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Organizations - उत्तराखंड के सभी संगठनों को आत्म मूल्यांकन की जरूरत !

Started by shailesh, May 17, 2010, 11:32:16 PM

shailesh


उत्तराखंड राज्य गठन के बाद , राज्य और और देश के बड़े शहरों मे उत्तराखंड के कई संगठन बने , जिनका हमेशा ही दावा रहा है की उन्होंने राज्य के विकास , और संस्कृति के प्रचार प्रसार मे बहुत योगदान रहा है !
ये संगठन दिल्ली और राज्य के कई बड़े शहरों मे कोई न कोई सांस्कृतिककार्यक्रम या कोई ngo  की तर्ज पर कुछ ना कुछ कैंप जरूर आयोजित करते रहेहै ! तहलका के गौरव सोलंकी ने एक ऐसे ही आयोजन का बहुत सार्थक मूल्यांकन किया है !
असल मे ऐसे तमाम कार्यक्रम जिसमे संस्कृति और उसके सरोकारोंकी समझ बहुत ही सतही होती है ! इन सभी कार्यक्रमों मे हर बार वही पुराने गाने गए जाते है और सब वही पुराना रंग ढंग रहता है , गीत संगीत बहुत कमजोरहोता है ! कहीं भी कोई नयापन इन कार्यक्रमों मे नहीं झलकता है ! और जिनका उद्देश्य नेताओं , मंत्रियों , ठेकेदारों  को मंच प्रदान करना और  उनके साथ फोटो खिचवा कर वाहवाही लूटना भर होता है  !
कोईसंगठन अगर थोडा एलीट किस्म के हुए तो उनके आयोजनों मे चमक दमक रहती है ,पर उनमे संस्कृति के प्रति प्रेम कम दिखावा ज्यादा रहता है ! और आजकल सभी groups  मे एक परंपरा बन गयी है  एक दुसरे की पीठ थपथपाने की , भले ही उनकार्यक्रमों का स्तर कुछ भी हो! और इन कार्यक्रमों से ओब्जेक्टिविटीबिलकुल  ही गायब रहती है !  और इसीलिये हमारे आयोजनों  का अगर कभी भीराष्ट्रीय मीडिया द्वारा मूल्यांकन होगा तो इसी तरह से होगा भले ही हम एकदुसरे की पीठ कितनी ही थपथपा लें |    और अगर हम चाहते है की हमारेकार्यक्रमों मे एक ओब्जेक्टिविटी रहे तो हमें संस्कृति के प्रति अपनीबुनियादी समझ को बदलना होगा,  हमें समझना होगा की ऐसे सांस्कृतिक आयोजनोंका उद्देश्य समाज के भीतर एक बौद्धिक, भावात्मक , और सामाजिक चेतना कोजगाना हो ! और ये कार्यक्रम किसी सर्कस की तरह ना होकर, कला की सुन्दर अभिव्यक्ति बने !


तहलका मे छपा लेख

dajyu/दाज्यू

बहुत सही प्रश्न उठाया है हो भुला।

दरअसल प्रिंट या मीडिया में अपना छपा हुआ नाम देखने या अपना फोटू देखने की हमारी भूख इतनी हो गयी है कि हम कुछ भी करके अपना नाम देखना चाहते हैं। भले ही इसके लिये हमें कुछ भी करना पड़े। हमें संस्कृति बचाने के नाम पर इतने सारे संगठनों या सामाजिक संस्थाओं की जरूरत क्यों है? क्यों सभी लोग मिल कर एक ही संगठन के तहत गुणात्मक व सकारात्मक काम नहीं कर सकते। दिल्ली, लखनऊ या बंबई में बैठ कर पहाड़ की समझ सतही ही हो सकती है, पहाड़ को जानने समझने के लिये पहाड़ के साथ एकाकार होना पड़ता है।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720




I am in agreement with the articles published in Tahalka. I have been harping on this issue since long. Why we make many so many designations in social groups which ultimately form into tiny groups? The sole objective, what I see is self promotion of individuals through groups. Social work is a social work and we should work in that way only.

What I wanted to express has been already elaborated by  Dr Shailesh. The only thing is that we all must give it a serious thought and work accordingly.

dayal pandey/ दयाल पाण्डे

हाँ शैलेश जी और दाज्यू  बिलकुल सही कहा है आपने , एक राष्ट्रीय पत्रिका में उस  कार्यक्रम की जो समीक्षा हुई है उससे तो यही लगता है कि हम अपनी संस्कृति का विकाश नहीं बल्कि उसको पीछे धकेल रहे हैं इत्तेफाक से मैं भी इस कार्यक्रम मैं मोजूद था , मैंने भी पूरा प्रोग्राम देखा , चूकि मैं पत्रकार या समीक्षक नहीं हू कि कोई टिप्पणी कर सकू पर इतना जरुर कहूँगा कि हम अपने संस्कृति और परंपरा के सांथ मजाक कर रहे हैं हम पड़े लिखे युवा हैं हमें अपने संस्कृति को बचने और और उसका विकाश करने मैं इतिहास रचना चाहिए,   


पंकज सिंह महर

दाज्यू और शैलेश जी की बातों से अपने आप को सम्बद्ध करते हुये सिर्फ यह कहना चाहता हूं कि आज उत्तराखण्ड से जुड़े हुये संगठन राज्य के नवनिर्माण में बहुत अच्छी भूमिका निभा सकते हैं। विभिन्न क्षेत्रों में विशेषज्ञता रखने वाले लोग अपने अनुभवों का लाभ इस राज्य के नवनिर्माण के लिये दे सकते हैं। लेकिन आज नाम और कुछ लाभ की चाहत जिस तरीके से बढ़ती जा रही है, वह इन संगठनों के औचित्य पर ही प्रश्न चिन्ह लगा देता है।
राष्ट्रीय राजधानी में जहां कुछ लाख उत्तराखण्डी परिवार रहते हैं, वहां पर संगठनों की संख्या हजारों की संख्या में जा पहुंची है। यदि इन संगठनों का उद्देश्य सिर्फ नाम और दाम कमाना ही है तो वह ठीक लाइन पर चल रहे हैं। लेकिन यह भी जरुरी है कि यह लोग अपने उद्देश्य पूर्ति के लिये उत्तराखण्ड के नाम का व्यवसायीकरण न करें और आम उत्तराखण्डी आदमी के साथ भावनात्मक छल न करें।

हेम पन्त

उपरोक्त कार्यक्रम के बारे में कोई नकारात्मक टिप्पणी करने से बचते हुए मैं उत्तराखण्ड के लोगों द्वारा संचालित की जा रही हजारों सामाजिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली पर कुछ सवाल ऊठाना चाहता हूँ.

- ऐसा क्यूं होता है कि उत्तराखण्ड के लोग शुरुआत में अच्छी सामाजिक संस्था चलाते हैं लेकिन उसी में से अलग होकर दर्जनों नयी संस्थाएं बन जाती हैं और अन्तत: कुछ ठोस काम नही हो पाता है.

- रचनात्मक कामों की शुरुआत तो होती है लेकिन आगे बढने पर एक दूसरे पर कीचड़ उछालने और एक दूसरे को नीचा दिखाने की प्रतिस्पर्धा क्यों शुरु हो जाती है?

- अगर हम कहते हैं कि हम उत्तराखण्डी हैं तो फिर कुमाऊं-गढवाल, जिलास्तर या क्षेत्रीयता के स्तर से ऊपर उठ कर इन संगठनों को संचालित क्यों नहीं करते? 

- अगर हम लोगों में इतनी अच्छी नेतृत्व क्षमता है कि हम हजारों सामाजिक संगठन 'पैदा' कर लेते हैं तो यह क्षमता राजनीतिक स्तर पर क्यों नहीं दिखती.  दिल्ली, मुम्बई, लखनऊ या चण्डीगढ में इतनी भारी संख्या में हमारे लोग हैं लेकिन राजनीतिक स्तर पर हमारा प्रतिनिधित्व कमजोर क्यों है?

खीमसिंह रावत

शैलेश जी का लेख पढ़ा अति सुंदर |
शैलेश जी उत्तराखंड राज्य बनाने के बाद कई संगठन बन गए हैं ये कहना उतना ठीक सा नहीं लगता है क्योकि उत्तराखंड के लोग जब से शहरों की ओर गए हैं तभी से संगठित होते रहे हैं  उत्तराखंड २००० में बना है शहरों में संगठन बहुत पहले से हैं और इन  सामाजिक संगठनों ने ही पहाड़ के विकास में अहम् भूमिका निभाई है | न जाने कितने प्राथमिक विद्यालय मिडिल बने, हाई स्कूल बने, इंटर कालेज बने, अस्पताल बने, रोडें बनी, डाकघर खुले| इस तरह की कार्यवाहियां के लिए पहाड़ के loga  ग्राम, क्षेत्रीय, पट्टी, जिला व मंडल स्तर पर संगठित होते रहे हैं  मैंने जहां तक महसूस किया है की जब से उत्तराखंड राज्य बना है तब से (उत्तराखंड के बाहर) शहरों के संगठनों ने विकास के लिए संहर्ष करना लगभग बंद सा कर दिया है क्योकि हम मानसिक तौर पर ये मान चुके हैं कि राज्य बनाने से हमारा काम ख़त्म हो गया है अब हमारी उत्तराखंड सरकार की जिम्मेदारी है| अब ये संस्थाए सांकृतिक आयोजन करते हैं या उत्तराखंड प्रवासियों की समस्याओं पर केन्द्रित हो गए हैं |
अगर हम अपनी संस्कृति  बचाने  की बात करते हैं तो हमें उन्हीं चीजों  का अनुकरण करना पडेगा जो हमारी संस्कृति में मौजूद हैं | 
हेम जी ने भी कुछ प्रश्न चिन्ह लगाए हैं हेम जी हम पहाड़ से तो शहरों में आ गए हैं किन्तु अपने क्षेत्र के प्रति हमारा गहरा लगाव भी इसका कारन हो सकता है | संस्थाओं का विघटन भी परिवार की तरह होता है| जहाँ तक मेरा मानना है गढ़वाल कुमाऊ का मसला गली मुहले से लेकर राजनीतिक स्तर तक अपना असर रखता है|यह हम और आप अपने इर्द गिर्द देखते आ रहे है| सही मायने में कोई भी इस बारे में इमानदारी से नहीं सोचता है |     

हेम पन्त

खीम दा निस्संदेह प्रवासी उत्तराखण्डियों ने अपने गांवों के लिये बहुत काम किया है और अभी भी कर रहे हैं. इस बहस को शुरु करके शैलेश भाई शायद यह सन्देश देना चाहते हैं कि हम जो भी सांस्कृतिक आयोजन करें उसमें उत्तराखण्ड की पारंपरिक लोक संस्कृति झलके, परिपक्वता दिखे और सबसे जरूरी है कि उस आयोजन से निकल कर जाने वाला हर आदमी कुछ ठोस सन्देश लेकर जाये.

हेम पन्त

मैं कुछ साल पहले किदवई नगर (दक्षिण दिल्ली) में रहता था, जहाँ के निवासियों में लगभग 70% उत्तराखण्ड के लोग हैं. विधानसभा चुनावों के दौरान कांग्रेस के प्रत्याशी ने कुछ उत्तराखण्डी संस्थाओं के सहयोग से 2-3 सांस्कृतिक आयोजन करवाये जो असल में उसकी चुनावी सभाओं में भीड़ जुटाने के आयोजन साबित हुए और वो प्रत्याशी जीत भी गया. उसने भाजपा के वरिष्ट नेता को हराया था, लोग कहते थे कि उसकी जीत में इन नाचगाने वाले आयोजन की विशेष भूमिका थी.

यह उदाहरण यह साबित करता है कि नेता, बिल्डर और नौकरशाह हमारी संस्थाओं को अपने फायदे के लिये 'यूज' करते हैं.