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Ghee Sankranti : घी संक्रांति

Started by Rajen, February 04, 2010, 06:15:15 PM

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Rajen

घी संक्रांति :

घी संक्रांति भाद्रपद महीने की एक गते को मनाया जाता है.  इसे ओलगिया संक्रांति भी कहते हैं.  कुमाऊँ के चन्द्र बंशी राजाओं के समय  संक्रांति के दिन शिल्पबिद अपनी दस्तकारी की बस्तुएं राजा को दिखाते थे.  राजा इस दिन उन्हें पुरुस्कृत करते थे.  प्रजा के लोग भी फल फूल, दूध-दही आदि उत्तम बस्तुएं दरबार में तथा प्रतिष्ठित ब्याक्तियौं के घर ले जाते थे जो 'ओगल' या 'ओग' कहलाता था.  आज भी यह प्रथा कुछ परिवारों में प्रचलित है. 

:ninja:

Reminds me of my childhood when our neighbors and folks form other villages would bring milk,yogurt,ghee and local produce to our home. It still happens, but it's nothing like good old days :(

Anubhav / अनुभव उपाध्याय

Welcome back Sir after such a long time.

Quote from: highlander23235 on February 04, 2010, 09:55:33 PM
Reminds me of my childhood when our neighbors and folks form other villages would bring milk,yogurt,ghee and local produce to our home. It still happens, but it's nothing like good old days :(

पंकज सिंह महर

सिंह संक्रान्ति या घृत संक्रान्ति - सिंह संक्रान्ति को 'ओलगिया भी कहते हैं। पहले चन्द राजवंश के समय अपनी कारीगरी तथा दस्तकारी की चीजों को दिखाकर शिल्पज्ञ लोग इस दिन पुरस्कार पाते थे तथा अन्य लोग भी साग-सब्जी, फल-फूल, दही-दूध, मिष्ठान्न तथा नाना प्रकार की उत्तमोत्त्म चीज राज दरबार में ले जाते थे तथा मान्य पुरुषों की भेंट में भी ले जाते थे। यह 'ओलगे' की प्रथा कहलाती थी। अब भी यह त्यौहार थोड़ा-बहुत मनाया है, इसलिये यह संक्रान्ति 'ओलगिया' भी कहलाती है, इसे घृत या घ्यू संक्रान्ति भी कहते हैं। इस दिन बेड़िया रोटियों के साथ खूब घी खाने का भी रिवाज है।

"कुमाऊं का इतिहास" के साभार

पंकज सिंह महर

इसे घ्य़ू-त्यार, घी-त्यार और ओलगिया के नाम से भी जाना जाता है। यह त्यौहार भाद्रपद मास की संक्रान्ति के दिन मनाया जाता है। इस वर्ष यह त्यौहार आगामी १७ अगस्त को मनाया जायेगा।

सोर-बागेशर (पिथौरागढ़ और बागेश्चर) जो गंगपारी इलाका माना जाता है, वहां पर कुछ त्यौहार संक्रान्ति की बजाय मसान्ति को मनाये जाते हैं। सो इस इलाके में १६ अगस्त को यह त्यौहार मनाया जायेगा।


पंकज सिंह महर

विगत शनिवार को गिरदा एक कार्यक्रम में भाग लेने देहरादून आये थे, उनसे मुझे भेंट करने का सुअवसर प्राप्त हुआ। घी-त्यार से संबंधित कई बातें गिरदा ने मुझे बताईं, इस त्यौहार के अवसर पर उन्होंने मेरा पहाड़ परिवार के सभी सदस्यों और समस्त देश-प्रदेश वासियों को शुभकामनायें दी हैं, एक छोटी सी कविता के साथ-

"घ्यू संकरात क चुपाड़ा हाथ,
मास का बेडू, तिमळाक पात"

साथ ही इस त्यौहार के दिन घी न खाने वाले व्यक्ति के लिये कहा जाता है कि वह अगले जन्म में गनेल बनेगा। इसका तथ्यात्मक पहलू भी गिर्दा ने बतलाया कि "जो लोग प्राकृतिक संसाधनों और पशुधन का पूरा इस्तेमाल नहीं करते और अकर्मण्य होकर प्रकृति और उसकी विपुल सम्पदा का इस्तेमाल नहीं करते, ऐसे कर्महीन निश्चित ही अगले जन्म में गनेल की ही गति को प्राप्त होंगे।"

Hisalu

Atyottam Rajen Da and Pankaj Daa...

Ghyu Tyaaraa upar bhotai bhal jaankaari de.. Guru tumeri jai ho..

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


घी-त्यार kee!

आप सभी को इस लोक पर्व की सपरिवार बधाईयां।

Meena Rawat