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उत्तराखण्ड की भोटिया जनजाति : Bhotiyas, Resident of High Altitude Himalayas

Started by हेम पन्त, April 17, 2010, 03:18:22 PM

हेम पन्त

भोटिया (Bhotiya) जनजाति के लोग उत्तराखण्ड के तिब्बत से लगे सीमान्त इलाकों के निवासी हैं, इन्हें शोका (Shoka) या रं (Rung) जनजाति के नाम से भी जाना जाता है. इनकी आबादी पारम्परिक रूप से मुख्यत: पिथौरागढ (धारचूला, मुन्स्यारी, डीडीहाट विकास खण्ड), बागेश्वर (दानपुर क्षेत्र), चमोली और उत्तरकाशी जिलों में समुद्र तल से लगभग 2500 मीटर से अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्र में पायी जाती हैं. भोटिया लोगों की शारीरिक बनावट मंगोलियन होती है लेकिन यह लोग तिब्बती समाज से अपने आनुवांशिक सम्बन्धों को नकारते हुए स्वयं को राजपूतों के वंशज मानते हैं. भोटिया जनजाति के लोग परम्परागत रूप से तिब्बत के "खम्पा" व्यापारियों के साथ वस्तु विनिमय के आधार पर व्यापार करते थे. 16वीं शताब्दी के में दुगलत मिरजा ने "तारिक-ए-रसिदी" नामक पुस्तक में भोटिया और तिब्बत्तियों के बीच होने वाले इस व्यापार का वर्णन किया है. आजादी के बाद चीन-भारत के बिगड़ते रिश्तों से इस व्यापार पर रोक लगा दी गई जिससे भोटिया लोगों को भारी संख्या में अपने गांव छोड़ कर शहरों की तरफ पलायन करने को मजबूर होना पड़ा.

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भोटिया लोगों के जातिनाम (Surname) उनके गांव के नाम पर आधारित होते हैं जैसे - मरतोलिया लोग मरतोली के मूल निवासी होते हैं. इसी तरह गर्ब्याल (गर्ब्यांग), नबियाल (नाबी), बौनाल (बौना) और नपलच्याल उपजाति के लोग नपलच्यूं गांव के निवासी होते हैं.

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जटिल भोगौलिक परिस्थितियों में रहते हुए भी यह लोग अपनी कठोर परिश्रम व व्यापारिक सोच के फलस्वरूप विभिन्न प्रकार के व्यवसाय में अत्यन्त सफल हुए हैं. भोटिया इलाकों में बनाये गये दन (कालीन), थुल्मा, चुटके व अन्य गरम कपड़े काफी मात्रा में खरीदे जाते है. अनवाल (पशुचारकों) के झुण्ड अपने प्रवास के लिये जाने जाते हैं. यह लोग सर्दियों में पहाड़ों से नीचे उतर कर प्रवास करते हुए तराई-भाबर तक पहुंच जाते हैं और सर्दियां खतम होते-होते पुन: हिमालय की गोद में बसे अपने गांवों में लौट आते हैं, और ग्रीष्म ऋतु यही बिताते हैं.1962 के चीन युद्ध के बाद तिब्बत-भारत चीन पर प्रतिबंध लगने के बाद सीमान्त इलाकों में रहने वाले भोटिया लोग पलायन करके देश के विभिन्न इलाकों में बस गये इससे इनके इलाके में होने वाली परम्परागत व्यापारिक गतिविधियों पर बहुत बुरा असर पड़ा. पिछले कुछ सालों से भारत सरकार ने पिथौरागढ के गुंजी (Gunji) नामक स्थान पर एक व्यापारिक चौकी स्थापित की है जहां पर साल में 2-3 महीने तिब्बत के साथ व्यापार के लिये व्यापारियों को अनुमति दी जाती है.       

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भोटिया और तिब्बतियों के बीच सदियों से चले हो रहे व्यापार के बारे में कहा जाता है कि भाषा में विभिन्नता के कारण आपस में इनका व्यापार इशारों में सम्पन्न होता था-  विक्रेता अपने माल को दोनों हाथों से ढ़क लेता थे और खरीददार से तब तक पैसे लेता रहता था जब तक उसे वांछित दाम नहीं मिल जाते थे।

भोटिया लोग बकरों, भेड़ों, और खच्चरों पर तिब्बत से सुहागा, नमक और स्वर्ण भस्म लाते थे और भारत की तरफ से ले जाकर अनाज, चीनी, गुड़, मसाले, तंबाकू, सूती कपड़े, लोहे के सामान, मूंग दाने आदि तिब्बतवालों को बेचते थे।

हेम पन्त

Source : wikipedia.org

Bhotiya are an ethno-linguistic group of people resided in the upper Himalayan valleys of the Kumaon and Garhwal of Uttarakhand Himalayas. These include the Shaukas of Kumaon and Tolchhas and Marchhas of Garhwal. Their name, Bhotiya, derives from the word Bod (बोड), which is the Classical Tibetan name for Tibet. Those living in Uttarakhand are generally referred to as Bhotiya, although they are sometimes also referred to as Bhutia; Bhutia more commonly means the related people of Sikkim.

The Bhotiya speak Almora and Kiranti languages belonging to the Tibeto-Burman family, although their dialects are mutually unintelligible to the Kumaonis and Tibetans. Owing to social process of Sanskritization, many of them have intermarried with the Hindus over the years. Most of the Bhotiya practice a combination of Tibetan Buddhism, Bön and Hinduism, although Hinduism is prevalent among the earlier semi-Indian groups, while Buddhism is prevalent among the recent immigrant groups of purer Tibetan origin, such as the Jadh.

Hindu gods such as the weather God Gabla, Runiya and Suniya, are worshiped to protect their animals from disease. Sidhuwa and Bidhuwa are worshiped as well to find lost animals.

Devbhoomi,Uttarakhand


भारत-चीन सीमा से लगे उत्तराखंड के सीमावर्ती जिले चमोली में रहने वाले भोटिया जनजाति के कई गांव हैं। भोटिया जनजाति में मारछा और तोलिया दो जातियों के लोग होते हैं। भोटिया जनजाति के ये लोग आज सामाजिक और आर्थिक रुप से आगे बढ़ रहे हैं। पुराने समय में भेड़-बकरियां पालने वाले ये लोग भारत-चीन के बीच नमक औऱ चावल का व्यापार करते थे।


लेकिन आज अपनी मेहनत से भोटिया जनजाति के लोग और खासकर महिलायें सफलता की नई कहानी लिख रही हैं। ऐसे ही एक गांव रेणी में हम सुशीला और उसके परिवार से मिले। सुशीला और उसकी बहन पढ़ाई-लिखाई पूरी करने के बाद अपने पुश्तैनी ब्यवसाय को आगे बढ़ा रही हैं।

वो उसी चरखे पर ऊन कात रही हैं जिसपर उनकी दादी और मां कातती थी। लेकिन आज जमाना बदल गया है वो पढ़ी-लिखी हैं। इसलिए नई तकनीक का इस्तेमाल कर बढ़िया क्वालिटी के कालीन, कंबल और ऊन से बनने वाले दूसरे सामान बना रही हैं।

ये खुद ही अपने सामान की मार्केटिंग भी करती हैं। उनकी इस पहल से परिवार आज आर्थिक और सामाजिक रूप से आगे बढ़ रहा है। लेकिन अब भी कुछ मुश्किलें हैं। भोटिया समाज के पास कोई राजनीतिक नेतृत्व नहीं है।

दरअसल ये लोग खानाबदोश सा जीवन जीते हैं। सर्दियां शुरू होने पर ये लोग अपनी भेड़-बकरियों के साथ चमोली में मांणा और आसपास की बर्फीली पहाड़ियों से उतकर तराई भाबर के मैदानों में आ जाते हैं। गर्मियां शुरू होने पर वापस पहाड़ों की ओर चले जाते हैं। खानाबदोश जीवन की कई परेशानियां भी हैं। किसी स्थायी ठिकाने और घरबार से दूर होने के कारण ये लोग अपने मताधिकार का प्रयोग नहीं कर पाते।

यहां के लोगों में आगे बढ़ने की ललक और ज्ज़बा तो दिखाई देता है लेकिन आजादी के 60साल बाद भी राजनीतिक जागृति का अभाव है। हालांकि भोटिया जनजाति के लोगों ने समय के साथ खुद को बदल तो लिया है लेकिन उन्हें अपने लिए आज भी किसी राजनीतिक नेतृत्व की तलाश है।

हेम पन्त

"कण्डाली" नामक अनूठा त्यौहार भोटिया जनजाति द्वारा हर बारह साल के बाद मनाया जाता है.

इस अनूठे रिवाज के बारे में आप हमारे फोरम में यहां जाकर जानकारी प्राप्त कर सकते हैं-


http://www.merapahad.com/forum/culture-of-uttarakhand/kandali-place-in-uttarakhand

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गढ़वाल के सुदूर उत्तर निवासी (वर्तमान) जौनसर बवार और भोटिया  यमुना के प्रतिनिधि हो सकते हैं और वे क्रमश: महाकाव्यात्मक काल से संबद्ध हो सकते हैं। सर एच.एच. रिस्ले द्वारा तैयार 'भारतीय जनगणना रिपोर्ट, 1901' में यह दर्शाया गया है कि युनाइटेड प्रॉविंसेज़ के एक बड़े भाग में आर्य द्रविड़ निवास करते थे जिनके शरीर में आर्य एवं द्रविड़ दोनों का रक्त मिश्रित था। अधिक संभव गढ़वाल भी इस क्षेत्र में शामिल था।


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हल्द्वानी में जिस जगह को आज भोटिया पड़ाव कहते हैं ऐसा माना जाता है कि पुराने समय में मुन्स्यारी, धारचूला आदि स्थानों से आकर भेटिया लोग यहां अपना डेरा डालते थे जिस कारण इस जगह का नाम ही भोटिया पड़ाव हो गया और जिस जगह अंग्रेजों ने अपना पड़ावा डाला था उस जगह को गोरा पड़ाव कहा गया। मोटाहल्दू में हल्दू के मोटे पेड़ होने के कारण उसे मोटाहल्दू कहा गया।

कालाढूंगी चौराहे में एक मज़ार थी जिसमें लोग अपने जानवरों की रक्षा के लिये पूजा करते थे उसे कालूसाही का मंदिर कहा जाने लगा। यह मंदिर आज भी यहां स्थित है।

इसी प्रकार रानीबाग में कत्यूरवंश की रानी जियारानी का बाग था इसलिये इस जगह को उसके नाम पर ही रानीबाग कहा गया। काठगोदाम में लकड़ियों गोदाम था जहां लकड़ियों को स्टोर किया जाता था इसलिये इस जगह का नाम काठगोदाम हो गया।