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Shiv Ling Pooja Worship -शिव लिंग पूजा का रहस्य जुडा है उत्तराखंड देवभूमि से

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, December 21, 2009, 07:57:36 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


दोस्तों,

जैसे की आपको ज्ञात होगा उत्तराखंड में देवभूमि जहाँ कि देवी देवताओ के अवतार से जुड़ी बहुत धार्मिक और पौराणिक कहानिया है! यह वही पावन भूमि है जहाँ पर गंगा को धरती पर लाया गया जहाँ शिव ने गौर से शादी क़ी, जहाँ पांडवो ने अपनी वनवास का समय बिताया,  जहाँ पर सीता माता धरती माता क़ी गोद में शमा गयी, जहाँ पर समुन्द्र को मथा गया !

आज हम आपके लिए ला रहा है, दुनिया में शिव शिव लिंग पूजा का रहस्य! 


एम.एस. मेहता

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

शिव लिंग पूजा का राज जुडा है उत्तरकाण्ड से

शिव की यागीश्वर में तपस्या
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जैसे के आपको ज्ञात होगा और कथा आपने सुनी होगी !

जब दक्ष्य प्रजापति ने कनखल के समीप यज्ञ किया था ! यहाँ पर शिव के अतिरिक्त सबको इस यज्ञ में बुलाया गया था! शिव की अर्धांगिनी पार्वती जो जब यह पता चला और अपने पति के तिरस्कार को देखकर वो वो कनखल जाकर यज्ञ के हवन में कूद पड़ी और देह त्याग कर दिया !

शिव ने कैलाश के यह बात जान दक्ष प्रजापति का यज्ञ विध्वंश कर सबका नाश कर दिया! और की भस्म को आच्छादित कर झाकर सैम (अल्मोड़ा जिले में स्थिति) में तपस्या की! झाकर सैम को तब से देवदारु वन के आच्छादित बताया है !  झाकर सैम जागीश्वर पर्वत में है !

कुमाउ के इस पर्वत में वशिष्ठ मुनि अपनी पत्नियों सहित रहते थे ! एक दिन ऋषि ने पत्नियों ने कुशा और व समिधा  एकत्र करते हुए शिव को रख मले हुए नगनवस्था में तपस्या करते  देखा ! गले में साप की माला थी और आँखे बंद, मौन धारण किये हुए, चित उनका काली (पत्नी) के शोक में संतप्त था! ऋषि के सित्र्याँ  उनके सौंदर्य को देखकर उनके चारो और एकत्र हो गयी!

सप्त ऋषियों की की सातो स्त्रियाँ जब रात में न लौटी तो प्रातः काल वे दूदने को गए ! देखा, तो शिव समाधि लिए है, और स्त्रियाँ उनके चारो और बेहोश पड़ी है !

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

ऋषियों का शिव को शाप देना
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यह देख कर ऋषियों के मन में विचार आया की शिव ने उनकी स्त्रियों की बेजज्ती की है, शिव को शाप दिया "जिस इन्द्रय यानी जिस वस्तु से तुमने यह अनौचित्य किया है, वह लिंग) भूमि में गिर जाय "!

तब शिव ने कहा "

"तुमने मुझे आकरण शाप दिया है, लेकिन तुमने मुझे संकित अवस्था में पाया है, इस लिए में तुमारे शाप का विरोध नहीं करूँगा ! मेरा लिंग धरती पर गिरेगा और तुम सातो सप्त ऋषि के रूप में आकाश में चमकोगे" अतः शिव ने शाप के अनुसार अपने लिंग को धरती में गिराया !

सारी धरती शिव के लिंग से ढक गयी ! गन्धर्व देवताओ ने शिव की पार्थना की और उन्होंने लिंग का नाम यागीश या यागीश्वर कहा और वे सप्त्रिशी कहलाये

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

{यागीश इसलिए नाम पड़ा की सित्र्याँ यज्ञ के लिए कुशा व समिधा एकत्र कर रही थी!  महाभारत में ऋषियों के साथ रमण करने की कहानी को अग्नि का रूप दिया गया है, वहां शिव अग्नि रूप में आये है ! स्वाहा उसमे से ऋषियों में पत्नी है ! स्वाहा ने अग्नि को संतुष्ट किया, उसमे जो वीय (स्कन्न) निकला, वह स्वाहा ने एक स्वर्णघट में एकत्र किया, जिससे सकंद यानी स्वामी कार्तिकेय पैदा हुए! वह कार्तिकेय इसलिए कहलाये की वह कर्तिको (किरातो) द्वारा पाले गए, जो कैलाश में रहते थे ! उनके छह सर वह १२ हाथ थे एक पर पेट एक ही था !

कारण यह था कि ७ स्त्रियों में से छह ने शिव के साथ सम्भोग किया था और ७ अरुदति, जो वशिष्ठ कि पत्नी थी, इस कृत्य में सम्मलित नहीं थी!  इसी कारण कार्तिकेय षडानन कहलाये !  यागीश्वर (जागीश्वर) में पण्डे भी यही कहानी कहते है! वे इतनी बात और जोड़ते है कि महादेव सातो स्त्रियाँ पर मोह्हित थे!  वे इनको नगन अवस्था में मिले थे ! भोले नाथ पार्वती के लिए तम्बूरा व डमरू बजाकर निर्त्य कर रहे थे! शाप के कारण लिंग भूमि में गिरा और भूमि लिंग के बार से दबने लगी!

विष्णु भगवान् ने योनी यानी शक्ति होना स्वीकार किया, और चक्र से लिंग को काटकर तमाम भारत के कोने-२ में बाटा यागीश्वर (जागीश्वर) तब से पावित्र्य तीर्थ हो गया ! वह भूमि १४४ वर्ग मील को मानी गयी है और पूर्व में इसके जटेश्वर, उत्तर में गणनाथ, पश्चिम में त्रिनेत्र दक्षिण में रामेश्वर है!  कहा जाता है, इश्वार्धार में शिव ने सप्त्रिशियो के सित्र्यों के विहार किया था !

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शिव लिंग का प्रकट होना
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आकाशवाणी हुयी, " संसार में कोई जगह नहीं, जहाँ शिव नहीं है, इसलिए, ये ऋषियों आश्चर्य मत करो, यदि शिव लिंग दुनिया को शिवलिंग ढक ले!

तब, ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, सूर्य, चन्द्रमा व अन्य देवगण, जो जागीश्वर में शिव की सुतुती कर कर रहे थे आपने-२ अंश वे शक्ति छोड़कर चले गये !  प्रथ्वी लिंग के बार से दबने लगी, और शिव से प्रार्थना की वह भर से मुक्त की जाय,
तब देवी देवताओ ने लिंग का आदि अंत जानना चाह ! प्रथ्वी ने ब्रह्मा से पूछा "

लिंग कहाँ तक है "

ब्रह्मा जी ने कहा " जहाँ तक प्रथ्वी है वहां तक"

प्रथ्वी ने ब्रह्मा को शाप दिया " तुमने एक बड़े देवता होकर झूठ बोला, इससे संसार में तुमारी पूजा नहीं होगी!

ब्रह्मा ने भी प्रथ्वी को शाप दिया " तुम भी कलयुग के अंत में ग्लेच्छो भर जावोगी!

देवी देवताओ ने प्रथ्वी से तो उन्होंने के कहा - ' जब ब्रह्मा, विष्णु व कपिल इस बात को नहीं जानते, तो वो कैसे जाने, !

तब भगवान् विष्णु से पूछा गया, " वे पातळ गए, पर अंत ना पा सके! तब देवताओ ने विष्णु की प्रार्थना की ! विष्णु शिव के पास गए, और इनसे अनुनय विनय के बाद यह निश्चय हुवा की विष्णु सुरदर्शन चक्र से लिंग को काटे और तमाम खंडो में इसे बात थे !

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अतः जागेश्वर में लिंग काटा गया ! और वह नौ खंडो में बाटा गया !

   (१)   हिमाद्री खंड
  (२)   मानसखंड
  (३)  केदारखंड
  (४)  पातालखंड - जहाँ नागो के पूजा की जाती है
  (५)  कैलाश खंड - जहाँ शिव स्वय विराजते है
  (६)   काशीखण्ड (जहाँ विश्वनाथ है)
  (७)  रेवाखंड (जहाँ रेवा नदी है, जिसके पत्थर नारव देश्वर के रूप में लिंग की पूजा होती है)
  (८)  ब्रह्तोतर खंड (जहाँ गोकेश्वर महादेव है) - कनारा जिला मुंबई
(९)  नगरखंड जिसमे उज्जैन नगरी है   

मेहता जी आपने इस टोपीक मे हमै पौराणीक ज्ञान से अवगत कराया है पढकर हमै बहुत अच्छा लगा लेकिन कुछ-एक जगहो पर इसे समझने मे दिक्कत हो रही है।
सायद या तो आपका शब्द रिपीड हो रहा है य़ा शब्द सस्कृत मे है। मै यहा पर एक शब्द लिख रहा हुं जीसका अथॅ मै समझ नही पा रहा हु आपसे अनरोध करता हु कि इस शब्द का भावॉथ बता कर हमे ज्ञान से परिपुणॅ करे।           (ग्लेच्छो)
धन्यबाद

jagdishmainali

Bahot badiya site chhu or mehta ji k yogdan bahute mahtwapurn chha aap sabhi logo ken  naya saal ki hardik shubh kamnayen 0989926897

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

शिवलिंग पूजा की शुरूआत का गवाह है जागेश्वर मंदिर[/color]दुनिया में शिवलिंग पूजा की शुरूआत होने का गवाह बना ऐतिहासिक और प्राचीनतम जागेश्वर महादेव का मंदिर आज भी अपनी भव्यता और प्रसिद्धि को मान्यता मिलने की बाट जोह रहा है.उत्तराखंड के अल्मोडा जिले के मुख्यालय से करीब 40 किलोमीटर दूर देवदार के वृक्षों के घने जंगलों के बीच पहाडी पर स्थित जागेश्वर महादेव के मंदिर परिसर में पार्वती, हनुमान, मृत्युंजय महादेव, भैरव, केदारनाथ, दुर्गा सहित कुल 124 मंदिर स्थित हैं जिनमें आज भी विधिवत् पूजा होती है.मंदिर के मुख्य पुजारी षष्टी दत्त भट्ट ने विशेष बातचीत में भाषा संवाददाता को बताया कि भारतीय पुरातत्व विभाग ने इस मंदिर को देश के द्वादश ज्योतिर्लिंगों में एक बताया है और बाकायदा इसकी घोषणा करता एक शिलापट्ट भी लगाया है. एक सचाई यह भी है कि इसी मंदिर से ही भगवान शिव की लिंग पूजा के रूप में शुरूआत हुई थी. यहां की पूजा के बाद ही पूरी दुनियां में शिवलिंग की पूजा की जाने लगी और कई स्वयं निर्मित शिवलिंगों को बाद में ज्योतिर्लिंग के रूप में पूजा जाने लगा.उन्होंने कहा कि यहां स्थापित शिवलिंग स्वयं निर्मित यानी अपने आप उत्पन्न हुआ है और इसकी कब से पूजा की जा रही है इसकी ठीक ठीक से जानकारी नहीं है लेकिन यहां भव्य मंदिरों का निर्माण आठवीं शताब्दी में किया गया है. घने जंगलों के बीच विशाल परिसर में पुष्टि देवी (पार्वती), नवदुर्गा, कालिका, नीलकंठेश्वर, सूर्य, नवग्रह सहित 124 मंदिर बने हैं.दत्त ने बताया कि दुनिया में भगवान शिव की लिंग के रूप में पूजा की शुरूआत इसी मंदिर से हुई थी और इसका जिक्र शिवपुराण के मानस खण्ड में हुआ है. चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भारत यात्रा के दौरान यहां की यात्रा की थी और उसने इस मंदिर की प्राचीनता के बारे में जिक्र भी किया है. यह मंदिर साक्ष्यों के आधार पर करीब ढाई हजार साल पुराना है क्योंकि इस मंदिर की दीवारों की प्राचीनता इसकी गवाह है. उन्होंने बताया कि मंदिर पर पहले एक बोर्ड लगा था, जिसको पुरातत्व विभाग दवारा हटा दिया गया है. उन्होंने कहा कि मंदिर की प्राचीनता साबित करने वाले बोर्ड को फिर से लगाया जाना चाहिये.उन्होंने कहा कि चंदकाल के राजाओं ने इस मंदिर का उद्धार कराया था और बाद में कत्यूरी राजाओं ने भी जागेश्वर मंदिर के लिए कई गांव दान दिये, जिससे मंदिर में पूजा पाठ की व्यवस्था हुआ करती थी. वर्तमान में मंदिर की देख रेख का काम भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा किया जा रहा है, लेकिन इसकी प्राचीनता को देखते हुए इसे विश्व धरोहर के रूप में विकसित किया जाना चाहिये.द्वादश शिवलिंगों में शुमार किये जाने के बावजूद इस मंदिर में आने वाले तीर्थ यात्रियों की सुविधा के लिए आवासीय व्यवस्था, मंदिर मार्ग के विकास, विद्युत और पेयजल व्यवस्था को अभी भी सुधारा नहीं जा सका है.उत्तरप्रदेश के मुरादाबाद के निवासी राजीव अग्रवाल ने इस संवाददाता को बताया कि मंदिर के इतिहास के बारे में जिक्र करते हुए उन्होंने एक पुस्तक लिखी है. यह मंदिर रेखा देवल शैली, पीठ देवल शैली और बल्लभी देवल शैली में बना है. महामृत्युंजय मंदिर का निर्माण रेखा शैली में किया गया है, जबकि केदार और बालकेश्वर मंदिर का निर्माण पीठ शैली तथा पुष्टि देवी मंदिर बल्लभी शैली में बना है. उन्होंने कहा कि मुख्य मंदिर के पास डंडेश्वर, वृद्ध जागेश्वर, ब्रह्म कुण्ड, कुबेर, बटुक भैरव, पंचमुखी महादेव मंदिरों के अतिरिक्त घने देवदार जंगल के चलते इसकी प्राचीनता पर कोई संदेह नहीं किया जा सकता. श्रावण महीने को छोडकर इस मंदिर में आने वालों की संख्या अपेक्षाकृत कम रहती है, जबकि श्रावण के महीने में भारी संख्या में यहां लोग आते हैं.दत्त ने कहा कि जागेश्वर को ही नागेश्वर माना जाता है क्योंकि इस मंदिर के आसपास के अधिकांश इलाकों का नाम नाग पर ही आधारित है. उन्होंने बताया कि बेरीनाग, धौलेनाग, लियानाग, गरूड स्थानों से भी यह साबित होता है कि यह इलाका नाग बहुल था और इसी लिए इसका नाम नागेश्वर भी पडा लेकिन बाद में इसे जागेश्वर भी कहा जाने लगा.उन्होंने बताया कि मानस खण्ड में नागेशं दारूकावने का जिक्र आया है. दारूकावने देवदार के वन के लिए कहा गया है. इससे भी इसे नागेश्वर का नाम दिया गया.उन्होंने कहा कि द्वादश ज्योर्तिलिंग में एक घोषित होने के बावजूद इस मंदिर की सबसे बडी महत्ता यह है कि यहीं से लिंग के रूप में भगवान शिव की पूजा शुरू हुई थी. इस तथ्य को और अधिक विकसित कर पूरी दुनिया में स्थापित किया जा सकता हैऔर भी... http://aajtak.intoday.in/story.php/content/view/30805/42/0/1/2