Author Topic: It Happens Only In Uttarakhand - यह केवल उत्तराखंड में होता है ?  (Read 33616 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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पौडी का मौरी मेला - जहाँ चलता है छः महीने तक पांडव नर्त्य (मडाण)
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                                 दैणा होया खोली का गणेशा,
                                  दैणा होया, मोरी का नारायणा !

यह मेला उत्तराखंड के पौडी जिले में बारह साल का बाद तमलाग गाव मे लगता है ! ग्राम तमलाग पट्टी गग्वाद्सियु मे यह जगह पड़ता है !

ग्राम तमलाग के भैरो मंदिर का अस्थित्व मौरी के जुदा हुवा है ! भैरो मंदिर के परागण में मौरी का मेला मनाया जाता है ! मौरी जुड़ा है सतयुग तथा महाभारत के पांडवो से, जो मंदिर के परागण में ६ महीनो तक डोळ दमो ताल पर नाचते थिरकते दिखाई देते है ! जिसमे भगवान् श्री कृष्ण ( नारायण), भैरवनाथ जी, हनुमान जी, कर्ण, भीब्रिक, अभिमुन्यु और पुत्र फुलेरी गोविन्द, कुंती (माता) द्रोपती, रुकमनी, रुपेणा और पॉँच पांडवो और गाव के कुल देवता तमाम लोगो के शरीर में प्रवेश करते है ! डोळ दमो की ताल पर ये देवता थिककते है !

छह माह तक चलने वाला इस मेले में कुंती माता का आहवान किया जाता है और उन्हें सम्मान के साथ उनके घर ले जाया जाता है !

हर बार साल में यह मेला जनवरी और जुलाई के बीच में मनाया जाता है !  बैशाकी के दिन लोग देवप्रयाग में अलकनंदा व भागीरथी में सनान के बाद कुण्डी पट्टी कन्वाल्सियु (जो की कुंती माता का मैयका भी है) दोपहर के भोजन के लिए रुकते है !

इस मेले का सबसे दर्शनीय दिवस होता है जब लोग डोळ दमो के साथ लोग सुमेरपुर जाते है हनुमान जी (तमलाग गाव से कुण्डी गाव) अलग -२ पेडो पर चढ़ जाते है तथा पेडो के हिलाने लगते है और पेड़ अपने आप जड़ से हिल हिलते -२ उखड जाते है ! जिसे देखना एक अवि समरनीय क्षण होता है ! उन दोनो पेडो बिना फिर कही रुके गाव में लाया जाता है और एक हफ्ते बाद नदी मे विसर्जित किया जाता है !

एक काले खाडू (भेड़) के बलि देने बाद मौरी मेले की समाप्ति की जाती है !


THE LAST FAIR HELD ON 06 JULY 2002 AND NEXT FAIR WILL HELD ON 06 JULY 2014.

Courtsey : Janam Bhoomi News Paper (Mumbai)

Mehata ju,
BHOT BHAL PRAYASH AND UNIQUE INFORMATION.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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यहां शान से होती है अंतिम विदाई
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पुरोला (उत्तरकाशी)। मानव जीवन में बच्चे के जन्म के बाद कई ऐसे मौके आते हैं, जब जश्न का माहौल बनता है, लेकिन जब किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है, तो वह अपने पीछे मातम मनाते परिजनों, रिश्तेदारों को छोड़ जाता है। सामान्यत: जीवन के इस अंतिम सत्य को दुखदायी माना जाता है, लेकिन उत्तराखंड के सुदूरवर्ती अंचल में बसे कुछ लोगों के लिए मौत महज आंसू बहाने की वजह नहीं है। उत्तरकाशी जिले के रवांई जौनसार इलाके और टिहरी जिले के जौनपुर व में रोने-धोने की बजाय परिजन मृतक की शानदार अंतिम यात्रा निकालते हैं। मृत्यु को मनुष्य जीवन के संकटों से पीछा छूटने का जरिया मानने वाली सदियों पुरानी परंपरा के तहत यहां के लोग मृतक को पारंपरिक वाद्ययंत्रों के साथ अंतिम विदाई देते हैं।

रवांई क्षेत्र के विकासखंडों पुरोला मोरी और नौगांव के पट्टी कमल सिंराई, रामा सिंराई, आराकोट, पंचगांई, बडासू, सिंगतूर, अडोर, फते पर्वत, बनाल, ठकराल, मुगरसंती, बड़कोट तथा जौनपुर की दो पट्टियों अलगाड़ व सिलवाड़ सहित जौनसार बावर क्षेत्र के कुछ भागों में रहने वाले हजारों ग्रामीण सदियों से इस परंपरा का निर्वाह करते आ रहे हैं। इसके तहत गांव के किसी की मृत्यु होने पर रोने-धोने की बजाय, उसकी शानदार अंतिम विदाई देने की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। शव के लिए देवदार की लकड़ी से खास डोली तैयार कर उसे रंग बिरंगी फूल मालाओं से सजाया जाता है। मृतक के रिश्तेदार शव के लिए कफन, धूपबत्ती आदि लाते हैं। इसके बाद शव को डोली में रखा जाता है। इस दौरान क्षेत्र के कई गांवों से दर्जनों बाजगी या जुमरिया ढोल, दमाऊ व रणसिंघा जैसे वाद्ययंत्र लेकर मृतक के गांव के बाहर एक विशेष स्थान पर इकट्ठा हो जाते हैं। गांव से शवयात्रा जब इस स्थान पर पहुंचती है, तो रिश्तेदार डोली के ऊपर रुपये उछालते हैं। जैसे ही मुख्य बाजगी यह रुपये उठाता है, एक साथ दर्जनों ढोल, नगाड़े, दमाऊ व रणसिंघा बजने लगते हैं। इसके बाद शवयात्रा शुरू होती है। रास्ते भर परिजन मृतक के हिस्से का खाद्यान्न, सेब, मूंगफली, दाल, मिर्च, अखरोट आदि बिखेरते हुए चलते हैं। मान्यता है कि यह सामग्री जानवरों व चिड़ियों के खाने से मृतक को पुनर्जन्म तक भोज्य मिलता रहेगा।

यात्रा के दौरान पूर्वनिर्धारित स्थान पर शवयात्रा को रोका जाता है। यहां डोली को रखकर मुख्य बाजगी उसके सामने एक खास कपड़ा बिछाता है। इसके बाद मौके पर मौजूद सभी बाजगी एक एक कर अपनी जोड़ी के साथ ढोल, दमाऊ, रणसिंघा आदि के वादन कौशल का प्रदर्शन करते हैं। मृतक के परिजन व शवयात्रा में शामिल अन्य लोग कपड़े पर बतौर ईनाम रुपये रखते जाते हैं। जो बाजगी जीतता है, उसे यह राशि मिलती है। इस परंपरा को पैंसारे के नाम से जाना जाता है।

अंतिम संस्कार का तरीका भी बेहद खास है। डोली को श्मशान घाट लाने के बाद शव को मुखाग्नि दी जाती है। यह रस्म निभाने वाले व्यक्ति (सामान्यत: मृतक का पुत्र) को सबसे अलग एक खास स्थान पर बिठाया जाता है। इसके बाद शवयात्रा में शामिल सभी लोग एक-एक कर उसकी गोद में रुपये डालते हैं। इसे मुख दिखाई कहा जाता है।

इस दौरान गांव में मौजूद महिलाएं महिलाएं गोमूत्र से घर की सफाई करती हैं। शवयात्रा के वापस लौटने पर सभी लोगों पर गोमूत्र व गंगाजल छिड़का जाता है। परंपरा के मुताबिक उस दिन बिरादरी के किसी भी घर में चूल्हा नहीं जलता, बल्कि सभी घरों से थोड़ा-थोड़ा आटा, दाल, चावल मृतक के घर पहुंचाया जाता है। सब लोग एक साथ वहीं भोजन करते हैं। इसे 'कोड़ी बेल' कहा जाता है।

क्षेत्र के बुजुर्ग बालकृष्ण बिजल्वाण, खिलानन्द बिजल्वाण, जरबी सिंह, मायाराम नौटियाल, गौरीराम, केशवानंद, गोपाल सिंह नेगी, नोनियालु आदि बताते है कि मृत्यु जीवन का अभिन्न अंग है। ऐसे में जिस तरह बच्चे के पैदा होने पर खुशियां मनाई जाती हैं, वैसे ही मरने पर भी उसे खुशी-खुशी विदा करना चाहिए। 'मुख दिखाई' रस्म के बारे में उन्होंने बताया कि परिवार के मुखिया की अकस्मात मृत्यु होने पर परिजनों के लिए धन की व्यवस्था करने में दिक्कतें होती थीं। इसीलिए सभी के सहयोग से थोड़ी-थोड़ी राशि देकर मृतक के परिजनों की मदद की व्यवस्था की गई।

Courtesy : http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttranchal/4_5_5677438.html

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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तुंगनाथ:यहां होती है भोले के हृदय व बाहों की पूजा

पंचकेदारों का संपूर्ण विश्व में धार्मिकता की दृष्टि से अलग ही पहचान है। यही कारण है कि देश-विदेश के श्रद्धालु यहां पहुंचकर भगवान के साक्षात दर्शनों के लिए लालायित रहते है।

हिमालय की गोद में बसे पंचकेदारों में से एक तुंगनाथ भी है, यहां शिव की हृदय और बाहों की पूजा होती है। समुद्रतल से करीब 12,772 फिट की ऊंचाई पर पर्वत श्रृंखलाओं के बीच स्थित भगवान तुंगनाथ का प्राचीन मंदिर धार्मिकता के साथ ही प्राकृतिक सौंदर्य से भी लबालब है। हर साल यहां हजारों की संख्या में तीर्थयात्री पहुंचकर मन्नतें मांगते है। मान्यता है कि जब भगवान राम ने रावण का वध किया था, तो ब्रह्म हत्या शाप से मुक्ति पाने के लिए उन्होंने ने यहां पर शिव की तपस्या की थी, इसलिए यहां का नाम चंद्रशिला पड़ा। चंद्रशिला से बद्रीनाथ, नीलकंठ पंचचूली, सप्तचूली, बंदरपूंछ, हाथी पर्वत, गंगोत्री व यमनोत्री के ऊपरी बुग्यालों के दर्शन होते है। प्रतिवर्ष तृतीय केदार तुंगनाथ की डोली शीतकाल गद्दी स्थल मक्कूमठ से ग्रीष्मकालीन पूजा के लिए तुंगनाथ पहुंचती है। मान्यता है कि तृतीय तुंगनाथ की शीतकालीन गद्दीस्थल मक्कूमठ में मारकंडी ऋषि द्वारा तपस्या की गयी थी, इसलिए यहां का नाम मक्कूमठ पड़ा। ग्रीष्मकालीन पूजा के लिए मक्कूमठ से प्रस्थान कर भगवान तुंगनाथ डोली पहले दिन भूतनाथ मंदिर, दूसरे दिन चोपता तथा तीसरे दिन चोपता से प्रस्थान कर तुंगनाथ पहुंची। जहां अगले दिन प्रात: ब्राह्मणों के वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ ही भगवान तुंगनाथ के कपाट खुलते हैं। यहां की एक पौराणिक कथा महाभारत काल से भी जुड़ी है। युद्ध में पांडवों ने कौरवों एवं गुरु द्रोणाचार्य का वध करने के बाद शाप से बचने के लिए शिव दर्शनों के लिए यहां पहुंचकर तपस्या की थी। वहीं आदि गुरु शंकराचार्य ने इन पंचकेदारों की खोज सनातन धर्म का जीर्णोद्धार के लिए किया था, तभी से आज तक यह प्रथा चली आ रही है।


Courtsey : Dainik Jagran

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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उत्तराखंड में एक ऐसा भी गाँव है जहा नही होते है पंचायत चुनाव

हिमाच्छादित गगनचुम्बी पर्वत श्रृंखलाओं से बीच चीन की सीमा से सटा भारत का एक गांव माणा आज भी अपनी पारंपरिक ओर प्राकृतिक विरासत को संजोए हुए है। समूचे देश में भले ही छोटे-छोटे चुनाव में प्रत्याशियों के बीच कांटे की टक्कर होती हो मगर यहां आज तक ग्राम पंचायत के लिए वोट नहीं डाले गए। सुनने में जरूर अटपटा लगता है कि विगत 100 साल से यहां ग्राम के मुखिया निर्विरोध चुनते आ रहे हैं।

चीन की सीमा से कुछ मील की दूरी पर बसा माणा देश का आखिरी गांव है।

हिन्दू आस्था के केन्द्र बदरीनाथ धाम से मात्र तीन किमी पैदल चलने के बाद पड़ने वाले इस गांव में नैसर्गिक सुन्दरता का अकूत खजाना है। माणा में ख्ेाती भी होती है और मंदिरों में पूजा भी। यहां का जीवन सोंधी खुशबू को समेटे है। नई बात यह है कि भोटया जनजाति के लगभग 300 परिवारों वाले इस गांव में प्रधान का चुनाव वोट डालकर नहीं होता। वर्ष 1962 के चीन युद्ध के बाद माणा को 1988 में नोटिफाईड एरिया बदरीनाथ से सम्बद्ध किया गया था। 1989 में पंचायत का दर्जा मिलने के बाद से आज तक यहां के निवासी अपने प्रधान का चयन आपसी सहमति से करते आ रहे हैं। यहां पहले प्रधान राम सिंह कंडारी से लेकर निवर्तमान ग्राम प्रधान पीताम्बर सिंह मोल्फा निर्विरोध चुने गए। यहां की आजीविका आलू की खेती,भेड़, बकरी पालन है। 1785 की जनसंख्या वाले छोटे से गांव में चंडिका देवी, काला सुन्दरी, राज-राजेश्वरी,भुवनेश्वरी देवी,नन्दा देवी,भवानी भगवती व पंचनाग देवता आदि के मन्दिरों में भोटया जनजाति की उपजातियों के लोगों का अधिकांश समय अपनी-अपनी परम्परा निभाने व धार्मिक अनुष्ठान में बीतता है। माणा में वन पंचायत भी गठित है जिसका विशाल क्षेत्रफल लगभग 90 हजार हेक्टेअर तक फैला है। यहां मौजूद भगवान बद्रीनाथ के क्षेत्रपाल घण्टाकर्ण देवता का मन्दिर अपनी अलग पहचान रखता है। कई खूबियों के बावजूद यहां भी कुछ कष्ट हैं। बद्रीनाथ के कपाट बन्द होने से कपाट खुलने तक पर यह पूरा क्षेत्र सेना के सुपुर्द रहता है। इस कारण ग्रामीणों को शीतकाल के 6 माह अपना जीवन सिंह धार, सैन्टुणा, नैग्वाड़, घिंघराण,नरौं, सिरोखुमा आदि स्थानों पर बिताना पड़ता है। दूसरी विडंबना यह है इन्टर तक के विद्यार्थी छह माह की शिक्षा माणा में लेते हैं और छह माह 100 किमी दूर गोपेश्वर के विद्यालयों में। यहां टेलिफोन, बिजली और पानी जैसी सुविधा तो हैं उपचार कराने को अस्पताल नहीं। ग्राम प्रधान पीताम्बर सिंह मोल्फा ने बताया कि देश-विदेश से बदरीनाथ पहुंचने वाले कई अति विशिष्ट व्यक्ति और मंत्रीगण माणा को देखने तो आते हैं लेकिन गांव के विकास को वादों के अलावा कुछ नहीं देते। देश विशेष पहचान रखने वाले इस गांव को अभी भी विकास का इंतजार है।

COURTSEY : DAINIK JAGRAN

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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RAKSHA BANDAN
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नई टिहरी यूं तो रक्षाबंधन पर्व भाई-बहन के प्यार की निशानी माना जाता है, लेकिन उत्तराखंड में इसके अलावा इस त्योहार का एक दूसरा पक्ष भी है। पहाड़ में सदियों से चली आ रही परंपरा के मुताबिक गांवों में कुल पुरोहित राखी के दिन अपने सभी यजमानों के यहां जाते हैं और उन्हें रक्षासूत्र बांधकर उनकी सुख, समृद्धि की कामना करते हैं। हालांकि, गांवों के शहरीकरण होने का प्रभाव इस परंपरा पर दिखाई देने लगा है, लेकिन आज भी कई जगह पुरोहित व यजमान इसका अनवरत निर्वाह करते आ रहे हैं। देश के अन्य हिस्सों की तरह उत्तराखंड में राखी का त्योहार नजदीक आने पर सिर्फ बहनें ही अपने भाई की कलाई पर राखी बांधने का इंतजार नहीं करतीं, बल्कि ग्रामीण अंचलों में रहने वाले ब्राह्मण भी इसकी प्रतीक्षा करते हैं। दरअसल, इस दिन वे अपने यजमानों को रक्षासूत्र बांधते हैं। लोक मान्यता के अनुसार देव-असुर संग्राम में हार के बाद जब देवराज इंद्र दोबारा युद्ध पर निकले, तो उनकी पत्नी इंद्राणी ने रक्षासूत्र तैयार करवाया और श्रावण शुक्ल पूर्णिमा के दिन उसे ब्राह्मण से बंधवाने को कहा। इसके बाद उन्हें विजय प्राप्त हुई। तब से सुख, समृद्धि व मंगलकामना के लिए ब्राह्मण से रक्षा सूत्र बंधवाने की परंपरा चल पड़ी। अब भी उत्तराखंड के गांवों में इस परंपरा का बखूबी निर्वाह किया जा रहा है। ग्रामीण अंचलों में किसी भी परिवार में बहन भाई के हाथ पर तब तक राखी नहीं बांधती, जब तक परिवार के कुल पुरोहित घर में आकर सभी सदस्यों को रक्षासूत्र नहीं बांध देते। इस दौरान पुरोहित यज्ञोपवीत संस्कार करा चुके पुरुषों को अभिमंत्रित जनेऊ पहनाते हैं। हालांकि, शहरीकरण के बढ़ते प्रभाव का असर इस परंपरा पर दिखने लगा है, लेकिन अब भी हर साल रक्षाबंधन पर्व के लिए ग्रामीण अंचलों में ब्राह्मण कुछ दिन पहले से ही तैयारी में जुट जाते हैं। बाजार से खास धागा लाकर जनेऊ व रक्षासूत्र तैयार किया जाता है। इसके बाद पुरोहित सभी रक्षासूत्रों की विधिवत मंत्रोच्चारण के साथ जौ, चावल, गंगाजल आदि से रक्षासूत्र व जनेऊ को पवित्र करता है। राखी के दिन पुरोहित अलसुबह ही अपने घर से निकल पड़ता है और एक-एक कर अपने यजमानों के घर पहुंच उन्हें रक्षासूत्र बांधता जाता है। हालांकि बदलते वक्त के साथ इस परंपरा पर भी आधुनिकता हावी होती दिखने लगी है। अब पुरोहित भी बाजार से ही जनेऊ व रक्षासूत्र खरीदकर यजमानों को देने लगे हैं। स्थानीय पुरोहित बालकराम उनियाल कहते हैं कि प्राचीन काल में आश्रमों में पढ़ाने वाले ऋषि-मुनि आसपास के गांवों में जाकर यजमानों को रक्षा सूत्र बांधते थे, बदले में उन्हें दान-दक्षिणा मिलती थी। वर्ण व्यवस्था के तहत ब्राह्मणों को गुरू माना गया। इसके बाद उनके द्वारा रक्षा सूत्र बांधने की परंपरा चल पड़ी। पंडित उनियाल ने कहा कि परंपराओं के निर्वहन को समाज के सभी वर्गो को एकजुट होना चाहिए।

पंकज सिंह महर

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देहरादून,जागरण संवाददाता: उत्तरकाशी का खूबसूरत दयारा बुग्याल पर्यटकों को एक अनूठा मौका मुहैया कराने जा रहा है। 16 अगस्त से 19 अगस्त तक यहां दूध, दही, छाछ और मक्खन की होली खेली जाएगी। अंदूडी उत्सव के नाम से प्रसिद्ध इस स्थानीय त्योहार को रैथल गांव की दयारा पर्यटन उत्सव समिति व अनधा संस्था हर साल मनाती है। होली की तरह मनाए जाने वाले इस उत्सव में रंग व गुलाल की जगह एक दूसरे पर दूध, दही व छाछ की बौछार की जाती है। गालों पर गुलाल की बजाय मक्खन मला जाता है। इसलिए विदेशी इसे बटर फेस्टिवल के नाम से पुकारते हैं। रविवार को राजपुर रोड स्थित एक होटल में आयोजित प्रेस कंाफ्रेंस में दयारा पर्यटन उत्सव समिति के अध्यक्ष चंदन सिंह राणा ने बताया कि अंदूड़ी त्योहार स्थानीय ग्रामीणों के मवेशियों के साथ गर्मियों में ऊंचे हिमालयी बुग्यालों की ओर पलायन की परंपरा से जुड़ा है। रैंथल व आस-पास के गांवों के लोग चातुर्मास के दिनों में अपने मवेशियों को आस पास के जंगलों में ले जाते हैं। इन दिनों वे अस्थाई घरों (छानियों) में अपने मवेशियों के साथ रहते हैं। लंबा समय बुग्यालों में बिताने के बाद जब वे भाद्रपद संक्रांति को घर लौटते हैं तो सामूहिक रूप से अंदूड़ी उत्सव मनाते हैं। त्योहार की शुरुआत श्रीकृष्ण के रूप में सजे बाल कलाकार द्वारा हांडी फोड़ने के साथ होती है। इस मौके पर गोवर्धन पर्वत व श्रीकृष्ण की पूजा की जाती है।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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In New Tehari Garwal, there is system that on occasion of Krishana Janam Ashtmi, pooja is performed by newly married dauthers. For detailed information go through the news from Dainik Jagran

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जन्माष्टमी: धियांणियों के हाथों कराई जाती है 
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नई टिहरी गढ़वाल। पहाड़ में कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर धियांण (नवविवाहित बेटी) को मायके बुलाने की परम्परा काफी पुरानी है। नवविवाहिताएं मायके आकर भादो के महीने मायके व ससुराल की मंगलकामना के लिए गीत गाती हैं।

भादो माह में धियांणी को मायके बुलाने की परंपरा पहाड़ की अधिष्ठात्री देवी भगवती नंदा के समय से मानी जाती है। लोकश्रुतियों में नंदा को प्रतिवर्ष मायके बुलाने की परंपरा रही है। नंदा को धियांण के रूप में आज भी पूजा जाता है। इस परंपरा के पीछे कृषि प्रधान समाज की झलक भी दिखाई देती है। दरअसल, भादो के महीने खेती के काम पूरे हो चुके होते हैं। ऐसे में महीने भर के लिए बेटी को मायके बुलाया जाता है। इस अवसर पर पहाड़ के खेतों में फसलें लहलहा रही होती है। इन्हीं फसलों के पौध को घर में लाकर पूजा की जाती है। पूजा में पूरी और पकौड़ी जिसे स्थानीय भाषा में 'स्वांला-पकौड़ी' कहा जाता है का भोग लगाया जाता है। भादो में गांवों में दूध घी की प्रचुरता रहती है। ऐसे में धियाणों के लिए विशेष रूप से दूध, दही व स्थानीय फलों से खातिरदारी की जाती है। परिवार की अहम हिस्सा रही बेटी को एक महीने तक घरों में लगी ककड़ी, मक्का और च्यूरा दिया जाता है। इस दौरान सहेलियों के साथ इकट्ठा होकर धियांण चाचरी, झुमैलो, बाजूबंद जैसे क्षेत्रीय लोक गीत गाती हैं। इन गीत नृत्यों में फसलों की पैदावार बढ़ाने, पशुधन के उन्नति और देवताओं की स्तुति होती है। लोकगायक प्रीतम भरतवाण का कहना है कि भादो के महीने में पहाड़ में धियांणों यानी बेटियों को बुलाने की परंपरा काफी पुरानी है। लोकगीतों के माध्यम से अपने मायके व ससुराल की उन्नति के लिए पूजा अर्चना करती है। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि बदलते परिवेश के साथ पहाड़ की परंपराओं में भी कमी आ रही है। अब लोग रीति-रिवाजों के नाम पर महज खानापूर्ति करने लगे हैं।

http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttranchal/4_5_5701413.html

पंकज सिंह महर

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दयारा बुग्याल में खेली गई दूध-मक्खन की होली

उत्तरकाशी (एसएनबी)। पूर्व से चली आ रही परम्परा के अनुसार दयारा बुग्याल में बड़ी संख्या में पर्यटकों व स्थानीय लोगों ने दूध, दही, छाछ और मक्खन की होली खेल कर अंडुड़ी उत्सव धूमधाम से मनाया तथा मवेशियों के साथ ही आम जनमानस के लंबे जीवन की कामना की। उत्सव का शुभारंभ कृष्ण-राधा की झांकी निकालकर किया गया। गत वर्षों की भांति यह उत्सव इस वर्ष भी गत रविवार को धूमधाम से मनाया गया। अंडूड़ी उत्सव को देखने के लिए बड़ी संख्या में पर्यटकों और स्थानीय लोगों ने पहले दिन ही रैथल गांव में डेरा डाल दिया था। उत्सव के दिन सुबह सभी लोग दयारा बुग्याल के लिए रवाना हुए और दोपहर के समय दूध, दही, मक्खन व छाछ की होली में शरीक हुए। महिला, पुरूषों ने एक दूसरे पर दही, दूध, मक्खन और छाछ फेंककर खुशी का इजहार किया। कृष्ण-राधा ने मटकी फोड़कर सभी लोगों को रंगों से नहीं बल्कि दूध, दही, मक्खन से उनके चेहरे और कपड़े सफेद कर दिये। दो घंटे तक होली खेलने के बाद दयारा बुग्याल में रासो नृत्य शुरू हुआ।

हेम पन्त

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Source : Dainik Jagran

बड़कोट (उत्तरकाशी)। उत्तरकाशी की रंवाई घाटी अपनी पौराणिक संस्कृति के लिए विश्व विख्यात है। नौगांव ब्लाकके पाली गांव में हर चार साल में होने वाले 'अठोड़' (भेड़) मेले की धूम एकअनोखी और आश्चर्य चकित कर देने वाली परंपरा है जो आज भी विद्यमान है।

मेले में गांव व क्षेत्र की भेड़-बकरियां दूरस्थ बुग्यालों से आकर मंदिर प्रांगण में मंदिरों की परिक्रमा करती हैं। इस ऐतिहासिक मेले को देखने के लिए दूर-दूर से लोग यहां पहुंचते हैं। पाली गांव में बुधवार को आयोजित हुआ यह 'कठोड़ मेला' पौराणिक रीति-रिवाजों के साथ-साथ डोली नृत्य, लोक नृत्य और गीतों की थाप पर धूमधाम से मनाया गया। दूर-दराज से पहुंचे श्रद्धालुओं और मेहमानों के लिए स्थानीय उत्पादों से बने व्यंजनों से स्वागत करते हैं। तहसील बड़कोट के अंर्तगत यमुनोत्री मार्ग पाली गाड़ से चार किमी की पैदल दूरी पर बसे पाली गांव में लगाने वाला कठोड़ मेला हर चार साल बाद मनाया जाता है। कई दशकों पूर्व इस मेले की शुरूआत 'अष्ट बलि' यानि आठ भेड़ों की बलि देकर की जाती थी। अष्ट बलि दिए जाने के कारण ही यह मेला 'अठोड़ मेला' के नाम से प्रसिद्ध है। यह अष्ट बलि अराध्य देव समेश्वर और जाख देवता को खुश करने और क्षेत्र की खुशहाली के लिए दी जाती थी। आज अराध्य देवता गांव वालों की महीनों बाद दूरस्थ बुग्यालों से घर पहुंची हजारों भेड़-बकरियों की पूरी टोली को सम्मोहित कर गांव में मंदिर प्रांगण में मंदिर के चारों ओर सात बार परिक्रमा करते हैं। हजारों भेड़ बकरियां मंदिर की यह परिक्रमा एक आश्चर्यजनक दृश्य होता है। भेड़ व बकरियों की एक सभ्य सेना की टीम की तरह समेश्वर व जाख देवता के निर्देशों का पालन करती हैं।

 

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