल जखमोला
यह लेख  भवन  कला संबंधित  है न कि मिल्कियत हेतु . मालिकाना   जानकारी  श्रुति से मिलती है अत: अंतर हो सकता है जिसके लिए  सूचना  दाता व  संकलन कर्ता  उत्तरदायी  नही हैं .
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गढ़वाल,  कुमाऊँ , उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी, निमदारी , जंगलादार  मकान ,बाखली ,  बाखई, कोटि बनाल  ) काष्ठ  कला अंकन नक्कासी   - 

Tibari House Wood Art in Kot , Pauri Garhwal ; Tibari House Wood Art in Pauri block Pauri Garhwal ;   Tibari House Wood Art in Pabo, Pauri Garhwal ;  Tibari House Wood Art in Kaljikhal Pauri Garhwal ;  Tibari House Wood Art in Thalisain , Pauri Garhwal ;   Nimdari wood carving Vyashchatti , द्वारीखाल पौड़ी  गढवाल में तिबारी,  खोली , भवन काष्ठ  कला, नक्कासी  ;बीरों खाल ,  पौड़ी  गढवाल में तिबारी,  खोली , भवन काष्ठ  कला नक्कासी ; नैनी डांडा  पौड़ी  गढवाल में तिबारी,  खोली , भवन काष्ठ  कला नक्कासी ; नक्कासी पोखरा   पौड़ी  गढवाल पौड़ी  गढवाल में तिबारी,  खोली , भवन काष्ठ  कला नक्कासी ;  में तिबारी,  खोली , भवन काष्ठ  कला नक्कासी ; रिखणी खाळ  पौड़ी  गढवाल में तिबारी,  खोली , भवन काष्ठ  कला नक्कासी ;   पौड़ी  गढवाल में तिबारी,  खोली , भवन काष्ठ  कला नक्कासी ; जहरी खाल  पौड़ी  गढवाल में तिबारी,  खोली , भवन काष्ठ  कला नक्कासी ;  दुग्गड्डा   पौड़ी  गढवाल में तिबारी,  खोली , भवन काष्ठ  कला , नक्कासी ; यमकेश्वर  पौड़ी  गढवाल में तिबारी,  खोली , भवन काष्ठ  कला नक्कासी ; नक्कासी , भवन नक्कासी  नक्कासी

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ज्याठा गाँव (पैनों .पौड़ी गढ़वाल ) में स्व  .  विश्वम्बर  दत्त देवरानी 'शास्त्री ' की भव्य  व विशेष तिबारी  व निमदारी में काष्ठ कला , अलंकरण , लकड़ी नक्कासी

गढ़वाल,  कुमाऊँ , उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी, निमदारी , जंगलादार  मकान , बाखली  , खोली  , मोरी ,  कोटि बनाल   ) काष्ठ कला अलंकरण अंकन, नक्कासी   -  157
( कला व अलंकरण पर केंद्रित है न कि भवन शैली पर ) 
 संकलन - भीष्म कुकरेती
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 एक लोक कथ्य अनुसार पैनों पट्टी में ज्याठ गांव के देवरानी  परिवार डाडामंडी  के निकट  डुंड्यख  गांव से स्थानन्तरित हुए थे।  ज्याठा गांव में स्व विश्वम्बर दत्त देवरानी शस्त्री प्रसिद्ध विद्वान व कर्मकांडी पंडित हुए थे जो  हिन्दू धर्म प्रचार वास्ते  विदेशों की यात्रा पर भी गए थे।  स्व विश्वंबर दत्त देवरानी 'शास्त्री '  महामना मदन मोहन मालवीय के सहयोगी भी रहे हैं। 
स्व विश्वंबर दत्त देवरानी  'शास्त्री ' ने  एक भव्य व विशेष तिबारी निर्मित की थी , तिबारी संभवत: 1930 -40  इ  के लगभग निर्मित हुयी होगी।   ज्याठा गांव में  स्व विश्वंबर दत्त देवरानी  'शास्त्री ' की तिबारी कई मामले में विशेष है।  दक्षिण गढ़वाल में अधिकतर तिबारी पहली मंजिल पर स्थापितहुई हैं किन्तु   ज्याठा  गाँव (पैनों , रिखणी खाल ब्लॉक , पौड़ी गढ़वाल )  में  स्व विश्वंबर दत्त देवरानी  'शास्त्री '  के  ढैपुर    , दुखंड /तिभित्या मकान में तिबारी तल मंजिल में स्थापित है व  पहली मंजिल में जंगला स्थापित है(निमदारी ) . कला व  रचना / बनावट की दृष्टि से ज्याठा गाँव ( (पैनों , रिखणी खाल ब्लॉक , पौड़ी गढ़वाल )  में  स्व विश्वंबर दत्त देवरानी  'शास्त्री '  के मकान की तिबारी व निमदारी भव्य है , विशेष है व आज भी उत्तराधिकारियों ने उचित देखभाल कर तिबारी -निमदारी को युवा ही रखा हुआ है।
  ज्याठा गाँव ( (पैनों , रिखणी खाल ब्लॉक , पौड़ी गढ़वाल )  में  स्व विश्वंबर दत्त देवरानी  'शास्त्री '  के मकान में काष्ठ कला  विवेचना हेतु - तल मंजिल में तिबारी , तिबारी के आस पास ; तल मंजिल में खोली (प्रवेशद्वार ) व पहली मंजिल में निमदारी (जंगल ) का  अध्ययन आवश्यक है।
  ज्याठा गाँव ( (पैनों  पट्टी , रिखणी खाल ब्लॉक , पौड़ी गढ़वाल )  में  स्व विश्वंबर दत्त देवरानी  'शास्त्री '    के मकान के तल मंजिल  में  स्थापित तिबारी  में भव्य नक्कासी दार चार स्तम्भ /सिंगाड़ स्थापित हैं जो तीन ख्वाळ/खोली /द्वार बनाते हैं।  स्तम्भ सिंगाड़ दीवार से तीन कड़ियों के माध्यम से जुड़े हैं।  तीनों कड़ियों में  पत्तियों , सर्पिल लता आकार ,  व बीच की कड़ी में काल्पनिक आकृतियां अंकित हुयी है।  नक्कासी की प्रशंसा करनी ही होगी।    स्तम्भ भूतल के ऊपर पाषाण देळी /देहरी पर स्थापित हैं।  स्तम्भ का आधार  चौकोर डौळ  है व उसके ऊपर  कुम्भी नुमा /दबल /पथ्वड़  नुमा आकर है जो उल्टे  कमल दल से बना है , उल्टे कमल दल   की पंखुड़ियों में काल्पनिक छवि की नक्कासी हुयी है जो दर्शनीय है और चित्र में आँखों का ध्यान बरबस इधर चला ही जाता है।  अधोगामी पद्म पुष्प के ऊपर ड्यूल (Ring type Wooden Plate ) है।  ड्यूल के ऊपर बड़ी बड़ी पंखुड़ियों वाला कमल खिले पुष्प की आकृति अंकित हाइवा उसके बाद तम्भ की मोटाई कम होती जाती है।  इस कम   मोटाई वाली  कड़ी में भी  रेखायुक्त नकासी हुयी है।   जहां स्तम्भ //सिंगाड़  की सबसे कम मोटाई है वहां उल्टा कमल फूल है व उसके ऊपर ड्यूल अंकित है  व उसके ऊपर सीधा कमल दल है।  कमल दल के ऊपरी हिस्से में  स्तम्भ अर्ध गोलाई लिए कोई फूल की शक्ल अख्तियार करता है जिसके ऊपर प्राकृतिक अलंकरण हुआ है।  इस पुष्प आकृति के ऊपर स्तम्भ थांत  (  Bat Blade  type  ) की शक्ल अख्तियार करते हुए ऊपर मुरिन्ड /मथिण्ड /शीर्ष abacus  से मिल।   स्तम्भ में जहां  से थांत आकृति शुरू होती है वहीं से मेहराब की चाप भी शुरू होती है।  मेहराब की चाप तिपत्ति (trefoil ) नुमा है व मेहराब के बाहर त्रिभुजों  के किनारे पर दोनो ओर   बहुदलीय पुष्प आकृति है याने प्यूरी तिबारी में  मेहराब के बाहर त्रिभुजों में 6  बहुदलीय फूल खुदे हैं।  इन त्रिभुजों में प्रकृति बेल बूटे  की नक्कासी हुयी है।  प्रत्येक मेहराब के ऊपर केंद्र में एक एक  प्रतीक आकर स्थापित है।  (संभवतया नजर न लगने हेतु या शगुन हेतु स्थापित है।   
स्तम्भ के प्रत्येक थांत  के ऊपर एक एक दीवालगीर  (bracket ) हैं जो पुष्प कली की आकृति का आभास देते हैं (आभासी अलंकार ) . ये दीवालगीर  ऊपर मुरिन्ड से मिल जाते हैं।  मुरिन्ड की कड़ियों में  बहुत ही आकर्षक  लता , पत्ती  व ज्यामितीय कला  अलकंरण उत्कीर्ण हुआ है  मुरिन्ड की कड़ियों में  बहुत ही आकर्षक  लता , पत्ती  व ज्यामितीय कला उत्कीर्ण हुयी है।  मुरिन्ड की आखरी कड़ी जो छज्जे के आधार से मिलते है उससे शंकु नुमा आकृतियां लटकती प्रतीत होती है। 
 तिबारी की  एक अन्य विशेष्ता है कि मुरिन्ड।/शीर्ष /abacus  के बगल  में एक एक  काष्ठ हाथी (कुल दो हाथी ( उत्कीर्ण हुआ है जो  मजबूती ,बल व स्थिरता का प्रतीक है।
  ज्याठा गाँव ( (पैनों  पट्टी , रिखणी खाल ब्लॉक , पौड़ी गढ़वाल )  में  स्व विश्वंबर दत्त देवरानी  'शास्त्री '    के मकान  के पहली मंजिल में निमदारी या जंगल स्थापित है।  जंगल भी रौनकदार है।    ज्याठा गाँव ( (पैनों  पट्टी , रिखणी खाल ब्लॉक , पौड़ी गढ़वाल )  में  स्व विश्वंबर दत्त देवरानी  'शास्त्री '    के मकान  के पहली मंजिल की निमदारी  में  कुल 14  युग्म स्तम्भ (जोड़ी से एक आकृति बनना  )   है व किनारे पर ज्यामितीय कुशलता की आकृतियां है।  युग्म स्तम्भ ढाई फ़ीट ऊंचाई तक मोठे हैं व ऊपर कम मोटाई के हैं।  इसी ऊंचाई से लकड़ी की रेलिंग भी लगी हैं।  निमदारी के स्तम्भ व आधार व शीर्ष कड़ी ज्यामितीय अलंकरण का उम्दा उदाहरण पेश करते हैं। 
 इस मकान की  खोली /प्रवेश द्वार की कोई  उचित  चित्र न मिलनेके कारण खोली की काष्ठ  कला का विवरण बाकी है।
निष्कर्ष निकलना सरल है कि   ज्याठा गाँव ( (पैनों  पट्टी , रिखणी खाल ब्लॉक , पौड़ी गढ़वाल )  में  स्व विश्वंबर दत्त देवरानी  'शास्त्री '    के मकान की तिबारी व निमदारी  में काष्ठ कला उच्च तम स्तर  की है.   

सूचना व फोटो आभार :  अतुल देवरानी , ज्याठा   गांव

यह लेख  भवन  कला संबंधित  है न कि मिल्कियत हेतु . मालिकाना   जानकारी  श्रुति से मिलती है अत: अंतर हो सकता है जिसके लिए  सूचना  दाता व  संकलन कर्ता  उत्तरदायी  नही हैं .
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गढ़वाल,  कुमाऊँ , उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी, निमदारी , जंगलादार  मकान ,बाखली ,  बाखई, कोटि बनाल  ) काष्ठ  कला अंकन नक्कासी   - 

Tibari House Wood Art in Kot , Pauri Garhwal ; Tibari House Wood Art in Pauri block Pauri Garhwal ;   Tibari House Wood Art in Pabo, Pauri Garhwal ;  Tibari House Wood Art in Kaljikhal Pauri Garhwal ;  Tibari House Wood Art in Thalisain , Pauri Garhwal ;   द्वारीखाल पौड़ी  गढवाल में तिबारी,  खोली , भवन काष्ठ  कला, नक्कासी  ;बीरों खाल ,  पौड़ी  गढवाल में तिबारी,  खोली , भवन काष्ठ  कला नक्कासी ; नैनी डांडा  पौड़ी  गढवाल में तिबारी,  खोली , भवन काष्ठ  कला नक्कासी ; नक्कासी पोखरा   पौड़ी  गढवाल पौड़ी  गढवाल में तिबारी,  खोली , भवन काष्ठ  कला नक्कासी ;  में तिबारी,  खोली , भवन काष्ठ  कला नक्कासी ; रिखणी खाळ  पौड़ी  गढवाल में तिबारी,  खोली , भवन काष्ठ  कला नक्कासी ;   पौड़ी  गढवाल में तिबारी,  खोली , भवन काष्ठ  कला नक्कासी ; जहरी खाल  पौड़ी  गढवाल में तिबारी,  खोली , भवन काष्ठ  कला नक्कासी ;  दुग्गड्डा   पौड़ी  गढवाल में तिबारी,  खोली , भवन काष्ठ  कला , नक्कासी ; यमकेश्वर  पौड़ी  गढवाल में तिबारी,  खोली , भवन काष्ठ  कला नक्कासी ; नक्कासी , भवन नक्कासी  नक्कासी

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सलूड़ (चमोली ) में एक तिबारी में काष्ठ कला , अलंकरण अंकन , नक्कासी

गढ़वाल,  कुमाऊँ , उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी, निमदारी , जंगलादार  मकान , बाखली  , खोली  , मोरी , कोटि बनाल   ) काष्ठ कला अलंकरण अंकन, नक्कासी   - 158
(अलंकरण व कला पर केंद्रित ) 
 
 संकलन - भीष्म कुकरेती
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चमोली गढ़वाल के सलूड़  गाँव रम्माण लोक नाटक हेतु विश्व प्रसिद्ध  गाँव है I  सलूड़ गाँव से कुछ तिबारियों व निमदारियों की सूचना मिली है I प्रस्तुत भवन की सूचना प्रसिद्ध पक्षी निहारक व पक्षी फोटोग्रैफ्रर दिनेश   कंडवाल ने साझा की है I
 सलूड़ का यह  भवन  कुमाऊँ की बाखलियों की बरबस याद दिला देता है क्योंकि इस भवन के तल मंजिल में स्थित खोली (प्रवेशद्वार ) का पहली मंजिल तक पंहुचना व पहली मंजिल में  झाँकने वाली खिड़की (  खोह नुमा खिड़की )  शैली गढवाल में कम कुमाऊँ में अधिक मिलती है I एक ही भवन में दो दो तिबारियों का प्रचलन भी गढवाल में कम मिलता है (अपवाद भी सर्वेक्षण में मिले है ) तथापि कुमाऊँ में एक भी भवन में कई तिबारियों का रिवाज निर्माण का प्रचलन आज भी है I इस भवन में भी कुमाऊँ की बाखलियों जैसे ही छज्जा चौड़ा नही है I या छज्जे को महत्व नही दिया गया है I
  सलूड़ गाँव (चमोली ) में इस भवन की काष्ठ कला समझने हेतु  हमारे पास  मुख्य संरचनाये –तल मंजिल में खोली , पहली मंजिल में दो तिबारियां , दो या तीन झाँकने की  खिडकियों का जायजा लेना आवश्यक है या तीन मुख्य बिन्दुं है जिनसे भवन की काष्ठ कला की विशेषता जानी जायेगी I
 तल मंजिल में तीन कमरों के दरवाजों व खिड़की के दरवाजों पर केवल ज्यामितीय कला , अलंकरण अंकन हुआ है I खोली में कई प्रकार के कला नक्कासी हुयी है I  खोली के सिंगाड़ दोनों ओर हैं व प्रत्येक सिंगाड़ त्रिगट  (तीन मिलकर ) उप स्तम्भों या  चरगट (चार मिलकर )  उप स्तम्भों से मिलकर बना है जो कुमाऊँ में अधिक प्रचलन है I
  खोली के प्रत्येक उप सिंगाड़ /स्तम्भ के आधार कमल दल से निर्मित कुम्भी , ड्यूल व सीधा कमल फूल की आकृतियाँ हैं जो कुछ ऊँचाई बाद  स्तम्भ सीढ़ी जाकर  मुरिंड /शीर्ष की समान्तर कड़ीयों में तब्दील हो जाती हैं व मुरिंड /शीर्ष की कई सतह निर्मित हो जाति हैं I मुरिंड के केंद्र में धार्मिक /प्रतीकात्मक कला अंकित है . खोली के उपर छ्प्परिका भी काठ की है I
 पहली मंजिल में दो दो कमरों से  दो बरामदे बने हैं  जिन्हें चार चार स्तम्भों से तिबारी निर्मित हुयी हैंI अर्थात पहली मंजिल में चार चार स्तम्भों व तीन तीन ख्वाळइयों .खोलियों से दो तिबरियां निर्मित हुयी हैं I
दोनों  तिबारियों के प्रत्येक  स्तम्भ गढवाल की आम तिबारियों के स्तम्भ जैसे ही हैं जिसके आधार  पर उलटे कमल फूल से कुम्भी बनी है , इसके उपर ड्यूल है , ड्यूल के उपर सीधा कमल फूल है व तब  स्तम्भ की मोटाई ऊँचाई के साथ कम होती जाती है I जहाँ पर सिंगाड़ /स्तम्भ की मोटाई सबसे कम है वहां उल्टा कमल फूल बनता है जिसके उपर ड्यूल है व उसके उपर सीधा कमल दल है जिसके ऊपर  से स्तम्भ थांत  (cricket  bat bladetype )  रूप धारण कर लेता है व थांत ऊपर  जाकर मुरिंड से मिल जाता है Iजहाँ से स्तम्भ थांत शक्ल अख्तियार करता है वहीं से मेहराब की एलक चाप बनती है जो दुसरे स्तम्भ के अर्ध चाप से मिलकर सम्पूर्ण मेहराब बनाते  हैं I लगता है मेहराब के त्रिभुजों में फूल व बेल बूटों की नक्कासी हुयी है व मुरिंड/शीर्ष कड़ी में भी नक्कासी हुयी लगती है I
 झाँकने  की खिड़कियाँ में स्तम्भ है जो दो तीन उप सिंगाड़ों  से बने हैं . खिड़की के  प्रत्येक उप सिंगाड़  कला व शैली दृष्टि से  तिबारी के स्तम्भ जैसे  ही निर्मित हुए हैं  उप सिंगाड़ का केवल  आकार छोटा है बस I
खिड़की  के  आधार  से कुछ ऊँचाई तक पटिला /तख्ता लगा है व उपर बाहर झाँकने के लिए छेद   है I झाँकने का छेद अंडाकार नही अपितु चौखट है Iदो नों बाहर झाँकने की खिडकियों की शैली व कला एक जैसी ही हैं I
   निष्कर्ष में कहा जा सकता है कि विश्व प्रसिद्ध रम्माण गां सलूड़ के प्रस्तुत विवेचित मकान की शैली गढवाली व कुमाऊँ शैलियों का मिश्रित रूप ही व ज्यामितीय , प्रतीकात्मक व प्राकृतिक नक्कासी का शानदार नमूना  है I
फोटो व सूचना आभार जग प्रसिद्ध पक्षी निहारक व फोटोग्राफर  दिनेश  कंडवाल
सूचना व फोटो आभार :  जग प्रसिद्ध पक्षी निहारक व फोटोग्राफर  दिनेश  कंडवाल
 यह लेख  भवन  कला संबंधित  है न कि मिल्कियत  संबंधी  . मालिकाना   जानकारी  श्रुति से मिलती है अत:  वस्तुस्थिति में  अंतर   हो सकता है जिसके लिए  सूचना  दाता व  संकलन कर्ता  उत्तरदायी  नही हैं I
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गढ़वाल,  कुमाऊँ , उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी, निमदारी , जंगलादार  मकान , बाखली , मोरी , खोली,  कोटि बनाल  ) काष्ठ  कला अंकन , लकड़ी नक्कासी श्रंखला जारी   
   House Wood Carving Ornamentation from  Chamoli, Chamoli garhwal , Uttarakhand ;   House Wood Carving Ornamentation/ Art  from  Joshimath ,Chamoli garhwal , Uttarakhand ;  House Wood Carving Ornamentation from  Gairsain Chamoli garhwal , Uttarakhand ;     House Wood Carving Ornamentation from  Karnaprayag Chamoli garhwal , Uttarakhand ;   House Wood Carving Ornamentation from  Pokhari  Chamoli garhwal , Uttarakhand ;   कर्णप्रयाग में  भवन काष्ठ कला, नक्कासी  ;  गपेश्वर में  भवन काष्ठ कला, नीति में भवन काष्ठ  कला, नक्कासी   ; जोशीमठ में भवन काष्ठ कला, नक्कासी  , पोखरी -गैरसैण  में भवन काष्ठ कला, नक्कासी  ,

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  बगोरी (नेलंग घाटी  ) के भवन संख्या 2 में काष्ठ कला , अलंकरण अंकन , नक्कासी

गढ़वाल,  कुमाऊँ , उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी, निमदारी , जंगलादार  मकान , बाखली  , खोली  , कोटि बनाल )  में काष्ठ कला अलंकरण, नक्कासी   - 159
 संकलन - भीष्म कुकरेती

   बगोरी  नेलंग घाटी  (भटवाडी, उत्तरकाशी ) का एक प्रमुख गाँव है  I बगोरी की एक तिबारी की काष्ठ कला के बारे में चर्चा हो चुकी है I. आज एक अन्य प्रकार के भवन जिसे बगोरी मकान संख्या 2 नाम दिया गया के बारे में चर्चा की जाएगी I
 बगोरी भवन संख्या 2  व अन्य भवनों के अध्यन स एसाफ पता चलता है कि बगोरी में भवन के तल मंजिलके अल्नक्र्ण पर इतना ध्यान नहिदिया जाता है व भवन तल मंजिल का उपयोग गौशाला या भंडार हेतु किया जाता था I अब कुछ मकानों में तल मंजिल का उपयोग गैरेज  या बगोरी के भारत वासियों के प्रवेश खुल जाने के बाद दुकानों के लिए किया जाने लगा हैI स्नभ्व्त्य शीत ऋतू समय ग्राम वासी जब  नीचे स्थान्तरित होते होंगे तो बर्फ पडती होगी व  आंगन या तल मंजिल में कीचड़ हो जाति होगी और इस वजह से तल मंजिल उपयोग नही होता होगा . यही शैली अति शीत क्षेत्र मलारी , गमशाली  (नीति घाटी , चमोली ) के मकानों में भी दिखी कि  तल मंजिल में कोई विशेष अलंकरण नही होता है I
प्रस्तुत बगोरी भवन संख्या 2 ढाईपुर शैली का है  व  में तल मंजिल में कमरों के  तीन बड़े दरवाजे हैं जो सपाट तख्तों या पटिलों से निर्मित हैं I उपरी मंजिल में जाने के लिए प्रवेश द्वार दूसरी ओर है I पहली मंजिल व  ढाइवां मंजिलें  तल मंजिल की पूरी लकड़ी के  छत पर टिकी है पहली मंजिल पर एक बड़ा बरामदा है जिसे लकड़ी के रंदा लगे तख्तों /पटिलों से ढका गया है I लम्बे  काष्ठ तख्तों से ढके बरामदे .में दो चौखट  मोरी  (खिड़कियाँ या झरोखे  ) हैं I   ढाइवां तल  पहली मंजिल की लकड़ी की छत  पर टिका है I ढाइवां तल के बरामदे  को नही ढका ग्या है I
  छत तीखी  ढलवां है व लकड़ी की ही बनी है I अति शीत क्षेत्र में  तीखी ढलवां छत निर्माण भी जलवायु के कर्ण बनाई जाती  हैं जिससे बर्फ पिघलकर सीधे नीचे गिर जाय I यही तीखे ढलवां लकड़ी की छत शैली जौनसार, उत्तरकाशी के अन्य अति शीत क्षेत्र व चमोली के अति शीत क्षेत्रों के मकानों जैसे गमशाली व मलारी के गाँवों में देखने  को मिला है I 
प्रस्तुत बगोरी भवन संख्या 2 में लकड़ी के पटिलों या कड़ीयों , बौळइयों में  सपाट ज्यामितीय कटान हुआ है कहीं भी कोई अन्य प्रकार का अल्नक्र्ण अंकन नहीं दीखता है प्रस्तुत बगोरी भवन संख्या 2 में ना  ही कोई धार्मिक प्रतीक अंकन हुआ या थरपण /थोपना हुआ है I
  ----- फोटो में आस- पास के बगोरी के  भवनों की काष्ठ शैली दशा ------------
प्राप्त फोटो में बगोरी री ( भटवाड़ी, उत्तरकाशी ) के दो अन्य मकानों का सूत भेद भी मिल जाता है I एक मकान जो प्रस्तुत बगोरी भवन संख्या 2  से बिलकुल सटा है वह दुपुर है , तल मंजिल खाली है व  पहली मंजिल के बरामदे  ढकने हेतु  चार स्तम्भ स्थापित हैं जिनके बीच के दो ख्वाळओं में आधा आधे ऊँचाई तक तख्तों से ढका है व एक ख्वाळ खुला है शायद दरवाजे हेतु उपयोग होता होगा I ढाई पुर की छत से बेच मुंडळ   से एक अनपहचानी लकड़ी की ज्यामितीय आकृति लटकी है पर साफ़ है कि यह कोई हिन्दू धर्म का प्रतीक तो नही है I संभवतया यह त्कींक का एक उपकरण है जो छत के दो  भागों को बंधने या साधने का काम आता  हो I
  इस मकान में भी कोई विशेष अलंकरण देखने को नही मिलता है है ना ही कोई धार्मिक प्रतीक या चिन्ह मकान पर मिलते हैं I . इसी दूसरे मकान के बगल में  एक और मकान जो छाया में ढका हुआ है में भी लगता है पहली मंजिल में स्थित बरामदे को बिन नक्कासी के लकड़ी के तख्तों /पटिलों से ढक दिया गया  है  I.
 प्रस्तुत फोटो में बगोरी भवन संख्या 2 के बगल में रस्ते के बगल में एक और दुपुर  भवन है जिसकी दीवारें सीमेंट की हैं किन्तु सामने का छोर व बगल का छोर प्रस्तुत बगोरी भवन संख्या 2 की ही नकल है याने तल मंजिल में  बड़े बड़े तख्तों के दरवाजे हैं व तख्तों में कोई नक्कासी नही है I इस मकान के पहली मंजिल के बरामदे को दो ओर से तख्तों से ढका गया है I इन तख्तों पर भी कोई नक्कासी नही दिखती है बिलकुल सपाट !  इस भवन में भी कोई धार्मिक प्रतीक चिन्ह खुदा या लटका नही मिला /दिखा I
बगारी के  इन चार भवनों में लकड़ी उपयोग से साफ़ पता चलता है कि इस प्रकार के भवनों में  सपाट तख्तों का उपयोग खूब होता है /था व  विशेष नक्कासी देखने को नही मिलती है यहाँ तक कि धार्मिक  प्रतीक भी देखने को नही मिले हैं I
सूचना व फोटो आभार :  Varsha Naresh 
यह लेख  भवन  कला संबंधित  है न कि मिल्कियत हेतु . मालिकाना   जानकारी  श्रुति से मिलती है अत: अंतर हो सकता है जिसके लिए  सूचना  दाता व  संकलन कर्ता  उत्तरदायी  नही हैं .
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 Traditional House Wood Carving Art (Tibari, Nimdari, Bakhali,  Mori) of   Bhatwari , Uttarkashi Garhwal ,  Uttarakhand ;   Traditional House Wood Carving Art (Tibari, Nimdari, Bakhali,  Mori) of  Rajgarhi ,Uttarkashi ,  Garhwal ,  Uttarakhand ;   Traditional House Wood Carving Art (Tibari, Nimdari, Bakhali,  Mori) of  Dunda, Uttarkashi ,  Garhwal ,  Uttarakhand ;   Traditional House Wood Carving Art (Tibari, Nimdari, Bakhali,  Mori) of  Chiniysaur, Uttarkashi ,  Garhwal ,  Uttarakhand ;   नेलंग घाटी  में  भवनों में लकड़ी  की नक्कासी , भटवाड़ी में भवन काष्ठ  कला , लकड़ी नक्कासी ,

Bhishma Kukreti

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    बगोरी (नेलंग घाटी , उत्तरकाशी ) के भवन संख्या 3  में काष्ठ कला, अलंकरण अंकन , नक्कासी

 
गढ़वाल,  कुमाऊँ , उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी, निमदारी , जंगलादार  मकान , बाखली  , खोली  , कोटि बनाल )  में काष्ठ कला अलंकरण, नक्कासी   -  160
 संकलन - भीष्म कुकरेती     
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बगोरी (नेलंग घाटी , उत्तरकाशी ) के भवन संख्या 3  में काष्ठ कला , अलंकरण अंकन , नक्कासी
 तिब्बत सीमावर्ती गाँव बगोरी (नेलंग घाटी उत्तरकाशी ) में भवनों में काष्ठ कला व अलंकरण श्रृखला में यह तीसरी कड़ी है जिसमे मुख्य  भवन  व उसके आस पास  दो अन्य भवनों में काष्ठ कला व अलंकरण पर चर्चा होगी I
भवन 3 . 1-  बगोरी (नेलंग घाटी , उत्तरकाशी ) के भवन संख्या 3  कड़ी में सामने से दिख  रहा भवन वास्तव में  अभी कुछ समय पहले तैयार भवन है क्योंकि दीवारें सीमेंट कंक्रीट की हैंI बगोरी की शैली में ही यह ढाईपुर मकान निर्मित  हुआ है व तल मंजिल में भंडार या गौशाला  हेतु छोड़ा गया है और अब जब से नेलंग घाटी भारतीय पर्यटकों के लिए खोल दी  गयी है बगोरी में भवनों के तल मंजिल में दुकान खोलने के लक्षण  मिलने लगे हैं I बगोरी (नेलंग घाटी , उत्तरकाशी ) के भवन संख्या 3   के 3.1 भवन यद्यपि आधुनिक है किन्तु लकड़ी प्रयोग, कला  व उपयोग की दृष्टि से भवन पारम्परिक शैली /कला का है I
 बगोरी के 3,1 भवन के पहली मंजिल में जाने हेतु सीमेंट की सीढियां बनी हैं I बगोरी (नेलंग घाटी , उत्तरकाशी ) के भवन संख्या 3  के 3,1 भवन में पहली मंजिल  तल मंजिल पर लकड़ी की छत पर टिकी है I बरामदे से बाहर छ्ज्जेनुमा आकृति की कड़ी के उपर चार नक्कासीदार  स्तम्भ टिके हैं I ये चार स्तम्भ  स्वत: ही तीन ख्वळ/मोरी / दरवाजे बनाते हैं I सीढ़ी के किनारे वाले दो स्तम्भों के मध्य की खोली /मोरी दरवाजे के रूप में उपयोग हो रहा है व बाकी  दो  .ख्वाळ /खोळइयों में ढाई फिट ऊँचाई तक ही रेलिंग में दो  लम्बी कड़ियाँ है I सभी चारों स्तम्भों में  कलायुक्त अंकन हुआ है . प्रत्येक स्तम्भ के अधर पर लम्बा कुम्भी है , फिर युल है फिर सीधा कमल फूल है फिर स्तम्भ गोलाई में कम होता जाता है व जहाँ पर सबसे कम ओटाई है वहां स्तम्भ पर उलटे कमल की खुदाई है उसके ऊपर ड्यूल है फिर सीधा कमल फूल है फिर स्तम्भ मकी मोटाई कम होती जाती है व ऊपर   ड्यूल कमल आदि का  नीचे वाला दोहराव है I
 रेलिंग की ऊपरी कड़ी के नीचे तरेनुमा आकृतियाँ खुदी हैं I इसी कड़ी के उपर थांत (criket bat blade) नुमा आकृति में कटान  हुआ है व ये थांत नुमा आकृतियाँ  जंगला  बनती है . याने जंगले में आधार पर तारे नुमा  आकृति फिर कड़ी व उसके उपर की कड़ी के मध्य कटान वाली थांत   आकृतियों   से जंगला बना है I
  बगोरी (नेलंग घाटी , उत्तरकाशी ) के भवन संख्या 3   के 3.1 भवन की पहली मंजिल की छत या ढाईपुर के फर्श (लैंटर्न) के बाहर काष्ठ या धातु की तोरण नुमा आकृति लटकी है जो भवन की सुन्दरत वृद्धि कारक है I. ढाई पुर के सामने की  दीवाल काठ की ही बनी  है जो सपाट तख्तों /पटिलों से निर्मित है I
ढाईपुर की छट तीखी ढलवां है व  ढाईपुर की छतआधार  पटिले के बाहर एक तिपत्ती नुमा आकृति से सजी (कटान किये ) पट्टिका है  जो स्यन्द्र्ता वृद्धि कारक है I
निष्कर्ष निकलता है कि बगोरी (नेलंग घाटी , उत्तरकाशी ) के भवन संख्या 3  के 3.1 भवन में स्तम्भों में आम गढ़वाल की तिबारियों व बगोंरी के अन्य तिबारी  स्तम्भ /सिंगाड़ समान कमल फूल व ड्यूल आकृति अंकित हुयी है I
बाकी  भवन में ज्यामितीय कटन से काष्ठ कला उभरी गयी है व आँखों को आनन्द दायक कला अंकित हुयी  है I
सूचना व फोटो आभार :
यह लेख  भवन  कला संबंधित  है न कि मिल्कियत हेतु . मालिकाना   जानकारी  श्रुति से मिलती है अत: अंतर हो सकता है जिसके लिए  सूचना  दाता व  संकलन कर्ता  उत्तरदायी  नही हैं .
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