Author Topic: Historical information of Uttarakhand,उत्तराखंड की ऐतिहासिक जानकारी  (Read 34661 times)

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यौद्धा

कुछ पुरातात्विक तथ्यों के आधार पर कहा जाता है कि यौद्धाओं ने दूसरी और तीसरी शताब्दी में गढ़वाल पर राज किया। यौद्धा राजाओं ने कुलिंदों को एक सीमित क्षेत्र तक बांधकर रखा तथा वे भागवत धर्म के अनुयायी थे।

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ऋषिकेश ऐतिहासिक तथ्य

ऋषिकेश से संबंधित अनेक धार्मिक कथाएं प्रचलित हैं। कहा जाता है कि समुद्र मंथन के दौरान निकला विष शिव ने इसी स्थान पर पिया था।

 विष पीने के बाद उनका गला नीला पड़ गया और उन्हें नीलकंठ के नाम से जाना गया। एक अन्य अनुश्रूति के अनुसार भगवान राम ने वनवास के दौरान यहां के जंगलों में अपना समय व्यतीत किया था। रस्सी से बना लक्ष्मण झूला इसका प्रमाण माना जाता है।

1939 ई. में लक्ष्मण झूले का पुनर्निर्माण किया गया। यह भी कहा जाता है कि ऋषि राभ्या ने यहां ईश्वर के दर्शन के लिए कठोर तपस्या की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान ऋषिकेश के अवतार में प्रकट हुए। तब से इस स्थान को ऋषिकेश नाम से जाना जाता है।

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श्रीनगर, गढ़वाल का इतिहास

इतिहास के आधार पर श्रीनगर हमेशा ही महत्वपूर्ण रहा है क्योंकि यह बद्रीनाथ एवं केदारनाथ के धार्मिक स्थलों के मार्ग में आता है।
बहुसंख्यक तीर्थयात्री इस शहर से गुजरते हुए यहां अल्पकालीन विश्राम के लिये रूकते रहे हैं। फिर भी नैथानी बताते हैं कि श्रीनगर के राजा ने हमेशा यह सुनिश्चित किया कि साधु-संतों तथा आमंत्रित आगंतुकों को छोड़कर अन्य तीर्थयात्री शहर के बाहर से ही जयें क्योंकि उस समय हैजा का वास्तविक खतरा था।

 गढ़वाल में एक पुरानी कहावत थी कि अगर हरिद्वार में हैजा है तो वह 6 दिनों में बद्रीनाथ में फैलने का समय होता था (अंग्रेज भी हैजा को नियंत्रित करने में असमर्थ रहे तथा कई लोगों द्वारा इस रोग के विस्तार को रोकने के लिये घरों को जला दिया जाता था तथा लोगों को घरों को छोड़कर जंगल भागना पड़ता था)।

वर्ष 1803 से नेपाल के गोरखा शासकों का शासन (1803-1815) यहां शुरू हुआ। समय पाकर गढ़वाल के राजा ने गोरखों को भगाने के लिये अंग्रेजों से संपर्क किया, जिसके बाद वर्ष 1816 के संगौली संधि के अनुसार गढ़वाल को दो भागों में बांटा गया जिसमें श्रीनगर क्षेत्र अंग्रेजों के अधीन हो गया। इसके बाद गढ़वाल के राजा ने अलकनंदा पार कर टिहरी में अपनी नयी राजधानी बसायी।

श्रीनगर ब्रिटिश गढ़वाल के रूप में वर्ष 1840 तक मुख्यालय बना रहा तत्पश्चात इसे 30 किलोमीटर दूर पौड़ी ले जाया गया। वर्ष 1894 में श्रीनगर को अधिक विभीषिका के सामना करना पड़ा, जब गोहना झील में उफान के कारण भयंकर बाढ़ आई। श्रीनगर में कुछ भी नहीं बचा। वर्ष 1895 में ए के पो द्वारा निर्मित मास्टर प्लान के अनुसार वर्तमान स्थल पर श्रीनगर का पुनर्स्थापन हुआ।

वर्तमान एवं नये श्रीनगर का नक्शा जयपुर के अनुसार बना जो चौपड़-बोर्ड के समान दिखता है जहां एक-दूसरे के ऊपर गुजरते हुए दो रास्ते बने हैं। नये श्रीनगर के मुहल्लों एवं मंदिरों के वही नाम हैं जो पहले थे जैसा कि विश्वविद्यालय के एक इतिहासकार डॉ दिनेश प्रसाद सकलानी बताते हैं।

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हिमालयन गजेटियर (वोल्युम III, भाग II ) वर्ष 1882 में ई.टी. एटकिंस के अनुसार कहा जाता है कि कभी शहर की जनसंख्या काफी थी तथा यह वर्तमान से कही अधिक विस्तृत था। परंतु अंग्रेजी शासन के आ जाने से कई वर्ष पहले इसका एक-तिहाई भाग अलकनंदा की बाढ़ में बह गया तथा वर्ष 1803 से यह स्थान राजा का आवास नहीं रहा जब प्रद्युम्न शाह को हटा दिया गया जो बाद में गोरखों के साथ देहरा के युद्ध में मारे गये। इसी वर्ष एक भूकंप ने इसे इतना अधिक तबाह कर दिया कि जब वर्ष 1808 में रैपर यहां आये तो पांच में से एक ही घर में लोग थे।

 बाकी सब मलवों का ढेर था। वर्ष 1819 के मूरक्राफ्ट के दौरे तक यहां कुछ मोटे सूती एवं ऊनी छालटियां के घर ही निर्मित थे और वे बताते हैं कि यह तब तक वर्ष 1803 के जलप्लावन तथा बाद के भूकंप से उबर नहीं पाया था, मात्र आधे मील की एक गली बची रही थी।

 वर्ष 1910 में (ब्रिटिश गढ़वाल, ए गजेटियर वोल्युम XXXVI) एच.जी. वाल्टन बताता है, “पुराना शहर जो कभी गढ़वाल की राजधानी तथा राजाओं का निवास हुआ करता था उसका अब अस्तित्व नहीं है। वर्ष 1894 में गोहना की बाढ़ ने इसे बहा दिया और पुराने स्थल के थोड़े अवशेषों के अलावा यहां कुछ भी नहीं है। आज जहां यह है, वहां खेती होती है तथा नया शहर काफी ऊंचा बसा है जो पुराने स्थल से पांच फलांग उत्तर-पूर्व है।”

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गढ़वाल पेन्टिंग स्कूल

गढ़वाल को पर्यटकों, साहसिक व्यक्तियों, राजनीतिक निर्वासितों, दर्शनशास्त्रियों एवं प्रकृति प्रेमियों के लिए सदैव ही एक सुरक्षित स्वर्ग के रूप में जाना जाता रहा है। 17 वी सदी के मध्य में एक मुगल राजकुमार सुलेमान शिकोह ने गढ़वाल में शरण ली। राजकुमार अपने साथ एक कलाकार एवं उसके पुत्र को लाया जो कि उसके दरबारी पेन्टर थे एवं मुगल स्टाइल की पेन्टिंग में कुशल थे।

 उन्नीस माह बाद राजकुमार ने गढ़वाल को छोड दिया परन्तु उसके दरबारी पेन्टर जो यहाँ के मनोहर वातावरण से मन्त्रमुग्ध हो गये थे वे यहीं पर रुक गये। ये पेन्टर श्रीनगर (गढ़वाल) में स्थापित हो गया जो पंवार राज्य की तत्कालीन राजधानी थी एवं गढ़वाल में मुगल स्टाइल की पेन्टिंग को प्रस्तुत किया। धीरे-2 समय के साथ इन मूल पेन्टरों के उत्तराधिकारी विशिष्ट पेन्टर बन गये तथा उन्होने अपने प्रकार की नवीन मुल पद्धति को विकसित किया।

यह स्टाइल बाद में गढ़वाल पेन्टिंग स्कूल के रुप में प्रसिद्ध हुआ। लगभग एक शताब्दी बाद एक प्रसिद्ध पेन्टर भोला राम ने पेन्टिंग की कुछ अन्य पध्दतियों द्वारा रोभानी आकर्षण के समतुल्य पेन्टिंग की एक नई पद्धति विकसित की। वे गढ़वाल स्कूल के एक महान मास्टर होने के साथ-2 अपने समय के एक महानतम कवि भी थे। भोला राम की पेन्टिंगों में हमे कुछ सुन्दर कविताएं प्राप्त होती हैं।

 यद्यपि इन पेन्टिंगों में अन्य पहाडी स्कूलों का प्रभाव निश्चित रुप में दिखाई पडता है तथापि इन पेन्टिंगों में गढ़वाल स्कूल की सम्पूर्ण मूलता को बनाए रखा गया है। गढ़वाल स्कूल की प्रमुख विशिष्टताओं में पूर्ण विकसित वक्षस्थलों, बारीक कटि-विस्तार, अण्डाकार मासूम चेहरा, संवेदनशील भी है एवं पतली सुन्दर नासिका से परिपूर्ण एक सौन्दर्यपूर्ण महिला की पेन्टिंग सम्मिलित है।

 अपनी लिखी कविताओं प्राकृतिक इतिहास पर लिखे विचारों, एकत्रित आंकडों एवं विविध विषयों पर विशाल मात्रा में बनाई गई पेन्टिंगों के आधार पर भोलाराम को निर्विवाद रुप में अपने समय के एक महान कलाकार एवं कवि के अपवाद व्यक्तित्व के रुप में जाना जा सकता है।

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राजा प्रदुमन शाह (1797-1804AD) द्वारा कांगडा की एक गुलर राज कुमारी के साथ किये गये विवाह ने अनेकों गुलर कलाकारों को गढ़वाल में आकर बसने पर प्रेरित किया। इस तकनीक ने गढ़वाल की पेन्टिंग सटाइल को अत्यधिक प्रभावित किया।

आदर्श सौन्दर्य की वैचारिकता, धर्म एवं रोमांस में विलयकरण, कला एवं मनोभाव के सम्मिश्रण सहित गढ़वाल की पेन्टिंग प्रेम के प्रति भारतीय मनोवृत्ति के साकार स्वरुप को दर्शाती है। विशिष्ट शोधकर्ताओं एवं एतिहासिक कलाकारों द्वारा किये गये कुछ कठिन शोध कार्यों के कारण इस अवधि के कुछ पेन्टरों के नाम प्रसिद्ध हैं।

 पेन्टरों के पारिवारिक वृक्ष में श्याम दास हर दास के नाम सर्वप्रथम लिये जाते हैं जो राजकुमार सुलेमान के साथ गढ़वाल आने वाले प्रथम व्यक्ति थे। इस कला विद्यालय के कुछ महान शिक्षकों में हीरालाल, मंगतराम, भोलाराम, ज्वालाराम, तेजराम, ब्रजनाथ प्रमुख हैं।

रामायण (1780AD)का चित्रण, ब्रहमा जी के जन्म दिवस (1780AD)का आयोजन, शिव एवं पार्वती रागिनी, उत्कट नायिका, अभिसारिका नायिका, कृष्ण पेन्टिंग, राधा के चरण, दर्पण देखती हुई राधा, कालिया दमन, गीता गोविन्दा चित्रण पुरातत्वीय अन्वेषणों से प्राप्त अनेकों प्रतिमाओं सहित वृहत्त मात्रा में इन पेन्टिंगों को श्रीनगर (गढ़वाल) में विश्वविद्यालय संग्रहालय में प्रदर्शित किया गया है।

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                           कुमाऊँ के मूल निवासी कौन थे आओ जाने
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प्रामाणिक ऐतिहासिक तथ्यों के अभाव में निश्चित रूप से कहना कठिन है कि मूलतः कुमाऊँ क्षेत्र में किन-किन मानव जातियों का प्रभुत्व था। महाभारत, पुराण और प्राचीन संस्कृत साहित्य में उपलब्ध कतिपय सन्दर्भों से ज्ञात होता है कि यहाँ किरात, किन्नर, यक्ष, तंगव, कुलिंद, खस इत्यादि जातियाँ निवास करती थीं। महाभारत के वन पर्व में मध्य हिमालय की उपत्यकाओं में निवास करने वाली जातियों को किरात, तंगव तथा कुलिंट बताया गया है।

 किरांततंगणाकीर्ण कुलिंद शत संकुलम्‌ । युधिष्ठिर के राजसूय-यज्ञ में उपस्थितों के नाम गिनाते हुए दुर्योधन कहता है कि मेरु मंदिर पर्वतों के मध्य शैलोक्ष नदी के किनारे निवास करने वाले खस-एकासन, पारद, कुलिंद, तंगव और परतंगण नामक पर्वतीय राजा काले रंग का चंबर और पिपीलिका जाति का स्वर्ण लाए थे।

 (महाभारत वनपर्व अध्याय ५२) द्रोणपर्व में आया है कि उक्त पर्वतीय जातियों ने पत्थर के हथियारों से महाभारत की लड़ाई में दुर्योधन की ओर से भाग लेकर कृष्ण के सारथी सात्यकि पर चारों ओर से पथराव किया था, किन्तु सात्यकि के नाराचों के समक्ष वे न टिक सके। (महाभारत द्रोणपर्व अध्याय १४१/४२-४३) ब्रह्मपुराण और वायुपुराण में मध्य हिमालय में किरात, किन्नर, यक्ष, गंधर्व, विद्याधर, नाग, इत्यादि जातियों के अस्तित्व के संकेत उपलब्ध होते हैं।

 स्कंदपुराण के मानस खंड में कोसी (कौशिकी) स्थित काषाय पर्वत नाम से वर्णित गिरिमाला को अल्मोड़ा का पहाड़ी भू-भाग माना गया है- कौशिकी शाल्मली मध्ये पुण्यः काषाय पर्वतः। तस्य पश्चिम भागे वै क्षेत्र विष्णो प्रतिष्ठितम्‌। अल्मोड़ा में जाखन देवी का मंदिर इस बात का प्रमाण है कि अत्यन्त प्राचीन काल में यहाँ दक्षों का आवास रहा है।

कालिदास के '[मेघदूत]' का नामक यक्ष मेघ को अल्कापुरी की पहचान के चिह्न बताते हुए कहता है कि उसकी प्रिया ने अपने दरवाजे की देहली पर शंख-पद्म की अल्पनाओं के ऊपर पुष्प बिखेरे होंगे। द्वारापान्ते लिखित वपुषों शंखपद्मौ च दृष्टवा (मेघदूत २००)तथा विन्यस्यन्ती भूविगणनया देहलीदन्त पुष्पै

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सांस्कृतिक जीवन के विविध पक्षों में यह परिपाटी कुमाऊँ में विभिन्न त्येहारों के अवसरों पर आज भी विद्यमान है। यक्ष जाति के अलावा आदि युग में कुमाऊँ में नाग जाति के निवास के संकेत भी मिलते हैं। पिथौरागढ़ जिले के बेरीनाग नामक स्थान में बीनाग/बेनीनाग का प्रसिद्ध मंदिर है। नागों के नाम पर कुमाऊँ में और भी कई मंदिर है।

जैसे धौलनाग, कालीनाग, पिंगलनाग, खरहरीनाग, बासुकि नाग, नागदेव इत्यादि। कुमाऊँ की आदिम जातियों में यक्ष और नाग जाति के अस्तित्व की कल्पना अनुमानों पर आधारित है किन्तु किरात जाति के संबंध में कुछ समाज शास्त्रीय एवं नृवैज्ञानिक प्रमाणों के आधार पर कहा जा सकता है कि प्रागैतिहासिक युग में कुमाऊँ-गढ़वाल के भू-भाग किरात, मंगोल आदि आर्येतर जातियों के निवास क्षेत्र रहे, जिन्हें कालान्तर में उत्तर-पश्चिम की ओर से आने वाले अवैदिक खस आर्यों ने विजित कर लिया।

 यह भी सम्भावना है कि इस प्रदेश पर आग्नेय परिवार की मुंडा भाषा-भाषी किरात जाति का प्रभुत्व दीर्घकाल तक रहा, अन्यथा प्राचीन काल में इसे किरातमण्डल की संज्ञा न मिलती। अपने स्वतंत्र भाषाई अस्तित्व के साथ किरातों के वंशज आज भी कुमाऊँ के अस्कोट एवं डीडीहाट नामक स्थानों में मौजूद हैं।

कुमाऊँ की बोलियों में आज भी अनेक ऐसे शब्द प्रचलित हैं, जो प्रागैतिहासिक किरातों की बोली के अवशेष प्रतीत होते हैं, जैसे- ठुड़ (पत्थर), लिडुण (लिंगाकार कुंडलीमुखी जलीय पौधा), जुंग (मूंद्द), झुगर (अनाज का एक प्रकार), फांग (शाखा), ठांगर (बेलयुक्त पौधों को सहारा देने के लिए लगाई जाने वाली वृक्ष की सूखी शाखा), गांग (नदी), ल्यत (बहुत गीली मिट्टी) आदि शब्दावली के अतिरिक्त कतिपय-व्याकरण तत्व भी आग्नेय परिवार की भाषाओं से समानता रखते हैं,

जैसे कुमाऊँनी कर्म कारक सूचक कणि/कन प्रत्यय मुंडा की भोवेसी तथा कोर्क बालियों में के/किन या खे/खिन है। बीस के समूह के आधार पर गिनने की पद्धति राजी और कुमाऊँनी में समान रूप से मिलती है। बीस के समूह के लिए कुमाऊँनी में बिसि शब्द है।

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किरात जाति के अलावा कुमाऊँ क्षेत्र में हिमालय के उत्तरांचल में निवास करने वाली भोटिया जाति का भी प्रभुत्व रहा। भोटिया शब्द मूलतः बोट या भोट है। तिब्बत को भोट देश या भूटान भी कहा जाता है तथा उस देश से संबंधित होने के कारण वहाँ के निवासियों को भोटिया कहा गया। भोटियों की भाषा तिब्बती कही गई। यह तिब्बती से निकटता रखती है। जोहार दारमा, ब्याँस तथा चौदाँस की भाषा में स्थानगत विभेद पाए जाते हैं।

 भोटियों की बोली जोहारी पर कुमाऊँनी का प्रभाव स्पष्ट परिलक्षित होता है। इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि आर्यों के आगमन से पहले यहाँ मुंडा तथा तिब्बती परिवार की भाषा बोलने वाले लोग निवास करते रहे होंगे। कुमाऊँ में शक संवत् के प्रचलन एवं अल्मोड़ा में कोसी के समीप स्थित कटारमल सूर्य मंदिर के अस्तित्व से इस संभावना की पुष्टि होती है कि किरात, राजी, नाग इत्यादि आदिम जातियों के पश्चात यहाँ शक जाति का अस्तित्व रहा है।

 गडनाथ, जागनाथ, भोलानाथ आदि लोक देवताओं के मंदिरों तथा गणनाथ आदि नामों के आधार पर यहाँ नाथ जाति के अस्तित्व की भी संभावना व्यक्त की जा सकती है। इतना निर्विवाद है कि कुमाऊँ के आदि निवासी कोल, किरात, राजी नाग, हूण, शक, बौर, थारु, बोक्सा, भोटिया और खस जाति के लोग हैं। इनमें सबसे सशक्त जाति खस थी, जो अन्य जातियों के बाद कुमाऊँ में आई।

यहां भाषा और संस्कृति की आधार भूमि के निर्माण में भी खसों का योगदान रहा है। मूलतः आर्य जाति से संबंधित होते हुए भी खस ऋग्वेद के निर्माण से पूर्व अपने मूल आर्य भाइयों से अलग होकर पृथक-पृथक दलों में मध्य एशिया से पूर्व दिशा में की ओर चले होंगे। यही कारण है कि वे अवैदिक आर्य भी कहलाते हैं।

 अनुमान है कि वे ई.पू. द्वितीय सहस्राब्दी के लगभग पश्चिम से पूर्व की ओर भारत के विभिन्न भागों में फैल गए। कुमाऊँ में खसों के प्रवेश का निश्चित समय बताना दुष्कर कार्य है, तो भी इतना निश्चित है कि यहाँ राजपूतों के आगमन से पूर्व खसों का प्रभुत्व था।


http://hi.wikipedia.org

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                            गौरखाओं के शासन काल में  उत्तराखंड


अठारहवीं सदी के अंतिम दशक में आपसी दुर्भावनाओं व राग-द्वेष के कारण चंद राजाओं की शक्ति बिखर गई थी। फलतः गोरखों ने अवसर का लाभ उठाकर हवालबाग के पास एक साधारण मुठभेड़ के बाद सन्‌ १७९० ई. में अल्मोड़ा पर अपना अधिकार कर लिया। गोरखा शासन काल में एक ओर शासन संबंधी अनेक कार्य किए गए, वहीं दूसरी ओर जनता पर अत्याचार भी खूब किए गए।

 गोरखा राजा बहुत कठोर स्वभाव के होते थे तथा साधारण-सी बात पर किसी को भी मरवा देते थे। इसके बावजूद चन्द राजाओं की तरह ये भी धार्मिक थे। गाय, ब्राह्मण का इनके शासन में विशेष सम्मान था। दान व यज्ञ जैसे कर्मकांडों पर विश्वास के कारण इनके समय कर्मकांडों को भी बढ़ावा मिला।

जनता पर नित नए कर लगाना, सैनिकों को गुलाम बनाना, कुली प्रथा, बेगार इनके अत्याचार थे। ट्रेल ने लिखा है- 'गोरखा राज्य के समय बड़ी विचित्र राज-आज्ञाएँ प्रचलित की जाती थीं, जिनको तोड़ने पर धन दंड देना पड़ता था। गढ़वाल में एक हुक्म जारी हुआ था कि कोई औरत छत पर न चढ़े।

 गोरखों के सैनिकों जैसे स्वभाव के कारण कहा जा सकता है कि इस काल में कुमाऊँ पर सैनिक शासन रहा। ये अपनी नृशंसता व अत्याचारी स्वभाव के लिए जाने जाते थे। जब अंग्रेजों ने इस राज्य पर आक्रमण किया, तो एक प्रकार से कुमाऊँ ने मुक्ति की ही साँस ली। २७ अप्रैल, १८१५ ई. को अंग्रेजों के साथ एक संधि पर हस्ताक्षर करके गोरखाओं ने कुमाऊँ की सत्ता अंग्रेजों को सौंप दी।


 

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