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  • देवीधूरा की बग्वाल: August 02, 2012

Author Topic: Stone Pelting: Devidhura Fair - देवीधूरा की बग्वाल: आधुनिक युग में पाषाण युद्ध  (Read 52010 times)


Devbhoomi,Uttarakhand

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                              देवीधुरा : पत्थरों से बरसती हैं नेमतें
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उत्तराखंड की संस्कृति यहां के लोक पर्व और मेलों में स्पंदित होती है। यूं तो राज्य में जगह-जगह साल भर मेलों का आयोजन चलता रहता है, लेकिन कुछ मेले ऐसे हैं जो अपनी अलग ही पहचान बनाए हुए हैं। कुमांऊ के देवीधुरा नामक स्थान पर लगने वाला बगवाल मेला इन्हीं में एक है, जो हर साल रक्षा बंधन के दिन मनाया जाता है। इस अनूठे मेले की खास विशेषता ये है कि इसमें पत्थरों का रोमांचकारी युद्ध होता है,

 जिसे देखने के लिए दूर-दूर से लोग जुटते हैं। चंपावत जिला मुख्यालय से करीब 60 किलोमीटर दूर अल्मोड़ा-लोहाघाट मार्ग पर बसा देवीधुरा समुद्रतल से करीब 2500 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है।

यहीं पर विशाल शिलाखंडों के मध्य प्राकृतिक रूप से बनी गुफा में मां बराही देवी का मंदिर है। मंदिर तक पहुंचने के लिए संकरी गुफा है। मंदिर के पास ही खोलीखांड दुबाचौड़ का लंबा-चौड़ा मैदान है। यहां पर रक्षा बंधन के दिन बगवाल यानी पत्थरों का रोमांचकारी युद्ध होता है। यह खेल लमगडिया, चम्याल, गहरवाल और बालिग खापों के बीच खेला जाता है। इन चारों खापों से जुड़े आसपास के गांव के लोग इसमें हिस्सा लेते हैं।

त्थरों के इस रोमांचकारी खेल के पीछे कई लोकमान्यताएं जुड़ी हैं। इन्हीं के अनुसार प्राचीन काल में मां बराही देवी को प्रसन्न करने के लिए यहां नरबलि देने की प्रथा थी। कहा जाता है कि हर साल इन चारों खापों के परिवारों में से किसी एक सदस्य की बलि दी जाती थी। एक बार एक खाप की बूढ़ी महिला के पोते की बारी आई लेकिन महिला ने अपने पोते की बलि देने से इंकार कर दिया।

कहीं देवी कुपित न हो जाए, यह सोचकर गांव वालों ने निर्णय लिया कि बगवाल खेलकर यानी पत्थरों का रोमांचकारी खेल खेलकर एक मनुष्य शरीर के बराबर रक्त बहाया जाए। तभी से नरबलि के प्रतीकात्मक विरोध स्वरूप इस परंपरा को जीवित रखते हुए हर साल रक्षाबंधन के दिन चारों खापों के लोग यहां ढोल नगाड़ों के साथ पहुंचते हैं और पत्थरों के रोमांचकारी खेल को खेलते हैं।

चारों खापों के लड़ाके युद्ध के मैदान खोलीखांड और दुबाचौड़ के मैदान में परंपरागत युद्ध पोशाक और छतोलियों को हाथ में लिए ढोल नगाड़ों के साथ मां बराही के मंदिर में पहुंचते हैं। सबसे पहले इन चारों खापों के योद्धाओं द्वारा मंदिर की परिक्रमा और पूजा-अर्चना की जाती है और फिर मंदिर के लंबे-चौड़े प्रांगण में युद्ध के लिए मोर्च पर डट जाते हैं। लमगडि़या और बालिग खाप के योद्धा दक्षिण दिशा में होते हैं और गहरवाल और चम्याल खाप के लड़ाके उत्तर दिशा में होते हैं। पुजारी के शंखनाद के साथ ही बगवाल शुरू हो जाती है और फिर शुरू होता है पत्थरों का रोमांचकारी युद्ध जिसमें लोगों की सांसें थम जाती हैं।

युद्ध के दौरान घायल लड़ाके पत्थरों की चोट को माता का प्रसाद मानते हैं। युद्ध के दौरान मैदान का दृश्य देखने लायक होता है। बांस की बनी छतोलियों से लड़ाके अपना बचाव करते हैं। इस चोट पर किसी तरह की मरहम पट्टी नहीं की जाती।

जिस समय ये रोमांचकारी युद्ध होता रहता है, पुजारी मंदिर में बैठकर मां बराही की पूजा अर्चना करता रहता है। यकायक वह भाववश मैदान में पहुंच शंखनाद करता है और पुजारी के शंखनाद के साथ ही पत्थरों के इस रोमांचकारी खेल को रोक दिया जाता है। इसके बाद चारों खापों के योद्धा आपस में गले मिलते हैं।

इससे पहले सुबह मंदिर में मां वराही की प्रतिमा को को चारों खाप के लोग नंदगृह ले जाते हैं, जहां पर मूर्तियों को दूध से नहलाया जाता है और नए परिधानों से सुसज्जित किया जाता है।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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देवी को खुश करने के लिए बहाते हैं खून   सत्य सिंधु     Image Loading  
 
      इस मंदिर के प्रांगण में दो गुट एक-दूसरे पर पत्थर फेंकते हैं। वे पत्थर तब तक फेंकते रहते हैं, जब तक कि एक आदमी के खून के बराबर खून न बह जाए। खून बहाने का यह कार्यक्रम किसी झगड़े के कारण नहीं होता, बल्कि ये लोग यहां की देवी मां बराही को खुश करने के लिए एकदूसरे का खून बहाते हैं। जी हां, उत्तराखंड के चम्पावत जिले के देवीधुरा गांव में यह परंपरा सदियों से चली जा रही है। इसके तहत श्रवण पूर्णिमा यानी रक्षा बंधन के दिन विभिन्न जातियों के लोग पूरे हर्षोल्लास के साथ दो गुट में यहां के बराही देवी मंदिर प्रांगण में इकट्ठा होते हैं और मां बराही देवी को खुश करने के लिए एक-दूसरे पर पत्थर फेंक कर एक आदमी के खून के बराबर खून बहाते हैं।
इस मेले का नाम है बगवाल मेला। इसका आयोजन देवीधुरा में होता है, इसलिए यह देवीधुरा बगवाल मेला के नाम से ज्यादा लोकप्रिय है। बगवाल पत्थर फेंकने की प्रक्रिया को कहते हैं। पिछले दो-तीन वर्षों से 13 दिनों तक चलने वाले इस मेले का मुख्य आकर्षण रक्षाबंधन के दिन पत्थर फेंक कर एक-दूसरे का खून बहाना ही होता है। सदियों से चली आ रही इस स्थानीय परंपरा के तहत विभिन्न जातियों के लोग (विशेष रूप से महर और फव्यार्ल जातियों के लोग) सैकड़ों की संख्या में ढोल-नगाड़ों के साथ किंरगाल की बनी हुई छतरी (छन्तोली) के साथ खूब उल्लासपूर्वक विभिन्न दिशाओं से यहां पहुंचते हैं और दो गुट में बंटकर यहां एक-दूसरे पर पत्थर फेंकते हैं।
लोक मान्यता है कि किसी समय देवीधुरा के सघन वन में बावन हजार वीर और चौंसठ योगनियों के आतंक से मुक्ति देकर स्थानीय जन से देवी ने नर बलि की मांग की। इसके लिए निश्चित किया गया कि पत्थरों की मार से एक व्यक्ति के खून के बराबर निकले खून से देवी को तृप्त किया जाएगा। इसी प्रथा के तहत यह मेला हर वर्ष आयोजित होता है। पत्थर फेंकने का यह कार्यक्रम दोपहर के समय लगभग 10-15 मिनटों का होता है। बगवाल का समापन शंखनाद से होता है। मंदिर के पुजारी को जब अंत:करण से विश्वास हो जाता है कि एक आदमी के खून के बराबर खून बह गया होगा, तब वे तांबे के छत्र और चंबर के साथ मैदान में आकर बगवाल सम्पन्न होने की घोषणा करते हैं।
स्थानीय जिला पंचायत द्वारा आयोजित किया जाने वाला यह मेला इस वर्ष 20 अगस्त से शुरू होगा और एक सितम्बर तक चलेगा। 20 अगस्त से मां बराही देवी के मंदिर में विधि विधान से पूजा-अर्चना शुरू होगी। 24 अगस्त को यानी श्रवण पूर्णिमा के दिन बगवाल का आयोजन होगा। रात में जागरण का कार्यक्रम होता है। इसके अगले दिन यानी 25 अगस्त को देवी की पालकी निकाली जाती है। बक्से में रखे देवी विग्रह की शोभा यात्रा पास ही स्थित शिव मंदिर तक ले जाते हैं। उसके बाद गांव में व्यापारिक मेला शुरू हो जाता है। इस वर्ष यह मेला पहली सितम्बर तक चलेगा। इस अवसर को देखने के लिए हजारों की संख्या में आसपास के लोग तो जुटते ही हैं, काफी संख्या में पर्यटक भी यहां पहुंचते हैं।
कैसे पहुंचें
हवाई मार्ग :  निकटतम हवाई अड्डा पंत नगर है, जो यहां से 206 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।
रेल मार्ग: टनकपुर यहां का निकटतम रेलवे स्टेशन है। टनकपुर से जिला मुख्यालय चंपावत की दूरी 75 किलोमीटर है और चम्पावत से देवीधुरा 40 किमी।
सड़क मार्ग : अगर आप नैनीताल की ओर से जाते हैं तो अल्मोड़ा की ओर जाने वाली सड़क पर शहर फाटक पर बस छोड़नी होगी। नैनीताल से शहर फाटक 75 किलोमीटर है। यहां से देवीधुरा 40 किलोमीटर है। इस दूरी को मिनी बस या छोटी टैक्सियों की सहायता से तय किया जा सकता है। टनकपुर से देवीधुरा 115 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।
कहां ठहरें: देवीधुरा प्राकृतिक रूप से भी एक खूबसूरत गांव है, जहां काफी पर्यटक आते रहते हैं। यहां जिला पंचायत, पीडब्ल्यूडी और वन विभाग के गेस्ट हाउस हैं, लेकिन इस मेले के दौरान काफी संख्या में लोग आते हैं। इसलिए इस दौरान पर्यटक चम्पावत और देवीधुरा से 44 किलोमीटर की दूरी पर स्थित लोहाघाट में भी ठहर सकते हैं।
 
http://www.livehindustan.com/news/lifestyle/lifestylenews/50-50-132433.html

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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  यहां योद्धा पत्थरों से युद्ध करते हैं..लेकिन कोई नहीं मरता   
देवीधुरा. उत्तराखंड के देवीधुरा में रक्षाबंधन के अवसर पर वर्षों से अनोखा पत्थर युद्ध होता है। इस बार मंगलवार को होने वाले इस आयोजन के लिए वहां आसपास के इलाकों के लोगों की भीड़ एकत्नित हो गई है।

चम्पावत जिले में देवीधुरा में बाराही देवी मंदिर परिसर में प्रति वर्ष रक्षाबंधन के दिन खेले जाने वाले युद्ध में घायल होने वाले श्रद्धालु को ऐसी ज्वलनशील जहरीली घास लगाकर ठीक किया जाता है जिसे आम आदमी के छूने भर से शरीर में उठने वाली व्यापक खुजली से मौत भी हो सकती है।

साढ़े छह हजार फुट ऊंचाई पर स्थित मंदिर परिसर में होने वाले इस अनूठे आयोजन में कितनी भी बड़ी आयु का व्यक्ति भाग ले सकता है लेकिन उसमें नाबालिग भाग नहीं ले सकते। पत्थरों के वजन की कोई बंदिश नहीं होती अर्थात योद्धा कितना भी भारी पत्थर उठा करके एक दूसरे को मार सकते हैं।

बाराही देवी मंदिर समिति के संरक्षक लक्ष्मण सिंह लमगड़िया ने बताया कि 15 दिवसीय मेले में गत वर्ष पांच लाख लोगों ने हिस्सा लिया था। स्थानीय भाषा में बग्वाल कहे जाने वाली इस ऐतिहासिक परम्परा में अनेक बार भाग ले चुके 85 वर्षीय एक 'योद्धा' के अनुसार इस खतरनाक युद्ध में किसी की कभी भी मौत नहीं हुई। हालांकि कम से कम चार-पांच दर्जन योद्धा इसमें घायल अवश्य होते हैं।

बरसात में विपरीत पर्वतीय भौगोलिक परिस्थितियों के बावजूद इसमें लोगों का हुजूम उमड़ता है। इसमें भाग लेने वाला योद्धा एक माह पूर्व से ही सात्विक जीवन व्यतीत करता है। युद्ध से पूर्व लोग अपने घरों को दीवाली की तरह सजाते हैं। बिना दुश्मनी वाली इस अनोखी लड़ाई में दो विपरीत दिशाओं में मोर्चा संभालने वाले चार खामों के सैकड़ों योद्धा स्वयं का बचाव बांस से बनी फरों की ढाल से करते हैं।

एक किवदंती के अनुसार देवताओं के गणों को प्रसन्न करने हेतु उन्हें पहले प्रति वर्ष एक नर बलि दी जाती थी। सैकड़ों वर्ष पूर्व एक वृद्धा के एकमात्न पौत्न की बलि की बारी आने पर उसकी करुण पुकार
सुनकर बाराही देवी ने वृद्धा से कहा कि खोली ख्वाड़ के नाम से भी विख्यात देवीधुरा मंदिर परिसर में सात्विक भाव से एकत्न हुए ग्रामीणों द्वारा सामूहिक रुप से एक नरबलि के समान पत्थरों से रक्त इक्ट्ठा करने पर उसके पौत्न के बचने के साथ ही इस प्रथा का भी अंत हो जायेगा। तभी से यह परम्परा जारी है।
 
http://www.bhaskar.com/article/NAT-stone-war-fair-in-devidhura-on-24-august-1286955.html

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Every year on Raksha Vandhan.

Stone pelting fair held in Devi Dhura Temple.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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  देवीधुरा के पत्थर युद्ध में साक्षी बने एक लाख से अधिक लोग              Aug 25, 12:15 am               लोहाघाट (चंपावत)। मिसाइल युग में पत्थर युद्ध के लिए विश्वविख्यात ऐतिहासिक देवीधुरा का बग्वाल मेला देखने के लिए देश-विदेश से करीब एक लाख से अधिक लोग पहुंचे। 13 मिनट चले पत्थर युद्ध में करीब 150 से अधिक योद्धा घायल हुए तथा दर्शक दीर्घा में पत्थर आने के कारण एक दर्जन से अधिक दर्शक भी चोटिल हुए। परंपरा के मुताबिक मंदिर की गुफा में स्थित शक्ति की परिक्रमा व पूजा अर्चना के बाद दूबचौड़ मैदान की पांच बार परिक्रमा पूरी कर रण बांकुरे पत्थर युद्ध के लिए तैयार हुए।
ढोल नगाड़ों के बीच बग्वाल खेलने आए जत्थों के पीछे महिलाओं ने भी बढ़-चढ़ कर सहभागिता करते हुए देव स्तुति व वीर रस एवं श्रृंगार रस पर आधारित गीता का गायन करते हुए बग्वाल खेलने वाले योद्धाओं का उत्साहवर्धन किया। इस बार सबसे पहले वालिक खाम बद्री सिंह बिष्ट के नेतृत्व में मैदान में पहुंचा। उसके बाद लमगड़िया खाम वीरेन्द्र सिंह व लक्ष्मण सिंह लमगड़िया के नेतृत्व में चमयाल खाम, फिर गंगा सिंह चम्याल व गिरीश सिंगवाल के नेतृत्व में और अंत में त्रिलोक सिंह बिष्ट के नेतृत्व में गहड़वाल खाम के लोग पूरे जोश खरोश के साथ मैदान में पहुंचे। चारों खामों द्वारा अपने-अपने स्थानों पर मोर्चा जमाने के बाद अपराह्न 2:51 बजे मंदिर से पुजारी के शंखनाद के साथ ही ऐतिहासिक बग्वाल शुरू हो गया। देखते ही देखते मैदान में चारों ओर से पत्थरों की बौछार होने लगी। दो दलों में विभक्त बग्वाल खेलने वाले रणबांकुरों के पत्थर आसमान में इस तरह दिख रहे थे मानो कोई पुष्प वर्षा हो रही हो। 3 बजकर 04 मिनट पर पुजारी धर्मानन्द ने बग्वाल रोकने की घोषणा की लेकिन रणबांकुरों में इतना उत्साह था कि युद्ध विराम की घोषणा के बाद भी 3 मिनट तक बग्वाल चलता रहा। पत्थर युद्ध में लगभग 150 लोग घायल हुए। घायलों के सिर, हाथ, पांव खून से लथपथ थे, लेकिन उनके चेहरों पर दर्द के कोई भाव नहीं दिख रहे थे। दर्शक दीर्घा में बैठे एक दर्जन से अधिक लोग भी पत्थर लग जाने से घायल हुए। बग्वाल खत्म होने के बाद चारों खामों के लोग आपस में गले मिले। एक-दूसरे की कुशल पूछी और मां बाराही की जय-जयकार की। इस वर्ष बग्वाल में चम्याल और गहड़वाल खाम के सबसे अधिक लोग घायल हुए। विपरीत मौसम के बावजूद देश-विदेश के कोने-कोने से आज लगभग एक लाख से अधिक लोग यहां पहुंचे हुए थे।
 
http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttranchal/4_5_6672304.html


नवीन जोशी

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[justify]देवीधूरा की बग्वाल: जहाँ लोक हित में पत्थरों से अपना लहू बहाते हैं लोग


कहा जाता है कि जब पृथ्वी पर मानव सभ्यता की शुरुआत हुई तो तत्कालीन आदि मानव के हाथ में एकमात्र वास्तु 'पाषाण' यानी पत्थर था, तभी उस युग को पाषाण युग कहा गया। पत्थर से ही आदि मानव ने घिसकर नुकीले औजार बनाये, उदर की आग को बुझाने के लिए जानवर मारे और पत्थरों को ही घिसकर आग जलाई और पका हुआ भोजन खाया, बाद में पत्थर से ही गोल पहिये बनाए और जानवरों पर सवारी गांठकर खुद को ब्रह्मा की बनाई दुनियां का सबसे बुद्धिमान शाहकार साबित किया। आज जहाँ एक ओर अपनी तरक्की से हमेशा असंतुष्ट रहने वाला मानव पृथ्वी से भी ऊँचा उठकर चाँद  व मंगल तक पहुँच गया है, वहीँ दूसरी ओर वही मानव आज भी मानो उसी पाषाण युग में पत्थरों को थामे हुए भी जी रहा है। जातीय व धार्मिक दंगो से कहीं दूर देवत्व की धरती देवभूमि उत्तराखंड के देवीधूरा नामक स्थान पर, वह अपने ही भाइयों पर पत्थर मारता है, पर खुशी उसे उनका लहू बहाने से अधिक उनके पत्थरों से अपना लहू बहने पर होती है। वर्ष में कुछ मिनटों के लिए यहाँ होने वाले पत्थर युद्ध में लोक-लाभ की भावना से लोग अपने थोड़े-थोड़े रक्त का योगदान देते हुए पूरे एक मनुष्य के बराबर रक्त बहाते हैं। लेकिन वर्षों से चली आ रही इस परंपरा ने आज तक किसी की जान नहीं ली है, वरन किसी की जान ही बचाई है। यह मौका है जब सवाल-जबाबों से परे होने वाली आस्था के बिना भी अपनी जड़ों और अतीत को समझने का प्रयास किया जा सकता है।

यूँ उत्तराखंड के कुमाऊं अंचल में यह लोकोक्ति प्रसिद्ध है, "नौ नौर्त, दस दशैं, बिस बग्वाल, ये कुमू फुलि भंग्वाल, हिट कुमय्या माल..।" अर्थात शारदीय नवरात्रि व विजयादशमी के बाद भैया दूज को बीस स्थानों पर बग्वाल खेलकर कुमाऊंवासी माल प्रवास में चले जाते थे। लेकिन अब केवल देवीधूरा में ही बग्वाल खेली जाती है। देवीधुरा यानी "देवी के वन" नाम का छोटा सा कश्बा उत्तराखंड के चंपावत ज़िले में कुमाऊं मंडल के तीन जिलों अल्मोडा, नैनीताल और चंपावत की सीमा पर समद्रतल से लगभग 2,400 मीटर (लगभग 6,500 फिट) की ऊंचाई पर लोहाघाट से 45 किमी तथा चम्पावत से 61 किमी की दूरी पर स्थित है । यहाँ ऐतिहासिक, आध्यात्मिक और नैसर्गिक सौंदर्य की त्रिवेणी के रूप में मां बाराही देवी का मंदिर स्थित है, जिसे शक्तिपीठ की मान्यता प्राप्त है। कहा जाता है कि चंद राजाओं ने अपने शासन काल में इस सिद्ध पीठ में चम्पा देवी और महाकाली की स्थापना की थी। महाकाली को महर और फर्त्याल जाति के लोगों द्वारा बारी-बारी से प्रतिवर्ष नियमित रुप से नरबलि दी जाती थी। बताया जाता है कि रुहेलों के आक्रमण के दौरान कत्यूरी राजाओं द्वारा मां बाराही की मूर्ति को घने जंगल के मध्य एक भवन में स्थापित कर दिया गया था। धीरे-धीरे इसके चारों ओर गांव स्थापित हो गये और यह मंदिर लोगों की आस्था का केन्द्र बन गया। इस स्थान का महाभारतकालीन इतिहास भी बताया जाता है, कहते हैं कि यहाँ पहाड़ी के छोर पर खेल-खेल में भीम ने शिलायें फेंकी थी। ग्रेनाइट की इन विशाल शिलाओं में से दो आज भी मन्दिर के निकट मौजूद हैं। इनमें से एक को राम शिला कहा जाता है। जन श्रुति है कि यहां पर पाण्डवों ने जुआ खेला था, दूसरी शिला पर हाथों के भी निशान हैं। निकट ही स्थित भीमताल और हिडिम्बा मंदिर भी इस मान्यता की पुष्टि करते हैं। वैसे अन्य इतिहासकर इस परंपरा को आठवीं-नवीं सदी का तथा कुछ खस जाति से भी सम्बिन्धित मानते हैं । दूसरी ओर पौराणिक कथाओं के अनुसार जब राक्षक्षराज हिरणाक्ष व अधर्मराज पृथ्वी को अपहरण कर पाताल लोक ले गए, तब पृथ्वी की करुण पुकार सुनकर भगवान विष्णु ने बाराह यानी सूकर का रूप धारण कर पृथ्वी को बचाया, और उसे अपनी बांयी ओर धारण किया। तभी से पृथ्वी वैष्णवी बाराही कहलायी गईं ।कहा जाता हैं कि तभी से मां वैष्णवी बाराही आदिकाल से गुफा गह्वरों में भक्तों की मनोकामना पूर्ण करती आ रही हैं। इन्हीं मां बाराही की पवित्र भूमि पर उल्लास, वैभव एवं उमंग से भरपूर सावन के महीने में जब हरीतिमा की सादी ओढ़ प्रकृति स्वयं पर इठलाने लगती हैं, आकाश में मेघ गरजते हैं, दामिनी दमकती है और धरती पर नदियां एवं झरने नव जीवन के संगीत की स्वर लहरियां गुंजा देते हैं, बरसात की फुहारें प्राणिमात्र में नव स्पंदन भर देती हैं तथा खेत और वनों में हरियाली लहलहा उठती है। ऐसे परिवेश में देवीधूरा में प्राचीनकाल से भाई-बहन के पवित्र प्रेम के पर्व रक्षाबंधन से कृष्ण जन्माटष्मी तक आषाड़ी कौतिक (मेला) मनाया जाता है, वर्तमान में इसे बग्वाल मेले के नाम से अधिक प्रसिद्धि प्राप्त है। कौतिक के दौरान श्रावणी पूर्णिमा को ‘पाषाण युद्ध’ का उत्सव मनाया जाता है। एक-दूसरे पर पत्थर बरसाती वीरों की टोलियां,  वीरों की जयकार और वीर रस के गीतों से गूंजता वातावरण, हवा में तैरते पत्थर ही पत्थर और उनकी मार से बचने के लिये हाथों में बांस के फर्रे लिये युद्ध करते वीर। सब चाहते हैं कि उनकी टोली जीते, लेकिन साथ ही जिसका जितना खून बहता है वो उतना ही ख़ुशक़िस्मत भी समझा जाता है. इसका मतलब होता है कि देवी ने उनकी पूजा स्वीकार कर ली। आस-पास के पेड़ों, पहाड़ों औऱ घर की छतों से हजारों लोग सांस रोके पाषाण युद्ध के इस रोमांचकारी दृश्य को देखते हैं। कभी कोई पत्थर की चोट से घायल हो जाता है तो तुरंत उसे पास ही बने स्वास्थ्य शिविर में ले जाया जाता है। युद्धभूमि में खून बहने लगता है, लेकिन यह सिलसिला थमता नहीं। साल-दर-साल चलता रहता है, हर साल हजारों लोग दूर-दूर से इस उत्सव में शामिल होने आते हैं। आस-पास के गांवों में हफ़्तों पहले से इसमें भाग लेने के लिये वीरों और उनके मुखिया का चुनाव शुरू हो जाता है. अपने-अपने पत्थर और बांस की ढालें तैयार कर लोग इसकी बाट जोहने लगते हैं।
बग्वाल यानी पाषाण युद्ध की यह परंपरा हजारों साल से देवीधूरा में चली आ रही है। पौराणिक कथाओं के अनुसार यह स्थान गुह्य काली की उपासना का केन्द्र था, सघन व्न में बावन हजार वीर और चौंसठ योगनियों का आतंक था, उन्हें प्रसन्न करने के लिये नरबलि की प्रथा थी। देवीधूरा के आस-पास वालिक, लमगड़िया, चम्याल और गहड़वाल खामों (ग्रामवासियों का समूह, जिनमें महर और फर्त्याल जाति के लोग ही अधिक होते हैं) के लोग रहते थे, इन्हीं खामों में से प्रत्येक वर्ष एक व्यक्ति की बारी-बारी से बलि दी जाती थी। एक बार चम्याल खाम की एक ऐसी वृद्धा के पौत्र की बारी आई, जो अपने वंश में इकलौता था। अपने कुल के इकलौते वंशज को बचाने के लिये वृद्धा ने देवी की आराधना की तो देवी ने वृद्धा से अपने गणों को खुश करने के लिये कहा। वृद्धा को इस संकट से उबारने के लिये चारों खामों के लोगों ने इकट्ठे होकर युक्ति निकाली कि एक मनुष्य की जान देने से बेहतर है कि आपस में पाषाण युद्ध “बग्वाल” लड़ (खेल) कर एक मानव के बराबर रक्त देवी व उसके गणों को चड़ा दिया जाए। इस तरह नर बलि की कुप्रथा भी बंद हो गयी। तभी से बग्वाल का एक निश्चित विधान के साथ लड़ी नहीं वरन खेली जाती है । मेले के पूजन अर्चन के कार्यक्रम यद्यपि आषाड़ी कौतिक के रुप में लगभग एक माह तक चलते हैं लेकिन विशेष रुप से श्रावण माह की शुक्लपक्ष की एकादशी से प्रारम्भ होकर भाद्रपद कृष्ण पक्ष की द्वितीया तक परम्परागत पूजन होता है । श्रावण शुक्ल एकादशी के दिन चारों खामो के लोगों द्वारा सामूहिक पूजा-अर्चना, मंगलाचरण, स्वस्तिवान, सिंहासन-डोला पूजन और सांगी पूजन विशिष्ट प्रक्रिया के साथ किये जाते हैं। इस बीच अठ्वार का पूजन भी होता है, जिसमें सात बकरों और एक भैंसे का बलिदान दिया जाता है।  पूर्णमासी के दिन चारों खामों व सात तोकों के प्रधान आत्मीयता, प्रतिद्वन्द्विता व शौर्य के साथ बाराही देवी के मंदिर में एकत्र होते हैं, जहां पुजारी सामूहिक पूजा करवाते हैं । बग्वाल खेलने वाले बीरों (स्थानीय भाषा में द्योंकों) को घरों से महिलाएँ आरती उतार, आशीर्वचन और तिलक-चंदन लगाकर व हाथ में पत्थर देकर ढोल-नगाड़ों के साथ बग्वाल के लिए भेजती हैं। द्योंके युद्ध से पहले एक महीने तक संयम तथा सदाचार का पालन करते हैं, और सात्विक भोजन करते हैं।पूजा के बाद पाषाण युद्ध में भाग लेने वाले चारों खामों के योद्धाओं की टोलियाँ अपने घरों से परम्परागत वेश-भूषा में सुसज्जित होकर ढोल, नगाड़ो के साथ सिर पर कपड़ा बाँध, हाथों में लट्ठ तथा फूलों से सजे व रिंगाल की बनी हुई छन्तोली कही जाने वाली छतरियों (फर्रों) के साथ धोती-कुर्ता या पायजामा पहन व कपड़े से मुंह ढंक कर अपने-अपने गाँवों से भारी उल्लास के साथ देवी मंदिर के प्रांगण दुर्वाचौड़ मैदान में पहुँचती  हैं, और दो टीमों के रुप में मैदान में बंट जाती हैं। सर्वप्रथम मंदिर की परिक्रमा की जाती है। इसमें बच्चे, बूढ़े, जवान सभी बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते हैं । सबका मार्ग पहले से ही निर्धारित होता है । मैदान में पहुचने का स्थान व दिशा हर खाम की अलग होती है । उत्तर की ओर से लमगड़िया, दक्षिण की ओर से चम्याल, पश्चिम की ओर से वालिक और पूर्व की ओर से गहड़वाल खोलीखाण दूर्वाचौड़ मैदान में आते हैं । दोपहर तक चारों खाम देवी के मंदिर के उत्तरी द्वार से प्रवेश करती हुई परिक्रमा करके मंदिर के दक्षिण-पश्चिम द्वार से बाहर निकलते हैं, और देवी के मंदिर और बाजार के बीच के खुले दूर्वाचौड़ मैदान में दो दलों में विभक्त होकर अपना स्थान घेरने लगते हैं । दोपहर में जब मैदान के चारों ओर आस्था का सैलाब उमड़ पड़ता है, तब एक निश्चित समय पर मंदिर के पुजारी बग्वाल प्रारम्भ होने की घोषणा करते हैं। इसके साथ ही खामों के प्रमुखों की अगुवाई में पत्थरों की वर्षा दोनों ओर से प्रारम्भ हो जाती है। ढोल का स्वर ऊँचा होता चला जाता है, छन्तोली से रक्षा करते हुए दूसरे दल पर पत्थर फेंके जाते हैं। धीरे-धीरे बग्वाली एक दूसरे पर प्रहार करते हुए मैदान के बीचों बीच बने ओड़ (सीमा रेखा) तक पहुँचने का प्रयास करते हैं। फर्रों की मजबूत रक्षा दीवार बनायी जाती है। जिसकी आड़ से वे प्रतिद्वन्दी दल पर पत्थरों की वर्षा करते हैं। पुजारी को जब अंत:करण से विश्वास हो जाता है कि एक मानव के रक्त के बराबर खून बह गया होगा तब वह ताँबें के छत्र और चँवर के साथ मैदान में आकर बग्वाल सम्पन्न होने की घोषणा शंखनाद से करते हैं। तब एक दूसरे के प्रति आत्मीयता प्रदर्शित कर आपस में गले मिल, अपने क्षेत्र की समृद्धि की कामना करते हुए द्योंके धीरे-धीरे मैदान से बिदा होते हैं। श्रद्धालुओं में प्रसाद वितरण किया जाता है। इसके बाद भी मंदिर में पूजार्चन चलता रहता है। देवी की पूजा का दायित्व विभिन्न जातियों का होता है। फुलारा कोट के फुलारा जानी के लोग मंदिर में पुष्पों की व्यवस्था करते हैं । मनटांडे और ढोलीगाँव के ब्राह्मण श्रावण की एकादशी के अतिरिक्त सभी पर्वों पर पूजन करवा सकते हैं । भैंसिरगाँव के गहढ़वाल राजपूत बलि के भैंसों पर पहला प्रहार करते हैं। लोक विश्वास है कि क्रम से महर और फर्त्याल जातियों द्वारा चंद शासन तक यहाँ श्रावणी पूर्णिमा को प्रतिवर्ष नर बलि दी जाती थी। कहा जाता है कि पहले जो बग्वाल आयोजित होती थी उसमें फर्रों का प्रयोग नहीं किया जाता था, परन्तु सन् 1945 के बाद से फर्रे प्रयोग किये जाने लगे। बगवाल में आज भी निशाना बनाकर पत्थर मारना निषेध है । रात्रि में मंदिर में देवी जागरण होता है।[/color]
[/color]खोलीखांड-दूर्वाचौड़ मैदान के सामने बने मंदिर की ऊपरी मंजिल में तांबे की पेटी में मां बाराही, मां सरस्वती और मां महाकाली की मूर्तियां हैं। ऐसा माना जाता है कि खुली आंखों से इन मूर्तियों को आज तक किसी ने नहीं देखा है। मां बाराही की मूर्ति कैसी और किस धातु की है यह आज भी रहस्य है। कहा जाता है कि मूर्तियों को खुली आंखों से देखने नेत्र की ज्योति चली जाती है। इसलिए मूर्तियों को स्नान कराते समय पुजारी भी आंखों पर काली पट्टी बांधे रहते हैं। इन मूर्तियों की रक्षा का भार लमगड़िया खाम के प्रमुख को सौंपा जाता है, जिनके पूर्वजों ने पूर्व में रोहिलों के हाथ से देवी विग्रह को बचाने में अपूर्व वीरता दिखाई थी। गहढ़वाल प्रमुख श्री गुरु पद से पूजन प्रारम्भ करते है।
श्रावणी पूर्णिमा के दूसरे दिन बक्से में रखे देवी विग्रह की डोले के रुप में शोभा यात्रा भी सम्पन्न होती है। भक्तजनों की जय-जयकार के बीच डोला देवी मंदिर के प्रांगण में रखा जाता है। चारों खाम के मुखिया पूजन सम्पन्न करवाते हैं। कई लोग देवी को बकरे के अतिरिक्त अठ्वार-सात बकरे तथा एक भैंस की बलि भी अर्पित करते हैं।

हेम पन्त

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देवीधूरा के मन्दिर में आषाड़ी देवी प्रतिस्थापित हैं.. यह मशहूर मेला उन्हीं को समर्पित है, इसलिये इस मेले को आषाड़ी कौतिक के नाम से भी जाना जाता है...

Risky Pathak

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Varahi Devi Temple DeviDhura
« Reply #29 on: March 13, 2011, 09:52:11 AM »

 

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