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Should Gairsain Be Capital? - क्या उत्तराखंड की राजधानी गैरसैण होनी चाहिए?

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 05, 2007, 12:23:04 PM

Do you feel that the Capital of Uttarakhand should be shifted Gairsain ?

Yes
97 (71.3%)
No
26 (19.1%)
Yes But at later stage
9 (6.6%)
Can't say
5 (3.7%)

Total Members Voted: 136

Voting closed: March 21, 2024, 12:04:57 PM


I do agree with TPS Rawat. Most of the political parties of Uttarakhand except of UKD has sideligned this major issue.

Capital issue should be in the political manifesto of the Political parties....

Quote from: एम.एस. मेहता /M S Mehta on December 15, 2011, 02:47:39 AM
Yes.. Even TPS Rawat also feel so.

गैरसैंण स्थायी राजधानी से होगा विकास : टीपीएस रावतDec 14, 06:26 pmबताएं
Twitter Delicious Facebook गैरसैंण : गैरसैंण जीआईसी मैदान में आयोजित रक्षा मोर्चा कार्यकर्ताओं की बैठक को संबोधित करते हुए मोर्चा प्रदेश अध्यक्ष टीपीएस रावत ने कहा कि भाजपा व कांग्रेस दोनों दलों ने गैरसैंण क्षेत्र की उपेक्षा की है। गैरसैंण स्थायी राजधानी बनाये जाने के मुद्दे को लेकर दोनों दलों ने गंभीरता से पैरवी नही की है।

रावत ने कहा कि प्रदेश में वर्तमान में भ्रष्टाचार, कमीशनखोरी चरम पर है और विभिन्न विभागों में पद रिक्ती के बाद भी युवाओं को रोजगार नही दिया जा रहा है। इस मौके पर प्रदेश के लोकगायक नरेन्द्र सिंह नेगी ने कहा कि भाजपा व कांग्रेस स्थानीय मुद्दों के हल को गंभीर नही हैं। मोर्चा जिलाध्यक्ष राजेन्द्र सिंह सगोई ने कहा कि नव सृजित रक्षा मोर्चा दल में युवा वर्ग विशेष रूचि ले रहे हैं और लोग अन्य दलों को छोड़ कर दल की सदस्यता ग्रहण कर रहे हैं। गैरसैंण विकासखंड के दूरदराज क्षेत्र से आये पूर्व सैनिकों, महिलाओं ने रैली में भाग लेकर भाजपा प्रदेश सरकार को सत्ता से उखाड़ फेंकने का संकल्प लिया। इस अवसर पर प्रेम सिंह बिष्ट, नयन सिंह, कुंवर सिंह, नंदन सिंह आदि विचार रखे।

(Dainik jagran).

हलिया

गैरसैण को उत्तराखण्ड की राजधानी बनाओ
श्री टीपीएस रावत को उत्तराखण्ड का सीएम बनाओ
गैरसैण
गैरसैण
गैरसैण
गैरसैण

विनोद सिंह गढ़िया

कौ लाटा आण काथा सुण काला तू, दौड़ डुना तू

जन नेता स्व. विपिन त्रिपाठी के खास सहयोगी उत्तराखंड गौरव से सम्मानित राज्य आंदोलनकारी, द्वाराहाट के पूर्व प्रमुख 88 वर्षीय हयात सिंह कैड़ा ने राज्य के मौजूदा परिदृश्य की तुलना कुमाऊं के एक किस्से के माध्यम से की है। जिसमें कौ लाटा आण काथा, सुण काला तू, अनाड़िल घट लगाई, दौड़ डुना तू जैसी पंक्तियां अंधेर नगरी चौपट राजा के आशय की तरफ संकेत करती हैं।
उत्तराखंड राज्य के मौजूदा परिदृश्य से वह काफी आहत हैं। एक जमाने में स्व. विपिन त्रिपाठी के सहयोगी रहे पूर्व सैनिक श्री कैड़ा का कहना है कि आज गैरसैंण राजधानी का मसला सभी ने भुला दिया है। कांग्रेस की हालत उस लाटे-गूंगे जैसी है, जिसके पास इस मुद्दे पर बोलने की शक्ति नहीं रह गई है। सत्तारूढ़ भाजपा बहरी हो गई है। उसने इस मामले में अपने कान बंद कर लिए हैं और वह दूसरे मुद्दों से ध्यान बांट रही है। गैरसैंण में राजधानी का शिलान्यास कर चुके उक्रांद के नेता घराट लगाने वाले उस अनाड़ी की तरह है जो लक्ष्य से भटक चुका है।
सत्ता के लोभ में फंसे उक्रांद के नेता भी गैरसैंण को भूल चुके हैं। उत्तराखंड की जनता की हालत उस लंगड़े जैसी हो गई है जो 1994 की तरह गोलबंद होकर संघर्ष की तरफ दौड़ नहीं सकती।

श्रोत: अमर उजाला

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


I fully endorse the views of Mr Kaida Ji. Indeed Uttarakhandi Politicians has totally diluted this major issue related to direct development of Uttarakhand.

There are giving thousands of baseless logic behind not shifting the capital to Gairsain but the reality that is that Congress & BJP fears of losing their vote of plain area on Gairsain issue.

After the sudden demise of Vipin da, UKD split in tinny piece and this issue weakened from there itself.

This is high time, UKD should strongly take-up this issue and regain public support. 

Quote from: विनोद गड़िया on December 24, 2011, 02:28:44 AM
कौ लाटा आण काथा सुण काला तू, दौड़ डुना तू

जन नेता स्व. विपिन त्रिपाठी के खास सहयोगी उत्तराखंड गौरव से सम्मानित राज्य आंदोलनकारी, द्वाराहाट के पूर्व प्रमुख 88 वर्षीय हयात सिंह कैड़ा ने राज्य के मौजूदा परिदृश्य की तुलना कुमाऊं के एक किस्से के माध्यम से की है। जिसमें कौ लाटा आण काथा, सुण काला तू, अनाड़िल घट लगाई, दौड़ डुना तू जैसी पंक्तियां अंधेर नगरी चौपट राजा के आशय की तरफ संकेत करती हैं।
उत्तराखंड राज्य के मौजूदा परिदृश्य से वह काफी आहत हैं। एक जमाने में स्व. विपिन त्रिपाठी के सहयोगी रहे पूर्व सैनिक श्री कैड़ा का कहना है कि आज गैरसैंण राजधानी का मसला सभी ने भुला दिया है। कांग्रेस की हालत उस लाटे-गूंगे जैसी है, जिसके पास इस मुद्दे पर बोलने की शक्ति नहीं रह गई है। सत्तारूढ़ भाजपा बहरी हो गई है। उसने इस मामले में अपने कान बंद कर लिए हैं और वह दूसरे मुद्दों से ध्यान बांट रही है। गैरसैंण में राजधानी का शिलान्यास कर चुके उक्रांद के नेता घराट लगाने वाले उस अनाड़ी की तरह है जो लक्ष्य से भटक चुका है।
सत्ता के लोभ में फंसे उक्रांद के नेता भी गैरसैंण को भूल चुके हैं। उत्तराखंड की जनता की हालत उस लंगड़े जैसी हो गई है जो 1994 की तरह गोलबंद होकर संघर्ष की तरफ दौड़ नहीं सकती।

श्रोत: अमर उजाला


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Who is talking about this issue in the election. I think BJP and Congress never raised any voice on capital issue.


विनोद सिंह गढ़िया

हाशिए पर चली गई आंदोलन के दौर में गढ़-कुमाऊं की सर्वमान्य रही 'राजधानी'

9 नवंबर 2000 की मध्य रात्रि दून के परेड मैदान में प्रथम राज्यपाल सुरजीत सिंह बरनाला और मुख्यमंत्री नित्यानंद स्वामी की शपथ के साथ भारत के नक्शे पर उत्तराखंड का उदय हुआ था। एक ओर जश्न का माहौल था, तो दूसरी ओर चंद मिनट में ही समारोह का मंच आंदोलनकारियों के कब्जे में आ गया। पूरे माहौल में सिर्फ एक ही नारा गूंजने लगा, 'गैरसैंण-गैरसैंण...राजधानी गैरसैंण।' गैरसैंण को लेकर यह पहली आवाज नहीं थी।
यह था, अस्थायी राजधानी के नाम पर छले जाने का प्रतिकार। आरक्षण विरोधी छात्र आंदोलन 2 अगस्त 1994 को पर्वतीय गांधी इंद्रमणी बडोनी के अनशन के साथ स्वत: ही उत्तराखंड आंदोलन में 'कन्वर्ट' हुआ, तो गैरसैंण की स्वीकार्यता भी बढ़ने लगी। आंदोलन के उफान के साथ गैरसैंण को राजधानी के तौर पर गढ़-कुमाऊं की व्यापक जनस्वीकार्यता मिल गई।
तत्कालीन उत्तर प्रदेश के दून समेत 8 पर्वतीय जिलों को मिलाकर उत्तराखंड राज्य बनाने की मांग काफी पुरानी रही है। इस प्रस्तावित राज्य की राजधानी पहाड़ पर गढ़वाल-कुमाऊं के केंद्र में हो, यह सवाल भी काफी पहले से उठता रहा है। 1987 में उत्तराखंड क्रांति दल (उक्रांद) के नेता त्रिवेंद्र पंवार ने लोकसभा की दर्शकदीर्घा से राज्य की मांग के समर्थन में परचे फेंके थे, तो उसमें 'गैरसैंण' को भी शामिल किया गया था। 1990 के दशक की शुरुआत से ही गैरसैंण को लेकर गर्माहट बढ़ने लगी थी। 1992 में उक्रांद ने प्रदेश भर से जुटे कार्यकर्ताओं की मौजूदगी में गैरसैंण को राजधानी घोषित करते हुए वहां इसके लिए अपने संरक्षक इंद्रमणी बडोनी और अध्यक्ष काशी सिंह ऐरी के हाथों शिलान्यास कराया। उत्तर प्रदेश की तत्कालीन भाजपा सरकार ने गैरसैंण का महत्व स्वीकारते हुए वहां शिक्षा विभाग के एडी का कार्यालय खोलाने को मंजूरी दी। 1994 से उत्तराखंड आंदोलन के समानांतर गैरसैंण राजधानी की लगातार बात होती रही। उत्तराखंड महिला मंच की केंद्रीय संयोजक कमला पंत की अगुवाई में 1996 में बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं ने गैरसैंण में रैली की। इसके बाद से मंच, उक्रांद और तमाम आंदोलनकारी संगठनों की ओर से लगातार पदयात्राएं, रैलियां, धरना-प्रदर्शन, बौद्धिक परिचर्चाएं राजधानी के मुद्दे पर होते रहे और गैरसैंण ऐसी तमाम गतिविधियों का केंद्र बन गया। वर्ष-2000 में उत्तराखंड को राज्य का दर्जा देने की घोषणा हुई, तो तमाम राज्यवासियों को उस वक्त करारा झटका लगा, जब सरकार के स्तर पर इंफ्रास्ट्रक्चर की अनुपलब्धता के बहाने गैरसैंण को 'गैर' करते हुए देहरादून को राजधानी के रूप में अपना लिया गया। इसके लिए दून पर 'अस्थायी राजधानी' का लेबल चस्पा किया गया। इसे पहाड़ की राजधानी को पहाड़ से दूर करने की साजिश मानते हुए महिला मंच ने 24 सितंबर 2000 को महारैली आयोजित की। 2 अक्तूबर 2000 को देहरादून में अस्थायी राजधानी का विरोध करते हुए गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने की मांग को लेकर उत्तराखंड बंद और चक्का जाम किया गया। वर्ष-2001 में नित्यानंद स्वामी सरकार ने जस्टिस वीरेंद्र दीक्षित की अध्यक्षता में स्थायी राजधानी चयन के लिए एकल आयोग का गठन किया, तो विरोध का सिलसिला तेज हो गया। वर्ष-2004 के अगस्त में राजधानी के मुद्दे पर गैरसैंण में अनशन पर बैठे बाबा मोहन उत्तराखंडी शहीद हो गए। इस पर पूरा प्रदेश उबल गया था। राजधानी के मुद्दे पर गैरसैंण में अनशन पर बैठे धरना-प्रदर्शन, अनशन, बंद-चक्का जाम का यह सिलसिला कभी तेजी से, तो कभी धीमे-धीमे हालिया वक्त तक जारी रहा। जुलाई 2009 को राजधानी आयोग की रिपोर्ट आई, तो गैरसैंण समर्थकों को एक बार फिर करारा झटका लगा-मायूसी मिली।

साभार : अमर उजाला


नोट : गैरसैण मुद्दे पर और अधिक जानकारी के लिए कृपया  इस लिंक पर क्लिक करें

विनोद सिंह गड़िया

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

In fact the capital issue has been sidelined by the political parities.

The people from Uttarakhand who call theseleves so called state agitators have now forgotten the capital issue.

Quote from: विनोद गड़िया on January 16, 2012, 03:12:04 AM
हाशिए पर चली गई आंदोलन के दौर में गढ़-कुमाऊं की सर्वमान्य रही 'राजधानी'

9 नवंबर 2000 की मध्य रात्रि दून के परेड मैदान में प्रथम राज्यपाल सुरजीत सिंह बरनाला और मुख्यमंत्री नित्यानंद स्वामी की शपथ के साथ भारत के नक्शे पर उत्तराखंड का उदय हुआ था। एक ओर जश्न का माहौल था, तो दूसरी ओर चंद मिनट में ही समारोह का मंच आंदोलनकारियों के कब्जे में आ गया। पूरे माहौल में सिर्फ एक ही नारा गूंजने लगा, 'गैरसैंण-गैरसैंण...राजधानी गैरसैंण।' गैरसैंण को लेकर यह पहली आवाज नहीं थी।
यह था, अस्थायी राजधानी के नाम पर छले जाने का प्रतिकार। आरक्षण विरोधी छात्र आंदोलन 2 अगस्त 1994 को पर्वतीय गांधी इंद्रमणी बडोनी के अनशन के साथ स्वत: ही उत्तराखंड आंदोलन में 'कन्वर्ट' हुआ, तो गैरसैंण की स्वीकार्यता भी बढ़ने लगी। आंदोलन के उफान के साथ गैरसैंण को राजधानी के तौर पर गढ़-कुमाऊं की व्यापक जनस्वीकार्यता मिल गई।
तत्कालीन उत्तर प्रदेश के दून समेत 8 पर्वतीय जिलों को मिलाकर उत्तराखंड राज्य बनाने की मांग काफी पुरानी रही है। इस प्रस्तावित राज्य की राजधानी पहाड़ पर गढ़वाल-कुमाऊं के केंद्र में हो, यह सवाल भी काफी पहले से उठता रहा है। 1987 में उत्तराखंड क्रांति दल (उक्रांद) के नेता त्रिवेंद्र पंवार ने लोकसभा की दर्शकदीर्घा से राज्य की मांग के समर्थन में परचे फेंके थे, तो उसमें 'गैरसैंण' को भी शामिल किया गया था। 1990 के दशक की शुरुआत से ही गैरसैंण को लेकर गर्माहट बढ़ने लगी थी। 1992 में उक्रांद ने प्रदेश भर से जुटे कार्यकर्ताओं की मौजूदगी में गैरसैंण को राजधानी घोषित करते हुए वहां इसके लिए अपने संरक्षक इंद्रमणी बडोनी और अध्यक्ष काशी सिंह ऐरी के हाथों शिलान्यास कराया। उत्तर प्रदेश की तत्कालीन भाजपा सरकार ने गैरसैंण का महत्व स्वीकारते हुए वहां शिक्षा विभाग के एडी का कार्यालय खोलाने को मंजूरी दी। 1994 से उत्तराखंड आंदोलन के समानांतर गैरसैंण राजधानी की लगातार बात होती रही। उत्तराखंड महिला मंच की केंद्रीय संयोजक कमला पंत की अगुवाई में 1996 में बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं ने गैरसैंण में रैली की। इसके बाद से मंच, उक्रांद और तमाम आंदोलनकारी संगठनों की ओर से लगातार पदयात्राएं, रैलियां, धरना-प्रदर्शन, बौद्धिक परिचर्चाएं राजधानी के मुद्दे पर होते रहे और गैरसैंण ऐसी तमाम गतिविधियों का केंद्र बन गया। वर्ष-2000 में उत्तराखंड को राज्य का दर्जा देने की घोषणा हुई, तो तमाम राज्यवासियों को उस वक्त करारा झटका लगा, जब सरकार के स्तर पर इंफ्रास्ट्रक्चर की अनुपलब्धता के बहाने गैरसैंण को 'गैर' करते हुए देहरादून को राजधानी के रूप में अपना लिया गया। इसके लिए दून पर 'अस्थायी राजधानी' का लेबल चस्पा किया गया। इसे पहाड़ की राजधानी को पहाड़ से दूर करने की साजिश मानते हुए महिला मंच ने 24 सितंबर 2000 को महारैली आयोजित की। 2 अक्तूबर 2000 को देहरादून में अस्थायी राजधानी का विरोध करते हुए गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने की मांग को लेकर उत्तराखंड बंद और चक्का जाम किया गया। वर्ष-2001 में नित्यानंद स्वामी सरकार ने जस्टिस वीरेंद्र दीक्षित की अध्यक्षता में स्थायी राजधानी चयन के लिए एकल आयोग का गठन किया, तो विरोध का सिलसिला तेज हो गया। वर्ष-2004 के अगस्त में राजधानी के मुद्दे पर गैरसैंण में अनशन पर बैठे बाबा मोहन उत्तराखंडी शहीद हो गए। इस पर पूरा प्रदेश उबल गया था। राजधानी के मुद्दे पर गैरसैंण में अनशन पर बैठे धरना-प्रदर्शन, अनशन, बंद-चक्का जाम का यह सिलसिला कभी तेजी से, तो कभी धीमे-धीमे हालिया वक्त तक जारी रहा। जुलाई 2009 को राजधानी आयोग की रिपोर्ट आई, तो गैरसैंण समर्थकों को एक बार फिर करारा झटका लगा-मायूसी मिली।

साभार : अमर उजाला


नोट : गैरसैण मुद्दे पर और अधिक जानकारी के लिए कृपया  इस लिंक पर क्लिक करें

विनोद सिंह गड़िया


विनोद सिंह गढ़िया

गैरसैण राजधानी मुद्दे पर मेरा पहाड़, अपना उत्तराखंड इत्यादि पोर्टलों पर चल रही ऑनलाइन मुहिम पर अमर उजाला की एक रिपोर्ट


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

उत्तराखंड में चल रहे विधान सभा चुनावो में क्षेत्री पार्टियों के गैरसैंन कोई मुद्दा नहीं रहा! उत्तराखंड के विकास की बात करने वाले पार्टियों को गैरसैंन जैसे मुद्दे की कोई सुध नहीं है! पहाड़ के लोगो की जन भावनाओ से जुडा सवाल है!

भारटीय जनता पार्टी एव कांग्रेस के चुनावी घोषणा पत्र में गैरसैन के मुद्दा जरुर होना चाहिए

विनोद सिंह गढ़िया

जैसा कि आप सभी ने देखा कांग्रेस और बीजेपी ने अपना चुनावी घोषणापत्र जारी किया, अनेक लोकलुभावने वादे किये जा रहे हैं। लेकिन किसी ने भी गैरसैण राजधानी मुद्दे को अपने घोषणापत्र पर कोई जगह नहीं दी, आखिर क्यों ? क्या  उत्तराखंड राज्य  बनाने का उद्देश्य यही था कि दूर देहरादून को हमारी राजधानी बनाई जायेगी ?
आज हर उत्तराखंडी कहता है - उत्तराखंड की राजधानी गैरसैण, सिर्फ गैरसैण .............तो फिर यह हमसे गैर क्यों ? क्या इनके पास कोई जवाब है ? क्या किसी राष्ट्रीय पार्टी में दम है जो उत्तराखंड की स्थाई राजधानी को गैरसैण बना सके ?