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Mera Pahad Photo Gallery : मेरा पहाड़ फोटो गैलरी

Started by पंकज सिंह महर, January 18, 2010, 12:35:22 PM

पंकज सिंह महर



मुझमें भी बसावट थी, मुझमें भी किसी का बसेरा था, 
यहां भी बच्चे उछलते-कूदते, रोते-गाते थे,
मैं गवाह हूं, लोरियों का, प्रसव पीड़ा का,
नामकरण का, चूड़ाकर्म का, विवाह का और मौत का भी,
मैं साथी रहा, मुझमें रह रहे परिवारों के सुख-दुःख का,
लेकिन आज इस दुःख की घड़ी में, मैं अकेला हूं,
उजाड़ सा, सुनसान सा,   
राहें तकूं, तो किसकी,
क्या कोई सुन पायेगा मेरी सिसकी?   

पंकज सिंह महर


पंकज सिंह महर

नदी किनारे के पत्थरों को पहले कोई खास अहमियत नहीं दी जाती थी, लेकिन जगह-जगह की बात है। अगर जगह प्रसिद्ध पर्यटक स्थल हो तो नदी किनारे के पत्थरों का भी महत्व बढ़ जाता है। मार्केटिंग का जलवा देखिये-कैम्पटी फाल में पत्थरों पर विज्ञापन


Raje Singh Karakoti

Excellent camera work Pankaj da.
Please send some more.


Quote from: पंकज सिंह महर on July 22, 2010, 12:42:00 PM
नदी किनारे के पत्थरों को पहले कोई खास अहमियत नहीं दी जाती थी, लेकिन जगह-जगह की बात है। अगर जगह प्रसिद्ध पर्यटक स्थल हो तो नदी किनारे के पत्थरों का भी महत्व बढ़ जाता है। मार्केटिंग का जलवा देखिये-कैम्पटी फाल में पत्थरों पर विज्ञापन



पंकज सिंह महर


पंकज सिंह महर


विनोद सिंह गढ़िया



यह तस्वीर है बेलंग गाड़ ( बेलंग नदी ) की, जो पोथिंग (कपकोट) बागेश्वर में है, यह एक छोटी सी नदी है, कपकोट में इस नदी का जल पेयजल एवं सिंचाई के लिए प्रयोग किया जाता है |


हेम पन्त


विनोद सिंह गढ़िया

"बेडू पाको बारामासा, ओ नरैन काफल पाको चैता मेरी छैला"

आपने उत्तराखंड का यह गीत हर वक्त सुना होगा, काफल का स्वाद भी लिया या फोटो में तो जरुर देखा होगा लेकिन बेडू देखा ...............? शायद कम ही लोगों ने देखा होगा ...........तो लीजिये बेडू की तस्वीर ................



BEDU



KAFAL

दीपक पनेरू

पंकज सर कैमरा के साथ साथ जो हकीकत बयां करती दर्द भरी पंकियां लिखी है...कोई भी सुन कर गर्स (हिया भर जाना) से भर जायेगा.....बहुत ही बढ़िया फोटो है सारे के सारे फोटो बहुत ही अच्छे है......

Quote from: पंकज सिंह महर on July 16, 2010, 11:29:47 AM


मुझमें भी बसावट थी, मुझमें भी किसी का बसेरा था, 
यहां भी बच्चे उछलते-कूदते, रोते-गाते थे,
मैं गवाह हूं, लोरियों का, प्रसव पीड़ा का,
नामकरण का, चूड़ाकर्म का, विवाह का और मौत का भी,
मैं साथी रहा, मुझमें रह रहे परिवारों के सुख-दुःख का,
लेकिन आज इस दुःख की घड़ी में, मैं अकेला हूं,
उजाड़ सा, सुनसान सा,   
राहें तकूं, तो किसकी,
क्या कोई सुन पायेगा मेरी सिसकी?