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Sri Dev Suman Great Martyr of Uttarakhand- अमर शहीद श्रीदेव सुमन

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, July 25, 2010, 09:04:48 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


२७ दिसम्बर १९४३ को जब उन्होंने टिहरी में प्रवेश के लिए यात्रा शुरू की तो उन्हें चंबा में रोक दिया गया और ३० दिसम्बर १९४३ में उन्हें टिहरी कारागार में बंद कर भीषण यातनाये दी गयी !

उन्हें डराया धमकाया गया और माफ़ी मागने के लिए बाध्य किया गया किन्तु सुमन ने उत्तर दिया "तुम मुझे तोड़ सकते हो, मोड़ नहीं सकते"

Devbhoomi,Uttarakhand

यह वीर है उस पुण्य भूमि का, जिसको मानसखंड , केदारखंड, उत्तराखंड कहा जाता है, स्वतंत्रता संग्रामी श्री देब सुमन किसी परिचय के मोहताज़ नही हैं, पर आज की नई पीड़ी को उनके बारे में, उनके अमर बलिदान के बारे में पता होना चाहिए, जिससे उन्हें फक्र हो इस बात पर की हमारी देवभूमि में सुमन सरीखे देशभक्त हुए हैं।सुमन जी का जनम १५ मई १९१५ या १६ में टिहरी के पट्टी बमुंड, जौल्ली गाँव में हुआ था, जो ऋषिकेश से कुछ दूरी पर स्थित है। पिता का नाम श्री हरी दत्त बडोनी और माँ का नाम श्रीमती तारा देवी था, उनके पिता इलाके के प्रख्यात वैद्य थे। सुमन का असली नाम श्री दत्त बडोनी था। बाद में सुमन के नाम से विख्यात हुए। पर्ख्यात गाँधी- वादी नेता, हमेशा सत्याग्रह के सिधान्तों पर चले।



पूरे भारत एकजुट होकर स्वतंत्रता की लडाई लड़ रहा था, उस लडाई को लोग दो तरह से लड़ रहे थे कुछ लोग क्रांतिकारी थे, तो कुछ अहिंसा के मानकों पर चलकर लडाई में बाद चढ़ कर भाग ले रहे थे, सुमन ने भी गाँधी के सिधान्तों पर आकर लडाई में बद्चाद कर भाग लिया। सुन्दरलाल बहुगुणा उनके साथी रहे हैं जो स्वयं भी गाँधी वादी हैं।परजातंत्र का जमाना था, लोग बाहरी दुश्मन को भागने के लिए तैयार तो हो गए थे पर भीतरी जुल्मो से लड़ने की उस समय कम ही लोग सोच रहे थे और कुछ लोग थे जो पूरी तरह से आजादी के दीवाने थे, शायद वही थे सुमन जी, जो अंग्रेजों को भागने के लिए लड़ ही रहे थे साथ ही साथ उस भीतरी दुश्मन से भी लड़ रहे थे। भीतरी दुश्मन से मेरा तात्पर्य है उस समय के क्रूर राजा महाराजा। टिहरी भी एक रियासत थी, और बोलंदा बद्री (बोलते हुए बद्री नाथ जी) कहा जाता था राजा को।

श्रीदेव सुमन ने मांगे राजा के सामने रखी, और राजा ने ३० दिसम्बर १९४३ को उन्हें गिरफ्तार कर दिया विद्रोही मान कर, जेल में सुमन को भरी बेडियाँ पहनाई गई, और उन्हें कंकड़ मिली दाल और रेत मिले हुए आते की रोटियां दी गई, सुमन ३ मई १९४४ से आमरण अन्न शन शुरू कर दिया, जेल में उन्हें कई अमानवीय पीडाओं से गुजरना पड़ा, और आखिरकार जेल में २०९ दिनों की कैद में रहते हुए और ८४ दिनों तक अन्न शन पर रहते हुए २५ जुलाई १९४४ को उन्होंने दम तोड़ दिया। उनकी लाश का अन्तिम संस्कार न करके भागीरथी नदी में बहा दिया । मोहन सिंह दरोगा ने उनको कई पीडाएं कष्ट दिए उनकी हड़ताल को ख़त्म करने के लिए कई बार पर्यास किया पर सफल नही हुआ।कहते हैं समय के आगे किसी की नही चलती वही भी हुआ, सुमन की कुछ मांगे राजा ने नही मानी, सुमन जो जनता के हक के लिए लड़ रहे थे राजा ने ध्यान नही दिया, आज न राजा का महल रहा, न राजा के पास सिंहासन। और वह टिहरी नगरी आज पानी में समां गई है। पर हमेशा याद रहेगा वह बलिदान और हमेशा याद आयेगा क्रूर राजा।
और अब मेरे शोध से लिए गए कुछ तथ्य:-सुमन को कुछ लोग कहते हैं की उनकी लडाई केवल टिहरी रियासत के लिए थी, पर गवाह है सेंट्रल जेल आगरा से लिखी उनकी कुछ पंक्तियाँ की वह देश की आज़ादी के लिए भी लड़ रहे थे।
"आज जननी उगलती है अगनियुक्त अंगार माँ जी,आज जननी कर रही है रक्त का श्रृंगार माँ जी।इधर मेरे मुल्क में स्वधीनता संग्राम माँ जी,उधर दुनिया में मची है मार काट महान माँ जी। "उनकी शहादत को एक कवि ने श्रधान्जली दी है-"हुवा अंत पचीस जुलाई सन चौवालीस में तैसा, निशा निमंत्रण की बेला में महाप्राण का कैसा?मृत्यु सूचना गुप्त राखी शव कम्बल में लिपटाया, बोरी में रख बाँध उसको कन्धा बोझ बनाया।घोर निशा में चुपके चुपके दो जन उसे उठाये, भिलंगना में फेंके छाप से छिपते वापस आए।"वीर चंद्र सिंह गढ़वाली जी ने सुमन जी को याद करते हुए लिखा था-"मै हिमालयन राज्य परिषद् के प्रतिनिधि के रूप में सेवाग्राम में गाँधी जी से १५ मिनट तक बात करते हुए उनसे मिला था, उनकी असामयिक मृत्यु टिहरी के लिए कलंक है। "और सुंदर लाल बहुगुणा जी ने कहा-"सुमन मरा नही मारा गया, मेने उसे घुलते-घुलते मरते देखा था। सुमन ने गीता पड़ने को मांगी थी पर नही दी गई, मरने पर सुमन का शव एक डंडे से लटकाया गया, और उसी तरह नदी में विसर्जित कर दिया गया।"परिपूर्ण नन्द पेन्यूली ने कहा था-"रजा को मालिक और स्वयं को गुलाम कहना उन्हें अच्छा नही लगा, जबकि राजा और प्रजा में पिता पुत्र का सम्बन्ध होता है।"अपनी पत्नी विनय लक्ष्मी को उन्होंने कनखल से पत्र लिखा-" माँ से कहना मुझे उनके लिए छोड़ दें जिनका कोई बेटा नही।"और साथ में खर्चे की कमी के लिए उन्होंने लिखा-"राह अब है ख़ुद बनानी, कष्ट, कठिनाइयों में धेर्य ही है बुद्धिमानी"

सत्यदेव सिंह नेगी

बहुत बढ़िया जानकारी दी आपने सर

आभार
सत्यदेव
Quote from: devbhoomi on July 28, 2010, 06:21:11 PM
यह वीर है उस पुण्य भूमि का, जिसको मानसखंड , केदारखंड, उत्तराखंड कहा जाता है, स्वतंत्रता संग्रामी श्री देब सुमन किसी परिचय के मोहताज़ नही हैं, पर आज की नई पीड़ी को उनके बारे में, उनके अमर बलिदान के बारे में पता होना चाहिए, जिससे उन्हें फक्र हो इस बात पर की हमारी देवभूमि में सुमन सरीखे देशभक्त हुए हैं।सुमन जी का जनम १५ मई १९१५ या १६ में टिहरी के पट्टी बमुंड, जौल्ली गाँव में हुआ था, जो ऋषिकेश से कुछ दूरी पर स्थित है। पिता का नाम श्री हरी दत्त बडोनी और माँ का नाम श्रीमती तारा देवी था, उनके पिता इलाके के प्रख्यात वैद्य थे। सुमन का असली नाम श्री दत्त बडोनी था। बाद में सुमन के नाम से विख्यात हुए। पर्ख्यात गाँधी- वादी नेता, हमेशा सत्याग्रह के सिधान्तों पर चले।



पूरे भारत एकजुट होकर स्वतंत्रता की लडाई लड़ रहा था, उस लडाई को लोग दो तरह से लड़ रहे थे कुछ लोग क्रांतिकारी थे, तो कुछ अहिंसा के मानकों पर चलकर लडाई में बाद चढ़ कर भाग ले रहे थे, सुमन ने भी गाँधी के सिधान्तों पर आकर लडाई में बद्चाद कर भाग लिया। सुन्दरलाल बहुगुणा उनके साथी रहे हैं जो स्वयं भी गाँधी वादी हैं।परजातंत्र का जमाना था, लोग बाहरी दुश्मन को भागने के लिए तैयार तो हो गए थे पर भीतरी जुल्मो से लड़ने की उस समय कम ही लोग सोच रहे थे और कुछ लोग थे जो पूरी तरह से आजादी के दीवाने थे, शायद वही थे सुमन जी, जो अंग्रेजों को भागने के लिए लड़ ही रहे थे साथ ही साथ उस भीतरी दुश्मन से भी लड़ रहे थे। भीतरी दुश्मन से मेरा तात्पर्य है उस समय के क्रूर राजा महाराजा। टिहरी भी एक रियासत थी, और बोलंदा बद्री (बोलते हुए बद्री नाथ जी) कहा जाता था राजा को।

श्रीदेव सुमन ने मांगे राजा के सामने रखी, और राजा ने ३० दिसम्बर १९४३ को उन्हें गिरफ्तार कर दिया विद्रोही मान कर, जेल में सुमन को भरी बेडियाँ पहनाई गई, और उन्हें कंकड़ मिली दाल और रेत मिले हुए आते की रोटियां दी गई, सुमन ३ मई १९४४ से आमरण अन्न शन शुरू कर दिया, जेल में उन्हें कई अमानवीय पीडाओं से गुजरना पड़ा, और आखिरकार जेल में २०९ दिनों की कैद में रहते हुए और ८४ दिनों तक अन्न शन पर रहते हुए २५ जुलाई १९४४ को उन्होंने दम तोड़ दिया। उनकी लाश का अन्तिम संस्कार न करके भागीरथी नदी में बहा दिया । मोहन सिंह दरोगा ने उनको कई पीडाएं कष्ट दिए उनकी हड़ताल को ख़त्म करने के लिए कई बार पर्यास किया पर सफल नही हुआ।कहते हैं समय के आगे किसी की नही चलती वही भी हुआ, सुमन की कुछ मांगे राजा ने नही मानी, सुमन जो जनता के हक के लिए लड़ रहे थे राजा ने ध्यान नही दिया, आज न राजा का महल रहा, न राजा के पास सिंहासन। और वह टिहरी नगरी आज पानी में समां गई है। पर हमेशा याद रहेगा वह बलिदान और हमेशा याद आयेगा क्रूर राजा।
और अब मेरे शोध से लिए गए कुछ तथ्य:-सुमन को कुछ लोग कहते हैं की उनकी लडाई केवल टिहरी रियासत के लिए थी, पर गवाह है सेंट्रल जेल आगरा से लिखी उनकी कुछ पंक्तियाँ की वह देश की आज़ादी के लिए भी लड़ रहे थे।
"आज जननी उगलती है अगनियुक्त अंगार माँ जी,आज जननी कर रही है रक्त का श्रृंगार माँ जी।इधर मेरे मुल्क में स्वधीनता संग्राम माँ जी,उधर दुनिया में मची है मार काट महान माँ जी। "उनकी शहादत को एक कवि ने श्रधान्जली दी है-"हुवा अंत पचीस जुलाई सन चौवालीस में तैसा, निशा निमंत्रण की बेला में महाप्राण का कैसा?मृत्यु सूचना गुप्त राखी शव कम्बल में लिपटाया, बोरी में रख बाँध उसको कन्धा बोझ बनाया।घोर निशा में चुपके चुपके दो जन उसे उठाये, भिलंगना में फेंके छाप से छिपते वापस आए।"वीर चंद्र सिंह गढ़वाली जी ने सुमन जी को याद करते हुए लिखा था-"मै हिमालयन राज्य परिषद् के प्रतिनिधि के रूप में सेवाग्राम में गाँधी जी से १५ मिनट तक बात करते हुए उनसे मिला था, उनकी असामयिक मृत्यु टिहरी के लिए कलंक है। "और सुंदर लाल बहुगुणा जी ने कहा-"सुमन मरा नही मारा गया, मेने उसे घुलते-घुलते मरते देखा था। सुमन ने गीता पड़ने को मांगी थी पर नही दी गई, मरने पर सुमन का शव एक डंडे से लटकाया गया, और उसी तरह नदी में विसर्जित कर दिया गया।"परिपूर्ण नन्द पेन्यूली ने कहा था-"रजा को मालिक और स्वयं को गुलाम कहना उन्हें अच्छा नही लगा, जबकि राजा और प्रजा में पिता पुत्र का सम्बन्ध होता है।"अपनी पत्नी विनय लक्ष्मी को उन्होंने कनखल से पत्र लिखा-" माँ से कहना मुझे उनके लिए छोड़ दें जिनका कोई बेटा नही।"और साथ में खर्चे की कमी के लिए उन्होंने लिखा-"राह अब है ख़ुद बनानी, कष्ट, कठिनाइयों में धेर्य ही है बुद्धिमानी"


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गढ़वाल उत्तराखंड के कार्यशील युवक श्री देवसुमन सन १९४२ के प्रारम्भ में टिहरी राज्य प्रजा परिषद् की सफलता के लिए आशीर्वाद मांगने सेवाग्राम वर्धा में महात्मा गांधी के पास पहुंचे महात्मा गाँधी से मिलकर वे वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली से मिले और बोले -जो मेरी इच्छा थी आज बापू ने पूरी तरह कर दी है ! क्योंकि बापू ने गढ़वाल के विषय में जो मेरी तजबीज थी !

उसे मंजूर कर लिया और आशीर्वाद दिया की मैं सत्य और अहिंसा के द्वारा टिहरी राज्य में प्रजा की सेवा करूँ !
मेरे लिए जीवन मरण का सवाल है क्योंकि टिहरी की जनता बहुत दुखी है !श्री देव सुमन ने चन्द्र सिंह गढ़वाली सम्पूर्ण गढ़वाल की स्तिथि से अवगत  करवाया श्रीदेव सुमन एक प्रतिभाशाली ब्यक्ति थे,वे नवयुवकों से कहा करते थे -क्या तुम अपने को चाँदी के चन्द सिखों में बेच डालोगे,

बापू से आशीर्वाद लेकर श्रीदेव सुमन ने जब टिहरी राज्य के अन्दर प्रजा मंडल के कार्य को चलाने निश्चय किया और वह मुनि की रेती से अपने गाँव जौल होते हुए ३० अप्रैल १९४२ को टिहरी पहुंचे तो मिनी की रेती से ही पुलिस उनके पीछे चल रही थी !

९ मई को उनको पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया,दो दिन की हिरासत में रखने के बाद ११ मई की रात को उन्हें एक मोटर में बिठाकर मुनिकी रेती पहुंचाया गया था ! तथा उन्हें राज्य से निष्कासित करने का आदेश दिया गया !

पहली जुलाई में उन्होंने पुनह राज्य में प्रवेश किया तो पुलिस ने उन्हें पुनह गरफ्तार कर लिया और कुछ दिनों हिरासत में रखने के उपरान्त पुनह राज्य की सीमा से बहार निकाल दिया गया, इसके पश्चात श्रेदेव सुमन ने और शंकर दत डोभाल ने टिहरी राज्य का प्रजामंडल के पंजीकरण करने के लिए लेकिन सफलता नहीं मिली  थी !


M S JAKHI

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बदहाल है श्रीदेव सुमन राइंका
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शिक्षा महकमा शिक्षा सुधार के लाख दावे कर ले, लेकिन सरकारी स्कूलों की स्थिति आज भी नहीं सुधर पाई है इस कारण पठन-पाठन तो प्रभावित हो ही रहा है विद्यालयों से छात्रों की संख्या भी घट रही है।

जनपद का दूसरा सबसे पुराना श्रीदेव सुमन राइंका चम्बा आज बदहाल स्थिति में है। विद्यालय की सबसे बड़ी समस्या व्यावसायिक पाठ्यक्रमों का बंद होना व छात्रसंख्या का घटना है। पहले विद्यालय में फोटोग्राफी, सिलाई, बुनाई, कढ़ाई, फार्मेसी जैसे पाठ्यक्रम संचालित होते थे जो पिछले 12 वर्षो से बंद हैं। इंटर में विभिन्न विषयों के प्रवक्ताओं के आठ पद रिक्त चल रहे हैं जिस कारण छात्रों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है। वर्तमान में छात्र संख्या घटकर 250 हो गई है जबकि दस साल पहले यहां एक हजार से अधिक छात्र संख्या थी। विद्यालय के लगभग 45 वर्ष पुराना भवन भी जर्जर हालत में है। लकड़ी बीम सड़ने लगे हैं और चादरों से पानी टपकता रहता है इस कारण बरसात में पठन-पाठन कार्य बाधित हो जाता है। खेल मैदान के विस्तारीकरण की योजना भी कागजों में सिमटकर रह गई है। पांच वर्ष पूर्व ब्लाक का मुख्य विद्यालय होने के कारण खेल मैदान के विस्तारीकरण की योजना बनी थी लेकिन इस पर अभी तक कार्य शुरू नहीं हो पाया है।

क्या कहते हैं जन प्रतिनिधि

चम्बा: क्षेपं सदस्य सोबन सिंह रावत, अभिभावक संघ के पूर्व अध्यक्ष जेपी नौटियाल का कहना है कि विभाग की उपेक्षा के चलते विद्यालय अनेक समस्याओं से घिरा हुआ है, जिससे यहां पर छात्र संख्या निरंतर घट रही है। उन्होंने यहां पर व्यावसायिक पाठ्यक्रम पुन: शुरू करने की मांग की है।

इनसेट=

अधिकारियों का तर्क

चम्बा: खंड शिक्षा अधिकारी भगवानदास का कहना है कि विद्यालय भवन बनाने को प्राकलन वित्तीय स्वीकृत को भेजा गया है। जहां तक व्यावसायिक पाठ्यक्रम शुरू करने की बात है यह मामला उनके स्तर का नहीं है।

http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttranchal/4_5_7036577_1.html

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शहीदों की याद में लगता हैं यहां मेला
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मातृ भूमि को राजशाही अत्याचारों से बचाने के लिए अपनी जान की बाजी लगाने वाले नागेन्द्र सकलानी व मोलूराम भरदारी की शहादत लोगों को आज तक याद है। इनकी याद में आज भी यहां हर वर्ष मेले लगते हैं।

आंदोलन में शिरकत करने वाले 95 वर्षीय कोटी निवासी बचन सिंह नेगी 11 जनवरी 1948 की याद करते हैं तो उनकी रोंगटे खड़ी हो जाती हैं। आज भी उनके मन में सामंतशाही के खिलाफ नफरत है। इस दिन की आंसू गैस के गोले व गोलियों की आवाज उनके जेहन में आज भी ताजा है। जब आठ पट्टियों के हजारों लोगों का जनसैलाब सामंतशाही के खिलाफ कीर्तिनगर में एकत्रित हुआ था। इसी दिन यानि 11 जनवरी 1948 को सकलाना पट्टी के नागेन्द्र सकलानी व भरदार पट्टी के मोलू भरदारी अपनी मातृ भूमि के काम आये और कीर्तिनगर में सामन्तशाही गोली के शिकार होकर वीर गति को प्राप्त हो गये।

अमर शहीद श्रीदेव सुमन ने सामन्तशाही अत्याचारों के खिलाफ जिस बीज को तिल-तिल मर कर अपने खून से सींचा था, उसी बीज से तैयार पौध को नागेन्द्र सकलानी व मोलू भरदारी के बलिदान ने विशाल वृक्ष का रूप दिया। टिहरी रियासत को आजादी दिलाने में1920 का तिलाड़ी कांड से लेकर 1948 तक का समय जनक्रांति का समय था जो कि रियासत को आजादी दिलाने में मील का पत्थर साबित हुआ। तब पूरे देश में छोटी-छोटी रियासतें सामंती अत्याचारों से त्रस्त होकर प्रजातंत्र में शामिल होने की मांग पर उन्माद थे। आंदोलन के दौरान 24 जून 1946 को नागेन्द्र व उनके तमाम क्रांतिकारी साथियों को कीर्तिनगर में बिना वारंट गिरफ्तार कर लिया गया। गिरफ्तार करने के बाद उनके द्वारा विभिन्न जेलों में की गयी भूख हड़ताल से सामंतशाही कांप गये और अंत में कड़ाकोट विद्रोह के सभी नेताओं को रिहा कर दिया गया। अक्टूबर 1947 को राजशाही द्वारा सकलाना पट्टी को अशांत क्षेत्र घोषित कर वहां बड़ी मात्रा में दमन के लिए पुलिस व सैनिक बल भेजा गया। कड़ाकोट, डांगचौरा, बमुण्ड, खास पट्टी सहित कई क्षेत्रों में आंदोलन अपने चरम पर था। 31 दिसम्बर 1947 को जनता ने थाने पर कब्जा कर दादा दौलतराम को कीर्तिनगर का एसडीओ नियुक्त कर आजाद पंचायत की स्थापना कर दी व जनवरी 1948 को तमाम अधिकारियों को बंदी बना कर कैद करने के बाद छोड़ा गया। आज के दिन कीर्तिनगर तहसील पर कब्जा करते समय नागेन्द्र सकलानी व मोलू भरदारी अपनी मातृ भूमि के काम आये और मातृ भूमि के नाम पर शहीद हो गये। अमर शहीदों की याद में 11 जनवरी से 14 जनवरी तक भव्य मेले का आयोजन किया जा रहा है।

http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttranchal/4_5_7159351.html

gireeshbhatt75@gmail.com

ऐसे थे वे सुमन.......

उत्तराखंड में स्थित टिहरी गढ़वाल की मनमोहक पहाड़ियों से घिरी तलहटी में बसे एक छोटे से गाँव "जौल" में जन्म हुआ था एक ऐसे देशभक्त का जो निरंतर अपने नाम के अनुरूप ही अपनी जन्मधरा को अपने पुण्य कर्मों की  सुगंध से आच्छादित करता चला आ रहा है। १५ मई सन १९१५ में जन्में श्री देव सुमन जी ने विरोध प्रारंभ किया था एक ऐसे कुशासन का, जिससे पूरी हिमालय की पुण्य भूमि ग्रसित थी।  बात उस समय की है, जब उत्तर-भारत छोटी-छोटी रियासतों में बंटा हुआ था और सभी रियासतें राजा महाराजाओं की गुलामी से कुप्रभावित थी।

प्रजा के लिए राजा का दर्जा ईश्वर का व उसकी आज्ञा, देवाज्ञा तुल्य होती थी. उनमें से ही एक थी टिहरी रियासत जहाँ का राजा भोग विलाश में डूबा रहता था और राज-सैनिक प्रत्येक गाँव, प्रत्येक घर से अनाज एकत्रित करवा कर, घर के ही सदस्यों से उस अनाज का ढुलान राजा के महल (कई किलोमीटर ऊंचाई पर स्थित) तक करवाते थे जिसे बेगार अथवा लगान कहा जाता था.

किसी के घर में खाने के लिए हो ना हो उसे बेगार देनी ही होती थी. श्रीदेव सुमन जी ने इसका विरोध किया व इसके उपलक्ष में राजा के सामने अपनी मांगें रखी, राजा ने मांगें सुनने के बजाय ३० दिसम्बर १९४३ को उन्हें विद्रोही मान, ३५ सेर की बेडियाँ पहना कर जेल में डाल दिया।

  सुमन जी ने ३ मई १९४४ से आमरण अन्न शन शुरू कर दिया, जेल में उन्हें कई अमानवीय पीडाओं से गुजरना पड़ा, उन्हें कंकड़ मिली दाल और रेत व कांच मिले हुए आटे की रोटियां दी जाती और कडाके की सर्दी में बर्फ की सिल्लियों पर लिटाकर हंटरों से पीटा जाता। आखिरकार जेल में २०९ दिनों की कैद व ८४ दिनों के आमरण अन्न सन्न के पश्चात् २५ जुलाई १९४४ को उन्होंने दम तोड़ दिया। राजा के आदेश पर उनकी लाश का अन्तिम संस्कार न करके भागीरथी नदी में बहा दिया गया।

राजा द्वारा सुमन जी के अस्तित्व को मिटाने का पूर्ण प्रयास किया परन्तु फिर भी  सुमन की वीरगाथा सुगंध की तरह ही फैलती चली गयी, इस वीरगाथा के साक्ष्य हैं  हिमालय के वे वृक्ष जिसकी छाँव में हमें स्वतंत्र होने का आनंद प्राप्त होता है, वे पहाड़ जिनसे हमें अपने कर्तब्य के प्रति अटल रहने, कभी ना झुकने व जीवन की ऊँचाइयों को छूने की प्रेरणा मिलती है

वह गंगा, भिलंगना, भागीरथी जैसे कई निरंतर प्रवाहित पवित्र नदियाँ जो किसी भी बाधा के समक्ष घुटने नहीं टेकती और अपने प्रयाण का मार्ग स्वयं ढूंड लेती हैं किन्तु दुर्भाग्य कि  आज हम उन मूल्यों को विस्मृत कर गए हैं जिन मूल्यों के लिए सुमन जी और उनके जैसे कई देशभक्तों ने समय-समय पर अपने जीवन का परित्याग कर पंचतत्व का आलिंगन किया था.

उन्होंने एक स्वतंत्र राज्य की ही नहीं अपितु कल्पना की थी एक ऐसे स्वतंत्र भारत वर्ष की, जो एक उन्नत, स्वाबलंबी, शांति का द्योतक, गौरवमयी राष्ट्र हो, जिसमें प्रत्येक नागरिक को पूर्ण स्वतंत्रता का अधिकार हो.

-गिरीश भट्ट

gireeshbhatt75@gmail.com


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आज उत्तराखण्ड के महान बलिदानी स्व० श्रीदेव सुमन जी की पुण्य तिथि है, स्व०  सुमन जी  को सत-सत नमन

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१९ नवम्बर १०४३ सुमन को आगरा जेल से मुक्त किया गया आगरा जेल से छोटने के पश्चात सुमन ने पुनह टिहरीराज्य में प्रवेश कर जन सेवा करने का निर्णय लिया !तो उनके कुछ शुभचिंतकों ने उन्हें टिहरी राज्य की भीषण स्थिति से अवगत कराया और खा की ऐसी स्थिति में टिहरी राज्य में प्रवेश करना खतरे से खाली नहीं हैं !


इस पर सुमन से उत्तर दिया मेरा कार्य क्षेत्र टिहरी में ही है वहीं कार्य करना व जनता के अधिकारों के लिए सामन्ती शासन के विरुद्ध लड़ना व मरना मेरा पुनीत कर्तब्य है !मैं अपने शरीर के कण-कण को नष्ट हो जाने दूंगा,किन्तु टिहरी राज्य के नागरिक अधिकारों को सामन्ती शासन के पंजे से नहीं कुचलने दूंगा !

१५ दिसम्बर १९४३ को उन्होंने जनरल मिनिस्टर को पत्र लिखा कि मैं शान्ति कि भावना से मिलना चाहता हूँ !१८ दिसम्बर को वो नरेंद्र नगर पहुंचे ,मुख्य पुलिस अधिकारी उन्हें टिहरी जाने कि अनुमति दे दी !


परन्तु थोड़ा आगे बढ़ते ही एक पुलिस अधिकारी ने उनके सिर टोपी उत्तराकर उन्हें बद्धी गालियाँ देते हुए उनकी टोपी को अपने जूते में फंसाकर फाड़ डाला और धमकी दी --घर गए तो घर को उखाड़ दिया जाएगा सुमन शांत रहे और एक सप्ताह घर पर विश्राम किया ,पुलिस बराबर उनके गाँव में उनके किर्या कलापों को देखती रही !