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Different Rituals of Worshiping God in Uttarakhand- देव पूजन की विभिन्न मान्यता

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, December 02, 2009, 10:50:59 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बैसी -

संक्रान्ति के ही दिन ग्राम-देवताओं को हरेला चढ़ा कर उनकी ध्ूमियाँ
जगाई जाती है। सभी ग्रामवासी सामूहिक रूप से अपने ग्राम-देवताओं- हरू, सैम, गोरिया,
गंगानाथ आदि को ध्ूप-दीप-नैवेद्य चढ़ाते हैं। नवरात्रियों में अनेक स्थानों पर 'बैसी' का
आयोजन होता है। बैसी ग्रामवासियों का सामूहिक धर्मिक उत्सव है। इसमें सभी ग्रामवासियों
को अनिवार्यतः भाग लेना पड़ता है। कभी-कभी आस-पास के अनेक गाँव मिल कर सम्मिलित
रूप से बैसी का आयोजन करते हैं। बैसी का व्रत रखने वाला पुजारी 22 दिनों तक ब्रह्मचर्य
व्रत का पालन करते हुए त्रिकाल स्नान और त्रिकाल संध्या करता है और दिन में केवल एक
बार भोजन करता है। ढोल नगाड़ों के साथ रात भर लोक देवताओं की गाथाओं के पफाग गाये
जाते हैं और डंघरिया नृत्य करते हैं। रात्रि में भ्वींन और झोड़े भी गाये जाते हैं। वैसी की पूर्णता
पर नृत्यरत देवता गाँव की परिक्रमा करके सारी बाधओं को गाँव की सीमा से बाहर खदेड़ आते
हैं और सीमा का कीलन कर आते हैं। वैसी की बाईस दिन केउत्सव की परम्परा अब समाप्त
प्राय है। अब 11 वें दिन यह अनुष्ठान पूरा कर लिया जाता है। बैसियों में प्रसाद के रूप में
'रोट' बांटा जाता है। ग्रामीण जन अपने-अपने घरों से सबसे बड़े कद्दू, लौकी, तुम्बी लाकर
पूजा स्थल पर तोड़ते हैं। यह दृश्य शाक-उत्पादन प्रतियोगिता जैसा लगता है। बैसी उत्सव का
र्ध्म के साथ ही कृषि जीवन से भी अभिन्न संबंध् है। इस दृष्टि से वैसी कुमाऊँ की अत्यन्त
प्राचीन पूजा-प(ति ठहरती है।

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आठूँ -

भादौं के शुक्लपक्ष की अष्टमी को स्त्रिायां दूर्बा देवी की पूजा अर्चना
करती हैं और व्रत रखती हैं। इसीलिए इसे दूर्वाष्टमी भी कहा जाता है। इस दिन अग्नि में पका
हुआ अन्न नहीं खाया जाता । कुछ लोगों का मानना है कि त्यौहार दुर्वासा ट्टषि की पुण्यस्मृति
में मनाया जाता है। दूर्वाष्टमी के दिन गोपियाँ पकवान एवं मिष्ठानादि लेकर दुर्वासा ट्टषि के
आश्रम की ओर जा रही थी, मार्ग में जमुना पड़ती थी। उसे पार करना कठिन था। गोपिाँ रूक
गयी। तभी वहाँ नारद जी आये। उन्होंने गोपियों से कहा - ''तुम लोग ऐसा प्रण करो कि हे
जमुना यदि कृष्ण एक पत्नीव्रतधरी हैं, मार्ग देना, अन्यथा न देना।'' प्रण के अनन्तर जमुना ने
मार्ग दे दिया। ऊपर का पानी ऊपर की ओर और नीचे का पानी नीचे रूक गया। गोपियाँ दुर्वासा
के पास पहुँची। ''दूबाहारी'' कहे जाने वाले मुनि के सारे पकवान खा लिये । गोपियां लौट आई।
जमुना वैसे ही अथाह थी। नारद जी वहीं थे। उन्होंने कहा- ''हे जमुना, यदि दुर्वासा मुनि केवल
दूब का ही आहार करने वाले हैं तो मार्ग देना अन्यािा ने देना।'' जमुना जी ने पुनः गोपियों के
लिए मार्ग छोड़ दिया। गोपियाँ अपने घर पहुंची किन्तु उनके मन में दुर्वासा के आहार के प्रति
संका बनी रही। उन्होंने कृष्ण से यह बात कही। तब कृष्ण ने उनकी शंका का समाधन करते
हुए कहा- ''हे गोपियो, ये तुम्हारी भावनाएं हैं। जैसे में एक पत्नी व्रतधरी हूँ, वैसे ही ये
मुनिश्रेष्ठ केवल दूब का आहार करते हैं।''23
पूर्वी कुमाऊँ में दूर्वाष्टमी का त्यौहार कुछ भिन्न रूप में मनाया जाता है। इस अवसर
पर कुँआरी कन्याएँ खेतों से सवाँ की गमरा ;गौराद्ध और चूख का मैंसर ;महेश्वरद्ध बना कर
आँगन में लाती है और गमरा-मैंसर के गीत गाती है। मनोरंजन हेतु ''हिरनचित्तल'' का
आयोजन होता है। ढोल-नगाड़ों के साथ गमरा का स्वागत किया जाता है। गमरा के आगमन
के दिन सभी लोग नए कपड़े पहनते हैं। कुछ दिनों तक खेल लगते हैं। नाच-गान और खूब
उल्लास रहता है। इस दृष्टि से आठूँ का यह उत्सव प्राचीन प्रतीत होता है। इस लोकोत्सव को
संबंध् भी कृषि जीवन से है।

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हरताली व्रत -

भादौं के कृष्णपक्ष की तृतीया को महिलाओं द्वारा अपनी सुहाग की रक्षा के निमित्त यह व्रत रखा जाता है। इस दिन सामवेदी लोगों द्वारा हस्त नक्षत्रा में उपाकर्म किया जाता है।

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बैसी यानी देव अवतरण की अलौकिक गाथा  बेतालघाट    बेतालघाट: ढोल की गर्जना, नगाड़ों की अंतर्मन को झंकृत करती टंकार। धूणी (एक किस्म का अग्निकुंड) के चारों तरफ दुलैंच यानी विशेष गद्दी में बैठे तपस्वियों के शरीर पर आ ान के साथ लोक देवताओं का अवतरण। यही है कौतुहल से भरी देवभूमि की पारंपरिक व धार्मिक अनुष्ठान से जुड़ी बैसी, जो देव अवतरण की अलौकिक गाथा और उत्तराखंडी सांस्कृतिक विरासत को खुद में समेटे है। दरअसल, केदारखंड व मानसखंड के लोक देवताओं के आ ान की पौराणिक परंपरा बैसी का आयोजन श्रावण मास में ही होता है। चूंकि देवभूमि के समस्त लोक देवता मसलन, न्याय देवता गोलज्यू महाराज, गंगनाथ, शैम आदि का निवास स्थान हिमालय माना जाता है, लिहाजा साझ की गोधुली बेला पर दास व डंगरिए (देवदूतों के रूप) ढोल व नगाड़ों की मिश्रित गर्जना व टंकार की झंकृत करने वाली धुन के बीच वीर गाथा के जरिए आ ान करते हैं। खास प्रांगण पर चारों तरफ लोक देवताओं के अवतरण को दुलैंच यानी विशेष गद्दी बिछी होती है। इसमें अक्षत, पुष्प एवं भेंट रखी जाती है। वीर रस की हुंकार जब चरम पर पहुंचती है तो देवों का अवतरण दुलैंच पर बैठे तपस्वियों के शरीर पर होने लगता है। खास बात है, दास व डंगरिए इस बीच लोक देवताओं के शौर्य, पराक्रम, अन्याय के खिलाफ जंग, कठिन परिश्रम आदि का बखान करते हैं। देवअवतरण पूर्ण होने पर फिर दौर शुरू होता दीन-दुखियों की फरियाद सुनने का। आसमान को छूती लपटों वाली धुणी में तप कर लाल हुआ चिमटे को लोक देवता का अवतारी चाट कर या शरीर पर पीट शांत करता है। यह सब हैरतअंगेज होता है। अंगारों पर चलना और उन्हें निगल जाना तो और भी भयंकर। मगर इससे अवतारी को तनिक भी क्षति नहीं पहुंचती। 22 दिन की घोर तपस्या यानी बैसी के अंतिम दिन लोक देवताओं को पुन: हिमालय के लिए रवाना किया जाता है।   (source - Dainik Jagran)   

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

News about Baisi (22 days worship) in Almora

नाफड़ा में भंडारे के साथ बैसी संपन्न



चमड़खान: समीपवर्ती नाफड़ा गांव में आयोजित 22 दिवसीय बैसी का शुक्रवार को विशाल भंडारे के साथ समापन हो गया। जिसमें क्षेत्र के सैकड़ों ग्रामीणों ने भागीदारी कर भंडारे का प्रसाद ग्रहण किया।
नाफड़ा की धूणी में 22 दिवसीय बैसी का आयोजन किया गया था। जिसमें राम सिंह व दिनेश उपाध्याय के गुरू सानिध्य में जगत सिंह पधान, भजन सिंह, भूपेंद्र सिंह, शंकर सिंह, मोहन सिंह, जगत सिंह बिष्ट, भारत सिंह, गणेश सिंह, हरीश सिंह, देवेंद्र खाती, आनंद सिंह आदि ग्रामीण भक्ति में बैठे थे। बैसी के दौरान धूणी में पूजा-अर्चना के साथ प्रतिदिन जागर का आयोजन कर देवताओं का अवतरण किया गया। जिसमें क्षेत्र की खुशहाली की कामना की गई। समापन पर शुक्रवार को धूणी में पूजा-अर्चना के साथ विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान संपन्न कराए गए। इस अवसर पर विशाल भंडारे का भी आयोजन किया गया। जिसमें क्षेत्र के सैकड़ों श्रद्धालुओं ने प्रसाद ग्रहण किया। आयोजन में राकेश सिंह, शंकर सिंह, शौर्य पदक प्राप्त कर्नल सुंदर सिंह आदि ने सहयोग किया।
(dainik jagran)