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Promote Rain water harvesting - बारिश के पानी को वचाने की मुहिम

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, July 27, 2010, 12:29:26 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Dosto,



जिस तरह से पहाड़ो में हर पानी की दिक्कत हो रही है! उसके कई कारण है, ग्लोबल वार्मिंग, पेड़ो का काटना आदि!  पहले समय लोग पहाड़ो में खाई बनाया करते थे ऊँचे-२ पहाडो में जिसमे बारिश का पानी को जमा किया जाता था और जब लोग अपने गाय भैसों को चराने के ले जाते थे इसी पानी को लोग इस्तेमाल करते थे! जिसके भैसिया खाई कहते थे लेकिन अब ये खाई गायब से हो गए है!     


उत्तराखंड के अगर भूमि के अंगार के पानी का स्टार को बचने की जरुरत है तो फिर से पुनः इन खाइयो को फिर से बचाना हो होगा जिससे की जमीन के अन्दर के पानी का स्तर बाद सकता है!     

इस मुहिम में सरकार ही अहम् भूमिका होगी !     


Regards,     


एम् एस मेहता

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


What is Rain Water Harvesting ?


Rainwater harvesting is the accumulating and storing, of rainwater.[1] It has been used to provide drinking water, water for livestock, water for irrigation or to refill aquifers in a process called groundwater recharge. Rainwater collected from the roofs of houses, tents and local institutions, or from specially prepared areas of ground, can make an important contribution to drinking water. In some cases, rainwater may be the only available, or economical, water source. Rainwater systems are simple to construct from inexpensive local materials, and are potentially successful in most habitable locations. Roof rainwater can be of good quality and may not require treatment before consumption. Although some rooftop materials may produce rainwater that is harmful to human health, it can be useful in washing clothes and in other tasks. Household rainfall catchment systems are appropriate in areas with an average rainfall greater than 200 mm (7.9 in) per year, and no other accessible water sources (Skinner and Cotton, 1992).

There are a number of types of systems to harvest rainwater ranging from very simple to the complex industrial systems. Generally, rainwater is either harvested from the ground or from a roof. The rate at which water can be collected from either system is dependent on the plan area of the system, its efficiency, and the intensity of rainfall (i.e annual precipitation (mm per annum) x square meter of catchment area = litres per annum yield) ... a 200 square meter roof catchment catching 1,000mm PA yields 200 kLPA.


Advantages :


Ground catchments systems channel water from a prepared catchment area into storage. Generally they are only considered in areas where rainwater is very scarce and other sources of water are not available. They are more suited to small communities than individual families. If properly designed, ground catchment systems can collect large quantities of rainwater.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720



मैंने अपने गाव में कुछ जगह सरकार के द्वारा बनाये गए खाई देखि लेकिन वहां पर भी भ्रष्टाचार! ठेकेदारों ने थोडा सा गद्दा खोदकर हलकी दिवाल बना कर पैसे खा गए!

इस khaaiyo को बनाने के लिए उचित जगह चुनना चाहिए ताकि इन पर पानी जमा हो सके! लेकिन इस प्रकार के कोई मानक प्रणाली वहां पर नहीं अपनाई जा रही है!


पंकज सिंह महर

बारिश का आधा पानी ही बुझा देगा उत्तराखण्ड की प्यास



रूफ-टाप रेनवाटर हार्वेस्टिंगजागरण/देहरादून/ उत्तराखंड में होने वाली बारिश की 50 फीसदी मात्रा से ही सूबे की न केवल 100 फीसदी प्यास बुझाई जा सकती है, बल्कि रोजाना की अन्य जरूरतों को भी पूरा किया जा सकता है। इसे समझकर ही नए नियम बनाए जा रहे हैं। सूबे में 'रूफ-टाप रेन वाटर हार्वेस्टिंग' की कवायद शुरू की गई है। वर्षा जल संग्रह का प्रावधान नए बनने वाले सरकारी व निजी भवनों के लिए अब अनिवार्य हो गया है।

गंगा-यमुना सहित अनेक नदियों का उद्गम स्थल इसी प्रदेश होने के बावजूद उत्तराखंड में जल संकट बढ़ता जा रहा है। एक तरफ भूजल स्तर गिर रहा है और जलस्त्रोत सूख रहे हैं तो दूसरी तरफ आबादी वृद्धि से पानी की मांग में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। आलम यह है कि गर्मी में पर्वतीय गांवों में ही नहीं, राजधानी में भी पानी की कमी समस्या बनती जा रही है। वैज्ञानिक आगाह कर रहे हैं कि तेजी से बदल रहे पर्यावरण की वजह से एक दिन पानी बेहद नीचे चला जाएगा और आम जनता को आसानी से मयस्सर नहीं होगा। माना जा रहा है कि इस समस्या का निदान ही वर्षा जल संग्रह है। पानी का प्राकृतिक शास्त्र यह है कि पृथ्वी पर दो-तिहाई भाग में होने के बावजूद 97 फीसदी खारे समुद्र के रूप में है। पीने योग्य सिर्फ तीन फीसदी पानी है। इसमें से दो फीसदी हिमखंडों और एक फीसदी नदियों के रूप में है।

अब बात उत्तराखंड की, राज्य में औसतन 1250 मिलीमीटर वर्षा के हिसाब से 53483 वर्ग किमी क्षेत्र में सालभर में 6,68,537 करोड़ लीटर पानी बरसता है। सूबे की 90 लाख आबादी को प्रति दिन 100 लीटर के हिसाब से एक साल में 32850 करोड़ लीटर पानी चाहिए। अर्थात कुल वर्षा का महज 50 फीसदी। अगर इस पानी का संचय किया जाए तो इसके लिए 526 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र की जरूरत होगी। बारिश के इस पानी का उपयोग करने को सरकार अब गंभीर नजर आ रही है। इस बारे में सचिव एमएच खान ने बताया कि सूबे में 'रूफ-टाप रेनवाटर हार्वेस्टिंग' को अनिवार्य कर दिया गया है। नए बनने वाले सभी सरकारी और निजी भवनों के लिए इस व्यवस्था को लागू करने का शासनादेश जारी कर दिया गया है। अब नए घर का मानचित्र वर्षा जल संग्रह के सुनिश्चित प्रबंध होने पर ही स्वीकृत किया जाएगा। इतना ही नहीं, पेयजल संकट क्षेत्र स्थित पुराने सरकारी भवनों में वर्षा जल संग्रह के निर्देश दिए गए हैं। पेयजल मंत्री मातबर सिंह कंडारी ने भी वर्षा जल संग्रह की सरकारी भवनों में संभावना व स्थिति पर रिपोर्ट तलब की है।

पंकज सिंह महर

Rainwater harvesting- The Hindi version

क्षेत्र कोई भी हो, बर्षा जल संचयन सभी के लिए जरूरी है। आर्किटेक्ट देव्यानी वर्षीजल संचयन के एक सिस्टम के बारे में बता रही हैं।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720



Rain water harvesting should be aggressively promoted in Uttarakhand through some programmes etc. People must be made aware about the importance of rain water harvesting.

The first and foremost things is to know the importance of rain water harvesting.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


It is is raining heavily in Pahad. There is need to implement rain water harvesting method.

लगातार वर्षा से जनजीवन अस्त-व्यस्त, नैनीताल में 60 मिमी

नैनीताल: सरोवरनगरी में बीते 24 घंटों से लगातार वर्षा के कारण जनजीवन अस्त-व्यस्त रहा। इस अवधि में यहां 60 मिमी वर्षा रिकार्ड की गई है। लगातार बारिश से पर्यटन गतिविधियां ठप रहीं और स्कूली बच्चों की फजीहत हुई। झील का जल स्तर 9 फिट एक इंच तक बढ़ जाने के बाद जल निकासी के लिए चैनल गेट खोल दिये गये हैं। इससे एक इंच पानी बलियानाले में बह रहा है।

नैनीताल में सोमवार शाम से वर्षा लगातार जारी है। जिसके चलते रोजमर्रा के कार्य बाधित हुए, वहीं कई स्थानों में भूकटाव हुआ है। नाले पूरे दिन उफान पर रहे। कई स्थानों में जल भराव के चलते लोगों को आने जाने में मुश्किलों का सामना करना पड़ा। सात नम्बर क्षेत्र में कई घरों के भीतर बारिश का पानी घुस आया। स्कूली बच्चों की बारिश में खूब फजीहत हुई और पर्यटन गतिविधियां भी पूरी तरह ठप रहीं। लगातार बारिश के चलते नैनी झील का जल स्तर नौ फिट एक इंच जा पहुंचा है। जिस कारण झील के चैनल एक इंच खोल दिए गए हैं। लोनिवि झील नियंत्रण कक्ष के एई एससी पांडे ने बताया कि बलियानाले को ध्यान में रखते हुए पानी कम मात्रा में छोड़ा जा रहा है। इधर जीआईसी मौसम केंद्र के मुताबिक 24 घंटों में 60 मिमी वर्षा रिकार्ड की गई। तापमान अधिकतम 23 व न्यूनतम 16 डिग्री सेल्सियस रिकार्ड किया गया। आर्द्रता अधिकतम 95 व न्यूनतम 75 प्रतिशत रही। मौसम विभाग के निदेशक डा.आनंद शर्मा के मुताबिक मानसून कुमाऊं में सक्रिय है और 24 घंटे तक सक्रिय रहने का अनुमान है। पर्वतीय क्षेत्रों में अधिक वर्षा होगी।

हेम पन्त

A general idea through a graphical representation on how we can implement Rain Water Harvesting Technique in our Homes..



kavindra Singh koshyari/ कविन्द्र सिंह कोश्यारी

लगभग एक सदी पूर्व बनाई गयी खाई...................

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Quote from: kavindra Singh koshyari/ कविन्द्र सिंह कोश्यारी on July 29, 2010, 07:36:13 PM
लगभग एक सदी पूर्व बनाई गयी खाई...................

Welcome back Koshiyari Ji... After a long gap.

Yah we recall our childhood days when we used to in Jungle / dhura, we found many Khayee.. made at many place for water conservation.

But now these all khaiyees are missing. There is need to make such khayees again for water harvesting.