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Save Trees & Plant Trees Initiative by Merapahad-पेड़ बचाओ पेड लगाओ

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, June 02, 2010, 07:58:13 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


From :    from   Pooran Kandpal <kandpalp@yahoo.com>

व्यथित पर्यावरण 
(पर्यावरण दिवस (५ जून  पर विशेष )

तूने मेरे पर्वतों को खोद कर झुका दिया,
वर्फीली चोटियों को हीन हिम से कर दिया,
दिनोदिन मेरे शिखर का रूप बिखरने है  लगा,
निहारने निराली छटा जन तरसने है लगा.

चीर कर तन तूने मेरा रंग हरित उड़ा दिया,
कर अगिनत घाव  तन पर श्रृंगार है छुड़ा दिया,
तरुस्थल को मेरे तूने मरुस्थल है बना दिया,
जल जमीन जंगल खजाना सारा दोहन कर दिया.

जल, मल से रंग रहा है, देख पलकें खोल कर,
पी रहा हर घूंट में तू विष के बूटी घोल कर,
लालसा मृदु पेय जल की  मन में तेरे रह गई,
लुप्त होती शुष्क सरिता खुद हूँ प्यासी कह गई.

बन  के दानव जंगलों को रौंदता तू जा रहा,
फटती छाती को तू मेरी कौंधता ही आ रहा,
काट वन-कानन तो तू कंक्रीट वन  बना रहा,
उखाड़ उपवनों को मेरे ईट तरु लगा रहा.

कंद फल जड़ी बूटियां नित लुप्त होते जा रहे,
जीव मेरे वक्षस्थल के गुप्त होते जा रहे,
पिक बयां भ्रमर  गुंजन को तरसता रह जायेगा,
प्रकृति के स्वस्थ संतुलन की
जो सोच तू  ना कर पायेगा.

चाहता तू जी सके इस धरा में अमन चैन से,
वृक्ष बंधु मान ले लगा ले अपने नैन से,
कोटि पुण्य पा जायेगा एक वृक्ष के जमाव से,
स्वच्छ  पर्यावरण में फिर जी सकेगा चाव से.

बर्बादी वह है तेरी जिसे तरक्की कह रहा,
पर्यावरण की पर्त पर कहर तू वरपा रहा,
संभल जा नहीं तेरा अस्तित्व  ही मिट जायेगा,
कर प्रदूषित मेरा तन तू कहाँ टिक पायेगा.
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पूरन चन्द्र कांडपाल
(लेखक- स्मृति लहर 'व्यथित पर्यावरण')

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720



Hope you must be planning to plant maximum Trees in your surrounding and when you visit to your native place in Pahad, please carry a message and tell people about importance of trees.

Save a tree, save the world
Save energy, save the world

पंकज सिंह महर

हमें पेड़ों के साथ-साथ छोटी झाड़ियां, पौधे आदि भी रोपित करने चाहिये। जैसे बेर की झाड़ी-इसे लगाने से एक तो ग्रीनरी रहेगी, इसकी जड़े मिट्टी को रोकती हैं और इसका फैलाव भी ज्यादा होता है, साथ ही चिड़ियाओं के लिये, छोटे जानवरों के खाने का इंतजाम भी हो जाता है।

केले के पेड़ केल्याड़ (केले के पेड़ों का समूह) के रुप में लगाने चाहिये, केले के चौड़े पत्ते जहां आक्सीजन का ज्यादा उत्सर्जन करते हैं, वहीं पर केल्याड़ भूमि की नमी को भी बचाये रखता है।

गांव के नजदीक फलदार पेड़ यथा दाडि़म, अनार, तिमुल, **एक पेड़ और होता है तिमुल का जैसा ही लेकिन उसकी जड़ों में फल लगता है। आम, खुबानी, पुलम, आडू, बेड़ू, माल्टा, नारंगी, चूख (नीबू बड़ा), कागजी नीम्बू, अंगूर की बेल, आलूबुखारा आदि के परमपरागत पेड़ों को लगाना चाहिये।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

 
It is generally seen wheresover there are Baanj trees in Uttarakhand, there will definitely source of water. It is said that 'Baanj' trees are best sources of water and cold breeze.

We should specially concenrate on plantation of Baanj Trees in rainy season and its seed should be sowed.

A better idea would be if Baanj trees are plantted through nursery and then we should plant the trees in better places.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

आवा दिदा भुलौं आवा, नांग धारति की ढकावा , डाळि बनबनी लगावा
आवा दयब्तों का नौंकि, डाळि रोपा पुन्न कमावा
हिटा रम्म- झम्म, चला भै ठम्म – ठम्म


www.apnauttarakhand.com/aawa-dida-bhulon-aawa-nang-dhartee-ki-dhakawa-n-s-negi-anuradha-nirala/

This is one of the best songs educating people about the plantation...

Come brother and sister, let us save forest and plant maximum trees. Also save forest from become tree less.

On name of God, let us plant trees and earn well being.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720



आओ शपथ करे !

-     हर आदमी एक साल में कम से कम ५ पेड़ लगाये !


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


This is the shocking news. We all have to take pledge and towards saving forest.

Source : Dainik Jagran

जंगल गिन रहे अंतिम सासे
   
उत्तरकाशी। देवदार, कैल, बांज, बुंरास के जंगल अंतिम सांसे गिन रहे है। इन्हें खतरा प्रकृति से नहीं बल्कि मानव से है। मानव विकास की होड़ में वन संपदा को खत्म करने पर तुला है। यही कारण है कि आज हमें कई प्राकृतिक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है, लेकिन हम इसके बाद भी नहीं चेत रहे है।

ब्लाक भटवाड़ी के उच्च हिमालय क्षेत्र में निर्माणाधीन जल विद्युत परियोजनाओं के निर्माण में भी सड़कों सहित अन्य कार्यो के निर्माण में दुर्लभ वन संपदा को नुकसान पहुंच रहा है। जनपद में बन रही सड़कों सहित विभिन्न जल विद्युत परियोजनाओं की आड़ में भी खूब वृक्षों का कटान हो रहा है। इससे न केवल बड़े पेड़ों को ही नुकसान हुआ, बल्कि पहाड़ों में पाई जाने वाली हिसर, किनगोड़ सहित कई अन्य झाड़ीदार पौधों को भी इसका नुकसान उठाना पड़ रहा है। निर्माण के दौरान मलबे के लिए नियत स्थान न होने के कारण भी पौधों को नुकसान हो रहा है। पर्यावरण से जुडे़ समाज सेवी भी इस तरह के विकास से काफी चिंतित है। पर्यावरण प्रेमी प्रताप पोखरियाल का कहना है कि विकास के लिए सड़कें, परियोजनाएं भी जरूरी है, लेकिन इनके निर्माण में उन सब बातों का ध्यान रखना भी जरूरी है। इससे हमारे वृक्ष बचे रहें और हम सब स्वच्छ हवा में सांस ले सकें।

दो कंपनियों को भेजा नोटिस

प्रभागीय वनाधिकारी आईपी सिंह ने बताया कि सड़क निर्माण के दौरान मलबा व पत्थर को निचले क्षेत्रों में डालने से जंगल को भारी नुकसान हो रहा है। इसके लिए उन्होंने दो कंपनियों को नोटिस भेजा है। धरासू यमुनोत्री मार्ग व असी गंगा क्षेत्र में सड़क निर्माण कार्य के साथ अन्य कार्यो से वन भूमि को नुकसान पहुंचा रहे ठेकेदारों को नोटिस भेजा गया है।

एक सड़क पर था विवाद

लोक निर्माण विभाग के अधीशासी अभियंता एसके राय का कहना है कि ब्लाक डुंडा के डांडा माजफ सड़क निर्माण के समय वन भूमि में मलबा डालने को लेकर कुछ विवाद था, लेकिन बाद में डंपिंग जोन में मलबा डालने के बाद यह सुलझ गया था।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Go through this News .. What the writer did for saving trees.
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पारुल जैन

पेड़ों की पुकार सुनिए
कुछ दिन पहले  मुझे दिल्ली की भागदौड़ से दूर उत्तराखंड के एक छोटे से हिल स्टेशन मुक्तेश्वर जाने का मौका मिला। र
ास्ते भर हरे-भरे चीड़ और देवदार के पेड़ों का दृश्य और शीतल हवा का स्पर्श बेहद सुखद लगा। हिल स्टेशन पहुंचते ही सुंदर फूलों की क्यारियों और आडू, आलूबुखारे, खुबानी, सेब और नाशपाती से लदे पेड़ों ने हमारा स्वागत किया। इतनी सुंदर और फल-फूलों से भरपूर जगह मैंने पहली बार देखी थी। मेरी पहली प्रतिक्रिया यही थी कि दिल्ली छोड़ यहीं बस जाऊं।

मैंने अपने टैक्सी ड्राइवर से कहा- आपका यह हिल स्टेशन तो बहुत सुंदर है। वह तपाक से बोला- क्या आप इसे अपना बनाना चाहेंगी? यह प्रश्न मेरे लिए अप्रत्याशित था। फिर भी मैंने पूछा कैसे, तो वह बोला कि यहां जमीन दिल्ली की तरह बहुत महंगी नहीं है, आप यहां जमीन खरीद कर कॉटेज बनवा लीजिए और फिर जब मन करे यहां आइए या अपने रिश्तेदारों को भेजिए। मैं असमंजस में पड़ गई। मेरी परेशानी भांप कर वह बोला कि आप किसी बात की चिंता न करे, यहां दिल्ली वालों के बहुत से कॉटेज हैं और कई दिल्ली वालों ने यहां जमीन खरीद रखी है, जो आने वाले समय में यहां अपने लिए कॉटेज बनवाएंगे। उसने कहा कि अगले दिन वह हमें आसपास की जगहों पर कुछ प्लॉट्स दिखा लाएगा। उनमें जो प्लॉट हमें पसंद होगा वहां हम अपना कॉटेज बनवा सकते हैं।

बनवाने की व्यवस्था भी वह खुद ही कर देगा। यानी हमें सिर्फ पैसे देने होंगे, बाकी सारी सिरदर्दी उसकी। अगले दिन हम कॉटेज के लिए साइट्स देखने गए। सभी जगहें एक से बढ़कर एक थीं। चारों तरफ पहाड़ों का सुंदर नजारा दिखता था। पर एक बात हैरान कर देने वाली थी। ज्यादातर साइट्स पर फलों के पेड़ लगे थे। एक साइट देखकर मैंने ड्राइवर से पूछा कि अगर हम ये जगह ले लेते है तो इन पेड़ों का क्या होगा, तो वह बोला कि जब ये जगह आपकी हो जाएगी तो जितने पेड़ आपको चाहिए उतने रख लें बाकी कॉटेज बनाने के लिए काट दिए जाएंगे।

मैं जैसे आसमान से धरती पर आ गिरी। मेरे सामने उस हिल स्टेशन का भविष्य तैरने लगा जहां कदम कदम पर सिर्फ कॉटेज ही कॉटेज होंगे और उनके आसपास होंगे, गिने-चुने फलों के पेड़ और फूलों की क्यारी। फिर वह हिल स्टेशन भी दिल्ली जैसा ही हो जाएगा, जहां हर जगह भीड़, शोर, गाड़ियां और प्रदूषित हवा होगी और जो फल आज यहां बहुतायत में हैं, भविष्य में बच्चों को सिर्फ उनके चित्र किताबों में दिखाकर हम उन्हें कहेंगे- बेटा देखो ये आलूबुखारा है जो एक गहरे लाल रंग का खट्टा-मीठा फल था और हमारे जमाने में बाजार में खूब मिलता था।

मैंने कॉटेज लेने का आइडिया वहीं त्याग दिया और होटल वापस आ गई। शाम को टीवी पर देखा तो पता चला कि आज तो विश्व पर्यावरण दिवस है। मेरे मन में संतोष था कि मैंने कॉटेज के लिए जमीन न खरीद कर कुछ पेड़ों को कटने से तो बचा लिया। अगर पेड़ों की हरियाली चाहिए तो हमें अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण करना ही होगा।

http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/6091262.cms

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


There is need to carry out similar programme in other areas also:

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मणिपुरी बांज व उतीस के पौध रोपे (07 / July 2010)

जैंती (अल्मोड़ा): प्राथमिक वानिकी प्रशिक्षण केन्द्र जैंती में प्रशिक्षणरत वनरक्षकों ने बांज, अकेसिया, बांस, उतीस, मणिपुरी बांज प्रजातियों के पौधों का रोपण किया!

(Dainik Jagran)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


हरेला त्यौहार नजदीग आ रहा है ! इस त्यौहार को पहाडो में पेड़ पौधे लगाये जाते है!

आये .. संकल्प ले .. जहाँ भी पेड़ लगाये,