Author Topic: Famous Shiv Temples In Uttarakhand - उत्तराखंड मे महादेव के प्रसिद्ध मन्दिर  (Read 83533 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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ग्राम ढि़कुली रामनगर [नैनीताल]-महाभारत काल का प्राचीन शिव मंदिर
 
 
 दर्शनमात्र से पूरी होती हैं मुरादे
 
 रामनगर [नैनीताल]। महाभारत काल के पौराणिक शिव मंदिर में दर्शन करने मात्र से ही मन की सारी मुरादे पूर्ण हो जाया करती है। ग्राम ढि़कुली जो कभी महाभारत के समय में विराटनगरी के नाम से जानी जाती थी। उसके पश्चिम की ओर पहाडि़यों पर पांडवों द्वारा बनाया गया प्राचीन शिव मंदिर आज भी विराजमान है।
 किदवंती है कि इस शिवमंदिर में शिवलिंग की स्थापना पांडव पुत्र भीम ने की थी। मंदिर के आसपास खुदाई के दौरान क्षेत्रीय ग्रामीणों को कई बार पांडव काल की कलाकृतियां मिली। जिन्हें कुछ लोगों ने सहेज कर अपने घरों में रखा गया है। पुरातत्व विभाग की उपेक्षा के कारण पर्यटन के मानचित्र में इस प्राचीन शिव मंदिर का उल्लेख नहीं हो पाने से यह मंदिर आज भी उत्तराखंड की यात्रा में आने वाले श्रद्धालुओं की नजरों में नहीं आ पाया। अन्यथा यह मंदिर लोकप्रियता के नए आयाम स्थापित कर सकता था

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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ऋषिकेश नीलकंठ महादेव मंदिर
 
 गढ़वाल, उत्तरांचल में हिमालय पर्वतों के तल में बसा ऋषिकेश में नीलकंठ महादेव मंदिर प्रमुख पर्यटन स्थल है। नीलकंठ महादेव मंदिर ऋषिकेश के सबसे पूज्य मंदिरों में से एक है। कहा जाता है कि भगवान शिव ने इसी स्थान पर समुद्र मंथन से निकला विष ग्रहण किया गया था। उसी समय उनकी पत्नी, पार्वती ने उनका गला दबाया जिससे कि विष उनके पेट तक नहीं पहुंचे। इस तरह, विष उनके गले में बना रहा। विषपान के बाद विष के प्रभाव से उनका गला नीला पड़ गया था। गला नीला पड़ने के कारण ही उन्हें नीलकंठ नाम से जाना गया था। अत्यन्त प्रभावशाली यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। मंदिर परिसर में पानी का एक झरना है जहाँ भक्तगण मंदिर के दर्शन करने से पहले स्नान करते हैं।
 
 प्रचलित कथाएं
 ऋषिकेश से संबंधित अनेक धार्मिक कथाएं प्रचलित हैं। कहा जाता है कि समुद्र मंथन के दौरान निकला विष शिव ने इसी स्थान पर पिया था। विष पीने के बाद उनका गला नीला पड़ गया और उन्हें नीलकंठ के नाम से जाना गया। एक अन्य अनुश्रूति के अनुसार भगवान राम ने वनवास के दौरान यहां के जंगलों में अपना समय व्यतीत किया था। रस्सी से बना लक्ष्मण झूला इसका प्रमाण माना जाता है। 1939 ई. में लक्ष्मण झूले का पुनर्निर्माण किया गया। यह भी कहा जाता है कि ऋषि राभ्या ने यहां ईश्वर के दर्शन के लिए कठोर तपस्या की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान ऋषिकेश के अवतार में प्रकट हुए। तब से इस स्थान को ऋषिकेश नाम से जाना जाता है।
 
 हिमालय का प्रवेश द्वार, ऋषिकेश जहां पहुंचकर गंगा पर्वतमालाओं को पीछे छोड़ समतल धरातल की तरफ आगे बढ़ जाती है। हरिद्वार से मात्र 24 किलोमीटर की दूरी पर स्थित ऋषिकेश विश्व प्रसिद्ध एक योग केंद्र है। ऋषिकेश का शांत वातावरण कई विख्यात आश्रमों का घर है।उत्तराखण्ड में समुद्र तल से 1360 फीट की ऊंचाई पर स्थित ऋषिकेश भारत के सबसे पवित्र तीर्थस्थलों में एक है। हिमालय की निचली पहाड़ियों और प्राकृतिक सुन्दरता से घिरे इस धार्मिक स्थान से बहती गंगा नदी इसे अतुल्य बनाती है। ऋषिकेश को केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री का प्रवेशद्वार माना जाता है। कहा जाता है कि इस स्थान पर ध्यान लगाने से मोक्ष प्राप्त होता है। हर साल यहां के आश्रमों के बड़ी संख्या में तीर्थयात्री ध्यान लगाने और मन की शान्ति के लिए आते हैं। विदेशी पर्यटक भी यहां आध्यात्मिक सुख की चाह में नियमित रूप से आते रहते हैं।

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बगोट चुगलैर2 hours ago
गडवाल सतपुली में उडद की दाल का आज के युग का पहला मंदिर.... जय वेंतेश्वर महादेव...

विनोद सिंह गढ़िया

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वृद्ध केदार के रूप में ख्याति प्राप्त महादेव मंदिर

रामगंगा और विनोद नदी के पावन संगम से करीब 100 मीटर की दूरी पर स्थित भोलेनाथ का मंदिर वृद्ध केदार के नाम से प्रसिद्ध है। मंदिर में शिवजी की धड़ रूप में पूजा की जाती है। क्षेत्र के लोगों के अपार श्रद्धा का केंद्र इस मंदिर को चंदवंशीय राजा रुद्रचंद ने अपने शासनकाल में भव्य रूप दिया था। मंदिर में महाशिवरात्रि पर्व के अलावा काली चतुर्दशी तथा पूर्णमासी के मौके पर क्षेत्र का सुप्रसिद्ध मेला लगता है। लोगों का विश्वास है कि भोलनाथ को जो भी श्रद्धालु 108 लोटा जल अर्पित करता है। महादेव उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी कर देते हैं।
पाषाणकाल में बने इस ऐतिहासिक मंदिर के बारे में अनेक मान्यताएं हैं। पहले मंदिर छोटा था। वर्ष 1480 में राजा रूद्रचंद ने मंदिर को भव्य रूप दिया। मंदिर के भीतर भोलेनाथ माता पार्वती के साथ विराजमान रहते हैं। विशाल शिलाखंड को भगवान शंकर के धड़ के रूप में पूजा होती है। मंदिर में मौजूद ताम्रपत्र के अनुसार राजा रूद्र चंद ने डुंगरियाल जाति के लोगों को पुजारी जबकि मनराल जाति के लोगों को मंदिर की व्यवस्था की जिम्मेदारी दी है। मंदिर में जलार्पण के साथ ही मनौती पूरी होने पर लोग घंटियां तथा शंख चढ़ाने के अलावा भंडारा भी आयोजित करते हैं।

साभार : अमर उजाला
 

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Itleshwar (Almora) Jalali

This is a very old temple consisting of a large Shiv-Ling. The temple is situated up the hill; a river flows below it. Some vessels from the Mahabharta era have been discovered near the temple. A special gathering of people is observed on the occasion of Maha Shivaratri.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Billeshwar Mahadev
Shiv Temple (jalali Almora)

This is another holy place in Jalali. A famous Shiv temple is situated here in Talli Jalali. The style of the construction of this temple resembles the Shiv temple in Kathmandu, Nepal. 

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Moteshwar Mahadev

Shree Moteshwar Mahadev, also known as Shree Bheem Shankar Mahadev, is an abobe of Lord Shiva in Kashipur. This place was known as the Dakini State in ancient days.

Kashipur (Govishn) is a historic place in Nainital district. Around 1 km away is a place known as Ujjanak. This is where Lord Shiva is situated in his full face as a Jyotirlingam known as Bheem Shankar. This is the Bheem Shankar Jyotirlingam.

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मुख से होते हैं शिव के दर्शन

जागरण प्रतिनिधि, गोपेश्वर: दुनियां में भगवान शिव के मुख से दो ही स्थानों पर दर्शन होते हैं। इनमें भारत में उत्ताराखंड के चमोली जिले के रुद्रनाथ और नेपाल में पशुपतिनाथ शामिल हैं।

उत्ताराखंड में चमोली जिले में रुद्रनाथ समुद्र तल से ऊंचाई 2286 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यह मंदिर पांडवों ने बनाया है। यहां भगवान शिव का मुखमंडल एक गुफा के अंदर है। पवित्र गुफा के अंदर ही भगवान की पूजा अर्चना की जाती है। छ: माह तक रुद्रनाथ तो छ: माह तक गोपेश्वर के गोपीनाथ मंदिर में भगवान रुद्रनाथ के दर्शन किए जा सकते हैं। इस वर्ष 23 मई को श्री रुद्रनाथ के कपाट खुलने हैं।

यह है महात्म्य

पौराणिक कथाओं के अनुसार जब पांडवों पर गो हत्या का पाप लगा था तो उससे छुटकारा पाने के लिए पांडव शिव की खोज में हिमालय पर्वत पर आ पहुंचे। चूंकि शिव पांडवों को अपने दर्शन नहीं देना चाहते थे। इसलिए उन्होंने सांड का रूप धारण कर दिया और धरती के अंदर चले गए। पांच स्थानों पर भगवान शिव ने पांडवों को अपने पांच भागों के दर्शन दिए। तब जाकर पांडव गो हत्या से मुक्त हो सके।

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ऐसे होते हैं शिव दर्शन

केदारनाथ-पृष्ठ भाग के दर्शन

तुंगनाथ-बांह के दर्शन

कल्पेश्वर-जटा के दर्शन

मद्महेश्वर- नाभि व पेट के दर्शन

रुद्रनाथ-मुख के दर्शन

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ऐसे पहुंचे

जिला मुख्यालय गोपेश्वर से चार किलोमीटर दूर सगर गांव तक वाहन से पहुंचा जा सकता है। सगर गांव से 21 किलोमीटर की पैदल दूरी पर स्थित है रुद्रनाथ मंदिर।

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ठहरने की व्यवस्था

-ठहरने के लिए रुद्रनाथ में मंदिर समिति की धर्मशालाएं हैं। जो यात्री जल्दी भगवान के दर्शन कर देते हैं वे पनार बुग्याल, ल्यूती बुग्याल, सगर या गोपेश्वर में ठहरने के लिए आ सकते हैं।

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नजदीकी स्थल

-रुद्रनाथ दर्शनों के बाद सूर्य कुंड, चंद्र कुंड, तारा कुंड, मानस कुंड के भी श्रद्धालु दर्शन करते हैं। रुद्रनाथ से पुत्रदायिनी मां अनसूया मंदिर भी जा सकते हैं। इसके अलावा सगर में प्रसिद्ध सकेश्वर मंदिर के दर्शन करना भी रुद्रनाथ जाने वाले श्रद्धालु नहीं भूलते।

http://www.jagran.com/uttarakhand/chamoli-10415988.html

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टपकेश्वर: जहां तन के साथ मन भी हो गदगद

कुदरत का करिश्मा कहिए या भोलेबाबा की महिमा, यहां रम जाने को मन करता है। चारों तरफ अप्रतिम हरियाली का संसार है। यहां आने वाले भक्त प्रकृति की शरण में आकर ईश्वर की अनुभूति को पूरी तरह महसूस करते हैं। टपकेश्वर मंदिर से जुड़ा पुराना विश्वास भक्त और भगवान के बीच के प्रेम को और भी बढ़ाता है।

टप-टप टपकती पानी की बूंदें शिवलिंग का जलाभिषेक कर रही हैं। कहते हैं, कभी इन पानी की बूंदों के स्थान पर दूध टपका करता था। शिवलिंग के ठीक ऊपर एक चमकता चांदी का छत्र है, जो चारों ओर से शिवलिंग को घेरे हुए है। दिन सोमवार का हो तो शिवभक्तों की संख्या अधिक हो जाती है। भक्तों की छोटी-सी थाली में भी बेल, भांग, धतूरा, धूप, अगरबत्ती, कलावा, केला, फूल आदि के साथ नारियल होते हैं। यहां शिवलिंग का दर्शन करके भक्ति में भावमग्न हुए कई भक्त एकटक उसे निहारते रहते हैं। भक्तिलीन होकर भक्तों के आंखों से निर्झर जलधारा बह निकलती है। नव दंपती से लेकर बच्चे, बूढ़े और युवा सभी बाबा के दर्शन को आतुर दिखते हैं।  फर्श पर घी-तेल बिखरे होने से कुछ फिसलन भी है, मगर इसकी परवाह किसे है, भक्त तो सिर्फ शिवलिंग की एक झलक पाना चाहते हैं। हम इस वक्त देहरादून, उत्तराखंड में स्थित टपकेश्वर महादेव मंदिर में हैं। यह एक स्वयंभू लिंग है। यह मंदिर प्राकृतिक गुफाओं के भीतर है। गुफा में चट्टानों ने जगह-जगह थन का रूप ले रखा है। मंदिर परिसर से पहले जब आप मुख्य द्वार पर पहुंचते हैं तो आपके बाईं ओर राधाकृष्ण मंदिर है। सामने मंदिर के लिए रास्ता व दाईं ओर हर सिद्ध दुर्गामाता मंदिर है। मंदिर के मुख्य द्वार में एक खास बात यह भी है कि वहां पीपल और बरगद एक साथ जुड़े हुए हैं, जिनकी शाखाएं द्वार के ठीक ऊपर आई हुई हैं। इन वृक्षों की जड़ पर शनि देव का मंदिर है। मान्यता यह है कि यहां नि:संतान महिलाएं पूजा-अर्चना करें तो उनकी मनोकामना पूर्ण होती है। करीब 80 सीढियां उतरने के बाद आपके बाईं ओर श्री टपकेश्वर महादेव का प्रवेश द्वार तो बाईं ओर टौंस नदी की ओर उतरती सीढियां नजर आएंगी। दरअसल यह मंदिर इसी नदी के किनारे स्थित है। कुछ आगे बढ़ने के बाद गणेश मूर्ति को देखते हुए शिवलिंग के दर्शन होते हैं। दरअसल शिवलिंग का सिर्फ ऊपरी हिस्सा ही दिखाई देता है, बाकी ढका हुआ है। करीब 3 फुट की ऊंचाई पर एक सफेद वस्त्र पहने पुजारी है, जो भक्तों के भाल पर चंदन का तिलक लगा रहे हैं। यहां के महंत भरत गिरि ने बताया कि पूर्वकाल में इन्हीं गुफाओं में देवता और षियों ने तपस्या की। गुरु द्रोणाचार्य ने तो यहां 12 वर्ष तपस्या कर महादेव को प्रसन्न किया और उन्हीं से धनुर्विद्या भी ग्रहण की। भगवान भोलेनाथ ने अस्त्र-शस्त्र भी दिए। द्रोणाचार्य परिवार समेत यहीं रहा करते थे। यहां द्रोणचार्य को पुत्र के रूप में अश्वत्थामा की भी प्राप्ति हुई। दूध की इच्छा होते हुए भी अश्वत्थामा इससे वंचित रहे, क्योंकि माता कृपी उन्हें दूध पिलाने में असमर्थ थीं। अश्वत्थामा ने शिव की कठोर तपस्या की। यकायक पूर्णमासी के दिन गुफा ने ही थन का रूप ले लिया। शिव की कृपा से गुफा में दुग्धधारा बहने लगी। कहा जाता है कि दुग्ध धारा यूं बहती रहती, लेकिन कलियुग आते-आते यह धारा पानी में बदल गई। मुख्य मंदिर से निकल कर एक छोटे से पुल से नदी पार कर आप वैष्णो देवी की गुफा के मुख्य द्वार पर पहुंचते हैं। गुफा में प्रसाद दे रहे पुजारी पं. विपिन जोशी का कहना है कि यह एक प्राकृतिक गुफा है और यहां श्रद्धालु दूर-दूर से आते हैं। श्रीनगर गुफा से प्रवेश पर रोक रहती है तो यहां आने वाले कहते हैं कि उन्हें इस गुफा से भी वही अनुभूति होती है। इस मंदिर से कुछ नीचे उतर कर मां संतोषी का भव्य मंदिर है। यहां के पुजारी भवानी गिरि का कहना है कि एक दिन मां ने स्वप्न में उन्हें इस स्थान पर मंदिर बनाने की आज्ञा दी, लेकिन आर्थिक रूप से कमजोर होने के कारण मैं सिर्फ सोचता रहा कि कैसे बनेगा मां का मंदिर। एक दिन मधु अग्रवाल नाम की महिला यहां आईं और मुझसे कहने लगीं कि यहां मां का मंदिर नहीं, इसलिए मैं यह मूर्ति लाई हूं। और उसके बाद इस मूर्ति को स्थापित कर दिया गया। मंदिर में ही सप्तमुखी हनुमान की प्रतिमा है और साईंबाबा, कालीमाता, कालभैरव आदि की मूर्तियों से मंदिर अधिक भव्य दिखाई देता है। मंदिर से जुड़े कुछ खास तथ्य यह स्थान अश्वत्थामा की जन्मस्थली भी है।
 देवताओं को महादेव ने यहां देवेश्वर के रूप में दर्शन दिए।
 गुरु द्रोण ने यहां 12 वर्ष तक भोले शंकर की तपस्या की।
 यहीं भगवान शंकर ने भूमार्ग से प्रकट होकर दूधेश्वर के रूप में दर्शन दिए।
 गुफा के किनारे बह रही टौंस नदी को पूर्वकाल में देवधारा भी कहा जाता था। मंदिर में आयोजित प्रमुख पर्व
 महाशिवरात्रि

 इस पर्व पर यहां पांच दिन का मेला लगता है। मेले में हस्तलिपि का सामान, खिलौने, झूले और मनोरंजन का सामान उपलब्ध होता है। इन दिनों मंदिर की भव्यता देखते ही बनती है। चारो ओर ॐ नम: शिवाय, बोल बम और जय श्री टपकेश्वर महादेव के जयघोष से वातावरण शिवमय हो जाता है। श्रावण मास
 दूर-दूर से शिवभक्त कांवड़ लेकर यहां पहुंचते हैं। वे विशेष पूजा, रुद्राभिषेक व महामृत्युंजय जाप आदि करते हैं।

http://www.livehindustan.com

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उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित प्राचीन मंदिर गोपीनाथ मंदिर भगवान शिव को समर्पित भारत के प्रमुख धार्मिक स्थलों में से एक है. उत्तराखंड का यह मंदिर चारों धामों की यात्रा के दौरान देखा जा सकता है. गोपेश्वर आने वाला हर श्रद्धालु गोपीनाथ मंदिर जरूर जाता है. इस मंदिर में 24 द्वार हैं. हर द्वार गर्भगृह की ओर जाता है. धार्मिक मान्यता---गोपीनाथ को लेकर अनेक तरह की धार्मिक मान्यताएं जुड़ी हैं. पुराणों में उल्लेख मिलता है कि यह स्थल भगवान शिव की तप स्थली थी. यहां पर भोले बाबा ने कई बार वर्षों तप किया था. कहा जाता है कि भगवान शिव ने कामदेव को इसी स्थान पर भस्म कर दिया था.

यह अष्टधातु का बना हुआ है और इसे कोई हिला नहीं सका है. मान्यता है कि अगर कोई सच्चा शिव भक्त इसे छूता है तो इसमें कंपन होने लगता है. इस मंदिर में शिवलिंग, परशुरामजी, भैरवजी की प्रतिमाएं विराजमान हैं.


उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित प्राचीन मंदिर गोपीनाथ मंदिर भगवान शिव को समर्पित भारत के प्रमुख धार्मिक स्थलों में से एक है. उत्तराखंड का यह मंदिर चारों धामों की यात्रा के दौरान देखा जा सकता है. गोपेश्वर आने वाला हर श्रद्धालु गोपीनाथ मंदिर जरूर जाता है. इस मंदिर में 24 द्वार हैं. हर द्वार गर्भगृह की ओर जाता है. धार्मिक मान्यता---गोपीनाथ को लेकर अनेक तरह की धार्मिक मान्यताएं जुड़ी हैं. पुराणों में उल्लेख मिलता है कि यह स्थल भगवान शिव की तप स्थली थी. यहां पर भोले बाबा ने कई बार वर्षों तप किया था. कहा जाता है कि भगवान शिव ने कामदेव को इसी स्थान पर भस्म कर दिया था.

पौराणिक कथा---मान्यता है कि सती के देह त्याग के बाद जब भगवान शिव तप में लीन हो गए थे तो ताड़कासुर नामक राक्षस ने तीनों लोकों में आतंक मचा रखा था. कोई भी उसे हरा नहीं पा रहा था. कठिन तपस्या करने के बाद उसे वरदान मिला था कि वह शिव पुत्र द्वारा ही मारा जा सकता है.

पौराणिक कथा---मान्यता है कि सती के देह त्याग के बाद जब भगवान शिव तप में लीन हो गए थे तो ताड़कासुर नामक राक्षस ने तीनों लोकों में आतंक मचा रखा था. कोई भी उसे हरा नहीं पा रहा था. कठिन तपस्या करने के बाद उसे वरदान मिला था कि वह शिव पुत्र द्वारा ही मारा जा सकता है.

ब्रह्मा द्वारा यह बताने पर कि शिव पुत्र ही उसे मार सकता है, सभी देवताओं ने भगवान शिव की आराधना शुरू कर दी परंतु शिव अपनी तपस्या से नहीं उठे. इस पर इंद्र ने कामदेव को यह कार्य सौंपा जिससे भगवान शिव तपस्या समाप्त कर देवी पार्वती से विवाह कर लें और उनसे उत्पन्न होने वाला पुत्र ताड़कासुर का वध कर सके.

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