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Different Rituals of Worshiping God in Uttarakhand- देव पूजन की विभिन्न मान्यता

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, December 02, 2009, 10:50:59 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Dosto,

उत्तराखंड की देव भूमि जो की देवी देवताओ का निवास है, ऋषि मुनियों की तपो भूमि है! जहाँ पग-२ पर मंदिर है! यह पवित्र भूमि है! देवी देवताओ के इस निवास स्थान पर उनकी अलग -२ जगहों विभिन्न विधियों के पूजा होती है!

हम इस थ्रेड में देव देवताओ के पूजन की विभिन्न रीती रिवाजो के बारे में यहाँ पर जानकारी देंगे ! आशा है आप लोग इस अपने-२ क्षेत्रो के जुडी मान्यताओ के बारे में यहाँ पर जानकारी देंगे में सहायता करेंगे ताकि हमारी नयी पीड़ी और जिन लोगो को इन धार्मिक रीती रिवाजो के बारे में जानकारी नही है, वो भी अपने आप को इन जानकारियों के बारे में अवगत करा पाएंगे !

एम् एस मेहता 

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


जागर
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उत्तराखंड में जागरण को जागर भी कहते है!  जागर दो प्रकार का होता है !

१)   जागर -   देवी देवताओ के यज्ञ के रूप में, जहाँ पर रात जगरिया देवी देवताओ का आह्वान करता है! इसमें वह देवताओ में विशिष्ट चमत्कार के बारे में वर्णन करता है !  बाद में किसी पुरुष या महिला में वह देवता अवतरित होता है और भक्त जनों को आशीर्वाद देता है !

इस विषय में अधिक जानकारी के लिए हमारा यह लिंक देखे  

http://www.merapahad.com/forum/culture-of-uttarakhand/jagar-calling-of-god-from-uttarakhand/

२.  दूसरा जागर - भूत आत्मा या प्रेत आत्मा के शांति के लिए ! यह जागर भी रात में जगरिया के द्वारा गाया जाता है! जिसमे कोई व्यक्ति की यदि समय से पहले मृत्यु हो जाती है, या इसकी आत्मा को शांति नहीं मिली है, उसके शांति के लिए यह जागर किया जाता है !

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घन्याली
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यह भी एक प्रकार का जागर है!  घन्याली में, विशेष कर, आचारी परियो, सिधुवा रमोल, चन्डी देवता और अन्य वांण देवताओ का आह्वान किया जाता है!  देवी देवताओ के वीरता और चमत्कार की स्तुति करने वाले व्यक्ति को घनिय्या कहते है!

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पच्पयी
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देवी के नव रात्रियों के दौरान यह पूजा का आयोजन किया जाता है! पच्पयी मतलब, पांच जन्तुवो की बलि से पूजा!  इस पूजा में अष्टमी के पाच जीवो, भैसा, बकरा, मुर्गी, छिपकली और सूअर की बलि दी जाती है !

यह पूजा आयोजन के लिए!  आठ दिनों तक एक प्रकार का जागरण होता है जिसमे सुबह, शाम दोल दमाऊ के साथ देवी की आरती होती है !

Devbhoomi,Uttarakhand

उत्तराखंड मैं नागराज पूजन

  नागराजा गढ़वाल और कुमाऊँ का प्रमुख देवता है,उत्तराखंड के गढ़वाल और कुमाऊँ मैं नागराजा को भगवान् श्री कृषण के रूप मैं पूजा जाता है ! इसमें नागराजा के पासवा(जिस आदमी पर ये देवता आता है )   को डौंर-थाली को बजाकर नचाया और पूजा कि जाती है !

इसकी पूजा कृषण जन्म के प्रारंभ मैं  इसकी पूजा अर्चना कि जाती है और जागरों द्वारा डौंर थाली बजाकर नागराज को पूजा जाता है जिस ब्यक्ति पर देवता आता है वह धामी और जागरी और पंडित जी कि भाव भंगिमाओं  के अनुसार बैठकर पासवा की पूजा करके देवता को नचाया जाता है !

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धूनी
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यह भी एक प्रकार का जागरण होता है, जहाँ पर पूजा घर के आगन में धूनी जलाकर भगवान् की पूजा की जाती है !  विभिन्न देवी देवताओ की पूजा धूनी के रूप में होती है, जैसे सैम, हरु, गुसाई देवता आदि!

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वैस यानी वायस
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यह भी एक प्रकार की पूजा होती जो की वाइस दिन की होती है, लेकिन ११ दिन में ही समाप्त हो जाती है! रात दिन को लगाकर २२ दिन गिने जाते है !  हरु सैम देवता की विशेष रूप से २२ का आयोजन की जाता है !

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Ashtami
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This is dedicated to God Durga. This pooja is organized many parts of Uttarkahand. A eight days 'Jagran" is organized and "Bakra Bali" is given on the 8th day of the Pooja. That is why is called "Ashtami".

Aarti is performed three times every day. Devotees keep fast till all 8th days. 

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डिकारे
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डिकारे शब्द का शाब्दिक अर्थ है - प्राकृतिक वस्तुओं का प्रयोग कर मूर्तियाँ गढ़ना। स्थानीय भाषा में अव्यवसायिक लोगों द्वारा बनायी गयी विभिन्न देवताओं की अनगढ़ परन्तु संतुलित एवं चारु प्रतिमाओं को डिकारे कहा जाता हैं। डिकारों को मिट्टी से जब बनाया जाता है तो इन्हें आग में पकाया नहीं जाता न ही सांचों का प्रयोग किया जाता है। मिट्टी के अतिरिक्त भी प्राकृतिक वस्तुओं जैसे केले के तने, भृंगराज आदि से जो भी आकृतियाँ बनाई जाती हैं, उन्हें भी डिकारे समबोधन ही दिया जाता है।

हरेला का त्यौहार समूचे कुमाऊँ में अति महत्वपूर्ण त्यौहारों में से एक माना जाता है। इस पर्व को मुख्यतः कृषि और शिव विवाह से जोड़ा गया है। हरेला, हरियाली अथवा हरकाली हरियाला समानार्थी है। देश धनधान्य से सम्पन्न हो, कृषि की पैदावार उत्तम हो, सर्वत्र सुख शान्ति की मनोकामना के साथ यह पर्व उत्सव के रुप में मानाया जाता है। कुछ विद्वान मानते हैं कि हरियाला शब्द कुमाऊँनी भाषा को मुँडरी भाषा की देन है।

Source : http://tdil.mit.gov.in/CoilNet/IGNCA/utrn0044.htm

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


KNOW ABOUT THIS METHOD OF WORSHIP - STONE PELTING
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लोक मान्यता है कि किसी समय देवीधुरा के सघन बन में बावन हजार वीर और चौंसठ योगनियों के आतंक से मुक्ति देकर स्थानीय जन से प्रतिफल के रुप में नर बलि की मांग की, जिसके लिए निश्चित किया गया कि पत्थरों की मार से एक व्यक्ति के खून के बराबर निकले रक्त से देवी को तृप्त किया जायेगा, पत्थरों की मार प्रतिवर्ष श्रावणी पूर्णिमा को आयोजित की जाएगी । इस प्रथा को आज भी निभाया जाता है । लोक विश्वास है कि क्रम से महर और फव्यार्ल जातियों द्वारा चंद शासन तक यहाँ श्रावणी पूर्णिमा को प्रतिवर्ष नर बलि दी जाती थी ।

इतिहासकारों का मानना है कि महाभारत में पर्वतीय क्षेत्रों में निवास कर रही एक ऐसी जाति का उल्लेख है जो अश्म युद्धमें प्रवीण थी तथा जिसने पाण्डवों की ओर से महाभारत के युद्ध में भाग लिया था । ऐसी स्थिति में पत्थरों के युद्ध की परम्परा का समय काफी प्राचीन ठहरता है । कुछ इतिहासकार इसे आठवीं-नवीं शती ई. से प्रारम्भ मानते हैं । कुछ खास जाति से भी इसे सम्बिन्धित करते हैं ।

बगवाल को इस परम्परा को वर्तमान में महर और फव्यार्ल जाति के लोग ही अधिक सजीव करते हैं । इनकी टोलियाँ ढोल, नगाड़ो के साथ किंरगाल की बनी हुई छतरी जिसे छन्तोली कहते हैं, सहित अपने-अपने गाँवों से भारी उल्लास के साथ देवी मंदिर के प्रांगण में पहुँचती हैं । सिर पर कपड़ा बाँध हाथों में लट्ठ तथा फूलों से सजा फर्रा-छन्तोली लेकर मंदिर के सामने परिक्रमा करते हैं । इसमें बच्चे, बूढ़े, जवान सभी बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते हैं । बगवाल खेलने वाले द्यौके कहे जाते हैं । वे पहले दिन से सात्विक आचार व्यवहार रखते हैं । देवी की पूजा का दायित्व विभिन्न जातियों का है । फुलारा कोट के फुलारा मंदिर में पुष्पों की व्यवस्था करते हैं । मनटांडे और ढ़ोलीगाँव के ब्राह्मण श्रावण की एकादशी के अतिरिक्त सभी पर्वों? पर पूजन करवा सकते हैं । भैंसिरगाँव के गढ़वाल राजपूत बलि के भैंसों पर पहला प्रहार करते हैं ।

बगवाल का एक निश्चित विधान है । मेले के पूजन अर्चन के कार्यक्रम यद्यपि आषाढि कौतिक के रुप में एक माह तक लगभग चलते हैं लेकिन विशेष रुप से श्रावण माह की शुक्लपक्ष की एकादशी से प्रारम्भ होकर भाद्रपद कष्णपक्ष की द्वितीया तिथि तक परम्परागत पूजन होता है । बगवाल के लिए सांगी पूजन एक विशिष्ट प्रक्रिया के साथ सम्पन्न किया जाता है जिसे परम्परागत रुप से पूर्व से ही सम्बन्धित चारों खाम (ग्रामवासियों का समूह) गढ़वाल चम्याल, वालिक तथा लमगडिया के द्वारा सम्पन्न किया जाता है । मंदिर में रखा देवी विग्रह एक सन्दुक में बन्द रहता है । उसी के समक्ष पूजन सम्पन्न होता है । यही का भार लमगड़िया खाम के प्रमुख को सौंपा जाता है । जिनके पूर्वजों ने पूर्व में रोहिलों के हाथ से देवी विग्रह को बचाने में अपूर्व वीरता दिखाई थी । इस बीच अठ्वार का पूजन होता है । जिसमें सात बकरे और एक भैंस का बलिदान दिया जाता है ।

पूर्णिमा को भक्तजनों की जयजयकार के बीच डोला देवी मंदिर के प्रांगण में रखा जाता है । चारों खाम के मुखिया पूजन सम्पन्न करवाते है । गढ़वाल प्रमुख श्री गुरु पद से पूजन प्रारम्भ करते है । चारों खामों के प्रधान आत्मीयता, प्रतिद्वेंदिता, शौर्य के साथ बगवाल के लिए तैयार होते हैं ।

द्यीकों के अपने-अपने घरों से महिलाये आरती उतार, आशीर्वचन और तिलक चंदन लगाकर हाथ में पत्थर देकर ढोल-नगाड़ों के साथ बगवाल के लिए भेजती हैं । इन सबका मार्ग पूर्व में ही निर्धारित होता है । मैदान में पहँचने का स्थान व दिशा हर खाम की अलग होती है । उत्तर की ओर से लमगड़ीया, दक्षिण की ओर से चम्याल, पश्चिम की ओर से वालिक और पूर्व की ओर से गहड़वाल मैदान में आते हैं । दोपहर तक चारों खाम देवी के मंदिर के उत्तरी द्वार से प्रवेश करती हुई परिक्रमा करके मंदिर के दक्षिण-पश्चिम द्वार से बाहर निकलती है । फिर वे देवी के मंदिर और बाजार के बीच के खुले मैदान में दो दलों में विभक्त होकर अपना स्थान घेरने लगते हैं ।

दोपहर में जब मैदान के चारों ओर भीड़ का समुद्र उमड़ पड़ता है तब मंदिर का पुजारी बगवाल प्रारम्भ होने की घोषणा शुरु करता है । इसके साथ ही खामों के प्रमुख की अगुवाई में पत्थरों की वर्षा दोनों ओर से प्रारम्भ होती है । ढ़ोल का स्वर ऊँचा होता जाता है, छन्तोली से रक्षा करते हुए दूसरे दल पर पत्थर फेंके जाते हैं । धीरे-धीरे बगवाली एक दूसरे पर प्रहार करते मैदान के बीचों बीच बने ओड़ (सीमा रेखा) तक पहुँचने का प्रयास करते हैं । फर्रों? की मजबूत रक्षा दीवार बनायी जाती है । जिसकी आड़ से वे प्रतिद्वन्दी दल पर पत्थरों की वर्षा करते हैं । पुजारी को जब अंत:करण से विश्वास हो जाता है कि एक मानव के रक्त के बराबर खून बह गया होगा तब वह ताँबें के छत्र और चँबर के साथ मैदान में आकर बगवाल सम्पन्न होने की घोषणा करता है ।

बगवाल का समापन शंखनाद से होता है । तब एक दूसरे के प्रति आत्मीयता दर्शित कर द्यौके धीरे-धीरे खोलीखाण दूबाचौड़ मैदान से बिदा होते हैं । मंदिर में अर्चन चलता है ।

कहा जाता है कि पहले जो बगवाल आयोजित होती थी उसमें फर का प्रयोग नहीं किया जाता था, परन्तु सन् १९४५ के बाद फर का प्रयोग किया जाने लगा । बगवाल में आज भी निशाना बनाकर पत्थर मारना निषेध है ।

रात्रि में मंदिर जागरण होता है । श्रावणी पूर्णिमा के दूसरे दिन बक्से में रखे देवी विग्रह की डोले के रुप में शोभा यात्रा भी सम्पन्न होती है । कई लोग देवी को बकरे के अतिरिक्त अठ्वार-सात बकरे तथा एक भैंस की बलि भी अर्पित करते हैं ।

वैसे देवीधुरा का वैसर्गिक सौन्दर्य भी मोहित करने वाला है, इसीलिए भी बगवाल को देखने दूर-दूर से सैलानी देवीधुरा पहँचते हैं ।

SOURCE : http://tdil.mit.gov.in/CoilNet/IGNCA/utrn0024.htm