• Welcome to MeraPahad Community Of Uttarakhand Lovers.
 

Here We will Talk Only in our Language-याँ होलि सिर्फ अपणी भाषा-बोलि में बात

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, December 22, 2009, 08:14:32 AM

adhikari harish dhoura

सबे भाई लोगेंक म्यार नमस्कार
आब में ले य सस्था दघे जुड़ ग्यु
या भौते भली जानकारी मिलन लगी रे हमुन्केले येअक लिजी आपु लोगोनक आभारी छा.

आब फिर मिलुन, मी ले बीच बीच में लीखते रूलं

   धन्यबाद

kundan singh kulyal

दादा, दीदी, भुला, भूली, सब छ्यावे होला...
हम पहाड़ी थै न तो ताम्मन धन दौलत छ न हमर पहाड़ो मई एस आराम छ...
हमो थै छ त हमरी संस्कृति जू सारी दुन्नी है अलग छ...
संग्यातियो ये कै बचा बेरी राखला त हम दुन्नी मैं सबुहे धनवान छाँ.....

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

   from   Mukund Dhoundiyal ml.dhoundiyal@gmail.com

हमारा पहाड़ों  की जीवन शैली  माँ  तरक्की   ता  जरूर ह्वेई च  लेकिन तुल्न्मात्मक  दृष्टि से ... वास्तव माँ... चालीस पचास का दशक माँ  हमारा  पहाड़ी  आदिम  तैं  अधिकतर  "घरेलु" या फिर "होटल नौकर" समझे जांदू छैयी   ......हालात  भौत  ख़राब  छैयी
हम  तैं भंड मज्जा  बोले जांदू छयो.....   गरीबी भोत  छै

लोग बाग़ अपना नौनो तैं हद से हद मिड्डल  ही  कराइ सकदु छाई
एक  तेज तर्रार बछा  तैं  भी   सिर्फ  मेट्रिक ही कराइ सकदा छा   
खास  समर्थवान ( क्वि क्वि) ही अपना औलाद तैं  अग्ने पडैयी सकदु छैयी

  नौना  कु रिजल्ट अभी खुली भी नि  की ..भेजी देन्दा छा वे  तैं.परदेश जाण वोला का दिगढ़    और बोल्दा छा की
"जा नौना परदेश जा   रुपया  कमाऊ   फटाफट
और   हम खुनी मणि आर्डर  भेज"
हल्ल्या  भी  "हैल तंगल" चलiना कु    मोटी  रकम मंग्दु
  फसल माँ हिस्सा, लारा लत्ता  गरम मसाला ता  अलग से

वैकि मन की  अगर नि ह्वेई ता  वू  सार्या गों  माँ  ढाकी मार के  बैज्ती  करना माँ देर नि करदू
हल्ल्या  कु मुख  बंद  रखना  का वास्ता  व़ेई  तैं खुश रख्णु  जरूरी च

लेकिन   जू लोग बाग़ परदेश माँ चली गैनी ,  वू लोकु माँ   कुछ मेहनती लोकु न  दिन  रात एक करके   पढाई करी   और  अपणी आर्थिक स्तिथि मजबूत करी

पचास---साठ का  दशक  माँ    जब हालात थोडा भोत सुधरी
और    लोकु न  अपणी    जीवन सुधार सँरचना  बनायीं

लोगु की आर्थिक हालात  सुधरी ता वू लोगु  की औलाद
तैं तब मिली .... वास्तविक  अनुकूल वातावरण  और  ह्वेई गैन अपना पैर पर  खड़ा वू  बणी गैन  स्वावलंबी

  "भंड मज्जा "     नाम करन   भी  धीरे धीरे ....  दूर ह्वेगी
हालात एन छिना की  छाती ठोक के हम भी
ललकार मरि सक्दां की हम भी  कै से कम नि छाँ
हमारा लोग भी अब   बड़ा  बड़ा  इंजिनियर बणी गैनी
और सात समुद्र पार   अपणी  साख बनौना  छी

  ता फैली गैन सारा हिन्दुस्थान का बड़ा बड़ा शहर माँ   और हिन्दुस्तान ही नहीं  विदेशों माँ भी
   
  और  तो और कुछ ता  विदेशों माँ बस्सी गैन

बडू सौभाग्य च  हमारू  ....

लेकिन  यो तो ह्वेई  एक बात...दूसरी तरफ

हमारू प्रबुद्ध समाज   (मरद जात) कु  भी ता बहुत स्पीड  पलायान  ह्वेई गी     
  गाँव का गाँव   .खाली ह्वेई गैन  ...अर अभी भी होंदा  ही  जाणा  छिन

हालात   इतना  खराब ह्वेई गी   की    कै कै  गाँव माँ   "मुर्दा"  लिजाणा का वास्ता चार छै मरद  भी   नि रेगी  .... सोच्णु पोड्लो की...हम तैं कुछ..की,, हमारू पलायान  बंद   कनि के हो
   रोक्णों  पोडालो यो पलायन     आज कु .असली मुद्दा. च..यो...

पहाड़  का लोकु का वास्ता    रोजी रोटी  का असार  पैदा करना पोड्ला..
और हमारा लोग बाग़  अपना मुल्क माँ   "वापसी"  कनि के   करीं ..... कनि कै नया नया लघु उद्योग, कारखाना खुल ला  और हमारा पहाड़ माँ  हमारी   छोटी छोटी जरूरत   कनि कै ह्वेइली पूरी


अपना  मुल्क का विकास माँ हमारू योगदान  होणु जरूरी च   लेकिन  होलू कनि कै ?

हम तैं  रोजी रोटी का  नया नया  आयाम तलाश  करण पोड्ला  ताकि  हमारा मुल्क माँ रैण  वालों तैं   सुरक्षा  और आत्मविश्वास  मिलो
और  वू भी नयी शक्ति का साथ,  नयी स्फूर्ति  और  नयी उमंग का साथ और नया नया   सुबेर कु नयू नयु  सूरज की  लाल लाल  किरण  का साथ  अपणा  काम माँ ब्यस्त  ह्वेई जाला

अब त  हमारी गरीबी  काफी हद्द तक  दूर ह्वेगी
अब हम पिज्जा  और कोक  भी घर पर माँगा सक्दान   नेगी जी का  "मयल्दा  गाणों" तैं भी  अपणा  अपणा  घोर  माँ   ही आराम से सुणी सक्दां   

फलों कु ,  पल्प  कु और  जूस की क्वी कमी नहीं
सोयाबीन की खेती और उत्पादन  भी हमारा लोकु तैं  रोजगार दे सक दीं
हेर्बल  रिसर्च   लबोरात्रि  खुल सकदीना
सौर उर्जा , पवन चक्की और कु कारोबार  भी रोजगार पैदा करी सकदु


   हम  अपणी   बंजर   जमीन  माँ   "फ़ल  पट्टी"  कु  अभियान ता आसानी से  चलाई ही सक्दां
जै माँ 3 -४-5 साल माँ   ही  पेड़  फल  दीना  शुरू करी देन्दा 
    बस  सिर्फ बन्दर,  भालू  और सुंगर  से रक्षा
कु ध्यान  रखना   पर्लु

जय बद्रीविशाल

Anil Arya / अनिल आर्य

गढ़वाली, कुमाऊंनी के विकास को समिति बनेगी देहरादून। प्रदेश सरकार ने कुमाऊंनी और गढ़वाली भाषा के मानकीकरण के लिए ठोस पहल करने का फैसला किया है।  भाषा मंत्री मातबर सिंह कंडारी की अध्यक्षता में विधानसभा में हुई बैठक में गढ़वाली कुमाऊंनी के लिए व्यापक सर्वे, इन भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए प्रस्ताव बनाने, प्रस्ताव बनाने को सम्मेलन का आयोजन करने, परस्पर वार्तालाप में इन भाषाओं का उपयोग करने, भाषाओं के संरक्षण के लिए संग्रहालय बनाने, संपूर्ण राज्य के रचनाकारों की सूची बनाने, भाषाआें के विकास को समिति का गठन करने का फैसला किया गया। इसके लिए एक बैठक 18 अगस्त को अल्मोड़ा में की जाएगी। बैठक में भाषा संस्थान की निदेशक सविता मोहन सहित अन्य उपस्थित थे। उम्मीद है कि इस बैठक में कुछ न कुछ सकारात्मक कार्रवाई होगी। epaper.amarujala. kuchh bat aghil t badi .:)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

लोक बाराखड़ी
लोक बाराखड़ी प्रस्तुति : दिग्पाल सिंह नेगी

क - कंचनी डाळी कु वासुनि कन।
ख- खाते पीते राम भजन।
ग- गंगा जी मा स्नान कन।
घ- घरों-घरों की बात नि सुण।
ङ्- गंगा जी गन्दी नि कन।
च-चंचल नारी कू संग नि कन।
छ- छलिया मुख की बात नि सुण।
ज- जंगलू मा वासु नि रैण।
झ- झूठि मुटी बात नि करण।
ञ- येनी बात कैमू नि बोलण।
ट- टम्का पैस गांठि मा रखण।
ठ- ठगा आदिम दगड़ी सौदा नि कन।
ड- डगड्यनी ढुंगी मा खुटो नि रखण।
ढ- ढवाली बात कभी नि कन।
ण- णखदि नरमी कु वास नि कन।
त- ताता रोस मा झगड़ा नि कन।
थ- थता थुमा सब दगड़ी कन।
द- दया धर्म सदा रखण।
ध- धरती माता की सेवा करण।
न- नकली बात कभी नि बोन।
प- पढ़ण-लेखण पर ध्यान देण।
फ- फंचा आदिम की बात सुण।
ब- बांगी लकड़ी कांधी मा नि रखण।
भ- भरियाँ भवन की चोरी नि कन।
म- मंगण आदिमू की बात नि सुण।
य- यनि-यनि बात मन मा रखण।
र- राम नाम सदा भजण।
ल- लंगी लंगी डाळी कू टुक नि काटण।
व- वखला मा नारियों दगड़ी बात नि कन।
ह- हल लगोण मा सरम नि कन।
स- साधु, संन्तो की सेवा करण।
ा- सनातन धर्म की सेवा करण।
भा- सासू ससुर की सेवा कन।
क्ष- अक्षरों पर ध्यान देण।
त्र- त्रणी तार भगवान करद।
ज्ञा- ज्ञानी यानी एकी तरह बणण।


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

011/7/26 Mukund Dhoundiyal <ml.dhoundiyal@gmail.com>

     

    बोला  मेरा  भै  बंदौ !!!!! 

     ख़ूब  छाँ  आप लोग बाग़ ?

    मेरु रैबार  वू लोगुं का वास्ता  च  जू नौकरी की तलाश माँ  अपणु मुल्क ( शिवालिक श्रंखला)   
    छोडीक  मैदानी  इलाका माँ बशीगी
    परदेश माँ बसणा की वजह से  और तखा की बोली कु इस्तेमाल करणा  से   जू  अपणी  बोली से दूर ह्वेई गैना.

    लेकिन   हैराणी  की बात  या छ की  अपणी  धरती माँ से दूर  होणा पर भी क्या  कवी  आदिम अपणी बोली  भूली सकदु क्या?

    द्वि मद्रासी आपस माँ जब  भी मिल दन तो  अपनी बोली माँ " इंगा पो,  इंगा पो " और   मलयाली   भी  " इब्ढ़े पुव़ा,  इब्ढ़े पुव़ा  (कहाँ जा रहे हो )   बोल्दाना पंजाबी    भी  "तुस्सी मुस्सी"  और  बंगाली  भी " भालो भालो

    '  गुजराती   अपनी   "सारो छे   सारो  छे "  माँ शुरू ह्वेई जन्दन .  यानि की ...अपणी अपणी प्यारी बोली माँ मद मस्त ह्वेई जंदन

    लेकिन  एक  हमारू  पहाड़ी  जीव ही एनु  जीव  जू  अपणी बोली   माँ बोलना माँ शर्म महसूस करदू
      यनु ता क्वी  भी जानवर नि होंदु  जू अपणा झुण्ड माँ रै की  सहचर जानवर की   बोली  भाषा भी नी बींगी सकदु
     प्रदेश  से दूर रैणा   कु यो मतलब नि की तुम अपणी बोली भी बिसरी जौ

    अपणी बोली ही  हमारी अपणी  पछ्याण च .....
    अपणु स्वाभिमान च .....
    अपणी परंपरा   च 
    और अपणी संस्कृति च
    हमारू गौरव भी और हमारी अभिव्यक्ति भी च

    अपने  ऐसे मजबूर  भै बंदों    से....  अब  मै
    हिंदी में बात कर के समझाना  चाहता हु   

      अपने  प्रिय जन को  हम,  अपने दिल की बात (यानी की दिल की टीश)  आसानी से  अपणी बोली द्वारा ही  पहुंचा सकते हैं
    ये अपणी  प्यारी मयल्दी बोली  दो दिलों का  मेल कराती है कितनी अछि है

    तो फिर ...आवो ....आज ही  शुरू करते हैं
    अपणी बोली में बोलना ...और  बचाते  हैं  अपणी  बोली को   
Dhoundiyal ji sadar pranam/simanya....
Ya bhali baat छ....apni bhasha ar sanskriti koo samman hamaroo kartavya छ.....

अपणी बोली ही  हमारी अपणी  पछ्याण च .....
अपणु स्वाभिमान च .....
अपणी परंपरा   च 
और अपणी संस्कृति च
हमारू गौरव भी और हमारी अभिव्यक्ति भी च

Jagmohan singh Jayara "Jigyansu"


From: Dr Biharilal Jalandhari <drbjalandhari@gmail.com>
To: PauriGarhwal@yahoogroups.com
Sent: Monday, September 12, 2011 4:02 PM
Subject: Re: [PGGroup] जू अपणी बोली से दूर ह्वेई गैना.

- Hide quoted text -

ढौंडियाल जी आप ठिक बुना छन पर अभि हमरि बोलि कखि भि स्थापित नी छ ! प्राथमिक स्तर बटी उच्च शिक्षा तक 

2011/7/26 Mukund Dhoundiyal <ml.dhoundiyal@gmail.com>

     
    बोला  मेरा  भै  बंदौ !!!!! 

     ख़ूब  छाँ  आप लोग बाग़ ?

    मेरु रैबार  वू लोगुं का वास्ता  च  जू नौकरी की तलाश माँ  अपणु मुल्क ( शिवालिक श्रंखला)   
    छोडीक  मैदानी  इलाका माँ बशीगी
    परदेश माँ बसणा की वजह से  और तखा की बोली कु इस्तेमाल करणा  से   जू  अपणी  बोली से दूर ह्वेई गैना.

    लेकिन   हैराणी  की बात  या छ की  अपणी  धरती माँ से दूर  होणा पर भी क्या  कवी  आदिम अपणी बोली  भूली सकदु क्या?

    द्वि मद्रासी आपस माँ जब  भी मिल दन तो  अपनी बोली माँ " इंगा पो,  इंगा पो " और   मलयाली   भी  " इब्ढ़े पुव़ा,  इब्ढ़े पुव़ा  (कहाँ जा रहे हो )   बोल्दाना पंजाबी    भी  "तुस्सी मुस्सी"  और  बंगाली  भी " भालो भालो

    '  गुजराती   अपनी   "सारो छे   सारो  छे "  माँ शुरू ह्वेई जन्दन .  यानि की ...अपणी अपणी प्यारी बोली माँ मद मस्त ह्वेई जंदन

    लेकिन  एक  हमारू  पहाड़ी  जीव ही एनु  जीव  जू  अपणी बोली   माँ बोलना माँ शर्म महसूस करदू
      यनु ता क्वी  भी जानवर नि होंदु  जू अपणा झुण्ड माँ रै की  सहचर जानवर की   बोली  भाषा भी नी बींगी सकदु
     प्रदेश  से दूर रैणा   कु यो मतलब नि की तुम अपणी बोली भी बिसरी जौ

    अपणी बोली ही  हमारी अपणी  पछ्याण च .....
    अपणु स्वाभिमान च .....
    अपणी परंपरा   च 
    और अपणी संस्कृति च
    हमारू गौरव भी और हमारी अभिव्यक्ति भी च

    अपने  ऐसे मजबूर  भै बंदों    से....  अब  मै
    हिंदी में बात कर के समझाना  चाहता हु   

      अपने  प्रिय जन को  हम,  अपने दिल की बात (यानी की दिल की टीश)  आसानी से  अपणी बोली द्वारा ही  पहुंचा सकते हैं
    ये अपणी  प्यारी मयल्दी बोली  दो दिलों का  मेल कराती है कितनी अछि है

    तो फिर ...आवो ....आज ही  शुरू करते हैं
    अपणी बोली में बोलना ...और  बचाते  हैं  अपणी  बोली को 





Devbhoomi,Uttarakhand

मेरा पहाड़ का सभी सदस्यों तैं यम यस जाखी कु प्रणाम,कनु-कनु मनाई आप लोगों न नयुं साल

Mohan Chandra Badhani

आप सब लोगों के म्यार तरफ बटी नयी साल बहुत बहुत बधाई हो...आप सबुकैं अपां भाषा में बात करन देखा छ त मकेल लै नी रई.....आप सबुकैं म्यर तरफ बीती नमस्कार.