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1st Generation Speaks Pahadi, 2nd Understand a bit, What about 3rd Generation ?

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, March 09, 2010, 04:14:19 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Dosto,

The existence of the regional languages is at stake. Same is situation for our pahadi languages. The reasons are as follows :

1)   First Generation Speaks the pahadi language

2)   Second generation  born outside the Uttarakhand can only understand the language as they listen the conversation of first generation.

3)   What about the third Generation as the second generation do not speak the language so they will not able to pass the language to third Generation.

So it is clear that one day, our languages are going to die in metro cities. We all have to take pledge to teach our regional language to next generation.

Let us start this campaign to survive our language.

Regards,

M S Mehta

mehta ji ye batao.. hum kis gen mai aate hai.. kilke hum to bhalki bulanu yaar.. ghar mai le

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


मोहन दा,

या पीड़ी हामी लोगो ले भाषा पर आधारित कर राखो! जैसे की:

     १) पैल पीड़ी - जो आपुन भाषा में बात करू (यो खासतौर बाटी हमर पहाड़ क जो लोग अलग-२ शहर में बसी गयी,वो तो परिवार में आपुन भाषा में बात करनी, उनार नानतिन जो याहं पैद भैई (दुसर पीड़ी) जो केवल आपुन भाषा के समझ सकनी लेकिन बात नि कर स्कन

२) तो यो जो दुसर वाली पीड़ी छो उनार जो नानतिन छे उनको आपुन भाषा नि बाटी स्कन! किले के वो खुद आपुन भाषा नी जानन!

अब यो तीसर पीड़ी कबे ले आपुन बोली नी सीख पावो!

म्यार ख्याल हामी लोगो दुसर पीड़ी वाल छियो ! 

पंकज सिंह महर

ऐसा नहीं है, मेरे आमा-बूबू पहाड़ी बोलते थे, मेरे ईजा-बाबू भी बोलते हैं, मैं और मेरी पत्नी भी बोलते हैं और मेरी आने वाली पीढ़ी भी जरुर बोलेगी।
थोड़ा है और थोड़े की जरुरत है।

शर्माओ नहीं, हमारी बोली हमारा उपहास नहीं है,
हमारा गर्व है, हमारी संस्कृति है, हमारी पहचान है।

इसके बिना हम अधूरे और खोखले हैं, भले ही बाहर से सैप बनते होंगे, लेकिन अन्दर से कभी न कभी यह खोखलापन, अधूरापन कचोटता जरुर होगा।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

From: Mukund Dhoundiyal <ml.dhoundiyal@ gmail.com>
Subject: [YU - All India Society] शुरू करा अपणी बोलीआज बीटी
To:
Date: Monday, 4 January, 2010, 6:47 AM





संसार का  हर प्राणी अपने समुदाय में रहता है
और उसीमे बड़ा भी होता है  और  अपने को सुरक्षित समझता है 
  उसका  सही विकास भी अपने  समुदाय में  ही होता है
इंसान  भी  अपने अपने समुदाय में  ही पनपते हैं उनके विकास में सहायक  शक्तियां भी समुदाय में  ही विद्यमान होती हैं
और उनकी परस्पर विचार आदान प्रदान करने की एक बोली होती है
जिस के माध्यम से  वो अपने लोगो  से जुड़ा रहता है


फिर हम उत्तरांचली क्यों नहीं अपने  समुदाय में जुडे रहने   का  और अपणी बोली में बोलने का  अभ्यास नहीं करते
और क्यों नहीं हम   आपस में अपणी बोली में बुलाते हैं ..

हमारी बोली बहुत ही आसान है प्यारी भी .  पहाड़ों में आज भी ऐसे बहुत से  देशी लोग देखे सकते हैं जो उत्तरांचली
बोलियों को समझ जाते हैं
बल्कि कुछ तो बोल भी लेते हैं   कोटद्वार  नैनीताल ऋषिकेश  हर्दिवर देहरादून में  रहने वाले बहुत से पंजाबी दुकानदारों को मैने लोकल  बोली बोलते देखा है...

एक दिन  जब मै कोट द्वार  में  अपणी गाँव जाने वाली बस  ढून्ढ रहा था   तो एक  दूकान दर  न  मुझे पीछे से पुकारा  "ओ भैजी कख छ जाणा  रोडवेज  कु टिकट घर  यख च हमारा होटल का समणी  आवा आवा पैली  गरम गरम च्या ता  पे जावा
तुमारु टिकट  लीना माँ हम सहायता करिद्युंला
और मै हैरान  था की ये आवाज   दुकानदार अग्रवाल  के मुह से निकली थी जिनका चाय का रेस्तोरांत है

तब मुझे लगा की हमारी अपणी बोली कितनी अच्छी और आसान है 
बहार से  आये भांडे बर्तन  बेचने वाले,   सब्जी बेचने वाले  लोग  यहाँ तक की   देसी परदेसी अध्यापक भी
भी  हमारी बोली में बोलते  पुकारते  हुए देखे  जा सकते हैं
और कहीं कहीं तो ऐसा लगा मानो वे उत्तराँचल के मूल निवासी हैं

तो ठीक ही बोला किसी ने  की
"घर कु जोगी जोगडा  और भैर कु जोगी सिद्द "
अरे  भाई   ...
शुरू  करा अपणी बोली .....
आज  बीटी ...
न  न न  आज  न
....... बल्कि अब्बी बीटी
बुलाँ चालाँ  सुरु करा..

शुभ काम का वास्ता महूर्त की जरूरत नि होंदी   ...जब बीटी शुर करा .....
समझा  तब बीटी शुभ महूर्त ह्वेगी   

Himalayan Warrior /पहाड़ी योद्धा



आपु बोली के बचायी रखना एक चिंता का विषय छा!

हर कोई आपुन बच्चा कै सिध अंग्रेजी सीखूंण चा लेकिन आपुन बोली कै अपुन बच्चो के सीखूंण तरफ को धयान निदींन ! यो खतरा ज्यादे ठुल-२ शहरो में रूनी वाल लोगो के छो !

आओ शपथ लियो आपुन बोली के बचोन के लीजी !

Lalit Mohan Pandey


मेहता जी बिलकुल सही कुछा, जब ईजा, बाबु ही पहाड़ी नि बोली सकाला त नन्तिना कसिके सिखाला.   
यह जरुर एक गंभीर विषय है की कैसे अपनी बोली, सभ्यता, संस्कृति को जीवित रखा जाय. Pahle तो yah samjhana jaruri है की संस्कृति or सभ्यता tabhi जीवित rah sakti है, जब hamari बोली जीवित rahe.   lekin  इसके लिए कही से कोए सार्थक पर्यास हो रहा हो ये भी नहीं दीखता. Pithoragarh jaise jagahu mai भी jake ये mahasoos hota है की bache ab पहाड़ी नहीं bol pate, कोए bolta भी है तो bas kuch word tak ही seemit rah jata है. .. ab Babu, Papa या डैडी हो गये  है तो ईजा , मम्मी हो गयी है और शायद इसी मै सभी खुश है. हकीकत तो ये है की अगर बच्चे पहाड़ी नहीं बोल पाते तो उसके लिए बच्चू से ज्यादा दोषी माता पिता है.
हमारे गाव के एक बुजुर्ग सही ही कहा करते थे "आगो लागो इनरी भाषासे, ज्युना बाबु स dead body (daddy), मतारी स ममी कुनान."

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720



मै यो बात कै भौत मजबूती साथ ले बिश्वास करदू, बिना भाषा जाणि आपुन संस्कर्ती का विकास नि है सकदु! माँ बाप क विशेष रूप से जिम्मेवारी बनो की को आपुन, नौनी, चेला, चेली बटी कै पहाड़ी बोली मा बात करे! 

हमर भाषा क अस्तितव खातर मा छो!

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720



This is one of the serious issue. The existence of regional languages are also at stake. One way, people in metro cities do not teach their language to their kids and at the same in village areas also some changes can be seen in speaking languages. like.. omission of many words which have been either placed by English or Hindi. One of the popular word now a days can be heard. "One Day marriage"..

I think there is no pahadi world for this. In Hindi Ek Divseey Shadi.

What is in pahadi ?

Anyway.. people living in metro cities should speak their kids at home in their  regional languages.. s

dayal pandey/ दयाल पाण्डे

कुछ बदलते शब्द-
1st Gen.  -2nd Gen.  - 3rd Gen.
इजा/बोई  - मम्मी     - मोम
बोज्यू / बाबू - पापा     - डैड
घर        - होम     - फ्लैट
घरवाई     - wife         - डार्लिंग
बोजी/भौजी  - भाभी     - भाभी
शराब       - दारु      - ड्रिंक