Author Topic: Exclusive Garhwali Language Stories -विशिष्ठ गढ़वाली कथाये!  (Read 34547 times)

Bhishma Kukreti

  • Hero Member
  • *****
  • Posts: 18,227
  • Karma: +22/-1
खबर्या बौ

by Hari Lakhera



ये बात तबैकी च जब गाँव मा लोग रंद छे। रस्ता मा, पाणीम, खेतु मा, घट्ट म, घास या लाखड जांद वखत, कखि ना कखि दिन मा द्वी चार वखत आमिणी सामिणी हूंण मामूली बात छे।
मी त तब छोटु छे। पर रति बौ ताई  कभी नी भूलि नी सकुद। गाँव मा अजीब रिस्ता हूंदन। तब मेरी समझ मा नी आंद छे कि चालीस सालूक घनश्याम कुण त मी भैजी बोल्दु और तीस सालूक धनि मेकुण चच्चा बोल्द। पर ईं बात ताई समझण क वास्त त पूरी वंसावली निकाला पडली।
रति बौ घनश्याम भैजी कि घरवाली छे। जब भी मिलदि त ये द्वूर खूब छे बोलीक मेरी भुक्की लींद छे। और मी शर्म क मार मुंडि नी उठै सकुद छे। जनि पता चलदु कि रति बौ आणाईं च त लुक जांदु। पर रति बौ से कु छिपी सकुद छे भला। मां (मि माँ ही बोल्दु छे, ब्वे ना। शहरी पैदायस ) न कति बेर ब्वाल कि न चिढ़ाया कर मिताई पर रति बौ कैक बोल्णू पर कख आई। बीच बीच मा कबी ककड़ी, कबी मुंगरी, कबी बुखाण देकन पुल्या पत्या लींद छे। रति बौ क व्यवहार सब बच्चौंक दगड यनी छे। हम सब रति बौ देखीक भागद बी छे पर रति बौ क बग़ैर रै बी नी सकद छे।
आज क संदर्भ मा बोलु त रति बौ गाँव मा चलद फिरद अख़बार छे। गाँव क हर परिवार कि, हर मनखी की ख़बर रति बौ की ज़ुबान पर। कैन रात क्या पकाई, कैन दै छ्वाल, कैन घी ब्याच, छांछ कख मिलली, कु कख जायूं च, कु कब आलु, कैकि शरीर ख़राब च और यख तक कि कैकी ब्वारी उम्मीद  से च। ग़नीमत छे कि बौ क ज़ुबानी अख़बार गाँव की सासु, जिठाणी, ननद, देवरानी तक ही सीमित छे नी त मर्द जात पता नी क्या क्या नी बोल्द।
मीन कति बेर रति बौ ताई कबी घास क बिठुकु, कबी लाखुडूक बिठुकु त कबी ख़ाली हाथ रति बौ ताई कै न कै दगड बात करद द्याख। बीच बीच मा यन बी कि देर हूणाई च पर बात खतम ही हूंदी ददछे।  एक दिन नि रयाई त मीन ब्वाल ये बौ मुंड मा यतुक बोझ धर्यूं च वे ताई पगार मा धर देदी और फिर चैन से छ्वीं लगाई लेदी। बौ ब्वाल द्यूर दगड्या तिताई नी पता पर तु बी ठीक ही बुनाई छे। बाद मा समझ मा आई कि बौ क खबर्या कु छे। बौ की सब्यूंक दगड पटरि बैठीं छे। सब ताई पता छे कि बौ ताई बताणौकु मतलब गाँव ताई बताण पर बौ त बौ । बुझ्यां चुल्लू बीटीन भी अंगार निकालि दींद छे।
चुल्लसे याद आई, वे टाइम पर माचिस त सब्यूंक घरम हूंदी छे पर चुलु मा आग दीण कुण अग़ल बग़ल क घर बिटिन जख बि पैलि चुलु जल्यूं मील आग ली आंद छे। छिल्लूकी गड्डी लेकन ग्ये, आग  उठाई और अपण चुलु पन लग्या दे। आग की आग और छ्वीं कि छ्वीं। बौ ताई इ सब नी करण पडद छे किलाई कि जिठाणी सब पैली कर दींद छे।

गाँव मा सब बौ कुण छुंयाल बोल्द छे। छुयांल वन त वूं कुण बोल्दन छे जु यना की वना लगांदन, जै आपस मा मन मीलु ह्वा या झगड़ा ह्वा पर बौ यन नी छे। बस गाँव क कुशल समाचार दीण तक ही बौ की पौंच छे। बौ क गिचन क्वी गलत बात नी सुणै। बात बात मा हंसि। मुख पर कबी बी परेशानी कि झलक ना। ख़ुश मिज़ाज।
क्वी त मज़ाक़ मा बोलि दींद छे कि ये रति सारी गांवैकि ख़बर तीम च पर तेरी ख़बर कैम च।  बौ त बौ। तपाक से बोल्दी कि कोशिश चलणाई च जनि पता चललो सारि गाँव मा ढिंढोरा पिटौलु। तब त समझ मा नी आई पर अब जब याद करदु त लोगुक मतलब छे कि रति बौ माँ कब बणैली। व्या ताई कति साल ह्वे गे छे पर रति बौ क घरम कै नवजात बच्चैकि किलकार नि सुणै।

बौ क परिवार मा सबी छे। सासु, जेठ-जिठाणी और ऊँक द्वी लड़का, एक लड़की। परिवार संयुक्त। रति बौ काम कुण मर्कट। जिठाणी घर संभालदि, बौ भैरुक सारि काम। सुखी परिवार। खेति से और बाखरूक क व्यापार से आराम से गुजार।
समय कब रुकुदु। सबी दिन समान कैक रैन। पढ़ाई क चक्कर मा मी शहर चलि ग्यूं। बीच बीच मा गाँव आण जाण रौं। मेरि तरां और कति पढ़ाई क वास्त क्वी यना गे क्वी वना। रति बौ क जिठाणीक लड़का भी देहरादून गेन, लड़की व्यवाये गे। बौ ताई संतान प्राप्ति नी ह्वे। बौ फिर भी ख़ुश। जिठाणीक बच्चा बी त म्यार ही छन।
मेरी बी नौकरी लग, व्या ह्वे, और गाँव लगभग छुटि गे। बीच बीच मा परिवार क काम से घर जाण त ह्वे च पर खडा खड़ी। फिर दस साल बाद जब गाँव ग्यूं त सब कुछ बदल्यूं छे। ए बीच चिठ्ठी पतर्यूं से, आण जाण वालों से मोटी मोटी ख़बर त मिलणाई रै पर जु द्याख  वैकी उम्मीद नी छे।
बौ अपर कूडम अकेला। बाकी सब यना वना। भैजी बि नी रै। जेठ जिठाणी बड़ लड़का दगड दिल्ली । गाँव मा गिनती क परिवार। अद्धा से ज्यादा पुंगड बाँझ।
बहुत देर तक बौ दगड छ्वीं लगाणाई रौं। मीन पुछ ए बौ तु बी दिल्ली चली जाँदि। बौ न ब्वाल क्या बोन द्यूर, गे त छे। चार मैना रौं। बहुत ख़्याल राख वून। म्यार ही मन नी मान। कख गाँव, कख द्वी कमरों कु बंद मकान जैकुण फलैट बोल्दन। न कै दगड उठण बैठण न बात चीत। सब दर्वाज बंद करीक बैठ्यां रंदन। बेटा ब्वारी दिल्ली घुमाणकु लिगिन। सब जगह भीड़ ही भीड़। म्यार त जन दम घुट्यूण रै। मी त बिना बोल्यूं सुन्यूं रै नि सकदु। वख कैक दगड बोलन, कैकि सुनन।
यखी ठीक च। चार बीसी उमर हूण कुन च। अब कतुक रण। टकेरी मा बैठ्यूं रौंदूँ। सब्यूंक दगड बोल चाल च। ख़ाली ख़ाली नी लगदु। वन त अब ज्याद लोग नी छन गाँव मा पर जतुक बी छन, म्यार अपण छन। सरकार कुछ दे दींद। मी त दुकानीम जै नी सकुदु पर जै कुण बी बोलि दींदु, ना क्वी नी करदु। दुकानदार दुकानीम जाण से पैली पुछि लींदु कुछ चायांणाई त नी। दिल्ली वाल बी आंदन । वूंकि बी अपरि ज़िम्मेदारी छन। जब तक हाथ खुट चलणाई छन, ढीक च। ऐथर कैन द्याख।
बाकी तु सुणा। अब मी क्या सुणौ?

Copyright@ Hari lakhera

Bhishma Kukreti

  • Hero Member
  • *****
  • Posts: 18,227
  • Karma: +22/-1
 
न बि बत्यांद छै बल।

by Hari Lakhera

हमार गौं मा  एक कजै और वेकि कज्यांण रैंदी छै। दिन रात झगड़ा। कजै सिनख्वाल कच्ची लगै ल्वो और शुरू सलिकि, बीच बीच मा कज्यांणि तै हितराड, तीन यन नी कर, तन नी कर। बस अपणि रंगालि, मील यन कर तन कर।
कज्यांण जब नि सै सकु त भणकण्या ह्वे गे और भताड कजै से तंग ऐ गे। रोज़ रोज़ कि विखलाण। लमाला संगेठीण, चलि गे मैत।
कजै तै लौल्याट। मगर बिटि पाणि कु लालु।गौडि कु पिजालु। रस्वे कु कौरुलु। भनख्या ह्वे गे। सब रंगालि खतम। रतकालि बि नि हूंण दे। पौंचि गे कज्याणीक गौं। कज्यांणीक बुबा बि कम ना। यकच्वट्या  भेलगाली कि बौछार। लंठ, भताड, भैरगडडू, फफंडि और पता नी क्या क्या जु मन मा ऐ बोलि द्यै वेकुण। वैन ज़ुबान नी खोलि।
नसेटि कज्यांण बि चुप चुप मज़ा लीणै रै। बैसनार छे। क्या करदि। लग्द-बग्द थैला उठाई, कजैक हाथ खींच और ब्लाल चल घर, नरभाग्गी नी हूंद त यतना ग़ालि सुणुदु।
अब सब ठीक चलणै च बल। नौनक संदौण कजै करद बल।

Copyright@ Hari Lakhera

Bhishma Kukreti

  • Hero Member
  • *****
  • Posts: 18,227
  • Karma: +22/-1
मीनि नी खाई, त तिताई क्या दीण

(गढ़वाली बुज़ुर्गों के लिये ख़ास)

by Hari Lakhera


बात पुराणि च पर कुछ बात कभी पुराणि नी हूंदी।
गैणा दाद्दी बहुत सुंदर छे। चेहरा मोहरा कि बात नि छौं करणाई, स्वभाव कि बात च। वन अपर टाइम पर चेहरा मोहरा से बी सुंदर ही रै ह्वेलि। कभी कैक दगड झगड़ा करद नी द्याख , कैताई गाली दींद नी सूण। ज्याद बोल्दी भी नी छे। मेरी याद दास्त क हिसाब से जब मि दसैक सालूक रै ह्वोलु त दाद्दी सत्तर पिचात्तरैकि रै ह्वेली। द्द्दा त कब्येक चल ग्या छे। द्वी बेटी और एक बेटा छे। बेटी त पराया धन हूंदी छन । बेटा, ब्वारी, नाती नतणा सबीछे। पुंगडी पाटलि बी खार्यूं छे। दाद्दीक मैका खांद पींद  परिवार छे ,बल। वे टाइम पर पैसा वाल से मतलब लखपति करोड़पति से नी छे। जैम द्वी चार सौ भी छै त वी भी पैसा वाल ही छे। पुराण लोग बोल्द छे कि दाद्दी ज़ेवरों से लदीं कन ऐ छे। सोनैकि बुलाक, बुंदा, मुरखुल, चाँदी की तगड़ी, पता नी और क्या क्या। दद्दा खेती बाड़ी भी खूब ही छे। कपड़ा, लत्ता, लूण, गुड, तेल, तंबाकू वास्त द्वी मैना कुण कोटद्वार जैकन कुछ कर लींद छे, बस। लडक्यूंक व्यौ बी बढिया  से कर। मीन त कबी द्याख नी पर सुणन मा आंद छे की दाद्दी कमरा मा एक बड़ संदूक छ और सारी ज़ेवर वैक अंदर छन। दाद्दी क कमरा मा कैताई जाणैकि हिम्मत नी छे। जब भी कखी जाँदि त ताल लगाइक ही जांदी छे।
चैतू काका घरम ही रंद छे। पैली मम्मी कुण ब्येई, डैडी या पापा कुण बाबा, ताऊ कुण बाडा, ताई कुण बौडी, चच्चा कुण काका, चाच्ची कुण काकी, बुआ कुण फूफु, बोल्द छ्या। अब त ज़्यादातर अंकल आंटी ह्वा गीन, काम आसान ह्वे ग्या। ख़ैर, खेति बाड़ी गुज़ार लायक ह्वे जांदी छे किलाई कि चैतू काका खेती क तरफ़ ध्यान ही नि
छे। बस हुक्का गुड़गुणाई रौंद छे। द्वी चार फ़सली खेत बेचीक बेटी क व्या कर। दाद्दी बुढ़्या ह्वे ग्या त सारी काम काकी हि करदि छे। गोर गुठ्यार, खेती बाड़ी सब काकी क ज़िम्मा। साथ मा स्कूल जाण वाल द्वी बेटा। दिन भर लगीं रैंदन छे। थोड़ा चिड़चिड़ी भी छे। काम क बोझ माँ क्वी भी चिड चिड़्या जांदु। दाद्दी दगड कम ही पटदि छे। दाद्दी त चुप ही रैंदी छे। संक्षेप मा गुज़ार बसर हूणाई छे।
दाद्दी कुछ बीमार सी रण लग्यां छे। ज़्यादातर कमरा मा ही रैंदी छे। साल छ मैना यनी बीत। बुखार और खाँसी न जाण क नाम ही नी ल्याइ। खाणुक भी कम ह्वे ग्या छे। कमज़ोर ह्वे गे छे। सारी देखभाल काकी क ऊपर। एक उम्मीद छे कि मरण क बाद संदूक म्यार ही च। एक दिन जब दाद्दी भैर जाईं रै त तकिया क तल् बिटीक चाबी निकाल् , तालु ख्वालु, सारी संदूक खंग्वाल पर कुछ नी मील। पुराण कपड़ों से भर्यूं छे। ग़ुस्सा त बहुत आई पर संदूक बंद कर, तालु लगाई और चाबी तकिया क तल् धर द्याइ।
वख दाद्दी जाण वाली और यख काकी कुण रगबगाहट। ज़ेवर छन त छन पर छन कख। दाद्दी ताई बताई भी नी सकदि कि संदूक भी छाँणी आलि। जरूर बुढियाक लुकाइक धरीं छन। बेटि आली और वूं ताई दे देलि। वूंक आण से पैली कुछ करण पडल्। सासु सेवा परम सेवा। काकी न दाद्दी क विश्वास जीतणैकि कोशिश और तेज़ कर द्याई। बीच बीच मा इशारा भी करणाई रै कि कुछ कैकुण बोलुण च या बताण च त बताई द्यावु।
जब लग कि जाणक दिन कब ऐ जा पता नी त साफ बात करण ही ठीक समझ। एक दिन पूछ ही द्या। ए जी वू ज़ेवर कख धरीं छन। मरीं सि आवाज मा दाद्दीन पूछ कु ज़ेवर, ए ब्वारी? जु कुछ छे बुढ्यान बेट्यूंक व्यौ मा लगा दे। बाकी चैतु ज़बरदस्ती ली ग्ये। कुछ नी रै। जब ड्वाला मा लै छे तभी पैरीन । सारी जिंदगी बच्चों ताई बड़ करण मा लगाई। ज़ू मील, जतुक मील वतीक मा समय काट। ब्वारी ! मीनि नी खाई त तिताई क्या दीण।

(आज भी स्थिति वही है। लड़के - बहू बूढ़े मा बाप की संपत्ति पर आँख लगाये बैठे है । देख भाल करना तो दूर, इस ताक मे हैं कि खिसकें तो जमीन- मकान हथियांयें। कुछ तो मार पीट करने से भी नही चूकते। जब तक जिंदगी है, ऐश करो, जो है अपने पास ही रखो। बाद मे जो बचेगा उनका है ही। )

Copyright@ हरि लखेडा।
जनवरी, 2018


Bhishma Kukreti

  • Hero Member
  • *****
  • Posts: 18,227
  • Karma: +22/-1
ग्यान विज्ञान

by Hari Lakhea


ग्यान बाडा गांव क पधानूक परिवार से छे। दसवीं पास छे। दिल्ली म सरकारी नौकरी । सब बढ़िया ।

ग्यान बाडा ताई संतान  प्राप्ति देर मा ह्वे। संतान मतलब पुत्र। संतान क नाम से त द्वी  बेटी ह्वे गे छे पर बेटी त पराय धन हूँद। चिता मा  आग कु द्यालु।   अगर पुत्र नि हूणाई च त पत्नी मा खोट। तारा बौडी भी दुखी । कत्ती टोटका करीन, देवी देवता पूजीन तब पुत्र लाभ  ह्वे। बौडी धन्य ह्वे गे।

पुत्र प्राप्ति ह्वे त भंडारा करीक  सारी गांव  क आशीर्वाद पाई । पंडित जीन नाम राख विज्ञान । ग्यान बाडा कु विज्ञान । विज्ञान क आण से घर मा रौनक। अब त विज्ञान क हि सहारा च। मजाल च कि वेकुण  क्वी   अंगुलि भी  उठाई सक। बानिक बानिक क कपड़ा,  खिलौना । द्वी  साल की उम्र मा धूमधाम से मुन्डन,  ग्यारह साल की उम्र मा यज्ञोपवीत । सबूक लाडला ।

विज्ञान एक  प्राईवेट स्कूल मा पढदू छे। आठवीं तक त सब ठीक छे । स्कूल से क्वी शिकायत ना। पढण मा कुछ       खास ना पर ठाट मा क्वी कमी ना। कन्नी कैक बारहवीं पास कर और एक कौलेज मा एडमिसन भी ह्वे गे। बाडा न कालेज जाणकुण मोटरसाइकिल भी दे द्यै। वन त बाडा भी क्वी धन्यासेठ नि छे, ऊपर से महंगाई। बेटि भी बड़ी ह्वे गे छे । द्वी  बरहवीं पास करीक घरम बैठी छे। कैकी भी सरकारी नौकरी नी लगाई पाई। प्राईवेट जगह छोटी छोटी नौकरी करणाई लगी छे । रिस्ता  ऐ त छन पर बात नी बणि। कै ताई सरकारी नौकरी वाली चायेणी छे,  कै ताई कार न त मोटरसाइकिल या नकद। बड़ी मुश्किल से द्वी बेटि बिदा करीन।

वन त बाडा जेब खर्च कुण कमी नी करद छे पर विज्ञान कुण कभी पूर नी पौड़। चोरी छुपे क  बौडीम से भी  मील जान्द छे।
कभी कभी त हड़कैक भी ले लीन्द छे ।

और बाडा रिटायर ह्वे गेन। सरकारी क्वार्टर भी ग्ये। प्राविडैन्ट फन्ड त बेट्यून्क व्याह मा खतम । पेंशन से गुजर मुश्किल । गांव वापस  ऐ गीन। विज्ञान कुण खर्च भेजणाई रैन। पर वैकी मांग पूर करणैकी हिम्मत खतम ह्वे गे छे। जतूक ह्वे सक भेजणाई रैन।

एक दिन कैन ब्वाल कि विज्ञान कुसन्गत मा पड़ी गे। पढाई छोड़ीक कुछ अलग काम करणाई च। बाडा दिल्ली गे पर वैकी ठाट बाट देखीक दंग रै गे। चार पांच दिन रैकन वापस चलि गे। क्या काम करद इ त पता नी चल पर रात रात भर घर से गायब रौणक मतलब कुछ बढ़िया नी लगु।

फिर कैन बताई कि पुलिस पकड़ीक ली गे। बाडा दिल्ली गेन, ज़मानत पर छुड़ाई, गांव लाणैकी कोशिश कर पर नी आई। अब न चिठ्ठी न क्वी खबर।

कैन अखबार मा ख़बर द्याख । एक नवयुवक लगभग 27 बर्ष गैन्ग गोलीबारी में मरा। फोटो से पता चल कि विज्ञान च। बाडा दिल्ली गे। दाह संस्कार करीक वापस आ ग्ये।

बाडा भी नि रै। अन्तिम संस्कार बड़ी बेटीन कर।


Bhishma Kukreti

  • Hero Member
  • *****
  • Posts: 18,227
  • Karma: +22/-1
  Baghai Bani: Garhwali Tale illustrating the reasoning for Tiger becoming Man-Eater
(Chronological History and Review of Modern Garhwali Stories series )
( Review of Story ‘ Baghai Bani ‘(213,written by Mahesha Nand )
Review by Bhishma Kukreti ( Literature Historian )
-
   Those lived in rural Garhwal they knew that Tigers don’t attack human beings nor they kill their prey until they are hungry.
         However, these days, it is common Guldar or Tigers or leopards attacking human beings and eating human flesh too.
   Mahesha Nand xplains the reason for tigers or Guldar becoming Man-eater through his modern story ‘Baghai Bani’ . 
Mahesha Nand is successful in telling the story through personification style. In this story, Tiger and Tigress talk as human beings talk.  The dialogues between tiger snd tiger open many secrets of relationship among forest , humans and wild animals.
Mahesha Nand showed the hunger , the tragedy emotional of hunger and then he also discusses the real difference between Pap and Punya (sins and virtues ).
  As Mahesha Nand famous for using words those are no more in common uses among Garhwali for illustrating story.
The dialogues between tiger and tigress are interesting and offer interest to the readers .
Over all the story puts sound impression on readers for protecting the forest and environment .
Copyright@ Bhishma Kukreti , May 2019
Garhwali Story – Baghai Bani
Story taken from collection Augar by Mahesha Nand
Publication Year -2013
Publisher Khabar Sar Prakashan ,Ppauri
Copyright@ Bhishma Kukreti, May 2019
 Garhwali Stories about Forests, man-eater from Pauri Garhwal; Garhwali Stories about Forests, man-eater from Chamoli Garhwal; Garhwali Stories about Forests, man-eater from Rudraprayag Garhwal; Garhwali Stories about Forests, man-eater from Tehri Garhwal; Garhwali Stories about Forests, man-eater from Uttarkashi Garhwal;


Bhishma Kukreti

  • Hero Member
  • *****
  • Posts: 18,227
  • Karma: +22/-1
Gaun Gali: A Garhwali Short Story illustrating hard hitting changes in rural Garhwal
-
(Chronological History and Review of Modern Garhwali Short Stories series)
(Review of Short story Collection ‘Meru Pahar ‘written by Rakesh M. Thapliyal-1)
 (Review of ‘Ganv Gali a short story written by Rakesh M. Thapliyal )

Review by: Bhishma Kukreti (Literature Historian)

   ‘Gaun Gali’ is first Garhwali short story of story collection ‘Meru Pahar ‘ by Rakesh Mohan Thapliyal (born in Tehri, 1954) . Rakesh Mohan is famous for penning down memoir of sunken Tehri or the sunken capital of Tehri Riyasat too.
      Gaun Gali is the story of a migrated Garhwali visiting his village after many years  narrated through dialogues. The migrated Garhwali toured his village for attending a marriage party .The writers illustrate all changes happening through dialogues between two or many characters. The liquor consumption has become very common and the Hero tastes every bit of liquor in the marriage as soon as he gets down from the bus to his village bus stop. The story takes the readers back thirty years and compares the today’s situation. The changes frustrate the hero or Migrated Garhwali that there are good comfortable physical changes but many unavoidable changes now dangerous for the society. The story writer is himself the migrated Garhwali and plays a neutral man role for narration the situation. 
  Story teller also shows now , cold relationship between him(Migrated one) and his parents due to his ignoring them due to unknown conditions. Thapliyal nether praises the new situation nor criticizes but the story tells that the story teller is injured and heartbroken
  The style is definitely different that the narration is through dialogues but story writer did not use inverted coma or name of dialogues.   
    The language has Tehri dialects but is not hurdle in speed for story. The dialogues are s per character and readers enjoy each dialogue.
   Sanjay Kothiyal the editor of Yogvani rightly states that the readers feel the charcters as seen by their own eyes.
This author enjoy the story .
Copyright@ Bhishma Kukreti
 
 
     


Bhishma Kukreti

  • Hero Member
  • *****
  • Posts: 18,227
  • Karma: +22/-1
Teeri Dam: A Garhwali Fiction witnessing pain of Sinking Tehri City

Chronological History and Review of Modern Garhwali Short Stories/Fiction  series)
(Review of Short story Collection ‘Meru Pahar ‘ (Stories written by Rakesh M. Thapliyal-1)
 (Review of ‘Teeri Dam’ a short story (story written by Rakesh M. Thapliyal )

Review by: Bhishma Kukreti (Literature Historian)

Tehri  city had been important town or city in literature of Garhwal. Dr Mahavir Prasad Gairola wrote a couple of stories surrounding Tehri (now sunk). Many Garhwali poets illustrated the pain of sinking Tehri for development making (modern India) . Rakesh Mohan Thapliyal is First Garhwali fiction writer that penned down as a witness the stories of sinking Tehri once the capital of Garhwal Kingdom. Yes! The Story ‘Teeri Dam’ contains tens of small stories. In Fact, Rakesh Mohan tried condensing the  subject of a standard novel into 7000 words short story.
 The story starts from an old women visiting (frustratingly) to land settlement department and then opens a panorama of characters by characters telling the incidents; there are pains of people displaced or would be displaced, there are pains of getting compensations from settlement office, there are nepotism, corruption, lethargy in settlement office and various principles about dam constructions in the said story Teeri dam by Rakesh. Rakesh takes the readers to the history of Tehri city and also introduces with Chipko Hero Sundar Lal Bahuguna and his sayings about Dam.
     The biggest back draw of the story is that there are many subjects in short story and in reality the plot is suitable for novel .A common reader likes story with one single or double plot, aim and subjects.
The subjects of the story are still live for discussion among politicians, administrators, anthropologists, environmentalists and societies too.
  The story is narrated through dialogues that also makes complex situation for readers understanding the characters.
 Rakesh Mohan tried his best to capture the scene of 100 years of picture of Tehri history and ten years of Dam construction. He is successful in illustration his aim.
Dialogues are as per characters, time and place. Rakesh uses successfully similes and metaphors for speeding up the story line too. This author never visited Old Tehri but by reading the said story, this author could easily view the Old Tehri, the beloved Tehri and constructing the Dam on Reverend Rivers Bhagirathi –Bhilangana confluence. 
  The language is from Tehri region and does not make any difference for  a reader from Dhangu, (South Pauri Garhwal), Rath (upper Pauri Garhwal or Neeti (China border Chamoli) for understanding the language. Rakesh proved wrong the supporters of standard Garhwali is the only alternate for Garhwali literature.
Copyright@ Bhishma Kukreti
 Modern Garhwal Fiction /short stories from Uttarkashi Garhwal, South Asia; Modern Garhwal Fiction /short stories from Tehri Garhwal, South Asia; Modern Garhwal Fiction /short stories from Pauri Garhwal, South Asia; Modern Garhwal Fiction /short stories from Rudraprayag Garhwal, South Asia; Modern Garhwal Fiction /short stories from Dehradun Garhwal, South Asia; Modern Garhwal Fiction /short stories from Garhwal, South Asia; Modern Garhwal Fiction /short stories from Haridwar Garhwal, South Asia;


Bhishma Kukreti

  • Hero Member
  • *****
  • Posts: 18,227
  • Karma: +22/-1
Daraiber: A Garhwali Short Story depicting daily life of Hill drivers

Chronological History and Review of Modern Garhwali Short Stories/Fiction Series)
(Review of Short story Collection ‘Meru Pahar ‘ (Stories written by Rakesh M. Thapliyal-1)
 (Review of ‘Daraibar ’ a short story (story written by Rakesh M. Thapliyal )

Review by: Bhishma Kukreti (Literature Historian)

 Daraiber story is third story from story collection Meru Pahar ‘by story teller Rakesh Mohan Thapliyal. The ‘Daraiber’ story is very simple story about daily life of drivers of truck and buses from Hills of Uttarakhand. The story is twist less and simple. Yugvani editor Sanjay Kothiyal rightly appreciates Thapliyal that he was able for depicting real life of drivers, conductors driving truck and buses in Hills of Uttarakhand.
   The story has dialogues but as Thapliyal’s style there are no inverted comas or separation methods showing dialogues. The language is from Tehri Garhwal and easily under stable. It is difficult for story teller to make a twist leaas story attractive but Rakesh Thapliyal has been susccsful in making the story attractive.
Story – Daraiber
From Story Collection ‘Meru Pahar by Rakesh Mohan Thapliyal
Year 2014
Pub- Yugvani Dehradun
Copyright@ Bhishma Kukreti
 Modern Garhwal Fiction /short stories from Uttarkashi Garhwal, South Asia; Modern Garhwal Fiction /short stories from Tehri Garhwal, South Asia; Modern Garhwal Fiction /short stories from Pauri Garhwal, South Asia; Modern Garhwal Fiction /short stories from Rudraprayag Garhwal, South Asia; Modern Garhwal Fiction /short stories from Dehradun Garhwal, South Asia; Modern Garhwal Fiction /short stories from Garhwal, South Asia; Modern Garhwal Fiction /short stories from Haridwar Garhwal, South Asia;



Bhishma Kukreti

  • Hero Member
  • *****
  • Posts: 18,227
  • Karma: +22/-1
Parya: A bad story style from a learned literature analyst
(Chronological History and Review of Modern Garhwali Short Stories/Fiction Series)
(Review of Short Story Collection ‘Udrol’ (Stories written by Sandeep Rawat -1  )
 (Review of ‘Parya’ a
Garhwali Short story (Story written by Sandeep Rawat  )
Review by: Bhishma Kukreti (Literature Historian)
-
 Parya a Garhwali story  is as “There was a king and Queen and both died and that is the end of story”.  There are worse than this story in Garhwali and I never criticized badly those stories. However, when a literature analyst as Sandeep Rawat publishes ‘Parya’ type story it is painful for me and for the whole Garhwali literature community.
 Garhwali literature creative have more responsibilities than Hindi writers that their literature create more readers and make Garhwalis habitual of reading Garhwali prose. However, the’ Parya’ story by Sandeep frustrates me. The story is real one that a young woman loses her husband and she nurtures her two sons by raising buffalos and agriculture.  The potentiality is very high in the plot for showing struggle, pain and brave heart of the young widow but Sandeep fails on taking advantages of the potential plot.
   
Garhwali short Story – Parya
By Sandeep Rawat
From ‘Udrol’ a Garhwali Short Stories  Collection
Pub: Utkarsha Prakashan Meerut
Year – 2017
Copyright@ Bhishma Kukreti, 2019
 Modern Garhwal Fiction /short stories from Uttarkashi Garhwal, South Asia; Modern Garhwal Fiction /short stories from Tehri Garhwal, South Asia; Modern Garhwal Fiction /short stories from Pauri Garhwal, South Asia; Modern Garhwal Fiction /short stories from Rudraprayag Garhwal, South Asia; Modern Garhwal Fiction /short stories from Dehradun


Bhishma Kukreti

  • Hero Member
  • *****
  • Posts: 18,227
  • Karma: +22/-1
Jhees: A Garhwali Story discussing pros and cons of Inter-Caste Marriage

(Chronological History and Review of Modern Garhwali Short Stories/Fiction Series)
(Review of Short Story Collection ‘Udrol’ (Stories written by Sandeep Rawat -3)
 (Review of ‘Jhees’ a Garhwali Short story (Story written by Sandeep Rawat)

Review by: Bhishma Kukreti (Literature Historian)
-
 Jhees story by Sandeep Rawat raises the discussion on inter-caste marriage. Two [air fell in love from the childhood and they desire to marry with each other too. However, society rules, culture and future do not allow for inter –caste marriage.
  The story narration is simple and having common proverbs as Machhi Pani jan Jyu Paran. Sandeep followed the story telling style of folk story telling style that is simplest way. The story lacks romance that was a must in such plot. However, Sandeep leaves a question for the readers and up to certain extent , that makes story impressive.
Garhwali short Story – Jhees 
By Sandeep Rawat
From ‘Udrol’ a Garhwali Short Stories Collection
Pub: Utkarsha Prakashan Meerut
Year – 2017
Copyright@ Bhishma Kukreti, 2019
 Modern Garhwal Fiction /short stories from Uttarkashi Garhwal, South Asia; Modern Garhwal Fiction /short stories from Tehri Garhwal, South Asia; Modern Garhwal Fiction /short stories from Pauri Garhwal, South Asia; Modern Garhwal Fiction /short stories from Rudraprayag Garhwal, South Asia; Modern Garhwal Fiction /short stories from Dehradun


 

Sitemap 1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12 13 14 15 16 17 18 19 20 21 22